Wednesday, 4 March 2015

अवसाद से छुटकारा कैसे हो ?

विस्मृति आ अवसाद घेरले बीरबले बस चुप करदे। - बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’
  इंडिया टुडे के संपादक प्रमुख अस्थापुरी ने अवसाद अथवा विषाद जिसे अंग्रेजी चिकित्सा विज्ञानी ‘डिप्रेशन’ संबोधन कहते हैं उसकी महामारीनुमा आक्रामकता की ओर लोक ध्यानाकर्षण करते हुए इस बीमारी के रूग्ण व्यक्ति के मानसिक एवं शारारिक कष्ट के समानांतर इसे भारतीय राष्ट्र की उत्पादकता को गहरे किस्म के राष्ट्रीय घावों को फैलाने वाली महामारी कहा है तथा भारत सरकार घटक राज्य सरकारें नगर क्षेत्र, जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत व गांव पंचायत सहित समूचे भारतीय मानवीय सेहत संरक्षा का प्राथमिक सर्वोच्च स्तरीय संरक्षण सृजित करने की आवश्यकता जतायी है। उन्होंने दिसंबर 2014 में सेहत सुरक्षा बजट में 20 प्रतिशत कटौती के भारतीयों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कदम माना है। वे व्यक्त करते हैं कि भारत में अपने राष्ट्र जनों के लिये मानसिक स्वास्थ्य नीति का उद्घोष अक्टूबर 2014 में किया परंतु मानसिक सेहत संरक्षा विधेयक जिसका लक्ष्य मानसिक रोगियों के अधिकार संरक्षण तथा मानसिक रोगियों के मानसाधिकार मुहैया करता भी है। उनकी मान्यता है कि संसदीय कानून निर्माता गलियों में ही यत्र तत्र भटक रहा है। उनका कहना है कि उप संपादिका दमयन्ती दत्ता ने मानसोत्तर के समूचे संदर्भ को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चिंतन पोखर वाले बहस का बिन्दु उभारने की कोशिश की है। अरूण पुरी व उनके सहयोगियों ने डिप्रेशन जिसे हिन्दीभाषी अवसाद कहते हैं यदि अवसाद को तात्कालिक बीमारी माना जाये महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवदगीता के अठारह अध्यायों सात सौ श्लोकों धृतराष्ट्र संजय सहित कृष्णार्जुन संवाद के सभी उवाच संवाद शैली के पहले प्रकरण ‘विषाद’ का उद्घोष किया है। विषाद और अवसाद में कितना साम्य है कितनी विरूद्धधर्मिता इसका विश्लेषण भी डिप्रेसन अथवा विषाद के कथ्य को हृदयंगम करने के लिये आवश्यक अर्हता है। 
क्या विषाद-अवसाद तथा डिप्रेसन को पर्यायवाची अथवा समानार्थी शब्द माना जाये। श्रीमद्भगवदगीता के अर्जुन के युद्ध के मैदान युद्ध के लिये तैयार होकर आये अपने तत्कालीन एवं कर्तव्यों के प्रति जो मानसिक द्वन्द वाली प्रतिक्रिया व्यक्त की उसे काव्यात्मक रूप महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने विषाद योग बताया। स्वतंत्रता सेनानी हिन्दी कवि बालकृष्ण शर्मा नवीन हिन्दी कविता जगत के चमकीले नक्षत्र थे। उन्हें पंडित नेहरू ने राज्यसभा का मनोनीत सदस्य 1957-58 में नियुक्त किया। बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविता सुन कर अपनी व्यस्तता के बावजूद काव्य रसास्वादन करते हुए अपने आपको तरोताजा महसूस करते उनकी कविता ‘विस्मृति आ अवसाद घेरले’ पंडित जी को नयी ऊर्जा देती थी। अरूण पुरी की राय में भारतीय शहरों की बढ़ती हुई भीड़ संस्कृति के साथ साथ पारम्परिक संयुक्त परिवार की टूटन अवसादपूर्ण जिंदगी के कष्ट बढ़ाती है। वे कहते हैं कि भारत की जरूरत से देश में 8500 मनोचिकित्सकों की कमी है। मनोविज्ञानियों के क्षेत्र में भी 6750 अतिरिक्त मनोविज्ञानियों