Wednesday, 4 March 2015

गांधी वैचारिकी आज भी प्रासंगिक है।
अहिंसा के मसीहा महात्मा गांधी पर शस्त्रघाती हिंसाचार

5 फरवरी 2015 के अमर उजाला प्रवाह पन्ने में गांधी और गौड्से शीर्षक से - अखबार के अनुुसार आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता योगेन्द्र यादव के गांधी विचार पर अखबार पाठक प्रतिक्रिया का आकांक्षी है। सवाल यह है कि लोकमत विवेचक योगेन्द्र यादव को किसी एक राजनीतिक दल के खूंटे से क्यों बांध दिया जाये ? आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में जिसे भारतीय संघ राज्य के घटक का संवैधानिक दर्जा मिलना अभी शेष है, दिल्ली में भारत सरकार की केन्द्रीय सत्ता है यद्यपि विधान सभा है। पूरे दिल्ली क्षेत्र में भारत सरकार के अलावा लंगड़ा कर चलने वाली राज्य सरकार तथा नगर निगम नयी दिल्ली नगरपालिका तिहरा प्रबंध तंत्र है। यदि केन्द्र सरकार और दिल्ली की सरकार भारतीय संविधान के तिहत्तरवें व चौहत्तरवें संविधान संशोधन पर ईमानदारी से क्रियान्वयन करें, भारतीय संसद के दोनों सदन दिल्ली नगर निगम जिसे दिल्ली की पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार ने संविधान संशोधन की उपेक्षा करते हुए नगर निगम को अनेक टुकड़ों में बांट डाला। त्रिस्तरीय पंचायती राज अथवा डाक्टर लोहिया संकल्पित चौखंभा लोकतंत्र को संबल कैसे मिले ? राजधानी क्षेत्र की संवैधानिक नजरिये से लंगड़ी सरकार भी अपने 158 ग्राम पंचायतें तथा 62 कस्बायी बस्तियों सहित नयी दिल्ली नगर पालिका, महरौली, दिल्ली, दिल्ली छावनी, पालम, शाहदरा, अलीपुर, बादली, नजफगढ़, नरेला प्रमुख हैं। पचास के दशक में दिल्ली में 276 ग्रामीण बस्तियां तथा दिल्ली नगर निगम, नयी दिल्ली नगर पालिका, दिल्ली छावनी क्षेत्र थे। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने दिल्ली के गांवों का ग्रामोद्योगीकरण संपन्न करने के लिये खादी ग्रामोद्योग आयोग के प्रमुख वैकुंठ ल. मेहता जो भारतीय स्टेट बैंक के कार्यकारी उपाध्यक्ष होने के साथ साथ मुंबई प्रेसीडेंसी में सहकारिता आंदोलन के प्रवर्तक थे। विकेन्द्रित आर्थिकी के राष्ट्रीय पुरोधा थे। वे मुंबई प्रेसीडेंसी के प्रथम लोकप्रिय सरकार में बी.जी. खेर मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री व सहकारिता मंत्री रह चुके थे। वैकुंठ ल. मेहता का व्यक्तिगत संबंध अदने से अदने कार्यकर्त्ता से रहता था। जिस व्यक्ति को जमीनी स्तर पर कार्य संपादन करना होता वे उससे सीधा तादाम्य रखते थे। अपनी मातृभाषा गुजराती के अलावा वे मराठी भाषा के भी पारंगत थे। मुंबइया हिन्दी में बातचीत करते थे। जब उन्हें खादी ग्रामोद्योग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया उनकी पहली प्राथमिकता हिन्दी भाषा में कारगर संवाद क्षमता अर्जित करना रहती थी। दिल्ली में ग्रामीण उद्यम सहकारी समितियों के गठन में उनकी रूचि थी। जब कभी मुंबई से दिल्ली आते तेलियों, कुम्हारों, हथकरघा बुनकरों व धान कुटाई करने वाले शरीर श्रमियों की सुध लेने दिल्ली के गांवों में घूमते रहते थे। उत्तर प्रदेश के लगभग एक लाख ग्रामीण इलाकों में कम से कम हर गांव में एक ग्रामोद्योग सहकारी ढांचा खड़ा करना उनकी