Saturday, 7 March 2015

दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा - एक म्यान में दो तलवारें।
          इस ब्लागर ने दिसंबर 2012 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को गुजरात विधान सभा निर्वाचन में सफलता की शुभकामना व्यक्त करते हुए ‘दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ की मंगल कामना करते हुए उन्हें दिल्ली के तख्त पर आसीन होने की मनोकामना की थी। विपरीत राजनीतिक उठापटक के बावजूद 16 मई 2014 कोे नरेन्द्र मोदी ने भारत की षोडषी लोकसभा में अपने दल को बहुमत वाली राजनीतिक श्रेय दिला कर हिन्दुस्तान की राजनीतिक सोच में एक महत्वपूर्ण मील पत्थर स्थापित करने का उपक्रम किया। दिल्ली भारत की राजधानी है। दिल्ली शक्रप्रस्थ, इन्द्रप्रस्थ-खाण्डवप्रस्थ वन दाह के पांच हजार एक सौ पचास वर्ष से ज्यादा पुरानी इस राजधानी का इतिहास महाभारत के मुख्य पात्र कौंतेय पाण्डुनंदन अजातशत्रु युधिष्ठिर के उस सौम्य स्वभाव का पहला पड़ाव है जिसके द्यूत पराजय के पश्चात बारह वर्ष के बनवास एक वर्ष के अज्ञातवास के समय हस्तिनापुर वासियों ने ऊर्ध्वबाहु होकर कहा था - वयम् सर्वे गमिष्यामो यत्र गन्ता युधिष्ठिरः। 
          शक्रप्रस्थ अथवा इन्द्रप्रस्थ का पहला शासक अजातशत्रु युधिष्ठिर था। जिसे योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण की आन्वीक्षिकी षडविद्या राजनीति करने का सहारा था। इस दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान से लेकर इस्लामी सल्तनत वाले बादशाहों, बाबर से लेकर मुगल खानदान के प्रतापी बादशाहों में अकबर जहांगीर शाहजहां व औरंगजेब की मुगलिया सल्तनत के प्रतीक दिल्ली व आगरा सहित फतेहपुर सीकरी में ऐतिहासिक याददाश्तें बनी हुई हैं। दिल्ली ने उत्थान व पतन के अनेकानेक अवसरों को देखा परखा और पंद्रह अगस्त 1947 को जब ब्रिटिश राज ने भारत विभाजन के साथ सत्ता का हस्तान्तरण किया आजादी के पिछले साढे़ सतसठ वर्षों में पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी तक पंद्रह प्रधानमंत्रियों ने भारत और दिल्ली को अपनी ऊर्जा उपलब्ध की। 
          जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि उनके मंत्रिमंडल में जयप्रकाश भी रहें पर जयप्रकाश जी को यह स्वीकार्य नहीं था। जहां तक आंदोलन-प्रत्यांदोलन अभियान तथा सत्ता बदलाव का सवाल है स्वातंत्र्योत्तर भारत में जयप्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति वाला पक्ष, भारतीय राजनीतिक आंदोलनों का सर्वोच्च शिखर है। जयप्रकाश नारायण का देश की राजनीति को नयी जीवन रेखा देने वाला संपूर्ण क्रांति अथवा समग्र क्रांति वाला दृष्टिकोण जयप्रकाश जी के जीवन का ऐसा आदर्श था जिसे गांधी विनोबा के राजनीतिक मर्यादापूर्ण जीवन रेखा कहा जा सकता है। पश्चिम के विचारक तथा भारत के वे महानुभाव जिनमें पाश्चात्य सभ्यता अथवा राजनीतिक वैचारिकता पूंजीवादी अथवा साम्यवादी दृष्टिकोण में गांधी विनोबा व जयप्रकाश के राजनीतिक दर्शन को काल्पनिक UTOPIAN स्वर्गिक राज्य कह कर अव्यावहारिक भी कहा जाता है। महात्मा गांधी के जीवन दर्शन के व्याख्याता आचार्य दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर जिन्हें उनके संगी साथी काका साहेब कालेलकर संबोधित करते उन्होंने हिन्द स्वराज के बारे में पहली अगस्त 1959 को टिप्पणी की कि महात्मा का हिन्द स्वराज संकल्पित - उनके अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज तथा अपने देश वासियों के लिये महात्मा ने जो रास्ता सुझाया, काका साहेब कालेलकर की नजर में वह अव्यावहारिक राजनीति दर्शन था। वे यह भी कह गये कि विनोबा भावे के सर्वोदय अभियान में भी महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज में व्यक्त विचारों का अनुमान नहीं किया जा सकता। यद्यपि विनोबा भावे ने हिन्द स्वराज पर प्रोफेसर गोपाल कृष्ण गोखले व काका साहब कालेलकर की तरह कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की न ही पंडित नेहरू ने कभी हिन्द स्वराज की आलोचना की। 
