परोपकार ही जीवन का उदात्त लक्षण है। कुलभूषण बक्शी की परोपकार गाथा का सिंहावलोकन
मेरठ जिसका एक पुराना नाम मय राष्ट्र है। जब खाण्डव वन का दहन होरहा था, मय दानव (कश्यप-दनु संतान) जो विश्वकर्मा के समकक्ष वास्तुकार था उसे अग्नि भय से मुक्ति दिलाने का सत्कार्य कुंतीनंदन अर्जुन ने किया था। मय को प्राण रक्षा का जो उपकार अर्जुन ने किया मय उसका निष्क्रय देना चाहता था। दानव श्रेष्ठ मय ने अर्जुन से कहा कि वह अपनी वास्तु योग्यता को प्रस्तुत करना चाहता है। अर्जुन से उससे कहा - योगेेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण जो सम्मति देंगे वह उसे मंजूर होगी। मय ने अपनी मनोकामना वासुदेव श्रीकृष्ण से कही। वासुदेव श्रीकृष्ण ने सोच कर कहा कि शक्रप्रस्थ में एक ऐसा वास्तु निर्माण कर दो जिसमें कौंतेय युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ का पहला दरबार लगा सकें। यह बात बहुत पुरानी नहीं केवल पांच हजार एक सौ इक्यावन वर्ष पुरानी है। हस्तिनापुर से मयराष्ट्र होते हुए ही इन्द्रप्रस्थ जाने का रास्ता था। लोगों में एक कहावत है कि मय राष्ट्र में पहुंचने पर श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता की तीर्थयात्रा में आगे ले जाने से असहमति जतायी थी। उसके पिता ने कहा भी कि वत्स हमें तुम हस्तिनापुर पहुँचा दो। गंगा तट में रहेंगे। श्रवण कुमार ने माता-पिता की बात मान ली और उन्हें हस्तिनापुर गंगा तट पर पहुँचा दिया। हस्तिनापुर पहुँचते ही श्रवण कुमार की अक्ल दुरूस्त हो गयी। उसने अपना अपराध माता-पिता को आगे न ले जाने वाला कृत्य अनुचित माना। यह तो बात है हजारों साल पुरानी जो लोक कथा के रूप में लोक गंगा बन कर बह रही है।
मायावी वास्तुकार मय राष्ट्रधानी जिसे अंग्रेजी भाषा में मीरट Meerut तथा मराठी सहित दक्षिण भारतीय भाषाओं में मीरत उच्चारित किया जाता है। यही मेरठ दिल्ली का निकटवर्ती बड़ा शहर है जो आधुनिक भारतीय राजधानी क्षेत्र का भारतीय ऐतिहासिक राजनीतिक स्थितियों में दिल्ली दरबार पर असर करने वाला महत्त्वपूर्ण स्थानों गंगा-यमुना दो आबे का अत्यंत महत्त्वपूर्ण केन्द्र मेरठ हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई का पहला पड़ाव है जहां मंगल पांडे नाम के जवान ने आजादी का पहला बिगुल बजाया। दिल्ली से केवल 42 मील की दूरी पर स्थित पूर्वोत्तर दिशा का पहला बड़ा शहर जो दिल्ली से बड़ाहोती नीती माणा घाटी होते हुए तिब्बत पहुँचने का सबसे नजदीकी दूसरा रास्ता है। एक अन्य रास्ता दिल्ली हापुड़ गढ़ मुरादाबाद काशीपुर रानीखेत अल्मोड़ा बेरीनाग थल बमनगांव गिरगांव कालामुनि मुनस्यारी मिलम कुगरी बिगरी होते हुए है। ये दोनों रास्ते कैलास मानसरोवर यात्रा के पारम्परिक रास्ते हैं। सिपाही विद्रोह के पश्चात स्वतंत्रता आंदोलन का अगला चरण 1885 में मुंबई में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना का है।
