Wednesday, 4 March 2015

मुंबईकर भाषायी अल्पसंख्यक हिंदी भाषियों की अखबारी जरूरत


भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में मराठी समृद्ध भाषा है। जब से मराठी भाषियों ने नागरी लिपि का वरण किया है, संस्कृत प्राकृत तद्भव भाषा मराठी हिन्दुस्तान की समृद्ध क्षेत्रीय भाषा के रूप में उभरी है। मराठी भाषा का लोक मंगलकारी स्वरूप ज्ञानेश्वरी और एकनाथी भागवत के अठारह हजार अभंगों में दीखता है। राजधर्म, कूटनीति। छत्रपति शिवाजी की आन्वीक्षिकी विधा वाली षडंग राजनीति पेशवाई परामर्श तथा पेशवाई के समानांतर वडौदरा का गायकवाड़ इन्दौर का होल्कर ग्वालियर का सिंधिया मराठा राजतंत्र मराठी भाषायी प्रभाक्षेत्र से बाहर भी फैला यहां तक कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा बिठूर में मराठा स्वातंत्र्य एवं मराठी वाली भारतीय सांस्कृतिकता का व्यापक प्रभाव काशी के विद्वत् समाज में भी एक सांस्कृतिक धारा के रूप में विद्यमान था। चिंतनीय व मननीय बिन्दु यह भी है कि महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वरी पाठ ही गीता पाठ है चिंतनीय व मननीय बिन्दु यह भी है कि महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वरी पाठ ही गीता पाठ है। महाराष्ट्र की वर्णाश्रम व्यवस्था में कोेंकणस्थ व देशस्थ महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों के अलावा सामर्थ्यशील मराठा शक्ति संपात जिसे छत्रपति शिवाजी के राष्ट्रधर्म ने सशक्त बनाया। भारतीय राजनीतिक खेमों में मराठा लोक शक्ति एक सामर्थ्यशील राजधर्म की विधा के रूप में उभर कर सामने आयी। द्रविड़ देस तमिल भूमि से उत्पन्न भक्ति मार्ग जब कर्णाटक होते हुए महाराष्ट्र पहुंचा यहां भक्ति पुष्टि मार्गी श्रद्धा बन कर उभरी तथा भक्ति के ज्ञान-वैराग्य नामक अपत्यों ने भक्ति की विठ्ठल भक्ति धारा को पुष्ट किया और ज्ञान-वैराग्य तथा भक्ति की तरूणाई महाराष्ट्र में स्पष्ट रूप से दिखने लगी। स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है यह उद्बोधन मराठी भाषी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उर्ध्वबाहु होकर भारतीय राष्ट्रनाद की हुंकार भारतीय वायुमंडल में गुंजायमान की। 
भारत के भाषायी स्वरूप में आधुनिक हिन्दी के अलावा पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयाली, उड़िया, बांग्ला, मइती मणिपुरी, असमी और भारत में स्थायी नागरिकता प्राप्त गोरखा जिनकी मातृभाषा नैपाली है। ये सभी तेरह भाषायें और खड़ी बोली व्याकरण वाली फारसी शब्द बहुल उर्दू का भी भाषायी क्षेत्र वही है जो हिन्दी का है। भाषा विज्ञान हिन्दी व उर्दू को दो अलग अलग भाषायें नहीं मानता खड़ी बोली - रेखता जो संस्कृत शब्द शक्ति हिन्दी कहलाती है फारसी शब्द शक्ति संपात उसे उर्दू आवरण उपलब्ध करता है। इस्लाम के भारत प्रवेश ने मजहबी आस्थामूलक उद्देश्यों के लिये अरबी भाषा तथा राजनैतिक कर्मों के लिये फारसी भाषा का संबल लिया। फारसी हिन्दुस्तान के बादशाहत को भाई वह ज्यादातर इस्लामी राजकर्ताओं की सरकारी हुक्मों को जारी करने वाली भाषा थी। सिन्ध के लोगों ने अरबी लिपि को सिन्धी भाषा के लिये अपना लिया। आज भारत का भाषायी असमंजस इतना तीव्र है कि नागरी लिपि, संस्कृत भाषा तथा संस्कृत शब्दों बहुल हिन्दी के लिये केवल तमिलनाडु में ही नहीं अन्दरूनी विरोध जम्मू-हिमाचल, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ जहां नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी का प्राबल्य है भारत के सभी