Wednesday, 25 February 2015

मातृभाषा दिवस के सामानांतर भाषायी स्वराज दिवस की आवश्यकता

  मानव संसाधन मंत्रालय भारत सरकार ने शनिवार 21 फरवरी 2015 को भारतीय मातृभाषा दिवस - पहला भाव मातृभाव तथा पहली भाषा मातृभाषा का उद्घोष करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति जुविन इरानी प्रोफेसर रामशंकर काथेरिया एवं श्री उपेन्द्र कुशवाहा के आकर्षक चित्रों सहित असमिया, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मैइती मणिपुरी, मराठी, उड़िया, नेपाली, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिन्धी, तमिल, तेलुगु, उर्दू संबंधी विज्ञापन स्कूल शिक्षा और साक्षरता अनुभाग, उच्च शिक्षा विभाग द्वारा जारी किया गया है। मातृभाव मातृभाषा संबंधी उद्घोष संबंधित भाषायी लिपियों सहित उल्लिखित कर प्रस्तुत हुआ है। मानव संसाधन मंत्रालय ने भारत के बारह प्रतिशत अंग्रेजीदां महानुभावों की चाहत भाषा अंग्रेजी को भारत की मातृभाषा श्रेणी का दर्जा नहीं दिया है जबकि नागालैंड सहित भारत भूमि के कुछ हिस्सों के लोग अंग्रेजी को स्वभाषा का दर्जा अपने मन में तथा दैनंदिन व्यवहार में दे चुके हैं इसलिये मातृभाव मातृभाषायी पंक्तिभेद करना भारत की भाषायी जमीनी हालातों की उपेक्षा करने सरीखा होगा। मानव संसाधन मंत्रालय के अलावा भारत का भाषायी तंत्र गणतंत्र के घटक राज्यों, भारतीय संसद से भी गहरा ताल्लुक रखता है। भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के अलावा 22 भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी का वास्ता भारतीय संविधान में उद्घोषित राजभाषा तथा अंग्रेजी भाषा का तब तक प्रयोग जब तक भारत का हर घटक राज्य अपने राज्य की राजभाषा अथवा भारतीय संघ की राजभाषा में दफ्तरी कामकाज संसदीय कामकाज का रास्ता नहीं अपना लेता तब तक अंग्रेजी का वर्चस्व भारत में बना ही रहने वाला है। भाषायी स्वराज उपलब्ध कराने के लिये संसद के दोनों सदनों घटक राज्यों के विधान मंडलों में मातृभाषा अथवा चाहत भाषा में अभिव्यक्ति का स्वाधिकार पहली जरूरत है। भारत के लोगों को उस सूर्योदय पर्व की चाहत है जब भारत के राष्ट्रपति महोदय संसद के संयुक्त सदन को अपनी मातृभाषा के जरिये संबोधन करें, संसद सत्र शुरू होने वाला है। यह ब्लागर यह तो नहीं कहेगा कि राष्ट्रपति महोदय फरवरी 2015 में संयुक्त सदन को अपनी मातृभाषा से संबोधित करें पर यह अपेक्षा रहनी चाहिये कि भाषायी स्वराज के तात्कालिक शुरूआत की जाये। वर्ष 2016-17 के बजट सत्र में राष्ट्रपति जी का अभिभाषण उसी मातृभाषा में संबोधित हो। 
संसदीय भाषायी व्यवस्था, भारत संघ व उस के घटक राज्यों के मध्य पत्र व्यवहार घटक राज्य की भाषा में संपन्न हो। एक अच्छी शुरूआत यह है कि भारतीय 22 क्षेत्रीय भाषाओं में 20 ऐसी भाषायेंह ैं जिनकी वर्णमाला लिपि अलग अलग होने के बावजूद जिनके स्वर व्यंजन उच्चारण 51 ही हैं। दूसरी सुरूह बात यह है कि असमिया, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मइती मणिपुरी, ओड़िया, पंजाबी, तमिल, तेलुगु व उर्दू के अलावा दस भारतीय भाषाओं की लिपि नागरी है। भारत के घटक राज्यों मंे भी 10 राज्यों की राजकाज की भाषा हिन्दी है। 
