नरेन्द्र - बराक मैत्री भारत अमेरिकी दिव्य दर्शन
भारतीय वाङ्मय में मैत्री के अनेकानेक उदाहरण हैं। पौराणिक एवं औपनिषदिक मैत्री संबंधी संदर्भ आज लोगों को धार्मिक रहस्यकर लग सकता है इसलिये रामायण और महाभारत दो भारतीय महाकाव्यों में आकर्षक मैत्री के जो उपाख्यान हैं इन दोनों महाकाव्यों पर दृश्य-श्रव्य लोक सीरियलों ने आसेतु हिमाचल भारतीय मानुषों ने एकाग्रचित्त होकर रामायण और महाभारत सीरियलों के निर्माता रामानंद सागर और बलराज चोपड़ा की मनमोहक तथा आकर्षक शैली का मनोयोगपूर्वक फिल्मांकित राष्ट्रीय आनंदातिरेक का रसास्वादन किया। इन सीरियलों में राम-केवट मैत्री, राम-सुग्रीव मैत्री प्रसंगों से दर्शक भावविभोर थे। महाभारत सीरियल में कर्ण-दुर्योधन मैत्री, कृष्ण-श्रुतदेव मैत्री, कृष्ण-सुदामा मैत्री के अलावा मैत्री प्रकरण के अनेकानेक आख्यान-उपाख्यान कथ्य हैं। द्वितीय विश्व युद्ध में चर्चिल-रूजवेल्ट मैत्री को कूटनीतिक रणनीति का महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। ताजा उदाहरण नरेन्द्र दामोदरदास मोदी एवं ओबामा बराक हुसैन की अश्रुतपूर्व मैत्री का है। भारत में मैत्री के सर्वज्ञ संत विनोबा भावे हुए हैं जिन्होंने मैत्री भाव को भारतीय ब्रह्मचर्यत्त्व से जोड़ कर देखा तथा मैत्री भाव का एकदम नूतन दर्शन शास्त्र संसार को उपलब्ध कराया। यहां हमारे विवेचन का लक्ष्य विरूद्ध शीलाचार व्यक्तित्त्वों के मध्य हार्दिक मैत्री भाव उदय होने के उच्च मानवीय भावना दर्शन से है। संयुक्त राज्य अमेरिका की राजसत्ता भारतीय गणतंत्र के घटक राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को अमेरिका पहुंचने के लिये पारपत्रस-वीजा देने को तैयार नहीं था। अमेरिकी राजतंत्र की राजनीतिक मान्यता बन गयी थी कि नरेेन्द्र दामोदरदास मोदी इस्लाम धर्मावलंबी व्यक्तियों को राजधर्म पथ में नहीं सुहाते। संयुक्त राज्य अमेरिका तीस लाख भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों के अलावा हैं जिनमें एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा गुजराती भारतीयों का है जो नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का अभिवादन कर विश्व उद्यम व्यवसाय पटल में गुजराती शिष्टाचार ‘केम छो’ को विश्वव्यापी बनाना चाहते थे। महात्मा गांधी का सत्य-अहिंसा का मानव दर्शन विश्व अहिंसा दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रति वर्ष गांधी जंयती दूसरी अक्टूबर को मनाया जाता है। गुजराती भाषी महात्मा गांधी ने अपनी मातृभाषा के जरिये आधुनिक विश्व मानवता को जो मार्गदर्शन उपलब्ध कराया उसे हिन्द स्वराज के बीस अध्यायों में अभिव्यक्ति मिली है। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने न्यूयार्क में जो मनोहारी संबोधन दिया अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा बराक हुसैन ने वाशिंगटन में गुर्जर गिरा में ‘केम छो प्राइम मिनिस्टर’ संबोधन से आत्मीयता का इजहार किया। शुद्ध जैनी शाकाहारी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जब संयुक्त राष्ट्र संघ व अमेरिकी राजधानी वाशिंगटन में यत्र तत्र अपना जीवन दर्शन का गुरू मंत्र व्यक्त कर रहे थे तो वे नौरता-दरबा गुजराती पद्धति का शारदीय नवरात्र आराधक विधि से व्रती थे। केवल जल से दैनिक व्रतचर्या पारण करते थे। महाभारत व रामायण