इंडियन नेशनल कांग्रेस का शुरूआती तीस वर्ष वाला नेतृत्त्व ऐसे महापुरूषों के पास था जो वैचारिक मंथन में यकीन करने वाले लोग थे साथ ही गति भी मंथर थी। मोहनदास करमचंद गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटे तो उन्होंने हिन्दुस्तानी स्वराज संकल्प को व्यावहारिक तथा तुरंत गति देने वाला रास्ता अपनाया। वे स्वयं भारतीय गुजराती वैष्णव समाज से आते थे जिन पर नरसी मेहता की दशधा भक्ति का प्रभाव था। हिन्दुस्तान के आसुरी संपत वाले पहले धरापति हरिद्रोही वर्तमान हरदोई नरेश हिरण्यकश्यप थे। वे अदिति की सगी बहन दिति के पुत्र थे। दोनों के प्रजाध्यक्ष स्वयं मारीच कश्यप थे। सृष्टि के उस युग में संभवतः परिवार संस्था को मातृसत्ता संचालित करती थी। हिरण्यकश्यपक का पुत्र प्रह्लाद पहला भारतीय था जिसकी महाविष्णु-वैष्णव पंथ पर आस्था थी और नवधा भक्ति का प्रवर्तक था। मोहनदास करमचंद गांधी पर इक्ष्वाकु वंशी सत्य हरिश्चन्द्र के सत्याचरण का भारी असर था। उन्हें अपनी मां पुतलीबाई से रामभक्ति का मातृ रस मिला था। उस व्यक्तित्त्व ने भारत आने से पहले ही ब्रिटेन में अराजक हिंस्र आंदोलन के जरिये हिन्दुस्तान की आजादी का संकल्प लिये युवाओं से हुई अपनी वार्ता-संवाद को निखार देते हुए हिन्द स्वराज नाम की लघु पुस्तिका रची। यह पुस्तिका वाचक-अधिपति संवाद थी। ठीक वैसी ही जैसी ज्योत्सर के मैदान में श्रीकृष्णार्जुन संवाद महाभारत संग्राम के पहले दिन अगहन सुदी एकादशी को हुआ था। अगहन सुदी एकादशी को आज भी भारतवासी गीता जयंती के नाम से पुकारते हैं। मोहनदास करमचंद गांधी के भारत वापसी के ठीक चौदह वर्ष पश्चात गढ़ रोड मेरठ में गांधी विचार प्रभावित पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने पिता मोतीलाल नेहरू के तौरतरीके वाले स्वराजिस्ट किस्म के आजादी वाले तौरतरीके का बहिष्कार कर महात्मा गांधी का रास्ता चुना था। उन्होंने फरवरी 1929 में मेरठ के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी के सहयोग से गांधी आश्रम की विधि सम्मत स्थापना की और महात्मा गांधी के कुमांऊँ प्रवास का प्रबंध किया। पंडित नेहरू द्वारा प्रबंधित महात्मा गांधी की कुमांऊँ यात्रा हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा थी। कौसानी में ही महात्मा गांधी ने अपनी दूसरी असरदार पुस्तक श्रीमद्भगवदगीता का गुजराती भाष्य पूर्ण किया।
मेरठ ने हिन्दुस्तानी आजादी के संघर्ष में अद्वितीय भूमिका का निर्वाह किया। गांधी आश्रम के जरिये चर्खे पर सूत कताई, करघे पर खद्दर बुनाई का एक पारम्परिक कार्यक्रम जो गाढ़े के रूप में गांधी आश्रम बनने से पहले भी चलता आरहा था उसने आजादी के दीवानों की वर्दी का आकार लिया। गांधी आश्रम गढ़ रोड मेरठ के जरिये हाथ कते सूत से खादी परिधान तैयार करने की मुहिम का नेतृत्त्व आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी ने किया जो महात्मा गांधी के राजनैतिक चिंतन को तीक्ष्ण धार वाला बनाने में तब से लगे थे जब उन्होंने मुजफ्फरपुर कालेज में कोलकाता से चंपारण जारहे महात्मा गांधी का स्वागत सत्कार किया था। चंपारण की गांधी यात्रा ने भारतीय स्वातंत्र्य आंदोलन को जनोन्मुख बना डाला।
संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के नाम से तब पुकारे जाने वाले वर्तमान उत्तरा प्रदेश में इलाहाबाद में पंडित मोतीलाल नेहरू द्वारा कांग्रेस उपलब्ध कराये गये अपने भवन जिसे स्वराज्य भवन का नया नाम दिया। आनंद भवन में बैरिस्टर मोतीलाल नेहरू स्वयं अपने कुटुम्ब के साथ रहते थे। आजादी की लड़ाई में स्वराज्य भवन तथा उसके द्वारा कांग्रेस कार्यक्रम को गति देने का काम आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी करते थे। वे कांग्रेस महामंत्री तब हुआ करते थे। जवाहरलाल नेहरू ने मेरठ में खादी का जो संस्थान श्री गांधी आश्रम खड़ा किया उसके प्रमुख कर्त्ताधर्त्ता आचार्य कृपलानी ही थे। मेरठ, पश्चिमी उ.प्र. व दिल्ली के स्वातंत्र्य सेनानियों का मिलन केन्द्र था। खादी के काम का पहला संगठित केन्द्र था। सूत कताई तो गांव गांव शहरों के घर घर में होती थी। कते हुए सूत को हथकरघा बुनकर गांधी आश्रम को देेते और अपनी मजदूरी प्राप्त करते। आजीदी प्राप्ति के पहले वर्ष 1946 में कांग्रेस का अधिवेशन मेरठ में हुआ था। इसके अध्यक्ष आचार्य जे.बी. कृपलानी ही थे। गांधी आश्रम मेरठ की इस अधिवेशन में विशेष प्रतिभागिता थी। आचार्य जे.बी. कृपलानी और उनके शिष्य विचित्र नारायण शर्मा ने गांधी आश्रम मेरठ को पंडित नेहरू के क्रियात्मक सहयोग से खादी उत्पादन का अखिल भारतीय महत्त्वपूर्ण केन्द्र बना डाला। आजादी के पश्चात गांधी आश्रम का कार्य आकार बढ़ता गया। मेरठ और खादी की पहचान एक हो गयी। 1930 में गांधी आश्रम मेरठ का पहला खादी भंडार चांदनी चौक दिल्ली में खुला। दिल्ली के सूत कतैये बढ़लौन में खादी वस्त्र लेने लगे। भारत सरकार ने 1953-54 में अखिल भारत खादी ग्रामोद्योग मंडल का गठन श्री वैकुंठ ल. मेहता की अध्यक्षता में किया। खादी बोर्ड के जोनल दफ्तर क्रमशः मेरठ अंबाला कोलकाता काकेनाडा में खोले गये। एक दफ्तर वार्धा में भी खुला। खादी विस्तार के लिये बोर्ड ने नये नौजवानों को खादी प्रसार के लिये घुमन्तू दल सृजित किये। घुमन्तू खादी कर्मियों में एक युवक श्री कुलभूषण बक्शी भी थे। भारत विभाजन के पश्चात मुलतान के इलाके से मेरठ पहुंचने वाला मां बेटे दो जनों को परिश्रमी पुरूषार्थी के तौर पर मेरठ में रहने का अवसर मिला। यही कुलभूषण बक्शी अखिल भारतीय खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के धान कुटाई निरीक्षण से बढ़ते बढ़ते खादी ग्रामोद्योग आयोग के संयुक्त मुख्य कार्यपालक पद से जुलाई 1989 में सेवानिवृत्त हुए। यह ब्लागर भी 1954 से 1957 जनवरी तक अखिल भारतीय खादी ग्रामोद्योग मंडल के जोनल डाइरेक्टर श्री राजाराम शर्मा का सहयोगी रहा था। कुलभूषण