की जरूरत है। उनका मानना है कि सरकार को यह भी पता नहीें कि इस तकलीफदेह बीमारी के देश में कितने रोगी हैं ? जीविताशा वलीयसी कहावत है जिसे यह ब्लागर जीविताश कह रहा है अपोलो अस्पताल के जनक डाक्टर प्रताप सी. रेड्डी संस्थापक अपोलो अस्पताल समूह का कहना है कि उन्होंने सेहत संभाल की शुरूआत तीन दशाब्दी पहले चेन्न से शुरू की वे कहते हैं उन्होंने चित्तूर जिले में स्थित अपने गृह नगर की अंगीकृत किया। उन्होंने सेहत की देखरेख के लिये एक अनुकूल मनोभावना का विस्तार किया। इंडिया टुडे ने अपने मार्च 2 वर्ष 2015 के साप्ताहिक अंक में डा. प्रताप सी. रेड्डी का विज्ञापी संपादकीय प्रकाशित कर सेहत सुरक्षा का नया मंत्र दिया है। 39 वर्षीया सुश्री वन्दना शाह तलाक पत्रिका संपादिका हैं। तलाक मामलों की वकील भी हैं। पहले मुकदमे दायर करने वाली व्यक्ति भी रही हैं। उनका कहना है - डेथ (मृत्यु) डिप्रेसन (अवसाद) डाइवोर्स (तलाक) में तीन अप्रिय अनकहे शब्द हैं। वन्दना शाह की तलाक वाली अपनी रामकहानी है। डाक्टर राजेश सामू मानते हैं कि अवसाद का इलाज है। अवसाद कब शुरू हुआ यह तय करना श्रमसाध्य है। डाक्टर असित सेठ का मानना है कि अवसाद के कष्ट का मूल्य तो चुकाना ही पड़ता है। अवसादग्रस्त व्यक्ति अपने आप को अकेला महसूस करता है। डाक्टर समीर पटेल का अनुभव है कि अवसाद के रोगी दैनंदिन समस्याओं को लेकर आते हैं। डाक्टर मंजू मेहता का मानना है कि बहुत से रोगी शारीरिक प्रवृत्तियां भी संपन्न नहीं कर पाते हैं। उन्हें स्वस्थता भाव दर्शाना होता है। डाक्टर अमृता नारायणन मनोवैज्ञानिक तथा लेखिका का मत है कि लज्जा का आवरण तोड़ डालो वाराह पुराण तथा मार्कण्डेय पुराणों ने स्त्री मनोविज्ञान पर खुली चर्चा की है। दण्डक, अंधक जातहारिणी तथा दत्तात्रेय संबंधी आख्यानों के अलावा मार्कण्डेय पुराण में वर्णित -
यो माम जयति संग्रामे यो मे दर्पम् विपोहति यो मे प्रति बलो लोके सः मे भर्ता भविष्यति
देवी ने शुंभ के दूत को कहा - मेरा पति वही हो सकता है जो मुझसे संग्राम में जीते, मुझसे बलवान मुझमें जो अहंकार है उसे जो मिटा सके। 
डाक्टर अमृता नारायणन ने लज्जा का आवरण उतारने का जो उद्गान किया है वह महिला सामर्थ्य शक्ति संपात का वैसा ही रास्ता है जैसा दुर्गा ने अपनाया था और कश्यप-दनु के जुड़वां बेटों शुंभ और निशुंभ को खुली दावत दी कि युद्ध में विजयी से दुर्गा तुम्हारी दायिता ले सकती है। दुर्गा शुंभ-निशुंभ युद्ध में शुंभ निशुंभ मारे गये। सुमंत्र चटर्जी का कथन है अवसाद सहित घातक बीमारियों में भारत की ज्ञान शलाका कुछ खिसक गयी पश्चिम से उपलब्ध ज्ञान विज्ञान व पश्चिम की दवादारू क्या हमारी जरूरतों को पूरा करने की क्षमतावान हैं ? भारत की जरूरत अवसाद विषाद पर अपने लोगों पर हुए स्वानुसंधान की जरूरत है। भारत में चार स्त्रियों में एक दस मर्दों में एक याने जनसंख्या की चौथाई औरत और जनसंख्या के दशांश पुरूष अवसाद से पीड़ित हैं। देश में 3500 अभी 3500 मनोरोग चिकित्सक मनोचिकित्सा में लगे हैं। भारत की मनोरोग चिकित्सा के लिये 11500 मनोरोग चिकित्सक चाहिये। भारत में अवसादग्रस्तता पीड़ित रोेगियों की औसत आयु 31.9 वर्ष की है। संयुक्त राज्य अमरीका में औसत आयु 22.7 वर्ष है तथा चीन में 18.8 है। अवसाद पीड़ित 67 प्रतिशत रोगी वर्ग में आत्मघाती वृत्ति पायी जाती है। 