Friday, 20 February 2015

नीर क्षीर विवेक का राष्ट्र पर्व मानसरोवर

  हिन्दुस्तान में आम धारणा है कि मानसरोवर का राजहंस नीर क्षीर विवेक प्रदाता है। भारत के प्रधानमंत्री की आगामी चीन यात्रा सड़क पथ से नाथूला दर्रा होकर तिब्बत(त्रिविष्टप) प्रवेश करने, मानसरोवर कैलास यात्रा संपन्न करने के बाद विश्व के सव्य शक्तिशाली भारत के उत्तरी पड़ोसी राष्ट्र चीन की हिन्दू 14 अप्रेल 2015 के पश्चात मेष का सूर्य वसन्त का उत्तरार्ध माओ राजधानी पेइचिंग पहुंचने का संकल्प लिया गया है। यह यात्रा अप्रेल 2015 के उत्तरार्ध अथवा मई 2015 में संपन्न हो सकती है। चीन की राजधानी की कूटनीतिक यात्रा से पहले भारत में मानस व केदारखंडों के दो मध्यवर्त्ती हिमालयी उत्तरवर्त्ती तिब्बत पठार मेें एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ मानसरोवर है। डाक्टर राममनोहर लोहिया की ननिहाल अल्मोड़ा में थी। मारवाड़ी पहाड़ी आलू आढ़ती द्वारका प्रसाद अग्रवाल उनके मामा थे। उनकी नानी भी अपने लाड़ले बेटे द्वारका प्रसाद अग्रवाल के साथ अल्मोड़ा में ही रहती थीं। मारवाड़ी मामा के अलावा कुमइयां महिलाओं से ठेठ कुमइयां में बतियाती थीं। शांतिलाल त्रिवेदी जब पंडित नेहरू के लिये अस्कोट के काश्तकारों की दुःख भरी कहानी का गांव गांव घर घर जाकर अहवाल तैयार कर रहे थे। यूरप से भारत लौटने पर चेन्नई में हिन्दू अखबार में अपना लेख देने के लिये अपने पिता श्री हीरालाल लोहिया से कोलकाता में मिलने के पश्चात वे अकबरपुर होते हुए अल्मोड़ा गये। उन्हें जब पता चला कि राजकोट गुजरात निवासी शांतिलाल त्रिवेदी अस्कोट के खायकर सिरतानों की दुख दर्द भरी दास्तान के आंकड़े तैयार कर रहे हैं तो डा. राममनोहर लोहिया को मानसरोवर की मालगुजारी अस्कोट के रजवार के खजाने में जमा होने के प्रमाण मिले। 1949 में जब पंडित नेहरू ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानने का ऐलान किया डा. राममनोहर लोहिया के कैलास मानसरोवर के भारतीय भूभाग होने का प्रसंग उठाया। डा. लोहिया स्वयं भी कैलास मानसरोवर और राकसताल की यात्रा कर चुके थे। मूलतः मिलम निवासी के.सी.आई. सर नैन सिंह के पौत्र दुर्गा सिंह रावत स्वतंत्रता सेनानी थे। समाजवादी विचारधारा रखते थे। डा. रामनोहर लोहिया प्रति वर्ष गर्मियों में रावत जी के घर झलतोला टी इस्टेट जाया करते थे। कुमांऊँ की पहाड़ियों की वादियां महात्मा गांधी को सुन्दर लगती थीं। पंडित नेहरू अल्मोड़ा रानीखेत नैनीताल के चक्कर लगाया करते थे। उनका मन था कि बुढ़ापे में रानीखेत रहेंगे। बात सन 1931 की है, मैसूर के महाराज जयचाम वाडियार महारानी शिवांगी सहित कैलास मानसरोवर यात्रा के लिये 26 जून 1931 के दिन बेरीनाग पहुंचे। स्वामी रामतीर्थ, सेठ तुलसीराम भाटिया मुंबई से कैलास मानसरोवर यात्रा के लिये अल्मोड़ा पहुंच चुके थे। महात्मा गांधी की आज्ञा पाकर शांतिलाल त्रिवेदी ने भी कैलास यात्रा का संकल्प लिया। पत्नी भक्ति त्रिवेदी को राजकोट भेज दिया। अल्मोड़ा से झलतोला आये। पंडित नैन सिंह की पौत्रवधू स्वातंत्र्य वीर दुर्गा सिंह रावत की धर्मपत्नी तुलसी रावत धर्मपरायणा थी। विद्वान ब्राह्मणों को बुला कर कथायें सुनती थी। उन्होंने अपने पति दुर्गा सिंह रावत व उनके मित्रों को कहा - कैलास मानसरोवर यात्रा सव्यूं करो, विव्यूं नहीं। सव्यूं व विव्यूं कुमांऊँनी भाषा के शब्द हैं। सव्यूं का मतलब बांये से दांये को विव्यूं का मतलब दायें से बांये होता था। तुलसी