          दस फरवरी 2015 के दिन दिल्ली के 70 विधान सभा क्षेत्रों की मतगणना हुई। घोषित हुआ कि 67 विधायक आम आदमी पार्टी के प्रमुख केजरीवाल व उनके 66 उम्मीदवार विजयी घोषित हुए। भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के दल को केवल तीन सीटें मिलीं। इस चुनावी हार जीत को अन्ना हजारे व उद्धव ठाकरे ने नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की व्यक्तिगत पराजय के तौर पर आंका और अरविन्द केजरीवाल के विजय पर्व की भूरि-भूरि सराहना की। अरविन्द केेजरीवाल महाशय ने अपने विजय यज्ञ पर्व पर भारत के राष्ट्रपति महोदय से मिले, राष्ट्रपति ने उन्हें गले लगाया। समूचे विश्व सहित भारत के गांव गांव घर घर तक एक संदेश पहुंचा कि भारत को नौजवान उद्धारकर्ता शुकदेव सरीखा व्यक्तित्त्व मिल गया है। दिल्ली विधान सभा में केजरीवाल - अगले पांच साल यह उद्घोष चुनावी समर का जबर्दस्त असरदार शब्द था। एक म्यान में दोे तलवारें - हिन्दुस्तान का उद्धारकर्ता कौन ? गंवई गांव - गुजरात के वडगांव से आया नरेन्द्र दामोदरदास मोदी अथवा नौजवान अरविन्द केजरीवाल जो भारत की सतसठ वर्ष वाली नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार की उपज है परंतु ऊँची आवाज में घोषणा कर रहा है कि वह दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त करके रहेगा। मीडिया सहित हिन्दुस्तानी अखबार नवीस और राजनीतिक चिंतन पोखर के अधिपति जोर देकर कह रहे हैं नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पूंजीपतियों का तरफदार है और अरविन्द केजरीवाल गरीब गुर्बे का सहारा है। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी स्वातंत्र्योत्तर भारत के गांव से आये पहले राजनीतिक नेता हैं जिन्होंने गरीबी दूर से नहीं अपने घर में देखी है। जिनमें करूणा का रस है मदद करना जिसके स्वभाव का अंग है। जिसने स्वयं कठिनाइयां झेली हैैं न उसके पिता सरकारी अहलकार थे न वही कभी सरकारी मशीनरी का नौकरशाह रहा पर राजनीतिक प्रचार है कि नरेन्द्र मोदी गरीब का नहीं अमीर का समर्थक है। इस ब्लागर ने आई.आई.टी. उत्पादों को नजदीक से देखा है। वे एक दूसरे के मददगार होते हैं। आई.आई.टी. उत्पादों में एक चुम्बकीय शक्ति गतिशीलता है जो भारत की धरती से बाहर जाकर प्रभूत धनार्जन कर इस गरीब देश के जन जन पर अपनी दक्षता का रौब जमाना अपना स्वाभिमान समझता है ठीक उसी तरह जिस भांति लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने कहा था - स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। जिस हिन्दुस्तान की चालीस फीसदी जनता गरीबी में पिस रही है दरिद्र में नारायण का दर्शन करने वाले वैरागी नरेन्द्र दत्त जो विश्व में विवेकानंद नाम से विख्यात हुए वे अब दिव्यलोक में हैं उनके उद्भव के छः साल पश्चात हिन्द की भूमि दरिद्र नारायण की पहचान करने वाला खुद दरिद्र गरीब की तरह जीवित रहने वाले महा संकल्पित मोहनदास करमचंद गांधी भी भारतीय राजनीतिक रणनीति वाले वातावरण से तिरोहित हैं। उत्तर नेहरू भारतवर्ष में उनकी प्रियदर्शिनी कन्या इन्दिरा नेहरू गांधी ने लोकतंत्र को परिवार से चालित तंत्र में बदल डाला। हिन्दुस्तान तो ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ अनुयायी है। इन्दिरा-जैल सिंह राजतंत्र के इन्दिरा के पश्चात वंशवादी राजतंत्र का उदयादित्य पर्व आया। वंशवादी परम्परा के चमकीले जातिवादी नक्षत्रों