17 प्रतिशत लोग आत्महत्या का प्रयास करते हैं। भारत में 2001 से 2014 के बीच चौदह वर्षों में 528 प्रतिशत बढ़ोतरी इंगित हुई है। 45 प्रतिशत नाप्तयौवन अवसाद के कारण मदिरा और नार्कोटिक द्रवों की ओर आकर्षित होतेे हैं। डाक्टर राजेश सच्चर द्वारा अवसाद पीड़ा का भारतीय नजारा अवसाद जागतिक संकट है। विश्व स्वास्थ्या संगठन का 2012 का सर्वेक्षण मानसिक सेहत का भारतव्यापी अनुसंधान चिकित्सा वाला भारतीय संगठन आई.सी.एस.आर. भारत में बारह करोड़ व्यक्ति अवसादग्रस्त हैं। कृष्णार्जुन संवाद का पहला अध्याय ही विषाद योग कहलाता है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा - पापमेवाश्रये दस्मान् हत्वैतानानतायिनः। आततायियों की व्याख्या करते हुए वशिष्ठ स्मृति व्यक्त करती है - अग्रि दो गरवश्चैव शस्त्रपाणिर्धनायह् क्षेत्रदारर्ग षडैकेआततायिनः। अर्थात आग लगाने वाला, विष देने वाला शस्त्र लेकर मारने वाला, धनहर्ता भूमिहर्ता दार चोर ये छः आततायी कहे गये हैं। महात्मा गांधी ने श्रीमद्भगवदगीता के दूसरे अध्याय के चौवनवें श्लोक के स्थितप्रज्ञ व समाधिस्थ की मनःस्थिति को अपनी प्रार्थना का मुख्य स्त्रोत निश्चित किया। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को सांख्ययोग का सार तत्व अठारह श्लोकों के जरिये बताया। बुद्धि की स्थिरता ही स्थितप्रज्ञता की स्थिति है। अगर विषादग्रस्त व्यक्ति जिसे अवसाद उत्पीड़ित भी कहा जा सकता है अपने मन को स्थिर कर स्थितप्रज्ञता की ओर बढ़ता है उसे अवसाद उत्पीड़न नहीं हो सकता। बहुत से विचारक चिंतक तथा विश्लेषक लोग कहते हैं श्रीमद्भगवदगीता हिन्दू धर्म का ग्रंथ है पर नहीं श्रीमद्भगवदगीता तो मन को संयत करने की विधा है। श्रीमद्भगवदगीता को किसी मजहब से जोड़ कर देखने के बजाय मनुष्यता की उदात्त मानवीयता से जोड़ कर देखने की जरूरत है। श्रीमद्भगवदगीता के पंद्रहवें अध्याय का दूसरा श्लोक पुरूषोत्तम योग कहलाता है। इसमें कहा गया है - अधश्चोर्ध्वम् प्रसूतास्तस्य शाखा गुण प्रवृद्धा विषय प्रकाला अधश्च मूलान्युनु संततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके। मनुष्य योनि ही कर्मों का अनुबंध है। मनुष्य को कर्म का स्वाधिकार है। यही स्वाधिकार मनुष्य को दूसरी योनियों से अलग विशेष पंगत में खड़ा करता है। गीता का उपदेश व्यक्ति के मन के संशय को भगाता है। मन ही मनुष्य के सुख दुःख का कारक है। श्रीमद्भगवदगीता के सात सौ श्लोक जिन्हें  विषाद योग सहित अठारह योग पंक्तियों में गूंथा गया है उवाच उनसठ हैं जिनमें धृतराष्ट्र का एक संजय के सात अर्जुन के अठारह भगवान श्रीकृष्ण के 28 उवाच हैं कुल उवाच संख्या है। जिन लोगों की आस्था कृष्णार्जुन संवाद में है वे यदि अपने मन को पक्का करने, भ्रम, संशय से राहत पाना चाहें उनको श्रीमद्भगवदगीता का सांसारिक पाठ संत विनोबा शैली पर करना चाहिये। जिसे महात्मा गांधी ने दुनियादारी निभाने वाले व्यक्तियों के लिये अध्यात्म मार्ग का साप्ताहिक गीता पाठ शुक्र से गुरू तक सात दिन, पहले दिन पहला दूसरा अध्याय दूसरे दिन तीसरा चौथा पांचवां तीसरे दिन छठा सातवां आठवां चौथे दिन सोमवार को नवां से लेकर बारहवें तक मंगलवार को तेरहवें चौदहवें व पंद्रहवें अध्याय बुुध को सोलहवां सत्रहवां गुरूवार को अठारहवां अध्याय। श्रीमद्भगवदगीता