प्राथमिकता थी। वे इजरायल के नवनिर्माण के तौरतरीकों का पारम्परिक हिन्दुस्तानी गांवों में प्रयोग करने वाले पहले गांव हितैषी नेतृत्त्व थे जिनकी जिंदगी का आदर्श राजा रंतिदेव की वह शक्ति थी जिसमें राजा रंतिदेव ने कहा था -‘नत्वहम् कामये राज्यम् न स्वर्गम् न पुनर्भवम् कामये दुःख तप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्’। उनकी यह सत्संकल्प वाली कल्पना का उनके विश्वस्त साथियों गांधी आर्थिकी प्रयोगकर्ताओं में झबेर भाई पी. पटेल और विश्वनाथ एन. टेकुमल्ला ने डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के गांव जीरादेई में रूर्बन सोसाइटी के शिवसंकल्प को साकार करने में लगायी। रूर्बन सोसाइटी का एक दूसरा संस्करण डाक्टर ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने P.U.R.A. के रूप में प्रस्तुत किया। बारह वर्ष भारतीय गणराज्य के पश्चिमी भारत के गुजरात राज्य घटक के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने गांवों का कायाकल्प गांवों की सांस्कृतिक तथा सामाजिक स्थितियों को जिसे उन्होंने गांव की आत्मा की बरकरारी की संज्ञा दी उसे बरकरार रखते हुए गुजरात के पचास गांवों के अर्धशहरीकरण का बीड़ा उठाया RURBNISATION के सत्संकल्प से शुरू किया। जब नरेन्द्र मोदी सोलहवीं लोकसभा में पंद्रहवें सदन नेता के रूप में उपस्थित हुए उन्होंने भारतीय राष्ट्रीयता के प्रबल समर्थक धाराप्रवाह हिन्दी भाषणकर्ता डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की स्मृति में RURBAN MISSION संकल्पित किया। ये सारे कृत्य गांधी के गांव प्रेम के प्रतीक हैं। 
गांधी के अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज और अपने मुल्क वासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज का जो दर्शन शास्त्र हिन्द स्वराज में अपनी मातृभाषा गुजराती के जरिये व्यक्त किया, गांधी हिंसा आधारित स्वाधीनता के पक्षधर भारतीय युवा जन शक्ति को बर्तानियां में सुन चुके थे। सशस्त्र क्रांति के उद्गाता भारतीय नवयुवाओं की बातें सुन कर ही चिंतन मनन कर महात्मा गांधी ने इंडियन ओपीनियन के जरिये अपनी कल्पना के भारत में हिन्द स्वराज की झांकी बीस अध्यायों वाले अपने लघु ग्रंथ में उडेल कर रख दी। गांधी ने हिन्द स्वराज में जिन बिन्दुओं पर वाचक और अधिपति की संवाद संरचना की उसे अमृतलाल नानावती जी ने हिन्दी में अनुवाद करते समय पाठक और संपादक संज्ञा दी। गांधी के राजनीतिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले ने हिन्द स्वराज को एक मूर्ख की रचना बताया। टालस्टाय सहित यूरप के अनेकानेक विचारकों ने आधुनिकता के दोषों से बचने की कुंजी हिन्द स्वराज में पायी। गांधी विचार दर्शन के प्रखर व्याख्याता आचार्य दत्तात्रेय वी. कालेलकर ने हिन्द स्वराज की अर्धशताब्दी के अवसर 1.8.1959 को कहा कि गांधी का आध्यात्मिक स्वराज भारतीय रहन सहन को पुनर्जीवित करने की उनकी कल्पना भारत को कहीं का नहीं रखेगी इसलिये हिन्द स्वराज शब्द शक्ति आधुनिक भारत को मान्य नहीं है। उन्होंने यहां तक लिख डाला कि विनोबा का सर्वोदय अभियान भी हिन्द स्वराज का सहारा नहीं ले रहा है। उन्हें भी भारत को सर्वोदयी बनाने के लिये आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों की दरकार है। विनोबा दार्शनिक थे, उन्होंने अपने सारे लेखन में वक्तव्यों में हिन्द स्वराज की कहीं भी आलोचना नहीं की। 