में पहली पंगत में करूणानिधि-स्टालिन परम्परा का उदीयमान होना है। द्रविड़ देश में भगती उपजी और परिवारवाद भी यहीं से उपजा, कर्णाटक देवगौड़ा कुमार स्वामी खानदानी राजतंत्र उगा। महाराष्ट्र में इस में जरा फर्क आया क्योंकि पण्ढरपुरी विठ्ठल भक्ति पुष्टि मार्गी है इसलिये यहां भक्ति मार्ग ने राजमार्ग नहीं पकड़ा। बाला साहेब ठाकरे उनके पुत्र उद्धव ठाकरे ने संपादकीय राजकरण का वरण किया। खुद राजा बनने के बजाय ताज दूसरे के सिर बांधा। वंशवाद गुजरात में नहीं फैला पर पंचनद पंजाब पंजाबियन शिरोमणि अकाली दल में भी पिता पुत्र राजतंत्र, जम्मू कश्मीर में भी पितामह-पिता-पुत्र त्रिकुटी राज करती रही। दूसरी तरफ पिता पुत्री का राजकरण भी हिलोरें भरता रहा। यदुवंशियों में वंशवादी राजतंत्र में दम्पत्तिवादी राजतंत्र का रूख किया। इसलिये लोकतंत्र के शुद्धिकरण के लिये वंशवादी खेमों से भी आन्वीक्षिकी षडविद्या राजनीतिक परामर्श युग की आवश्यकता है। उन्होंने देश विदेश में यत्र तत्र सर्वत्र अपने साथी अरविन्द केजरीवाल महाशय की भरपूर मदद की और यह दिखाया कि केवल केजरीवाल ही हिन्दुस्तान का अकेला गरीब नवाज है। भारत की राजनीतिक चौपड़ के खेल में बाजी मार सकता है। केजरीवाल महाशय यह तो नहीं कह रहे कि नरेन्द्र मोदी कृपया गद्दी छोड़ो पर यह जरूर कह रहे हैं कि आप दुनियां में हिन्दुस्तान को देखो दिल्ली को मेरे रहम करम पर छोड़ दो। मैं दिल्ली को विश्व की सर्वोत्तम नगरी बनाने आया हूँ। मेरे साथ दिल्ली की सभी मोहल्ला सभायें हैं। दिल्ली के सारे झुग्गी झोपड़ पट्टी निवासी हर कोई मेरे साथ है। उन्होंने यह भी कहा है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दीजिये। दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के मातहत कीजिये। वे स्वयं को भारतीय संविधान का पूर्ण ज्ञाता भी बनाने में परहेज नहीं करते हैं। अपनी योग्यता का अपनी पात्रता का बखान करना उनका स्वाधिकार है। 
          भारत के संविधान में 73वें व 74वें संविधान संशोधन को क्रियान्वित करने में भारतीय संघ के घटक राज्यों की रूचि नहीं है। वे भारतीय गणतंत्र को ग्राम सभा से लेकर संसद तक पंचमुखी रूद्राक्ष बनाने के पक्षधर नहीं लगते हैं। महात्मा गांधी ने पंचायती राज की वकालत की थी व चाह रखी थी कि पंचायती राजतंत्र हो परंतु संविधान के निदेशक सिद्धांत तक ही पंचायत प्रावधान विचार पोखर बना भारत के सातवें प्रधानमंत्री राजीव गांधी के 73वें व 74वें संविधान संशोधन द्वारा ग्राम सभा - क्षेत्र पंचायत (तालुका पंचायत) जिला पंचायत त्रिस्तरीय पंचायत राज व नगर परिषद, नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम एवं छावनी बोर्ड की नगर प्रबंध इकाईयों को संवैधानिक स्तर तो दिया गया है पर म्यूनिसिपल बोर्ड वगैरह को जितनी स्वायत्तता 15.8.1947 से पहले थी वह तथा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की भी स्वायत्तता राज्य सरकारों ने अपने संबंधित विभागों को लौटा दी है। डाक्टर राम मनोहर लोहिया चौखंभा राज की बात करते थे। उनका चौखंभा राज 1. संसद 2. विधान मंडल 3. जिला सरकार 4. नगर सरकार या ग्राम सरकार की कल्पना थी। वे चौखंभा राज की सटीक व्याख्या करते पर उनके विचार पोखर वाला चौखंभा राज वर्तमान 73वें व 74वें संविधान संशोधनों में उतरा नहीं है। दिल्ली के मतदाताओं का 54 प्रतिशत हिस्सा चाहता है कि दिल्ली की बागडोर अरविन्द केजरीवाल महाशय के संकल्पानुसार संचालित हो। सत्तर में से सतसठ सीटें उन्हें मिली हैं। शेष तीन सीटें भारतीय जनता पार्टी को मिलीं यदि इन तीन सीटों में आ. आ. पा. सहित चुनाव लड़ने वाली पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों की मत संख्या तथा उपरोक्त उम्मीदवारों में से कोई नहीं, नोटा के कुल मत विजयी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को प्राप्त मतों से ज्यादा हैं। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह को विचार करना चाहिये कि वे उपने निर्वाचित सदस्यों से नैतिक आधार पर त्यागपत्र दिलायें कि उनके विरूद्ध पड़े मत उन्हें प्राप्त मतों से ज्यादा हैं अतः आम आदमी पार्टी - शासक दल व विरोधी दल दोनों की भूमिका स्वयं निर्वाह करे। 
