दूसरे धर्मावलम्बियों का हिन्दू धर्मान्तरण शास्त्र सम्मत नहीं
स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज द्वारा पिछली शताब्दी के तीसरे दशक के मध्य शुद्धि आंदोलन की मुहिम अंततोगत्त्वा इसलिये विफल हो गयी क्योंकि अभियान राजनीतिक था। मजहबी अथवा आस्थामूलक नहीं। स्वामी दयानंद सरस्वती ने विभिन्न मजहबों में घुसे पाखंड का तार्किक विरोध किया था। उन्होंने अपने तर्क से सनातनी वैष्णव शैव शाक्त मतावलंबी हिन्दुओं को भी नहीं बख्शा। जैन, बौद्ध, इसाईयत व इस्लाम के पाखंड के विरूद्ध उनके तर्कों में तार्किक शक्ति थी। वे भारत को आर्य राष्ट्र मूर्त्ति पूजा न करने वाले समाज की स्थापना करना चाहते थे। स्वामी दयानंद सरस्वती का अभियान आर्यसमाज का उत्कर्ष धीरे धीरे मुरझा गया। आज आर्य समाज मंदिरों में मंदी का वातावरण है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आनुषांगिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद तथा हिन्दू जागरण मंच सरीखी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रवृत्तियों का सक्रियता देने वाले व्यक्ति व संगठन ‘घर वापसी’ अभियान के जरिये बीते वर्षों में वर्तमान पीढ़ी से पूर्व पीढ़ियों में इस्लाम व ईसाई धर्म में जुड़े लोगों को फिर हिन्दू बनाने का उपक्रम कर रहे हैं। इसे वे घर वापसी कह कर ईसाईयों व मुस्लिमों में एक भय वाला वातावरण तैयार कर रहे हैं। जो लोग दूसरे धर्मों के लोगों को हिन्दू परिधि में वापस लाना चाहते हैं वो यह भूल रहे हैं कि हिन्दू जीवन शैली का अनुसरण करने वाले पारम्परिक हिन्दुस्तानी लोग हिन्दू सभ्यता की जिस किसी भी आस्था शैली का अनुपालन करते हैं उनमें धर्मान्तरण का कोेई प्रावधान नहीं है। सिख धर्म ही एक ऐसा भारतीय धर्म है जिसमें गुरू नानक के उपदेशों का अनुसरण करना गुरू गोविन्द सिंह का धर्मान्तरण अपनाने के लिये परिवार के एक बेटे को केश धारी सिख बनने का सामाजिक चलन था ताकि समाज एकजुट रहे, धार्मिक मर्यादाओं का अनुपालन करता रहे। सिख धर्म में धर्मान्तरण की अवधारणा को धार्मिक मर्यादाओं का अंग माना जा सकता है परंतु वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त, रैदासपंथी, कबीरपंथी, गोरखपंथी, अद्वैतवादी, द्वैत, द्वैताद्वैत तथा विशिष्टाद्वैत वादी भारतीय आस्थामूलक संप्रदाय जिनमें सामान्यतया चातुर्वण्य वर्णाश्रम व्यवस्था तथा व्यवसाय मूलक जाति व्यवस्था का प्रचलन है। उसमें इतर धर्मावलंबियों को प्रचार, लालच, प्रलोभन सहित किसी भी तरीके से इतर धर्मावलंबियों को अपने संप्रदाय अथवा आस्था अधिष्ठान में जोड़ने का कोई शास्त्रोक्त अथवा परम्परा मूलक प्रथा नहीं है इसलिये सिरी फोर्ट में अपने संबोधन में बराक हुसैन ओबामा ने भारतवासियों को भारतीय संविधान की धारा पच्चीस के बारे में जो राय मशविरा दिया वह भारत के भविष्य के मजहबी सौहार्द के लिये नितांत प्राथमिकता है। ख्रिस्ती धर्म व इस्लाम धर्म में धर्मान्तरण की शास्त्रीय व्यवस्था है। वे दोनों मजहब अपना संख्या बल बढ़ाने के समर्थक हैं। आज की दुनियां में धार्मिक आधार पर ख्रिस्ती धर्मावलंबी पहली कतार पर हैं। दूूसरा क्रम आता है इस्लाम धर्मावलंबियों का। जहां तक ख्रिस्ती धर्मावलंबियों का रोमन कैथोलिक समाज है जिसके मूर्धण्य धर्माचार्य पोप हुआ करते हैं वैटिकन जिनका पथ प्रदर्शक है। संयुक्त राज्य अमेरिका में धार्मिक आस्था वर्ग में पहला स्थान प्रोटेस्टैंट ख्रिस्ती धर्मावलंबियों का है जो आबादी के 52 प्रतिशत हैं तथा दूसरे स्थान पर रोमन कैथोलिक 24 प्रतिशत हैं। किसी भी धर्म को न मानने वाले लोग दस प्रतिशत हैं। यहूदी व मुस्लिम एक एक प्रतिशत हैं। मेनोन सहित इतर धर्मावलंबी 12 प्रतिशत हैं।