रावत ने कहा - ये शांतिलाल जी ब्राह्मण हैं। सौराष्ट्र सोमनाथ राजकोट से कुमांऊँ आये हैं। इनकी यात्रा का सव्य मार्ग मिलम, कुगरी बिगरी कैलास मानसरोवर है। जब दुर्गा सिंह रावत ने अपनी पत्नी से कहा - महाराज मैसूर व महारानी शिवांगी डीडीहाट, धारचूला, कालापानी, गर्ब्यांग होते हुए लिपुलेख दर्रे को पार कर तकलाकोट होते हुए कैलास मानसरोवर यात्रा कर रहे हैं। वे राजपुरूष हैं, सनातन धर्मावलंबी राजा में विष्णु भगवान के दर्शन करते हैं। वे इस सृष्टि के पालनकर्त्ता हैं इसलिये राजपुरूष लिपुलेख होकर कैलास मानसरोवर यात्रा कर सकते हैं परंतु भगवान शंकर के अनन्य भक्तों के लिये गौरी नदी के किनारे किनारे चल कर मिलम ग्लेशियर से ऊँटाधूरा, कुगरी बिगरी दर्रा ही शास्त्र सम्मत है। कैलास मानसरोवर यात्रा के ये दो दल क्रमशः लिपुलेख व कुगरी बिगरी होकर कैलास मानसरोवर यात्रा पर पहुंचे। शांतिलाल त्रिवेदी ने अल्मोड़ा से लेकर वापस अल्मोड़ा 7.9.1931 के दिन पहुंने का ब्यौरा अपनी यात्रा डायरी में दिया है। महाराज मैसूर व महारानी शिवांगी की कैलास मानसरोवर तीर्थयात्रा के अलावा नैनीताल से स्वामी विद्यानंद सरस्वती और रामकृष्ण मठ तथा रामकृष्ण मिशन मायावती जिला चंपावत के स्वामी प्रणवानंद जी भी कैलास मानसरोवर यात्रा संचालन कराया करते थे। भारत सरकार के विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने चीनी गणराज्य के सत्ताधिष्ठान से परामर्श के पश्चात सिक्किम के नाथूला दर्रे होकर भारत से सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर कैलास यात्रा का वैकल्पिक मार्ग सुनिश्चित किया गया है। समझा यह भी जारहा है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी सड़क मार्ग द्वारा कैलास मानसरोवर यात्रा नीर क्षीर विवेक पर्व मानसरोवर के राजहंस समूह दर्शन कर संपन्न करेंगे। उत्तराखंड सरकार कुमांऊँ मंडल विकास निगम के माध्यम से पिछले कई वर्षों से कैलास मानसरोवर यात्रा संपन्न करा रही है। राज्य सरकार राज्य विधान मंडल के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है कि वह यह साबित करे कि कैलास मानसरोवर यात्रा का सव्य पथ लिपुलेख दर्रा है। कुमांऊँ मंडल विकास निगम जब ये कैलास मानसरोवर यात्रा प्रबंधित कर रहा है उसे कैलास मानसरोवर यात्रा का सटीक विवरण जन सामान्य के संज्ञान में लाने का कार्य संपन्न करना चाहिये। साथ ही जिन कैलास मानसरोवर यात्राओं के विवरण यात्राकर्त्ता व्यक्तियों के वंशजों से मिल सकते हैं उसके लिये प्रयास करना चाहिये। पूर्व में इस ब्लागर ने उत्तराखंड सरकार का ध्यानाकर्षण रामानंद सागर सृजित रामायण सीरियल तथा बलराज चोपड़ा रचित महाभारत सीरियल में तत्कालीन ऐतिहासिक महत्त्व के प्रसंग आये हैं भारत सरकार से अनुरोध करना कि रामायण व महाभारत सीरियलों में मानसखंड व केदारखंड के मध्यवर्त्ती हिमालयी क्षेत्रों के भौगोलिक राजवंश वर्णनात्मक तथ्य सीरियलों में वर्णित हैं। उनकी भू भौगोलिक तथा ऐतिहासिक स्थितियों का विश्लेषणात्मक अनुसंधान कर उत्तराखंडके मानसखंड क्षेत्र के मत्स्य नरेश (वर्तमान मासी जिला अल्मोड़ा) कूर्म (कूर्मांचल का इलाका जो चंपावत जनपद में है) अल्मोड़ा जनपद का वारामंडल डिवीजन जो वाराही देवी का प्रतिमा क्षेत्र है। मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण तथा वाराह पुराण कुमांऊँ के इन दो जिलों चंपावत व अल्मोड़ा से संबंधित हैं। कालिदास महाकवि का जन्मस्थान डाक्टर शिवानंद