बक्शी व उनके दो घनिष्ठ मित्र प्रेमनाथ व कैलासनाथ मेरठ की त्रिकुटी थी। जब 1957 में यह ब्लागर पुनः खादी ग्रामोद्योग बोर्ड व 1.4.57 से खादी ग्रामोद्योग आयोग से जुड़ा ग्रामोद्योगों में सहकारिता अभियान का हिस्सा बना। एक धान कुटाई पर्यवेक्षक अनूप सिंह सहकारिता के मशहूर कर्मी थे उन्हें तेलघानी सहकारिता हेतु स्टेट डेवलेपमेंट अफसर नियुक्त करने के प्रसंग के कुलभूषण बक्शी व उनके साथियों ने भरपूर विरोध किया। इस ब्लागर से वह त्रिकुटी दिल्ली में मिली। अनूप सिंह की नियुक्ति न ही यह उनका लक्ष्य था। इस ब्लागर ने बक्शी जी को कहा - बक्शी जी आपके मित्र सहयोगी कैलासनाथ शुक्ल को भी तेलघानी उद्योग के स्टेट डेवलपमेंट अफसर के पद पर नियुक्ति करायी जा सकती है पर त्रिकुटी का मुख्य लक्ष्य अनूप सिंह की नियुक्ति नहीं होने देना था। खादी ग्रामोद्योग आयोग के प्रधान अध्यक्ष वैकुंठ ल. मेहता आश्वासन दे चुके थे कि सहकारिता विज्ञ अनूप सिंह को नियुक्ति दी जायेगी। बक्शी जी व उनके दोस्तों ने एक सौ टेलीग्राम भेजे हर टेलीग्राम में अनूप सिंह जी की नियुक्ति न हो यही आग्रह था। टेलीग्रामों की शब्दावली भी एक सी थी। उन सभी तारों को खादी ग्रामोद्योग आयोग में तैनात डाइरेेक्टर कोआपरेशन एंड विलेज इंडस्ट्रीज श्री वी.पी. उमर जी ने इस ब्लागर को सभी तार थमा दिये। ब्लागर ने एक स्वयं स्पष्ट आख्या तैयार कर कुलभूषण बक्शी जी द्वारा अनूप सिंह जी की नियुक्ति विरोध का प्रकरण प्रस्तुत कर श्री वी.पी. उमर जी को प्रस्तुत किया। आख्या पर श्री उमर जी ने अनुकूल टिप्पणी देते हुए अध्यक्ष से अनुरोध किया कि श्री अनूप सिंह जी की नियुक्ति आदेश जारी करने की स्वीकृति दी जाये। यह ब्लागर नियुक्ति आदेश लेकर दिल्ली आया। अनूप सिंह को बुला कर कार्यभार ग्रहण कराया। जब बक्शी जी को मालूम हुआ तो उन्होंने जो 100 तार भेजे थे उन पर वैकुंठ भाई ने कोई ध्यान नहीं दिया। बक्शी जी इस ब्लागर से मिले उन्होंने कहा - आपने क्या जादू चला दिया। इस घटना के लगभग अठारह वर्ष उपरांत खादी आयोग की नौकरी में इस ब्लागर व बक्शी जी का आमना सामना हुआ। तब खादी ग्रामोद्योग आयोग के एक सदस्य इलाहाबाद निवासी श्री जगपत दुबे थे। पंडित नेहरू के निजी सचिव रहे शिव दत्त उपाध्याय जी ने इस ब्लागर को कहा - जगपत तुम्हारा हाकिम होकर आरहा है। उससे करीबी मत बढ़ाना। उन्होंने यह भी कहा कि जगपत के पिता कन्हैयालाल भी पंडित नेहरू के बागवान थे। अप्रेल 1972 से 1974 तक यह ब्लागर उपाध्याय जी की राय के अनुसार उ.