शहीद पार्क में खड़े होकर शब्द शैली के चित्रकार चिंतन पोखर योगेन्द्र यादव ने शहीदों की विरासत का स्मरण किया। उन्होंने दो ‘ग’ ‘‘गांधी और गौड्से’’ शीर्षक से शुरूआत शहीदों की स्मृति से की। महात्मा गांधी मोहनदास करमचंद गांधी की जीवन रेखा सत्य और अहिंसा आधारित थी। उन पर रामायण कालीन सत्यवादी हरिश्चन्द्र के सत्याचरण का असर था। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में स्वयं लिखा कि सत्य हरिश्चन्द्र नाटक ने उनकी जीवन दिशा बदल डाली। योगेन्द्र जी लिखते हैं कि आज बापू का चेहरा करेंसी नोट में है। उनसे अर्ज है कृपया गौर से देखें करेंसी नोट में मोहनदास करमचंद गांधी का नहीं उनकी जीवनी को फिल्मांकित करने वाले बर्तानिया के फिल्मी हीरो एटिन बरा की फोटो है। उन्होंने गांधी का अभिनय किया। उसी तरह जिस तरह प्रति वर्ष दिल्ली की रामलीला मंचन में राम के एक्टर को रामभक्त राम समझ कर पूजते हैं। भारतीय सत्ता अधिष्ठान के जिस चिंतक ने करेंसी नोट में महात्मा गांधी के एक्टर का मुख अंकित करने का सुझाव रखा वह वास्तव में लोकतांत्रिक शासन में अकेले राजनीतिक पक्ष का पैरोकार था। चिंतन पोखर योगेन्द्र यादव ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राज को परिवारी राजकरण माना जिसके द्वारा गांधी विचार का उपयोग केवल गांधी परिवार की राजसत्ता की यथास्थिति बनाये रखने के लिये उपयोग किया। दूसरी ओर उन्हें गांधी के चश्मे के जरिये स्वच्छ भारत की नरेन्द्र मोदी की संकल्पना में भी अधिनायक वादी गंध महसूस हुई। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हिन्दुत्व जागरण संकल्पना में राजधर्मानुशासन की खामियां हो सकती हैं। कोई भी राजकर्ता किसी उद्देश्यपूर्ण वैचारिक स्त्रोत से बंध कर राजधर्म का अनुसरण नहीं कर सकता। उसे वाल्मीकि के कथन वयम् सर्वे गमिष्यामो रामो दाशरथिर्यथा तथा महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास के कथन वयम सर्वे गमिष्यामो यत्र गंता युधिष्ठिरः को हृदयंगम करना ही होगा तभी सुराज, रामराज और सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भागभवेत् की उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त होगा। मोहनदास करमचंद गांधी इसी मार्ग के राही थे। 
गांधी का चिंतन था कि वे वासुदेव श्रीकृष्ण की भांति सवा सौ वर्ष जियेंगे। अगर गौड्से के दिमाग में फितूर न आया होता। गौड्से या उसके सहधर्मियों ने गांधी को भारतीय समाज से छीन नहीं लिया होता तो वे सवा सौ वर्ष जीते। तब पी.वी. नरसिंहराव का राज होता। 