नौटियाल के अनुसार चमोली गढ़वाल है परंतु रघुवंश महाकाव्य में कालिदास ने राजा दिलीप को वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु सखा को अयोध्या से सरयू के तटवर्ती इलाके होकर अल्मोड़ा जनपद में सेराघाट से पहाड़ की चढ़ाई में वर्तमान में जागेश्वर नाम से पहचाने जाने वाले दारूका वन तक घास चुगाने के लिये लाया। दिलीप ग्वाले थे व नंदिनी गौ थी जिसे वे हरी हरी घास चुगाते चुगाते दारूका वन तक ले आये। महाकवि कालिदास की दूसरी कृति कुमार संभव है  जिसमें यक्षिणी की विरह गाथा का वर्णन है। वर्तमान छत्तीसगढ़ में रामगिरि नामक पर्वत में खरोष्ट्री लिपि में विरही यक्ष ने अपनी प्रेयसी यक्षिणी जिसे अल्मोड़ा में जाखन देवी का मंदिर कहा जाता है वह वस्तुतः विरहिणी यक्षिणी का ही मंदिर है। इसलिये तात्कालिक जरूरत यह है कि कालिदास काव्य के विभिन्न स्थलों का जो उल्लेख है, कालिदास के जन्म स्थान कालिदास काव्यभूमि का विश्लेषण करने का उत्तरदायित्त्व उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय अथवा हेमवती नंदन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय, कुमांऊँ विश्वविद्यालय जो भी कालिदास साहित्य के आधार पर कालिदास जन्मभूमि तथा कालिदास कर्मभूमि विश्लेषण पूर्ण अध्ययन कर कालिदास साहित्य को भारत की नयी पीढ़ियों के लिये उपलब्ध कराया जाये। उत्तराखंड सरकार ने संस्कृत भाषा को व्यावहारिक भाषा स्वरूप देने का संकल्प लिया है। जरूरत इस बात की है कि संस्कृत, प्राकृत, पाली, तद्भव नैपाली, तद्भव कुमांऊँनी, तद्भव गढ़वाली, तद्भव जौनसारी बोलियों को क्षेत्रीय भाषायी स्थिरतादायक महत्त्व उपलब्ध कराने के लिये नागरी लिपि में इन भाषाओं के पर्यायवाची शब्द संस्कृत उच्चारण, प्राकृत उच्चारण, पालि, नैपाली, कुमांऊँनी व गढ़वाली उच्चारण का अंग्रेजी भाषा में उस शब्द का भाषान्तरण। ऐसी भाषायी इनसाइक्लोपीडिया निर्मित करने से जहां कुमांऊँनी, गढ़वाली व नैपाल अंतर्भाषायी संवाद सुरूह हो जायेगा तथा शासन के भाषायी भ्रांति का संशय निवारण होगा। विशेष ध्यान देने योग्य बिन्दु यह भी है कि प्राकृत जो मौजूदा तद्भव भाषाओं की जननी है उसे नष्ट होने से बचाया जाये। कुमांऊँ में ही जहां पारम्परिक कुमांऊँनी बोली बोली जाती है उसके बारह रूप हैं। पूर्व में डोटियाली मिश्रित सोर्याली, कुमूं में डोट्याली सह कुमय्यां बोली (यह बोली सबसे ज्यादा मीठी तथा होली गाने वाले चांचरी, झोड़ा, भगनौला गाने वालों की प्रिय बोली है) दारमा व्यास चौंदास में बोली जाने वाली कुमइय्यां में तुणिया-खंपा पुट है। जोहार की कुमइय्यां या शौकी बोली वैष्णव पंथी है। दानपुर की दनपुरिया, गंगोली की संस्कृतनिष्ठ कुमइय्यां, अल्मोड़ा चौगर्खा खास परजा व सालम की बोलियां बौरारौ-कैड़ारौ की समृद्ध कुमइय्यां, अल्मोड़ा खास परजा की अल्मोड़िया, पाली की समृद्ध कुमांऊँनी, फल्दाकोट और छखाता में बोली जाने वाली कुमइय्यां इन सबके अलावा बागेश्वर, अल्मोड़ा, रानीखेत, नैनीताल पुरूष वर्ग की सांकर कुमइय्यां तथा महिला समाज में विशेष तौर पर साह परिवार समूहों में स्त्री समाज में प्रयुक्त भाषायी स्वरूप को कुमइय्यां ऐण कुमइय्यां मुहावरे बलबलन्त वाली हिन्दी में जिसे अफवाह कहा जाता है उसका स्वरूप कुमइय्यां में बदलाव वाला है। खबरें मिली हैं कि भाषायी विषय के रूप में कुमइय्यां कुमांऊँ विश्वविद्यालय में पढ़ायी जारही है। पहली जरूरत यह है कि उच्चारण शैली के अनुसार नागरी लिपि में कुमइय्यां