भारतीय संविधान का अभिकृत भाषान्तरण भारतीय भाषाओं में
1. संवैधानिक मामलों में भाषायी प्रामाणिकता के लिये पहली जरूरत हिन्दी के अलावा असमिया, बांग्ला, बोडो, डोंगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मइती मणिपुरी, मराठी, नैपाली,  ओड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिन्धी, तमिल, तेलुगु व उर्दू इन इक्कीस भारतीय भाषाओं में भारतीय संविधान का भाषान्तरण कर संसद के संयुक्त अधिवेशन में लोकसभा व राज्यसभा के सदस्यों के हस्ताक्षर, उपराष्ट्रपति, स्पीकर लोकसभा व भारत के राष्ट्रपति की स्वाक्षरी सहित प्रत्येक भाषा में भारतीय संविधान की अधिकृत प्रति उपलब्ध करायी जाये। संबंधित राज्यों को अधिकृत किया जाये कि वे उनकी राजभाषा में उपलब्ध संविधान का अनुसरण करें। 
2. भाषायी स्वराज की दूसरी महत्त्वपूर्ण आवश्यकता अंग्रेजी सहित 22 भारतीय मातृभाषाओं का शब्द पर्याय कोश सुनिश्चित करने के लिये भारतीय भाषायी विश्वकोश आयोग की रचना कर एक भाषा से दूसरी भाषा में भाषान्तरण को सुगम बनाया जाये। अंग्रेजी के शब्दों के लिये भारतीय भाषाओं में जो समानार्थी एक या अधिक पर्यायवाची शब्द हैं स्वर ‘अ’ से लेकर व्यंजन ‘ज्ञ’ तक 51 भारतीय उच्चारणों वाले शब्द शक्ति को भारतवासियों को जाग्रत करना ही होगा। श्री चेतन भगत व रोहन मूर्ति सरीखे नौजवान भारतीय भाषाओं के लिये विशेषतः चेतन भगत रोमन लिपि की वकालत हिन्दी को रोमन में प्रस्तुत किये जाने बाबत लिपि प्रसंग भारत को सत्रहवीं शताब्दी के ईस्ट इंडिया कंपनी के सूरत में अपना व्यापारिक अड्डा कायम करते ही भारतीयता को समझने के लिये तत्कालीन उर्दू भाषा को रोमन में लिखना शुरू किया गया। भारत जैसे देश जहां नटराज नृत्य से चौदह ध्वनियां निकलीं उस मुल्क के ग्रीक के 24 हरूफ और रोमन लिपि के 26 हरूफ पर सिकुड़ा देना ध्वन्यालोक की ‘भिन्न रूचिर्हि लोकः’ के विचार को कुछ करना माना है। इसलिये मातृभाषा दिवस के समानांतर भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भारत में भाषायी स्वराज याने भारतीय गणतंत्र का सरकारी कामकाज अंग्रेजी सहित 22 भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में शुरू करना। 
हिन्दुस्तान का अंग्रेजीदां अभिजात्य वर्ग बर्तानी शासकों की तरह भारतीय भाषाओं की ‘वर्नाक्यूलर’ संज्ञा देता है तथा इन भाषाओं को अंग्रेजी के मुकाबले अविकसित भाषा मानता है परंतु हिन्दुस्तान में जो 276 जुबानें व बोलियां प्रचलित थीं जिनके बारे में डाक्टर ग्रियर्सन का कवि तुलसीदास द्वारा रामचरितमानस भाषा में लिखे जाने के कार्य को इतना ऊँचा स्तर दिया कि वे बोले अगर तुलसी यूरप में पैदा हुआ होता तुलसी की महत्ता शेक्सपियर से ऊँची होती। तुलसी का रामचरितमानस जिसे उन्होंने अवध की जनभाषा अवधी में लिखा रामकथा का श्रेष्ठतम स्वरूप है तथा रामचरितमानस का भाषान्तरण दुनियां की अनेक भाषाओं में हुआ है। इसलिये तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि भारत के लोगों के राजकाज की भाषा जनभाषा हों। एक भाषायी स्वराज वाली समझबूझ पैदा हो। काशी में तुलसीदास ने भाषा में रामकथा कहने का जो प्रयास किया तत्कालीन विद्वत् समाज ने तुलसीदास को रोकने के लिये कोई उपाय छोड़ा नहीं पर स्वांतः सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा भाषा मति संकुल भारत नेति पर अडिग रहे। उन्हें जीवन में कठिनाइयां तो बार बार आयीं पर लक्ष्य प्राप्ति में तुलसी सफल रहे।
  यहूदी दुनियां भर में यत्र तत्र फैले हैं। वे संपन्न तथा विचारक हैं। 1948 में जब यहूदियों को अपना देश इजरायल गढ़ने का सुअवसर मिला उन्होंने पहला काम हिब्रू भाषा को इजरायल की भाषा का प्रतिष्ठित दर्जा दिया। हिन्दुस्तान के संविधान ने 22 भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं का दर्जा दिया है पर इन सभी भाषाओं पर अंग्रेजी का ग्रहण लगा हुआ है। चीन अपना कामकाज मंदारिन में करता है। सउदी अरब अरबी को प्रमुखता देेता है पर भारतवर्ष भाषायी लिपि विवाद में भाषायी चक्रव्यूह में फंसा है। आज भी राजनीतिक, प्रशासनिक एवं न्यायिक दृष्टि से ब्रिटेन का वैचारिक उपनिवेश रह गया है। इसलिये तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि भारत संघ के घटक राज्यों व भारत संघ के बीच होने वाला पत्राचार संबंधित घटक राज्य की राजभाषा में शुरू किया जाना पहली जरूरत है। घटक राज्य भाषा में संबंधित घटक राज्य व भारत सरकार में एक तथ्यपरक भाषायी समझौते की जरूरत है। केन्द्र सरकार में कार्यरत संबंधित राज्य की राजभाषा जिन लोगों की मातृभाषा है उनकी एक तालिका बननी चाहिये ताकि केन्द्र-राज्य पत्राचार में संबंधित राज्य की राजभाषा के प्रयोग में जो बाधायें आयें उनका निराकरण हो। केन्द्रीय सरकार का मौजूदा राजभाषा विभाग भारतीय संघ के घटक राज्यों स्वतंत्र राजभाषा विभाग के रूप में संचालित किये जाने की जरूरत है। अंग्रेजी के अलावा सभी 22 भारतीय भाषायें जिन्हें भारतीय संविधान ने भाषा अनुसूची की भाषा घोषित किया है उन सबके पृथक पृथक भाषा अनुभाग हों। जिन भाषाओं को एक से ज्यादा राज्यों की राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है उनका भाषायी आदान प्रदान संबंधित घटक राज्य में हो। पूरा केन्द्रीय राजभाषा विभाग भारतीय भाषा विज्ञान भाषान्तरण तथा भाषायी शब्द पर्याय का विश्वकोष बने। 
संसद में स्वभाषा या चाहत भाषा में बोलने व चाहत भाषा में सुनने का अधिकार 
          संसदीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का श्रीगणेश तभी हो सकता है जब जनप्रतिनिधि (कानून निर्माता) को अपने मन की बात अपनी मातृभाषा अथवा चाहत भाषा में व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो और जनप्रतिनिधि की अभिव्यक्ति सदन के दूसरे सदस्य अपनी मातृभाषा या चाहत भाषा में हृदयंगम करने का स्वाधिकार प्राप्त हों। अभी भारतीय संविधान ने 22 भारतीय भाषाओं को संविधान अनुसूची में दर्ज क्षेत्रीय/राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया है। हिन्दी के