महाकाव्यों में भक्त अंबरीष - एकादशी व्रत द्वादशी पारण विधि का आचरण करने वाले नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की जीवन शैली से अत्यंत प्रभावित ओबामा बराक हुसैन को महसूस हुआ कि उन्हें मनोवांछित मित्र मिल गया है। ओबामा अपने हाथ में बाइबिल रखते हैं तो नरेन्द्र मोदी श्रीमद्भगवदगीता। बाइबिल और श्रीमद्भगवदगीता की राजविद्या शक्ति ने दोनों अद्वितीय राजनीतिक नेतृत्त्व में अद्भुत प्रतीकों में विश्व राजनीति के लिये एक नया कूटनीतिक मील का पत्थर निर्मित किया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति की अधिकतम पदारोहण अवधि आठ वर्ष होती है। बराक हुसैन ओबामा अमेरिकी सत्ता संस्थान के राष्ट्रपतित्त्व के उत्तर काल में हैं। वे पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जिन्होंने अमेरिकी सत्ता शीर्ष पर पहुंचते ही दिखा कर अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नया निखार उपलब्ध कराया। संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय लोकतंत्र के शोडषी लोकसभा के पंद्रहवें प्रहरी भारत की सामान्य ग्रामीण स्थितियों से उभर कर आगे आने वाले ऐसे नेतृत्त्व के प्रतीक हैं जो स्वामी विवेकानंद व महात्मा गांधी के दरिद्रनारायण गरीबी की शाश्वत मूर्त्ति में ईशरत्व देखने के आदी हैं। स्वामी विवेकानंद तो सन्यस्त तथा ब्रह्मचारी थे पर महात्मा गांधी ने भारतीय वैष्णव समुदाय को झकझोरा। उन पर गुजराती भक्त कवि नरसी मेहता की दशधा भक्ति का प्रभाव था। वैष्णव तो वही है जो पराई पीड़ा समझता है। नरेन्द्र मोदी में ‘पीर पराई जाणे रे’ कूट कूट कर भरी हुई है। नरेन्द्र मोदी का समूचा व्यक्तित्त्व राष्ट्र को, मानवता को समर्पित है। उस माता का अहोभाग्य है जिसने अपने लाल को भारत भूमि का, भारत के गरीब लोगों की सुध लेने वाला, राजसत्ता पाकर न इतराने वाला सपूत जन्मा। हिन्दुस्तान के लोगों से ज्यादा नरेन्द्र मोदी के गुणों की गुण ग्राहकता का भान बराक हुसैन ओबामा को हुआ। उन्हें लगा कि दुनिया के दूसरे गणतंत्रात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नये युग का प्रादुर्भाव नरेन्द्र मोदी के आगमन से हुआ है। बराक हुसैन ओबामा गृहस्थ हैं तथा दो कन्याओं के पिता एवं अमेरिका की प्रथम महिला मिशेल ओबामा के पति हैं। मिशेल अपने पति का साथ उसी तरह दे रही हैं जिस तरह भारत के प्रथम पृथिवी पति राजा पृथुश्रवा की रानी अर्चि अपने पति के साथ कदम से कदम मिला कर चलती थी। पृथुश्रवा जिनके उद्यम के कारण धरती का नाम पृथ्वी भी पड़ा जिसे पश्चिमी सभ्यता ‘प्लेनेट’ संबोधन देती है इस धरती में बराक हुसैन ओबामा व नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की अटूट मैत्री आने वाले दो वर्षांे में विस्तारवादी, आर्थिक उद्यमिता यहां तक कि इन्फार्मेशन तकनालाजी में सार्वभौमता संपन्न तथा एकतांत्रिक चीन से संयुक्त राज्य अमेरिका उसके मित्र राष्ट्र तथा भारत के साथ अमेरिकी मैत्री प्रकरण महाभारत महाकाव्य के आदिपर्व के संभव उप पर्व रंगभूमि में वृषसेन नंदन राधेय कर्ण का प्रवेश तथा युवा महाराज कुमार दुर्योधन ने आचार्य द्रोण की अनुमति लेकर राधेय कर्ण के रंगमंच प्रवेश पर कुंती नंदन पार्थ अर्जुन के ‘अनाहुतोपसृृृृष्टानाम् अनाहुतोऽपि जल्पिनाम्’ कहने पर कर्ण ने कहा - यह रंगमंच तो सर्वसामान्य के लिये है। बल एवं