अक्षर संख्या व शब्द शक्ति सामर्थ्यवान बनाने के लिये नागरी लिपि में भाषायी अनुकूलता स्वाभाविक उच्चारण की दृष्टि से कुमइय्यां भाषा की बारह प्रमुख बोली क्षेत्रों में उच्च शिक्षित, शिक्षित, साक्षर तथा निरक्षर संवादकर्त्ताओं के ध्वन्यालोक को नटराज राज के पंद्रह डमरू स्वरों से निसृत ध्वनियों के आधार पर स्वर व्यंजनों में कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग तथा वर्ग रहित व्यंजनाक्षर स,ष,श,ह,क्ष,त्र,ज्ञ में स्थानीय उच्चारण की दृष्टि से स्वर-व्यंजनों में संकेतात्मक यथा - 1-100 संयोजित करने पर विचार विमर्श करना। कुमइय्यां में दाल जैसे शब्दों जिनका उच्चारण कुमइय्यां में ‘ल’ के बजाय ‘व’ सरीखा हो जाता है उसके लिये मराठी भाषा में प्रयुक्त होने वाले अक्षर ‘ळ’ कुमांऊँ में विभिन्न लिपि विज्ञानियों, स्वर विज्ञानियों सटीक व सार्थक उच्चारण की विधि क्या हो ? नागरी लिपि को कुमइय्यां भाषायी उच्चारण अनुकूलता उपलब्ध करने के तौर तरीके निश्चित करने के लिये प्रदेश के समस्त विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों व भाषायी विज्ञानियों की लिपि संशोधन आयोग गठित किया जाये। ब्राह्मी, खरोष्ट्री तथा तिब्बती लिपियों में भी संस्कृत साहित्य की पुस्तकें पाण्डुलिपियां शिलालेख यत्र तत्र विद्यमान हैं। विभिन्न गुफाओं में जो भित्ति चित्र, मासी का वह शिलालेख जिसमें कीचक किसने मारा। कीचक मत्स्य नरेश विराट की महारानी का अनुज था व अप्रतिम वीर था। उसकी कुदृष्टि सैरंध्री द्रौपदी पर थी इसलिये भीम ने उसका वध कर डाला जिससे पांडवों के अज्ञातवास का रहस्य खुल गया। जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड में भित्ति चित्रों, शिलालेखों तथा गुफाओं में निर्मित मूर्त्तियों के बारे में जो शिलालेख नागरी के अलावा इतर लिपियों में हैं उनके अध्ययनार्थ विभिन्न विश्वविद्यालयों को इलाके आवंटित किये जायें। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चीन यात्रा से पूर्व उत्तराखंड सरकार कैलास मानसरोवर यात्रा पथ समीक्षित व्याख्या करने के लिये मंत्रिमंडल का सुविचारित पक्ष विधानसभा के सामयिक, सटीक, सुव्यवस्थित अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व वाली उत्तराखंड की स्थिति उत्तर में तिब्बती पठार जिसकी अपनी सभ्यता है संस्कृति तथा हीनयान बौद्ध परम्परा है जहां परम पावन दलाई लामा के चौदहवें स्तंभ अपने नाप्त यौवन काल से भारत में 1959 से रह रहे हैं जिन्हें विश्व शांति मसीहा के रूप में देखता है। उत्तराखंड राज्य की उत्तरी सीमा में वह तिब्बत है जिसे वर्तमान में चीन ने अपने अधिकार क्षेत्र बना कर रखा है। और जो परम पावन दलाई लामा चीन द्रोही मानता है पूर्व में नैपाल का हिन्दू बहुसंख्यक राष्ट्र जो दस वर्ष पूर्व तक हिन्दू राजा का राज्य था पिछले दस वर्षों से नये संविधान निर्माण के लिये छटपटा रहा है। उत्तराखंड भारत का एकमात्र राज्य है जो जम्मू कश्मीर की तरह दो संप्रभु राज सत्ताओं से सीमा बनाता है। भारत की राजधानी से निकटतम सीमा क्षेत्र जो तिब्बत व नैपाल को स्पर्श करता है भारतीय राष्ट्र राज्य को दिल्ली स्थित सत्ता केन्द्र के अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का सीमावर्ती राज्य घटक है। मानसखंड व केदारखंड से निरंतर होरहे मानव पलायन को रोकने की भी तात्कालिक जरूरत है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।   

No comments:

Post a Comment