1948 के पश्चात घटी प्रमुख राजनीतिक घटनाओं के बारे में महात्मा गांधी की प्रतिक्रिया होती ? यह कल्पना का स्त्रोत है। इस संदर्भ में यदि यह देखा जाय कि वासुदेव श्रीकृष्ण की भी मृत्यु बहेलिये के बाण से हुई। फर्क इतना ही है कि गौड्से ने गांधी पर गोलियां जानबूझ कर दागीं। उद्देश्य गांधी जीवन लीला समाप्त करना था। बहेलिये ने श्रीकृष्ण के पांव के तलुवे को जो लाल था उसे हिरण की जीभ समझ कर तीर मारा। जब श्रीकृष्ण के पास बहेलिया पहुंचा श्रीकृष्ण ने कहा - वत्स तुमने मेरी मनोवांछित इच्छा पूरी की है क्योंकि मुझे इस संसार से विदा होना ही था। तुम तो निमित्त मात्र हो। जाओ द्वारका में मेरी मृत्यु का समाचार दे दो। उनसे कहो सात दिन बाद द्वारका समुद्र में डूब जायेगी। सभी लोग अर्जुन के साथ ब्रजभूमि अपने मूल निवास की ओर चल दो। गांधी ने गौड्से की गोली लगने पर राम स्मरण किया और हे राम कहा। उनके पुत्र देवदास गांधी ने तत्कालीन सरकार से प्रार्थना की कि गौड्से को बरी कर दिया जाये। सरकार के कानूनी तंत्र ने देवदास गांधी के अनुरोध पर अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं दी। ठीक सौ वर्ष पूर्व कोचरब आश्रम में दूधाभाई हरिजन परिवार को आश्रम का हिस्सा बना कर गुजराती वैष्णव समाज की नाराजगी को सहा। तेरापंथी अंबालाल सेठ ने महात्मा गांधी के छुआछूत नहीं अभियान के लिये मुक्त हस्त होकर तेरह हजार रूपये की थैली सौंपी। कोचरब आश्रम की प्रवृत्तियों को रूकने से बचाया। योगेन्द्र यादव ने गांधी के सगुण व गांधी के निर्गुण व्यापकता व अव्यापकता का प्रसंग उठाया है। सगुण व निर्गुण भक्ति मार्ग के दो फाटक हैं। राम अथवा श्रीकृष्ण को अपना आराध्य मानकर चलने वाले सगुण अथवा साकार अवताराधारित भक्ति के दो प्रमुख स्तंभ सूर और तुलसी थे। तुलसी ने त्रेता के मर्यादा पुरूषोत्तम राम - दाशरथि राम की भक्ति का सगुण स्वरूप अपनाया। सूरदास ने बालकृष्ण की भक्ति का रास्ता लिया। इन दोनों से अलग कबीर की तीसरी शाखा थी जो परमात्म तत्त्व के निर्गुण स्वरूप की ध्यान भक्ति किया करते पर सगुण वादियों से कोई झंझट नहीं करते। गांधी के राम ईशरत्त्व की शक्ति के समानांतर मर्यादा पुरूषोत्तम थे। मर्यादाओं का अनुपालन करते थे। एक नारी व्रती थे। दाशरथि राम का लोकाचार राजा राम के रूप में उनका अपनी प्रजा से जो राजव्यवहार था, उस पर वसिष्ठ के योगमार्ग की छाप थी जिसे आज का आधुनिक संसार UTOPIAN संज्ञा देता है। महात्मा उस रामराज के प्रबल पक्षधर थे। उनकी पहली कृति हिन्द स्वराज संकल्पित रामराज्य का रोडमैप बताने वाला लघु ग्रंथ है। 
गांधी स्थितप्रज्ञ व्यक्ति थे। उन्हें श्रीमद्भगवदगीता के 700 श्लोकों में सांख्ययोग के उन्नीस श्लोक जिनमें चौवनवां श्लोक अर्जुन का प्रश्न है - स्थित प्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। गीता के ये अठारह श्लोक महात्मा गांधी के गुरू मंत्र हैं। उन्होंने स्वजीवन में स्थित प्रज्ञता तथा समाधि वाली स्थिति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया था। सामाजिक चिंतन पोखर जब किसी वैचारिक अथवा राजनीतिक लाभ हानि के खूंटे से अपने आपको बंधक बना लेता है तब चिंतन पोखर भी प्रदूषित होने की ओर अग्रसर होता है। योगेन्द्र यादव की तकलीफ इससे प्रकट होती है कि अंबेडकर वादी गांधी पर तरह तरह के आरोप जड़ रहे हैं। वे सर्वधर्म समभाव और सनातन वैष्णव धारा का भी उल्लेख करते हैं। आचार्य नरेन्द्र देव की मान्यता थी कि महात्मा गांधी दाय वैष्णव थे इसीलिये आसेतु हिमाचल भारतीयों के प्रिय नेता बने। 