गैर हिन्दी घटक राज्यों में हिन्दी विरोध की अंतर्धारा प्रबल होती जारही है। नागरी हिन्दी प्रबल विरोध का सामना करने का एक ही उपाय है उर्दू सहित पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयाली, उड़िया, बांग्ला, मइती मणिपुरी, असमी और नगालैंड सहित अंग्रेजी भाषा को स्वभाषा मानने वाले लोगों के लोकमत को भारतीय संसद महत्व देकर संसद में किसी भी भारतीय भाषा अथवा अंग्रेजी बयान को अन्य भाषाओं के प्रयोक्ताओं के लिये तात्कालिक अनुवाद व्यवस्था हो साथ ही हिन्दी अंग्रेजी सहित प्रत्येक राज्य सरकार केन्द्र के साथ अपनी क्षेत्रीय भाषा में पत्र व्यवहार कर सकें। केन्द्र सरकार संबंधित राज्य की राजभाषा में ही घटक राज्य सरकार से पत्र व्यवहार का संकल्प ले तभी भारत की भाषायी अराजकता पर अंकुश लग सकता है।
स्वाधीनता संघर्ष तथा भारतीय स्वातंत्र्य के शुरूआती तीस वर्षों में मुंबई शहर में हिन्दी भाषियों के लिये दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्रों की एक श्रंखला थी। भारतीय विद्याभवन भवन्स जर्नल अंग्रेजी और हिन्दी में  प्रकाशित करता था। पूर्व में नवनीत नामक मासिक पत्रिका हिन्दी पत्रिका जगत में डाइजेस्ट का काम करती थी। नवनीत पत्रिका कालांतर में भवन पत्रिका बन गयी। आज भी नवनीत मुंबई से प्रकाशित होने वाली महत्वपूर्ण हिन्दी मासिक पत्रिका है। टाइम्स प्रकाशन के हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स ने साप्ताहिक धर्मयुग साप्तहिक दिनमान के समानांतर मुंबई के लाखों हिन्दी भाषियों को भाषायी पहचान दी थी। प्रभाष जोशी ने इंडियन ऐक्सप्रेस के हिन्दी संस्करण जनसत्ता के जरिये हिन्दी दैनिक पत्रकारिता का स्तर ऊँचा उठाने के साथ साथ हिन्दी अखबार नवीसों और हिन्दी भाषा के अखबार पढ़ने वालों में एक नयी जिन्दगी उडेलने का काम किया था। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश व हरियाणा दस हिन्दी भाषी राज्यों से अनेक मानक स्तर के हिन्दी दैनिक समाचार पत्र छपते हैं। मुंबई शहर के अखबार हाकरों के पास बांग्लाभाषियों की दैनिक पत्रिका - अमृत बाजार पत्रिका, गुजराती भाषा में मुंबई से छपने वाले जन्मभूमि के अलावा गुजरात से छपने वाले सभी गुजराती दैनिक समाचार पत्र मिलते हैं। राजस्थान पत्रिका गुजरात के अखबार हाकरों के पास मिलती है पर मुंबई में नहीं। दक्षिण भारतीय भाषाओं के दैनिक अखबार पाठकों के लिये मुंबई का हर अखबार हाकर तमिल तेलुगु मलयाली व कन्नड़ दैनिक पत्र रखता है परन्तु उत्तर प्रदेश व दिल्ली के किसी हिन्दी अखबार यथा हिन्दुस्तान, पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, अमर उजाला, आज, दैनिक भाष्कर, आर्यावर्त आदि अखबार पढ़ने को नहीं मिलते। 
बृहन्मुंबई महापालिका का नागरी क्षेत्र नवी मुंबई सहित समुद्र तटीय महाराष्ट्र के नगर क्षेत्रों में जिनकी कुल आबादी पांच करोड़ से ज्यादा है उस समूची महाराष्ट्र राज्य की मुंबई व आसपास शहरी आबादी में जहां 1.67 करोड़ मुंबई की जनसंख्या में चालीस लाख हिन्दी भाषी उत्तर भारतीय हैं। इनमें उर्दू भाषी बिहारी, उत्तर  प्रदेशीय इस्लाम धर्मावलंबी नहीं गिने गये हैं। जो लोग अपनी मातृृभाषा हिन्दी बताते हैं घर में हिन्दी बोलते हैं ज्यादातर लोग व्यवसायों में लगे हैं ऐसे दस लाख हिन्दी भाषी परिवारों में सक्षम तथा उत्तर भारत के इलाकों की क्षेत्रीय खबरें देने वाली समर्थ दैनिक अखबार न होने से बहुत से परिवार अंग्रेजी दैनिक अखबारों के खरीदते हैं। कंपनियों, भारत सरकार में नौकरी करने वाले लोग अंग्रेजी दैनिक