न्यूयार्क टाइम्स ने भारत में गिरिजाघरों पर होरहे आक्रमणों को संज्ञान में लेते हुए ख्रिस्ती धर्मावलंबी जिनकी संख्या समूचे विश्व में 2.2 अरब ख्रिस्ती धर्मावलंबी हैं। भारत की आबादी का 2.34 प्रतिशत भाग ख्रिस्ती धर्मावलंबियों का है। विश्व के ईसाई बहुल व इस्लाम बहुल राष्ट्र राज्य अपने धर्मावलंबियों पर अन्य देश जहां के अल्पसंख्यक हैं चिंता व्यक्त करते रहते हैं। भारत विभाजन के मुख्य कारक मोहम्मद अली जिन्ना का मत था कि पाकिस्तान के निर्माण में हिन्दू बहुल भारत के अन्दर रहने वाले मुसलमानों की त्याग भावना के वे कायल हैं। वे ही वस्तुतः द्विराष्ट्रवादी इस्लमी सोच के कर्णधार हैं। भारत में आज भी समूची मुस्लिम जनसंख्या 1.6 अरब में से इंडोनेशिया के पश्चात सर्वाधिक इस्लाम धर्मावलंबी हैं। भारत मूलक धर्मों में सिख, जैन, बौद्ध धर्मावलंबी भी अल्पसंख्यक श्रेणी में गिने जाते हैं पर ख्रिस्तियों व मुस्लिमों से उनकी स्थिति में अंतर है। भारतीय जनता पार्टी हिन्दुत्त्व आधारित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का राजनीतिक आनुषांगिक अंग है। राजनीतिक क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी व उसके लोक नेता नरेन्द्र मोदी को भारत के अल्पसंख्यकों में धर्मान्तरणीय असंतोष के कारण धार्मिक संत्रास न व्याप्त हो इसलिये शुद्धि अभियान या घर वापसी अभियान जो वास्तविकता में धर्मान्तरण ही है। लोकसभा व राज्यसभा में सरकारी प्रस्ताव कर भारत के राष्ट्रपति महोदय से अनुरोध करना चाहिये कि वे सर्वोच्च न्यायालय की राय जानने के लिये कि क्या धर्मान्तरण हिन्दू सभ्यता के विभिन्न संप्रदायों, पंथों, मतवादों में शास्त्रोक्त है ? क्या हिन्दू धर्म शास्त्र दूसरे मजहबों से हिन्दू धर्म में होने वाले धर्मान्तरण हिन्दू दर्शन, मीमांसा, न्याय तथा शास्त्रोक्त पद्धतियों के संदर्भ में स्वीकार्य है ? यदि सुप्रीम कोर्ट की राय हिन्दू धर्म में इतर धर्मों से धर्मान्तरण के विरूद्ध हो, सुप्रीम कोर्ट को भारत सरकार द्वारा कानूनी दर्जा हिन्दू कोड बिल की भांति दिया जाना चाहिये ताकि भारत के बीस प्रतिशत अल्पसंख्यक आश्वस्त हो सकें। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान की धारा 25 का उल्लेख किया। इस्लाम व ख्रिस्ती धर्म प्रचारात्मक लश्करी धर्म हैं जबकि हिन्दू धर्म परम्परावादी ज्ञान मार्गीय धर्म है जिसमें गुरू-शिष्य प्रयोजन धर्म का मूल मंत्र है। हिन्दू धर्म का गुरू अपने शिष्य से कहता है - ‘यानि अस्माकम् सुचरितानि तानि त्वयोपश्यानि नो इतराणि’। वत्स तुम्हें मेरे आचरण में जो अनुकरणीय लगे उनका अनुसरण करना चाहो कर सकते हो किन्तु मेरे आचरण के इतर पक्ष की तरफ ध्यान मत दो। हिन्दू धर्म का मूल स्त्रोत श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को कहा गया वह ज्ञान है कि श्रीकृष्ण कहते हैं - ‘इमम् विवस्वते योगम् प्रोक्तवानहमव्ययम् विवस्वान मनवे प्राह मनुरिक्षाकवे व्रवीत’। श्रीकृष्ण आगे अपने सखा अर्जुन को कहते हैं - ‘स काले नेह महता योगो नष्ट परंत्तप भक्तोऽसि मे सखाचेति रहस्यमेततरूत्तम्’।
भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में बहुमत मिला जिसका सारा श्रेय नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को ही जाता है। मोदी ने सबका साथ सबका विकास का मंत्र दिया। उनके दल के अनेक सांसद तथा नेेता भारतीय राजनीति को पूरे परिप्रेक्ष्य में देखने के बजाय इकतरफा हिन्दू राष्ट्र का राग अलाप रहे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि हिन्दू सभ्यता तथा सृष्टि का पहला राजराजेश्वर हरिद्रोही नरेश हिरण्यकश्यप था। हिरण्यकश्यप कश्यप दम्पत्ति का जुड़वां पुत्र (हिरण्यकश्यप-हिरण्याक्ष) था। वराहावतार में महाविष्णु ने सूकरावतार काल में हिरण्याक्ष का वध कर डाला क्योंकि वह अत्यंत उग्र आततायी था। जुड़वां भाई को महाविष्णु द्वारा मारे जाने का बदला हरिद्रोही राजा हिरण्यकश्यप महाविष्णु से वैर साध कर लेना चाहता था। कश्यप ऋषि की पत्नियों में पहला स्थान अदिति का था। दूसरा दिति का व तीसरा दनु का था। इन तीनों की मातृप्रधान पारिवारिकता थी। कश्यप केवल अदिति, दिति तथा दनु आदि के प्रजाध्यक्ष थेे। अदिति नंदनों में देवेन्द्र या शक्र नाम से जाने जाने वाले प्रथम पुरूष हिमालय से दक्षिण की ओर नहीं हिमालय से उत्तर की ओर त्रिविष्टप-त्रिदश के नरेश थे। वर्तमान हिन्दुत्त्व वाली भारत भूमि का पहला राजपुरूष हिरण्यकश्यप था जिसकी राजधानी वर्तमान हरदोई(संस्कृत भाषा में हरदोई को हरिद्रोही कहा जाता है) हिरण्यकश्यप ने अपने अनुज का वध करने वाले महाविष्णु से वैर साध लिया था। उसके घर में उसकी महारानी कयाधु नाम की यातुधानी से भक्त प्रह्लाद का जन्म हुआ जो नवधा भगवद्भक्ति का प्रथम उद्गाता था। प्रह्लाद ने वानप्रस्थी बनने के लिये राज्य छोड़ा अपने चचेरे भाई अंधक को हरिद्रोही का शासन सौंपा। प्रह्लाद के पुत्र विरोचन का पुत्र राजा बलि था जिसने राज्याधिकार अंधक से प्राप्त किया और अपनी यशधानी भृगुकच्छ को महत्त्वशील नमर्दा के तौर पर प्रतिष्ठित किया। देव-दैत्य-दानव प्रकरण में सांस्कृतिक धरोहर भी हैै। उसे ओर्वोपाख्यान और्वोपदिष्ट मार्ग तथा ओर्वोपदिष्ट योग के नाम से जाना जाता है। और्व-शुक्राचार्य का पर्यायवाची नाम है जिस भूभाग को आज अरब, अरेबिया के नाम से जाना उसे भारतीय वाङमय और्व कहता है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय सहित अनेक भारतीय विश्वविद्यालयों में अरेबियन कल्चर के संकाय हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण और महाभारत महाकाव्य में और्वोपाख्यान, और्वोपदिष्ट योग और और्वोपदिष्ट मार्ग का उल्लेख आता है। आवश्यकता इस बात की है कि देव संस्कृति (अदिति पुत्रों का सांस्कृतिक अधिष्ठान) तथा दिति व दनु पुत्रों आसुरी सम्पदा में और्वोपदिष्ट योग मार्ग सहारा लेकर हिन्दुस्तान की सरकार सऊदी अरब से सांस्कृतिक आदान प्रदान का मार्ग निर्धारित करे। हिन्दी वैयाकरण किशोरीदास वाजपेेयी ने नमाज को संस्कृत शब्द नमस्या का अरबी रूपान्तरण बताया। महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में जिसे संत शिरोमणि विनोबा भावे ने अनुशासन पर्व की संज्ञा दी, युधिष्ठिर के सवाल -
को धर्मः सर्व धर्माणाम् भवतः परमो मतः। किं जपन् मुच्यते जन्तुर्जन्म संसार बन्धनात्।।