अलावा बांग्ला, तेलुगु एक से ज्यादा घटक राज्यभाषा हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरू, अहमदाबाद, हैदराबाद आदि ऐसे बहुत से शहर हैं जहां भाषायी अल्पसंख्यक पर्याप्त मात्रा में हैं व कभी कभी जनप्रतिनिधित्त्व प्राप्त कर राज्य की विधान मंडल सदस्यता भी अर्जित कर लेते हैं। अतः तात्कालिक राष्ट्रीय भाषायी जरूरत यह है कि लोकसभाध्यक्ष, राज्यसभा सभापति, विधानमंडलों के स्पीकर व विधान परिषद् अध्यक्षों का एक अखिल भारतीय सम्मेलन लोकसभा स्पीकर आहूत करें। जनप्रतिनिधियों अथवा कानून निर्माताओं को अपनी मातृभाषा अथवा चाहत भाषा जिसमें उनका वाणी विलास वाला सामर्थ्याधिकार हो उसमें अभिव्यक्ति तथा अभिव्यक्त वक्तव्य का दूसरे भाषा भाषियों को उनकी स्वभाषा अथवा चाहत भाषा में सुनने का अधिकार उपलब्ध कराने के लिये विचार विमर्श करना चाहिये। विचार विमर्श के पश्चात भारत की 22 भाषाओं के प्रतिष्ठित विद्वानों, भाषा विज्ञानियों से परामर्श कर संसदीय अभिव्यक्ति मार्गदर्शिका निर्धारण करने बाबत बहस मुबाहसे के बाद संसदीय भाषा अभिव्यक्ति नीति का निर्धारण संपन्न किया जाये। साथ ही लोकसभा, राज्यसभा, प्रदेश विधान मंडलों में भाषान्तरण प्रकोष्ठ गठित किये जाने चाहिये। देश के ऐसे लोगों को पूर्णकालिक, अंशकालिक तथा बहुभाषी (दो, तीन या चार भाषाओं के सुप्रतिष्ठित ज्ञाता) व्यक्तियों भाषायी ज्ञान संसदीय क्षेत्र को भी उपलब्ध हो। संसद विधान मंडलों के ये बहुभाषी भाषान्तरण प्रकोष्ठ विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयों के भाषा संकायों से भी परामर्श करते रहें। संसद विधान मंडल पीठासीन अधिकारियों के समूह को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य तथा व्यक्त विचारों का विश्लेषण करने हेतु अंग्रेजी सहित भारत की संविधान अनुसूची वर्ग सभी 22 भारतीय भाषाओं में संसदीय वैचारिकी मासिक प्रकाशन प्रारंभ किया जाना चाहिये ताकि भारतीय संसदीय भाषायी ऊहापोह का सामना किया जा सके। 
  माननीया मानव संसाधन मंत्री महोदया ने भारत मातृभाषा दिवस 21 फरवरी का आह्वान किया है। इस वर्ष मातृभाषा दिवस फाल्गुन शुदी तीज शनिवार उत्तराभाद्रपद नक्षत्र धूम्र योग मीन राशि एवं चंद्रमा में पड़ा है। इस्लामी महिना जमादि उल्वल पांचवे महीने की पहली हिजरा तारीख मानव संसाधन मंत्री मातृभाषा दिवस को आगे भी मनाती रहेंगी। अगले साल मातृभाषा दिवस जब 21 फरवरी 2016 को मनाया जायेगा माघ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि राष्ट्रीय माघ 2 मुस्लिम महीना जमादि उल्वल पांचवां महीना तारीख हिजरा 11 होगी। मातृभाषा दिवस के समानांतर भारतीय संसद, घटक राज्यों को विधान मंडलों तथा केन्द्रीय मंत्रिमंडलों का संसदीय कार्य मंत्रालय भारतीय भाषाओं के संसदीय सुप्रयोग के लिये भाषायी स्वराज दिवस मनाने पर विचार करे ताकि भारतीय संसद राज्यों के विधान मंडल भारतीय भाषाओं के वर्चस्व से भारतीय लोकतंत्र की लोकतांत्रिक अंतरिक्ष का चमकीला नक्षत्र निर्मित कर सकें।
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