अखबार से अपना काम चलाते हैं। उन्हंे अपने मूल प्रदेश के गांव शहर तथा जिले की खबरों के लिये तरसना पड़ता है। अतएव हिन्दुस्तान, पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, अमर उजाला, आज, दैनिक भाष्कर, आर्यावर्त सरीखे अखबार संचालन करने वाले अखबार घरानों को अपने अपने दैनिक अखबार के मुंबई संस्करण जारी करने का विचार करना चाहिये। हिन्दुस्तान टाइम्स का प्रकाशन मुंबई से होरहा है। दैनिक हिन्दुस्तान ने इधर पिछले तीन चार वर्षों में हिन्दी अखबारी संसार में अपने लिये स्थान सुरक्षित कर लिया है। इसलिये हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन के भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रचारी हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन को मुंबई के उप नगरों में रहने वाले हिन्दी भाषियों को समर्थ स्वर देने के लिये आगे आना चाहिये। हिन्दुस्तान दैनिक के अलावा दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका क्रमशः हिन्दी हृदय प्रदेश उत्तर प्रदेश व राजस्थान की ऐसी दैनिक पत्रिकायें हैं जो महाराष्ट्र के हिन्दी अखबार पढ़ने वालों के लिये एक सशक्त व समर्थ अखबारी वातावरण तैयार कर सकते हैं ? हिन्दुस्तानी अखबारी दुनियां में हिन्दी पत्रकारिता क्षेत्र में राजस्थान पत्रिका व दैनिक जागरण ऐसे दैनिक अखबार हैं जिन्हें अंग्रेजी के राहुकाल ने डस नहीं रखा। अंग्रेजी अखबार नवीसी के समानांतर हिन्दी अखबारों पर अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहता है। बाबूराव पराड़कर व कमलापति त्रिपाठी ने हिन्दी अखबार नवीसी को जो स्तरीय ऊँचाई दी उसे स्वतंत्र हिन्दी अखबार ज्यादा सामर्थ्य दे सकते हैं। आज हिन्दी अखबार नवीसों में मौलिक लेखन के बजाय ख्यातनामा भारतीय अंग्रेजी अखबारों तथा विदेशी अखबारों में छपे लेखों के अनुवाद पर जोर दिया जारहा है। अनुवादी आख्यान सही सटीक अनुवाद न होने के कारण दिशा भ्रम एवं संशयग्रस्तता भी फैलाते हैं। विभिन्न हिन्दी अखबारों में आज यह संशयग्रस्तता विद्यमान है। जरूरत इस बात की भी है कि हिन्दी अखबार घराने मौलिक लेखन को बढ़ावा देें। पीढ़ियों के सनातन ज्ञान में व्यापक अंतराल वाली खाई चौड़ी होती जारही है। ठीक उसी तरह जिस तरह गरीब अमीर के बीच खाई चौड़ी होती जारही है। संपन्न विपन्न व्यक्ति की हंसी उड़ाने में उतारू होगया है। सत्ता के स्वामी यह समझने लग गये हैं कि वे ही मांधाता महीपति हैं इसलिये सबसे पहली जरूरत वह है जो स्वामी विवेकानंद ने महात्मा गांधी ने सेठ राजा बलदेवदास बिड़ला ने दुर्बल गरीब को अपने साथ साथ चलने के लिये प्रेरित किया। 
  संसार परिवर्तनशील है। परिवर्तन की हवा को सही दिशा देने का काम भारत के भाषायी अखबार कर सकते हैं। जर्मन भाषी मैक्समूलर ने भारत आये बिना भारत को समझा और ऋग्वेद का प्रकाशन आक्सफोर्ड से संपन्न कराया। मैक्समूलर ने अपने स्व नाम को जो जर्मन संस्कृति का नाम था उसे भारतीय वाङमय मोक्षमूलः उद्घोषित किया। बर्तानी आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का उन्होंने अक्षपत्तन कह कर अक्षपत्तन को काशी व अवंति के स्तर में रखा। ऋग्वेद के हस्तलिखित पाण्डुलिपियों तथा ऋग्वेद के सस्वर उच्चारण को उन्होंने महत्ता दी। पुरानी जर्मन भाषा में 80 से 90 प्रतिशत संस्कृत शब्द हैं। अंगेला मर्केल महाशया ने भारतीय प्रधानमंत्री का ध्यानाकर्षण करते हुए कहा था कि मानव संसाधन मंत्रालय जर्मन भाषा के बजाय संस्कृत का पाठ्यक्रम का अंग बना रहा है। जर्मनी शब्द स्वयं संस्कृत