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा - ध्यायन, स्तवन, नमस्यश्य च यजमान तथैव च। आस्था ईश्वराधाना के चार तत्त्व हैं। ध्यान, स्तुति, प्रार्थना, नमस्या(नमाज) और यजमान धर्म हवन करना। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ संचालक जिनमें द्वितीय सरसंघ संचालक गुरू गोलवलकर माधव सदाशिवराव गोलवलकर की भारतीय मेधा की छाप है वे स्वयं विचारें, शंकराचार्य परम्परा के निष्पक्ष विचारकर्त्ता शंकराचार्यों की राय ज्ञात करें चारों वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों वाल्मीकि रामायण, महाभारत तथा अठारहों पुराणों में जहां जहां धर्म संबंधी उल्लेख है उनकी समीक्षा - गैर सरकारी और सरकारी तथा न्यायपालिका के स्तर पर समीक्षित की जाय क्या हिन्दू संस्कृति में दूसरी संस्कृतियों के मजहबी आस्थानों से धर्मान्तरण करा कर कोई प्रविधि नहीं संकल्पित हुई है, यदि सर्वपल्ली डाक्टर राधाकृष्णन ने छुआछूत के संबंध में जो मशविरा महात्मा गांधी को दिया और साफ साफ कहा कि सनातन धर्मशास्त्र में छुआछूत मानने का कोई शास्त्रोक्त निर्देेश नहीं हैै। आज हिन्दू धर्म की व्याख्या करने वाले राधाकृष्णन व विनोबा भावे सरीखे व्यक्तित्त्व भारत में हो सकते हैं पर ऐसा कोई व्यक्तित्त्व दिखता नहीं जिसका मत सर्वग्राह्य हो इसलिये शास्त्रार्थ तथा न्यायपथ का अनुकरण ही विकल्प है।
आधुनिक भारत के हिन्दू संस्कृति मूलक तटस्थ चिंतकों में स्वामी विवेकानंद अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस के आशाीर्वाद के साथ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, भारतीय धार्मिकता के अध्येता आचार्य नरेन्द्र देव तथा संत विनोबा भावे ने हिन्दू संस्कृति अथवा हिन्दू धर्म की जो व्याख्यायें की जन सामान्य को जो सटीक मार्ग दर्शन दिया जिन्होंने धार्मिक जिज्ञासा में पाखंड के घुसने से रोका वे सभी यह मानते रहे कि हिन्दू धर्म या हिन्दू संस्कृति से जो जीवन शैली पैदा हुई वह भारत के हर गांव, पत्तन, जंगलों, नदियों पहाड़ों की चोटियों में हिमाद्रि से सह्याद्रि तक गंगा से कावेरी तक पूर्व में कटक से पश्चिम में अटक तथा हिन्दूकुश की पहाड़ियों से लेकर सेतुबंध रामेश्वर के रामसेतु तक सौराष्ट्र के ज्योतिर्लिंग सोमनाथ से हिमालयस्थ केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग पर्यन्त समूचे भारत की भारतीय वाङमय वीणा वाली वाणी का गीत उद्गम एक सरीखा है। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने भक्ति नारद संवाद में कहा - भक्ति नारद को अपना परिचय देती हुई कहती है -
द्रविड़ेऽहम् समुत्पन्ना वृद्धिम् कर्णाटके गता क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता।
जरठत्वम् समापातौ तेन दुःखेन दुःखिता साहम् तु तरूणी कस्मात् सुतौ वृद्धाविमे कुतः।।
आधुनिक भारत की तात्कालिक जरूरत आत्मसंयम, लोकसंयम तथा सर्वे भवन्तु सुखिनः की है। आज भारत भर में धार्मिकता सहिष्णुता के पुनर्जागरण की जो बहस चल पड़ी है गिरजाघरों में पादरी डरे हुए हैं नरेन्द्र मोदी के नेतृत्त्व के खिलाफ हिन्दुस्तान का समूचा राजनीतिक तंत्र घर वापसी की मुहिम चलाते लोगों, अल्पसंख्यक भारतीय नागरिकता धारक व्यक्ति दुविधा में हैं उनके संशय को दूर करने की तात्कालिक जरूरत है दुनियां को यह बताना जरूरी है कि हिन्दू संस्कृति और हिन्दू धर्म एवं उसके अनेकानेक संप्रदायों में दूसरे धर्मों से हिन्दू धर्म में ‘धर्मान्तरण’ का उद्देश्य न व्यापक हिन्दू समाज का है न ही हिन्दू बहुल मोदी सरकार ही दूसरे धर्र्माें से हिन्दू धर्मावलंबी ऊर्ध्व बाहु होकर घोषणा कर रहा है हम धर्मान्तरण के पक्षधर नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी कृपापूर्वक बराक हुसैन ओबामा को आश्वस्त करें कि भारत ख्रिस्ती धर्मावलंबियों व इस्लाम धर्मावलंबियों के साथ भारत भूमि में सौमनस्यतापूर्वक सह अस्तित्त्व का आकांक्षी है।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
No comments:
Post a Comment