प्र. से खादी आयोग सदस्य से बचता रहा। भोलानाथ मंडल बिहार से ललित नारायन मिश्र के अंतरंग सहयोगी थे। उन्हें भी खादी आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया था। उन्होंने डाक्टर जी. रामचन्द्रन से कह कर इस ब्लागर को पटना स्थानांतरित करा दिया। पटना में लगभग एक वर्ष कार्य करने के पश्चात वहां की स्थिति सुधरती देख यह ब्लागर दिसंबर 1974 में लखनऊ बदल दिया गया। समाजवादी नेता मदन मोहन उपाध्याय जब लखनऊ आते इस ब्लागर से भी मिलते। उन्होंने 1976 में इस ब्लागर से कहा कि ऊनी स्वेटर पुलोवर वगैरह हाथ बुनाई से महिला श्रम शक्ति को मजबूत किया जा सकता है। स्वातंत्र्य वीर मोतीराम जोशी इस बारे में पहले बात कर चुके थे। जब बक्शी जी को मालूम पड़ा कि समाजवादी नेता मदन मोहन उपाध्याय इस ब्लागर से मिले उन्होंने ब्लागर को कहा उपाध्याय जी से बात कराओ। उपाध्याय जी अपने साढ़ू अंबिका दत्त अधिकारी के घर टिके थे। मैंने उनसे प्रार्थना की कि मेरे अफसर उनसे मिलना चाहते हैं। जगपत दुबे होमफार्म के उस कक्ष में रूकना चाहते थे जहां जवाहरलाल नेहरू रूका करते थे। हाथ बुनाई कार्यक्रम को गति देने के लिये महिलाओं की हैंड निटिंग प्रतियोगिता तथा कार्यकर्त्ता सभा का आयोजन होमफार्म में किया गया। जगपत दुबे की इच्छापूर्ति होगयी। श्रीमती शांति मदन मोहन उपाध्याय विशुद्ध शाकाहारी थी। अपने अतिथियों को दुग्धाहार शाकाहार उपलब्ध कराती थी। उन्होंने इस ब्लागर को ताकीद कर दिया कि कोई अतिथि होमफार्म में मदिरा सेवन, मांस सेवन अथवा अंडा सेवन नहीं कर सकेगा। शांति बहन की यह आज्ञा इस ब्लागर ने सभी प्रतिभागियों को बता दी। तीन दिन होमफार्म में हाथ बुनाई करने वाली महिला श्रम शक्ति को शांति उपाध्याय का हार्दिक आतिथ्य उपलब्ध हुआ। बक्शी जी ने इस ब्लागर को कहा - आपने मेरी इज्जत रख ली। यह ब्लागर मूर्ति पूजा व व्यक्ति पूजा का कायल नहीं है। बक्शी जी चाहते थे कि एक शानदार रपट बन जाये। बुलंदशहर के गांधी आश्रम के सचिव जलभरत पांडे ने सदस्य जगपत दुबे का हार्दिक स्वागत किया। 131 कार्यकर्त्ताओं में से हरेक ने जगपत दुबे को माल्यार्पण किया। दूबे जी ने जलभरत पांडे से कहा - एक माला कुलभूषण बक्शी जी को भी पहनाओ। उनका आदेश क्रियान्वित हुआ। बारी इस ब्लागर की आयी तो इस ब्लागर ने कहा - सदस्य महोदय यह व्यक्ति न तो मूर्ति पूजा करता है न व्यक्ति पूजा। यह माला ग्रहण नहीं करेगा।
भारत की राजनीतिक जागृति में ब्रजभूमि तथा इससे सटे हुए गंगा-यमुना दो आब के जिलों में अलीगढ़ मेरठ सहारनपुर मुजफ्फरनगर बुलंदशहर मुरादाबाद बिजनौर बदायूं एटा इटावा के गांवों तथा अनाज मंडियों का स्वामी दयानंद सरस्वती सृजित आर्यसमाज और स्वामी जी की रचना सत्यार्थ प्रकाश का खेतिहर किसानों की कृषि आधारित रचनात्मक विचार पोखर का विशेष महत्व रहा है। गंगा-नहान गढ़ मुक्तेश्वर का कार्तिकी पूर्णिमा का प्रसिद्ध मेला भारत की आजादी की मुहिम में एक महत्वपूर्ण केन्द्र होने के साथ साथ गंगा-यमुना दो आब की हिन्दू-मुस्लिम द्वैत स्थिति तथा गांवों के मुसलमानों में हिन्दुओं से कदीमी भाईचारा भी था। शहराती मुसलमान फारसी व उर्दू के ज्ञाता व पक्षधर थे पर गांव के मुसलमानों की जबान वही थी जो वहां के हिन्दू बोलते थे। भाषायी अलगाव वाद शहरी मुसलमानों में फारसी पढ़े लिखे मुसलमानों तथा अंग्रेजी राज में