के शर्मणि शब्द का रूपांतर है। जर्मन भाषा की तरह रूसी भाषा भी संस्कृत के नजदीक है। इसलिये विदेशी भाषायी जरूरत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि हिन्दी-प्राकृत- पाली-रूसी-जर्मन व अंग्रेजी भाषाओं के शब्द पर्यायी कोष निर्धारित किये जायें ताकि विभिन्न भाषाओं की शब्द शक्ति सटीक समझने का उपक्रम हो सके और भाषायी ऊहापोह भाषातंरण की त्रुटियों के कारण व्यक्ति में संशयग्रस्ता उत्पन्न न करे। भारत सरीखे बहुभाषी राष्ट्र हित के लिये संस्कृत-प्राकृत-पाली आधुनिक भारतीय भाषाओं तद्भव शब्द उनका स्वरूप संस्कृत, प्राकृत, पाली, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयाली, उड़िया, बांग्ला, मइती मणिपुरी, असमी और हिन्दी सहित हिन्दी क्षेत्र की सभी तद्भव भाषाओं में संस्कृत-प्राकृत-पाली शब्दों का वर्तमान रूप यह भाषायी शब्द तेज आज की मूर्धण्य जरूरत है। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल बादशाह की इजाजत से सूरत में तिजारत शुरू की हिन्दुस्तान की भाषा को समझने के लिये ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने कारिंदों को स्थानीय भाषा को रोमन लिपि में लिखने की सलाह दी ताकि वे व्यापारी भारत के शब्दों को सही सही समझ सकें। उस भाषा को उन्होंने रोमन उर्दू कहा। 
  चेतन भगत सरीखे अंग्रेजी लेखक हैं तो हिन्दुस्तानी परंतु अंग्रेजी भाषा में लेखन कार्य करते हैं। उनका मत है कि हिन्दी को दुनियां में लोकप्रिय बनाने के लिये रोमन लिपि में लिखा जाये। वे यह भूल रहे हैं कि रोमन लिपि में 26 अक्षर हैं जब कि ग्रीक में केवल 24 अक्षर। वे सभी उच्चारणों को व्यक्त नहीं कर पाते हैं यथा हिन्दी का - ख घ ङ च छ झ ठ ढ ण त थ ध न भ ष श क्ष त्र ज्ञ उन्नीस अक्षरों की उच्चारण अनुसार लिखने की व्यवस्था रोमन लिपि में नहीं है। रामकृष्ण मिशन ने संस्कृत शब्दों को रोमन लिपि में लिखे जाने के लिये वेदों में सस्वर उच्चारण चिह्नों का प्रयोग कर एक नयी शब्द रचना शुरू की जिससे पश्चिम के लोगों को कृष्ण, विष्णु, हृषीकेश, ऋषि आदि शब्दों की अभिव्यक्ति हेतु अंग्रेजी रोमन अक्षरों के साथ कुछ अनुस्वार उच्चारण प्रतीक निश्चित किये। उदाहरणार्थ संस्कृत शब्द विष्णु के लिये VISHNU, हृषीकेश के लिये HRISHIKESH, ब्रह्म के लिये BRIHM। 
  चेतन भगत की रोमन लिपि में हिन्दी लिखी जाने के अलावा बंगलुरू के श्रीमन नारायण मूर्ति ने मूर्ति लाइब्रेरी के लिये आक्सफोर्ड की ओर रूख किया है। उनके सुपुत्र भारतीय वाङमय को नया निखार देकर पुस्तक क्रांति का संकल्प ले रहे हैं। उन्हें भी भारतीय वाङमय को रोमन लिपि के जरिये लोक प्रसिद्धि की कल्पना है। सबसे पहली जरूरत तो संस्कृत-प्राकृत-पाली तद्भव भारतीय भाषाओं के पर्याय कोश की तात्कालिक जरूरत है। यह काम किसी एक व्यक्ति अथवा एक सरकार का नहीं भारत की सरकार तथा भारत संघ के घटक राज्यों को अपने अपने राज्य की वाणी, बोली व भाषा एवं संस्कृति को नया जीवन देने के लिये साझा उत्तरदायित्त्व स्वीकार करना चाहिये ताकि भारतीय भाषाओं के विभिन्न तत्वों को सटीक समझने और भारतीय वाङमय को मूल मानते हुए भारतीय भाषायी अश्वत्थ वृक्ष की संरचना करनी होगी। भारतीय भाषायी विश्वकोष की रचना भारतीय भाषायी वर्ण संकरता से बचा सकती है। अंततोगत्वा भारत के लोगों को नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नव पंचवारम् - नटराज के डमरू के नौ धन पांच - चौदह ध्वनियों के ध्वन्यालोक को पहचानना ही होगा।
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