के साप्ताहिक पाठ से मन में स्थित प्रज्ञता का शनैः शनैः प्रभाव बढ़ेगा। क्षणिक विषाद से उत्पन्न मानसिक अवसाद से राहत मिलेगी। वैज्ञानिक सोच रखने वाले महानुभाव अगर राजनीतिक अथवा वैचाारिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेते हुए गीता पाठ का विरोध करें यह पाठ सामूहिक प्रार्थना न होकर वैषादिक उपक्रम भी हो सकता है। ध्यान, प्रार्थना, नमस्या या नमाज, यज्ञ या हवन संपन्न करना, मानव आस्था के चार चरण हैं। ध्यान या जप करना अकेले या सामूहिक प्रार्थना करना, हठासन में रोजाना पांच बार नमाज अता करना तथा वातावरण की शुद्धि हेतु हवन भी मनुष्य में पागलपन के लक्षण टल सकते हैं। अवसाद अथवा डिप्रेसन मानसिक रूग्णता का कारक तत्व माना गया है। इसलिये वैकल्पिक उपाय के तौर पर गौ-उत्पाद, पंचगव्य का सप्ताह में एक दिन शरीर पर लेप कर 2 घन्टे के पश्चात स्नान करने से भी अवसाद की शरीर पर होने वाली रासायनिक प्रक्रिया को रोका जा सकता है। 
अवसाद रोक के वैज्ञानिक उपायों में पंचगव्य व प्रत्येक शनिवार को स्वमूत्र से शरीर लेप के पश्चात 2 घंटे उपरांत स्नान करना भी अवसाद के शरीर पर तथा मन पर होरहे आक्रमण को रोका जा सकता है। यहां पंचगव्य निर्माण विधि का उल्लेख इसलिये किया जारहा है क्योंकि पंचगव्य गेह-शोधन तथा कायशोधन का प्रतीक है। गो मूत्र, गोमय, गोदुग्ध गोदधि गोसर्पि मक्खन व घी कुशोदक के मिश्रण से तैयार होने वाले पंचगव्य के बारे में भारतीय वाङमय का कथन है -
मूत्रम् तु नील वर्णाया कृष्णाया गोमयम् स्मृतम्, पयश्च ताम्र वर्णायाः श्वेताया दधि संस्मृतम्
कपिलाया घृतम् ग्राह्यम् महाव्याधि विनाशनम्।।
नील गाय का गोमूत्र, काले रंग की गाय का गोबर, तांबे के रंग वाली गाय का दूध, श्वेत रंग की गौ का दही, कपिला गौ का घी इनका मिश्रण गोमूत्र 2 हिस्सा, गोबर एक हिस्सा, गोदुग्ध 14 हिस्सा, दही छः हिस्सा, घी दो हिस्सा तथा कुशोदक 2 हिस्सा कुल अंतरिक्ष में स्थित 27 नक्षत्रों के लिये सत्ताईस हिस्से से तैयार पंचगव्य गौओं जिनके वर्ण के बारे में ऊपर कहा गया है शुक्ल पक्ष को एकादशी तिथि से लेकर पौर्णमासी तक संग्रहीत हो उसका पंचगव्य बने। उस पंचगव्य से काय शोधन व गेह शोधन दोनों कार्य संपन्न हो सकते हैं। नील गाय का गोमूत्र संकलित करना श्रमसाध्य काम है परंतु विंध्य-सतपुड़ा पर्वतों की भांति जहां पूज्य बाबा का वन्य जीव आरक्षण है वहां तीन नील गायों पर भी इलाज चल रहा है। इसलिये जहां जहां नील गायें फसलें बर्बाद कर रही हैं उन्हें बाड़े में रख कर नीलगाय गोमूत्र संकलित करना पंचगव्य निर्माण में उपयोग करना संकल्पित किया जाये। राजस्थान मुख्यमंत्री महोदया जी से रणथंभौर में नील गायों द्वारा पहुंचायी जारही खेतीबाड़ी के नुकसान का ब्यौरा उपलब्ध किया गया है। जहां जहां नील गायें फसलों को चौपट करती हैं उन्हें वन्य पशु संरक्षण के काम में प्रयुक्त किया जा सकता है। विधिपूर्वक हिमालयी गौओंके दूध दही घी तथा गोबर सहित तराई तथा मैदानों में पाये जाने वाली नील गायों के गोमूत्र उपलब्धि के स्त्रोत सहित पंचगव्य-व्याधि नामिनी सुलभ औषध का विनिर्माण सटीक तरीके से कैसे हो इस पर अगले ब्लाग में प्रस्तुत किया जायेगा तथा अवसाद से राहत के हिन्दुस्तानी तौरतरीकों पर भी विवेचन होगा।
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