अंग्रेजीदां मुसलमानों में मोहम्मद अली जिन्ना के विचार से प्रभावित थे कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग अलग राष्ट्रीयतायें अथवा कौमें हैं। अलीगढ़ ने भारतीय राष्ट्रीयता अभियान को श्री कृष्ण दत्त पालीवाल और चंद्रभानु गुप्त सरीखे राष्ट्रवादी नेतृत्व उपलब्ध कराया। अलीगढ़ गुप्त जी की जन्मभूमि थी पर उनकी कर्मभूमि अवध की मुख्य नगरी लखनऊ थी। उन्होंने काकोरी कांड में फंसे क्रांतिवीरों की वकालत करने उन्हें कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिये संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को बाध्य किया कि वे चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल अशफाक उल्लाह खां रामकृष्ण खत्री आदि की पैरवी करें। संयुक्त प्रांत आगरा व अवध की राजनीति को गहराई तक समझने वाले विभिन्न जातिगत समूहों केे दृष्टिकोण के मर्मज्ञ, संयुक्त प्रांत के शिया व सुन्नी संप्रदायों में इस्लामी राजनीति की भी गुप्त जी को गहरी समझ थी। राजनीति के अलावा वे उदात्त समाजसेवी, जरूरतमंदों की मदद स्वयं करने वाले तथा संपन्न व्यवसाइयों से जरूरत मंद लोगों की सहायता दिलाते थे। अपनी इस प्रवृत्ति का वे प्रचार नहीं होने देते थे। गुप्त जी महात्मा गांधी की तरह व्यक्ति की परख करने वाले इंसानी जौहरी थे। उन्होंने अपना जीवन परोपकार में लगाया। वे कबीर के उस सिद्धांत असूली के ‘कबिरा खड़ा बजार में लिये लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपनो चलो हमारे साथ’। इस महान परोपकारी व्यक्तित्त्व की पुण्यस्मृति में उनके अनुयायियों में अग्रणी बाबू राधाकृष्ण अग्रवाल व विमल कुमार शर्मा ने 1980 में कल्याणं करोति की स्थापना की। गुप्त जी पुण्यस्मृति में कल्याणम करोति पिछले पैंतीस वर्ष से ‘अहर्निशम् सेवामहे’ का आदर्श लेकर चल रही है। कल्याणम करोति के तीन विकेन्द्रित संगठन कल्याणम करोति मथुरा वृन्दावन तथा कल्याणम करोति मेरठ कैंट ने अपने अपने इलाकों में आशातीत सफलता अर्जित की है। यहां हम कल्याणम करोति मेरठ कैंट के अस्पताल को एक सुसज्जित नेत्र चिकित्सालय में परिवर्तित करने का श्रेय खादी सेवी कुलभूषण बक्शी को जाता है जिन्होंने परम पावन दलाई लामा के अनुग्रह का लाभार्जन कर 80 बिस्तर वाला आधुनिकतम नेत्र चिकित्सालय भारतीय सेना के अपरिमित सहयोग से सुप्रतिष्ठित कर डाला। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेत्र रोगियों विशेष तौर पर ग्रामीण इलाकों के नेत्र रोगियों का इलाज कम से कम खर्च में संपन्न कराना जरूरतमंद मरीजों व उनके तीमारदारों की मदद करना कल्याणम करोति मेरठ के ज्योति पुंज कुलभूषण बक्शी का जीवन आदर्श था। जब जब उन्हें नेत्र चिकित्सालय के लिये आर्थिक सहायता की दरकार हुई परम पावन दलाई लामा ने कुलभूषण बक्शी को भरापूरा आशीर्वाद दिया।
श्रीमद्भगवदगीता का कहना है -
नैनम् छिन्दति शस्त्राणि नैनम् दहति पावकः। न चैनम् क्लेदयन्तापो न शोष्यति मारूतः।।