योगेन्द्र यादव द्वारा कांग्रेस पर जड़े गये आरोप में गांधी की आत्मा को खोखला करना एक भीषण अतिशयोक्ति प्रतीत होती है। कांग्रेस में जब तक जवाहलाल नेहरू का वैयक्तिक व वैचारिक वर्चस्व बना रहा गांधी कांग्रेस के कवच बने रहे। उत्तर नेहरू कांग्रेस व गांधी विचार में आंकड़ा तिरेसठ के बजाय छत्तीस होगया। महात्मा गांधी ने कांग्रेस की राजनीतिकता से 1934 में ही उपराम ले लिया था। वे कांग्रेस को नहीं समूची भारतीयता का सत्याग्रही अहिंसा मूलक नेतृत्व कर रहे थे। आसेतु हिमाचल आबाल वृद्ध नर-नारी वे हिन्दू हों, मुसलमान, सिख या ईसाई हों, पारसी हों अथवा जैन व बौद्ध धर्मावलंबी हों सबसे कम संख्या वाले धार्मिक समूह पारसियों सहित महात्मा गांधी के नाम से हर हिन्दुस्तानी परिचित था। अंबेडकर पंथियों कांशीराम अनुयायी तथा सुश्री मायावती के समर्थक समर्थ, संपन्न दलित समूह पिछले साढ़े सतसठ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंगित क्रीमी लेयर वाली आर्थिकी लक्ष्मण रेखा को पार कर नवधनाढ्य भारतीय दलित अपने आप पर दलित ठप्पा चिपकाये रखने का पक्षधर इसलिये है कि उसे दरिद्रनारायण दलित समूह का जातिवादी समर्थन मिलता रहे। वह नवधनाढ्य चैन की वंशी दलित ठप्पे के साथ बजाता रहे। गरीबी-भुखमरी बीमारी से पीड़ित दरिद्रनारायण वह दलित हो पिछड़ा वर्ग से आता हो अथवा भारत के तथाकथित सवर्णों के बीच गरीबी की तबाही भुगत रहा समूह हो उसकी गरीबी का निवारण कानून अथवा सरकारी प्रोजेक्टों से तब तक नहीं हो सकता जब तक वह अपने आत्मबल का प्रदर्शन न करे। श्रमपूर्वक कौशल प्राप्ति का रास्ता न अपनाये। गांधी की तरह गरीब से गरीब आदमी आत्मीयता बढ़ाये बिना गरीब में आत्मविश्वास जगाये जाने और गरीब और अमीर कानूनी बराबरी के बावजूद व्यावहारिक बराबरी का रास्ता अपनाना होगा। वह रास्ता हिन्दुस्तान के लोगों को गांधी जी ने दिखाया। 
गांधी स्वयं मूर्ति पूजा व व्यक्ति पूजा के पक्षधर नहीं थे। मानवमात्र की बराबरी के पक्षधर थे। वे कोई साधु या सन्यासी भी नहीं थे। उन्होंने हिन्दुस्तान के आम आदमी को जाग्रत करने के लिये अपरिग्रह का रास्ता चुना। हिन्दुस्तान की धरती से महात्मा गांधी के इतर लोक में प्रवेश करने के साढ़े छः दशक के बाद भी गांधी ने हिन्द स्वराज में जो अभिव्यक्ति की अहमदाबाद में 1915 में कोचरब आश्रम में दूधाभाई हरिजन परिवार को आश्रम का अभिन्न अंग बनाने का जो स्तुत्य प्रयास किया छुआछूत मिटाने के लिये जो व्रत लिया आज गांधी एकादश व्रतों में जितनों का आप निर्वाह कर सकें उन्हें अपनायें। सत्य और अहिंसा का रास्ता तो अपनायें ही। गांधी विचार गांधी आचार शैली आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी गांधी जीवन काल में थी। यह सही है कि हिन्दुस्तान के लोग मजबूरी का नाम महात्मा गांधी तब भी कहते थे जब गांधी भारत की आजादी के संग्राम में बढ़ रहे थे। आलोचना तथा अपशब्द से डरना गांधी स्वधर्म नहीं था। भारत के दलितों को जो आत्मशक्ति महात्मा गांधी ने उन्हें हरिजन संबोधित कर उपलब्ध करायी। अंबेडकर वादियों का जो उल्लेख योगेन्द्र यादव ने किया है गांधी जीवन दर्शन में ईश निंदा भी भगवद्भक्ति का द्वेष्य भाव है। सदाचार निर्णय प्रकरण में नारद ने युधिष्ठिर से कहा - यथा वैरानुबंधेन मर्त्यस्तन्मयित वियात