पराक्रम में श्रेष्ठ जन रंगभूमि में अपना कौशल प्रदर्शित कर के पात्रताधारक हैं। रंगभूमि में कर्ण और पार्थ अर्जुन का रण कौशल देखने के लिये शारद्वत कृपाचार्य ने कहा - ‘अयम् पृथायास्तनयः कनीयान् पाण्डुनंदनः कौरवो भवता सार्धम् द्वन्दयुद्धः करिष्यति’। कुंतीनंदन पार्थ अर्जुन द्वारा ‘अनाहूत’ योद्धा के लिये संशय किये जाने पर दुर्योधन की अहैतुक तात्कालिक मैत्री ने राधेय कर्ण को अंग नरेश घोषित कर राजवंशीय सम्मान दे डाला। दुर्योधन-कर्ण की मैत्री महाभारत महाकाव्य की अद्वितीय कड़ी है। राजनीति वह आन्वीक्षिकी षडविद्या राजनीति के विशारद निरायुध तथा स्वयं राज्य न करने वाले वासुदेव श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा - वह पाण्डव पक्ष में सम्मिलित हो जाये पर विजयी होने पर हस्तिनापुर के चक्रवर्त्ती सम्राट होने के लालच में कर्ण ने दुर्योधन से मैत्री त्याग नहीं किया। दुर्योधन कर्ण की मित्रता को वासुदेव श्रीकृष्ण का यह आश्वासन भी तुड़वा नहीं पाया कि कर्ण को युधिष्ठिर हस्तिनापुर का चक्रवर्त्ती सम्राट घोषित करेगा। मैत्री का बंधन कर्ण ने लालच के बावजूद तोड़ा नहीं। कर्ण जानता था कि महाभारत युद्ध में विजय उसी की होनी है जिसके साथ श्रीकृष्ण हैं। लालच में आकर कर्ण ने अपने आश्रय दाता दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा। इसी को कहते हैं घनी मित्रता। आज विश्व रंगमंच में बराक हुसैन ओबामा और नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के बीच जो मैत्री बंधन हुआ है वह अपने किस्म का अद्भुत मैत्री धर्म है। विस्तारवादी चीन तिब्बत की सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करने में लगा है, सिक्यांग व हांगकांग में भी असंतोष उभर रहा है। चीन की इस विस्तारवादी नीति का सामना भारत व संयुक्त राज्य अमेरिका मिलकर कर सकते हैं। भारत व अमेरिका दोनों लोकतांत्रिक देश हैं। यहां लोकमत का प्रभुत्त्व होने के साथ साथ विचार स्वातंत्र्य व अभिव्यक्ति का लोकाधिकार उपलब्ध है जिसका कि चीन में अभाव है। पिछले 55-56 वर्षों से तिब्बती धर्मगुरू परमपावन दलाई लामा भारत में रह रहे हैं। आप्रवासी तिब्बती बौद्ध संसद भारत में रह कर प्रवासी तिब्बत सरकार का संचालन करती है। राज्य है, राष्ट्र है, तिब्बती बौद्धों का चीन व पेइचिंग से भाषायी, सांस्कृतिक, आस्थामूलक किसी भी क्षेत्र में एकरूपता नहीं है। तिब्बत पर चीन के जबरन कब्जे के लिये दुनियां की उन ताकतों के जो स्वतंत्र राष्ट्रों की स्वायत्तता के पक्षधर हैं, प्रवासी तिब्बती सरकार जो भारत के घटक राज्य हिमाचल के धर्मशाला नाम के स्थान से संचालित है उसे मान्यता देने का पर्व आगया है। बराक हुसैन ओबामा व नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की अटूट व्यक्तिगत मैत्री ही तिब्बत के अस्तित्त्व को सुरक्षित कर सकती है। चीनी सत्ता भारत के अरूणाचल प्रदेश को अपना भू क्षेत्र बतलाती है। यह समस्या तभी हल हो सकती है जब भारत व अमेरिका मिल कर तय करें कि तिब्बत व चीनी तुर्किस्तान चीन के भू भाग नहीं हैं। माओ-त्से-तुंग के नेतृत्त्व में चीन का विस्तारवाद बढ़ा किन्तु सोवियत संघ ढह गया। विलोम धर्मिता तथा विरूद्ध स्वभाव के बावजूद भी मैत्री का बंधन अद्वितीय परिणामदायक हुआ करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के स्वागत तथा उनकी लगन से