लगातार 84 वर्ष तक प्रज्यावित कुलभूषण बक्शी दीपशिखा 11 जनवरी 2015 के दिन इहलीला पूर्ण कर दिव्य लोकों के लिये रवाना होगयी। अपनी धर्मचारिणी जीवन संगिनी श्रीमती सुन्दर बक्शी तथा इकलौते पुत्र रवि बक्शी को शोक संतप्त कर दिव्यात्मा चली गयी। उनकी पत्नी पुत्र तथा पुत्रवधू व उनकी संतान पुत्री दामाद तथा नाती पोतों को बिलख कर छोड़ दिव्यात्मा ने अपनी राह पकड़ ली। परिजनों के शोक संता पके अलावा कुलभूषण बक्शी के असामयिक निधन से कल्याणम करोति मेरठ कैंट के अस्पताल से लाभान्वित होने वाले हजारों लोगों की आंखों में अश्रुबिन्दु हैं। प्रिय प्रवास में महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने लिखा - हे विश्वात्मा भरत भूमि के अंक में और होवे परन्तु ऐसी विरह व्यापी घटना न होवे। कुलभूषण बक्शी एक अनुशासित खादी सेवी थे। उन्होंने गांधी आश्रम मेरठ से लेकर खादी ग्रामोद्योग आयोग के मुख्यालय ग्रामोदय, इरला रोड विले पार्ले 56 मुंबई में 1954 से लेकर 1989 तक लगातार पैंतीस वर्ष खादी सेवा संपन्न की। 31 जुलाई 1989 को आयोग के संयुक्त मुख्य कार्यपालक के पद से सेवा निवृृत होकर सेवानिवृति के 25 वर्ष समाज सेवा में लगाये। लगभग पंद्रह सोलह वर्ष वे कल्याणम करोति मेरठ को एक सशक्त सामर्थ्य वान नेत्र चिकित्सालय का आकार दिलाने में सफल हुए। उनके निधन से समाजसेवा की एक लौ बुझ गयी। लौहपुरूष चंद्रभानु गुप्त तथा उनके अंतरंग सहयोगी रहे दिवंगत राधाकृष्ण अग्रवाल ने अहेतुक सेवा की जो लौ जगायी जिसमें श्रीबाबा, स्वामी जयेन्द्र सरस्वती महाराज, स्वामी रामभद्राचार्य महाराज सहित अनेकानेक संतों ने जनसेवा के पुनीत कार्य में जो भागीदारी संपन्न की वह भारतीय संत समाज का अनुग्रह है उन लोगों पर जो गृहस्थ जीवन में रहते हुए अहेतुक समाज सेवा के प्रकल्प में योगदान देते रहे हैं। कुलभूषण बक्शी के असामयिक निधन से कल्याणम करोति के प्राण पुरूष विमल कुमार शर्मा को परोपकार मार्ग में जो ठेस लगी है पारब्रह्म परमात्मा श्री विमल कुमार शर्मा को इस मित्र हानि के दुःख से निवृत्ति की शक्ति प्रदान करे। उन्हें कुलभूषण बक्शी तरीके के नये सहयोगी मिलें। उनके वर्तमान मूर्धण्य सहयोगियों में डाक्टर वी.वी. प्रताप श्याम किशोर जेटली सुनील कुमार शर्मा अयोध्या और बिठूर में उन्हें सहयोग देने वाले सभी महानुभावों में कुलभूषण बक्शी सरीखी पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे वैष्णव भक्त नरसी मेहता की यह उक्ति समाज सेवा करने वाले व्यक्तियों का गुरूमंत्र बने। कुलभूषण बक्शी की यशस्विता अमर रहे। उन्हें परमात्मा सद्गति देे। अगले जीवन में उन्हें यशस्वी बनाये। यह एक लोकसेवी का देहन्यासाख्यान है। समाज सेवी वर्ग कुलभूषण बक्शी की सदाशयता यानि अस्माकम् सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि।
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