न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः। भारत के लोग ईशनिंदा को भी भक्ति का एक प्रकार मानते हैं। पश्चिमी सभ्यता ईशनिंदा को कबूल नहीं करती पर भारतीय भक्ति मार्ग में ईशनिंदा भी भक्ति का एक तरीका है। इसलिये गांधी विचार पर अनुकूल अथवा प्रतिकूल टिप्पणी से पूर्व समग्र गांधी साहित्य के साथ साथ दत्तात्रेय का कालेलकर आचार्य विनोबा भावे आचार्य कृपलानी महात्मा के तीन मुख्य गांधी ड्योढ़ी शताब्दी के अवसर पर गांधी आर्थिकी सहित गांधी ग्राम स्वराज तथा गांधी राजनीतिक चिंतन का भारतीय भाषाओं का सत्याग्रह - अहिंसक समाज की संरचना, राष्ट्र संघ के सदस्य देशों में गांधी वैचारिकी - गांधी प्रार्थना वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे। आज भारतीय नवयुवा समाज में पर पीड़ा समझने की ताकत पैदा करने की जरूरत है। गांधी का राजनीतिक ठीक से हृदयंगम करने के लिये सबसे पहली जरूरत - ‘पर दुःखे उपकार करे तोये मन अभिमान न आणे रे’ की मानसिकता को स्वयं अपनाना तथा आज के आत्मकेन्द्रित और आत्मकौशल संपन्न बनने की लालसा जुआरियों में जो भावना काम करती है पहले मेरी चाल, अहम् पूर्वम् अहम् पूर्वम् अहम् पूर्वम् इति श्रुतम् की उपेक्षा कर सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन न करना, शरीर श्रम करना, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध और लोभ के संवरण में न आना जो व्यवहार मुझे पसंद नहीं वैसा व्यवहार सामने वाले से न करना। आत्मानि प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत् तथा निर्भय होकर स्वकर्त्तव्य का पालन करना। गांधी जीवन दर्शन के आध्यात्मिक सामाजिक - अन्याय सहन न करना स्वयं अन्य व्यक्ति पर अन्याय मार्ग पर चल कर आक्षेप न लगाना, सामाजिक सांस्कृतिक आस्थामूलक शैक्षिक तथा आर्थिकी वित्तीय पाखंड से परहेज करना गांधी जीवन रेखा का मूल स्त्रोत है। गांधी साहित्य को आधुनिक युवा वर्ग की जरूरत के मुताबिक व्याख्यायित करने की जरूरत है। गांधी भारत के नांदीमुख हैं भारतीय मानसिकता द्वेष भक्ति को भी मान्य करती है। निंदा और स्तुति को पारस्परिक विधर्मिता मानती है। युधिष्ठिर ने नारद से पूछा था - चेदिराज शिशुपाल की अंगुष्ठ शरीर चेतना योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण में कैसे सम्मिलित हो गयी ? नारद ने कहा था कि विद्वेष भी भक्ति की एक विधा है। नारद का मत था कि विद्वेष भक्ति भी ईश्वर के निकट पहुंचने की क्षमता रखती है। यही हिन्दुस्तानी अध्यात्म दर्शन का गुरू मंत्र है जिसे मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी माता पुतलीबाई के श्रौत वैष्णव धर्म तत्व से माता स्तनपान के साथ आत्मसात किया था। गांधी को सही सही तरीके से समझने के लिये भारतीय पारम्परिक सहज कर्म के सदोष होने के बावजूद निष्पादन करने की प्रक्रिया ही मनुष्य योनि को कर्मानुबन्धिीनि मनुष्य लोके के ब्रह्माण्डीय सिद्धांत से जोड़ती है। गांधी पथ का सही अनुशीलन तभी संभव है जब गांधी चेतना चिंतन पोखर निर्द्वन्द निरंहकार व कर्मफल निरपेक्ष होकर गांधी विचार दर्शन का अध्ययन अध्यापन सभी पाखंड धर्मिताओं को एक किनारे रख कर संपन्न करें। 
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