प्रभावित होकर बराक हुसैन ओबामा ने भारतीय गणराज्य के ६६वें गणतंत्र समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित होने के नरेन्द्र मोदी के आग्रह को तत्काल स्वीकार किया और मैत्री विकसित हुई तथा वैयक्तिक संबंधों में तब्दील हो गयी। चाय पर चर्चा हुई, गुफ्तगू हुई, बहुत से अहम अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के बिन्दु जिन पर दो विश्वनेताओं में वार्त्ता हुई उसका परिणाम आने वाले वर्षों में दिखेगा। आज संसार में जो आततायी तंत्र जिहादियों ने शुरू किया है उस पर कारगर नियंत्रण के उपायों पर अमेरिका और भारत सोच रहे हैं, मनन, चिंतन, विचार-विमर्श कर आततायी प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के प्रयास निरंतर चल रहे हैं।
भारत में ख्रिस्ती धर्मावलंबी अपेक्षाकृत कम हैं पर इस्लाम धर्मावलंबियों की संख्या भारत में हिन्देशिया के बाद दूसरे नंबर पर है। ख्रिस्ती धर्मावलंबन धर्मान्तरण के सिद्धांत का अनुयायी है। संयुक्त राज्य अमेरिका की कुल आबादी 31,88,92,103 है। वहां की लोकभाषा अमेरिकी अंग्रेजी है। धर्मावलंबियों की कतार में जायें तो 52 प्रतिशत जनता प्रोटेस्टेंट, 24 प्रतिशत रोमन कैथोलिक, 2 प्रतिशत मोमिन, 1 प्रतिशत यहूदी, 1 प्रतिशत इस्लाम धर्मावलंबी, अन्य धर्मावलंबी 10 प्रतिशत। जनसंख्या के दस फीसदी लोग किसी भी मजहब से जुड़े नहीं हैं। ख्रिस्ती धर्म व इस्लाम धर्म धर्म प्रचार व धर्मांतरण पर विश्वास करने वाले मजहब हैं। आज की दुनियां में मजहब या धर्म के नजरिये से जनसंख्या की सांख्यिकी में ऊँचे आसन पर ख्रिस्ती मजहब है। दूसरे क्रम में इस्लाम, तीसरे क्रम में हिन्दू मजहब आता है। मजहब के नजरिये से हिन्दू धर्म शास्त्र के अंतर्गत धर्मान्तरण का कोई प्रावधान नहीं है। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा सत्यार्थ प्रकाश प्रस्तुतीकरण स्वामी श्रद्धांनद ने शुद्धि अभियान पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में चालू किया। शुद्धि आंदोलन पूरी तरह विफल रहा। महात्मा गांधी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थापना दिवस वसंत पंचमी सन् 1916 में काशी में मदन मोहन मालवीय जी से अनुरोध किया था कि वे काशी विद्वत् परिषद के परामर्श लेकर यह बताने का कष्ट करें कि क्या हिन्दू धर्म में छुआछूत शास्त्रसम्मत है ? महामना मदन मोहन मालवीय ने महात्मा गांधी को कहा कि वे तो स्वयं ही छुआछूत परम्परा से मानते आरहे हैं इसलिये छुआछूत के बारे में शास्त्रीय मत क्या है इस बारे में ठीक-ठीक बताने की स्थिति में मैं नहीं हूँ। हां मैं सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन से अवश्य ही अनुरोध करूँगा कि छुआछूत शास्त्रोक्त है या नहीं इसका विवेचन करें। डा. राधाकृष्णन ने दोनों नेताओं को कहा कि छुआछूत तो वे भी परम्परा से मानते आरहे हैं परन्तु महात्मा गांधी जी के महत्त्वपूर्ण प्रश्न कि क्या अस्पृश्यता धर्म शास्त्रोक्त है ? इसे सही-सही बताने के लिये वे एक पखवाड़े का समय चाहते हैं। एक पखवाड़े के बाद सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन ने महात्मा जी की समस्या का निस्तारण करते हुए कहा - वेदों व स्मृतियों में छुआछूत का शास्त्रोक्त उल्लेख कहीं पर भी होने का कोई प्रमाण इन धर्मग्रन्थों में मुझे नहीं मिला। संभवतः यह मान्यता किन्हीं अज्ञात कारणों से परम्परा से चली आरही है या यह भी हो सकता है कि भारत में इस्लाम के आगमन से छुआछूत मानने की परिपाटी शुरू हुई हो।
संप्रति केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के पदारूढ़ होने के पश्चात ‘घर वापसी’ के नाम पर धर्मान्तरण को प्रच्छन्न रूप से बढ़ावा दिया जारहा है। पहली जरूरत इसलिये यह है कि धर्म के मूल तत्त्व के वास्तविक शास्त्र ज्ञाताओं को सामूहिक रूप से हिन्दू धर्म में दूसरे धर्मों से धर्मान्तरण चाहे उसे हम शुद्धि आन्दोलन कहें या घर वापसी कहें जो धर्मावलंबी एक बार धर्म छोड़ चुका है क्या उसे पुनः हिन्दू धर्म के परिवेश में सम्मिलित किया जाना धर्मसम्मत है ? भारत में हिन्दू धर्मावलंबियों की संख्या कुल जनसंख्या का 82 प्रतिशत है, शेष अठारह प्रतिशत लोग ईसाई या अन्य धर्मावलंबी हैं। इतर धर्मावलंबियों के समूह में निन्यानब्बे प्रतिशत लोग हिन्दू से मुसलमान या ईसाई बने हैं। इन दोनों मजहबों में मजहब बदलो की प्रक्रिया है और वो उसका अनुसरण भी करते हैं। नरेन्द्र मोदी व बराक हुसैन ओबामा के बीच आर्थिक, व्यापारिक, सामरिक तथा तक्नालाजी संवर्धन के क्षेत्र में अनेक समझौते हुए। ओबामा दम्पत्ति भारत की सांस्कृतिक विविधता से बहुत प्रभावित हुए। कुछ विवेचकों का मानना है कि सिरी फोर्ट भारतीय संविधान की धारा 25 का उल्लेख करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने जो संदेशा सिरी फोर्ट से दिया वह चिन्तनीय व मननीय होने के साथ साथ धार्मिक सहिष्णुता का पथ प्रदर्शक भी है। कुछ लोगों का मानना है कि बराक हुसैन ओबामा धार्मिक स्वातंत्र्य संबंधी वक्तव्य अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारी समझते उनका विचार विमर्श होना है। विश्व हिन्दू परिषद सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समस्त आनुषंगिक संगठनों का राष्ट्रीय कर्त्तव्य है कि शुद्धि अथवा घर वापसी सरीखे अभियान सनातन धर्म की धार्मिक भावना के प्रतिकूल आचरण हैं। विश्व की धार्मिक श्रद्धा वाली जनसंख्या में विश्व मानव समुदाय के एक अरब से ज्यादा लोग मजहबी पहचान सुनिश्चित करने के आकांक्षी हैं और वे लोग जो संत विनोबा की धर्म शैली पर यकीन करते हैं वे कहते रहे हैं - ‘श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिन्दा अप्यत्र क्वापि हि’। भागवत धर्म शास्त्र में श्रद्धा दूसरे धर्म शास्त्रों की अनिंदा या श्रद्धा करना मजहबी पहचान का शीर्ष तत्त्व है। भारत के प्रधानमंत्री जी के धर्मान्तरण के नये नये तरीकों पर रोक लगा कर भारत के सर्वोच्च न्यायालय में यह भावना करना कि क्या हिन्दू धर्म के नाम से पुकारे जाने वाले मजहबी विचार को भारतीय सुप्रीम कोर्ट के विचार हेतु प्रस्तुत किया जाये कि क्या धर्मान्तरण सनातन धर्म, उसकी अनेक शाखायें वैष्णव, शैव व शाक्त समाजों में धर्मान्तरण याने दूसरेेेेेे इतर धर्म से हिन्दू धर्म में प्रवेश ग्राह््य है ? क्या संविधान की धारा 25 के संदर्भ में हिन्दू धर्म एक मजहब या रिलीजन की मजहबी चौखट में फिट बैठता है या हिन्दू जीवन शैली एक सनातन मानव धर्मिता का प्रतीक मात्र है जिसमें ऊँकार, गंगा, गाय, गायत्री में सभी अथवा किसी एक दो या तीन का मान्यता देने वाले मजहब या रिलीजन को भारत धर्म कहा जा सकता है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
No comments:
Post a Comment