          आजादी मिलते समय दिल्ली में 276 गांव दिल्ली म्यूनिसिपल कारपोरेशन नयी दिल्ली म्यूनिसिपल कमेटी तथा दिल्ली छावनी बोर्ड तीन शहर प्रबंधक संगठन को मनोरमा ईयर बुक 2015 के अनुसार अब दिल्ली में आठ जिले (घोषित 11 जनपद पर अस्तित्त्व में आठ) उत्तर दिल्ली जिला जनसंख्या 8,83,418 उत्तर पूर्व 2,70,000 उत्तर पश्चिम 2,53,583 दक्षिण 27,33,752 दक्षिण पश्चिम 22,92,363 केन्द्रीय 5,78,671 तथा नयी दिल्ली 1,32,713 कुल आबादी 1,69,53,235 गांवों की संख्या 158 शहरी क्षेत्र 62 इंगित हैं। दिल्ली नगर निगम के अनेक भाग कर दिये गये हैं। दिल्ली का मौजूदा अर्ध राज्यीय प्रबंध दिसंबर 1991 में स्थापित हुआ। पंडित नेहरू दिल्ली के गांवों का ग्रामीण औद्योगिकीकरण चाहते थे। उनकी कल्पना थी कि दिल्ली के देहात देहात भी रहें साथ ही उन्हें शहर की सुविधायें भी मिलें जिनकी कल्पना भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने P.U.R.A. प्रोवाइडिंग अर्बन एमेनिटीज टु रूरल एरियाज का गुरूमंत्र दिया। भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे अहमदाबाद में 2011 में घोषणा की थी कि वे गुजरात के 50 गांवों का उनकी ग्रामीण आत्मा को बरकरार रखते हुए शहरीकरण करने का संकल्प लिये हैं। गांवों को शहरी सुविधायें गांव की आत्मा को बरकरार रखते हुए उपलब्ध्ध कराना उनका संकल्प है। उनकी सरकार ने डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की स्मृति में RURBAN MISSION का संकल्प लिया है। ठीक साठ वर्ष पहले 1954 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के परामर्श से विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा मुंबई प्रेसीडेंसी में सहकारिता आंदोलन के जनक वैकुंठ ल. मेहता ने रूर्बन सोसाइटी की संकल्पना इजरायल के नयी बस्ती स्थापना के समानांतर की थी। रूर्बन सोसाइटी का पहला संकल्प डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के गांव जीरादेई से शुरू हुआ था। रूर्बन सोसाइटी के विचार पोखर में दो व्यक्ति प्रमुख थे जिनमें गांधी ग्रामोद्योग दक्ष झबेर भाई पी. पटेल उनके सहयोगी विश्वनाथ एन. टेकुमल्ला थे। रूर्बन सोसाइटी का प्रयोग वैकुंठ ल. मेहता ने दस वर्ष तक सफलतापूर्वक संपन्न किया। भारतीय गांवों को शहरी सुविधा मिले इसकी पहल क्यों न दिल्ली के 958 गांवों, 62 शहरी क्षेत्रों को संविधान संशोधन 73वां व 74वां का पूर्ण लाभार्जन देते हुए संकल्पित किया जाये। 
          अरविन्द केजरीवाल महोदय मोहल्ला सभाओं को अपने संकल्प का विश्वविख्यात दिल्ली बनाने के लिये करना चाहते हैं। उनके दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के पश्चात उन्हें पहला काम यह करना होगा कि वे मुहल्ला कमेटियों को ग्राम पंचायत नगर परिषद नगर पंचायत नगर पालिका तथा नगर निगम कानूनों में मोहल्ला सभा का समावेश कर उन्हें ग्राम पंचायत अथवा नगर क्षेत्र की कानून सम्मत इकाई का दर्जा दिलावें भले ही वह ग्राम सभा सदस्य क्षेत्र अथवा नगर पालिका पार्षद क्षेत्र से छोटा इलाका ही क्यों न हो। 
           अण्णा हजारे अराजनीतिक हैं उनका जीवन उद्देश्य राजनीतिक सत्ता न होकर अहैतुक समाज सेवा है। उनका आंदोलन व महाराष्ट्र सरकार के विरूद्ध हो अथवा भारत सरकार के। ऐसे सामाजिक आंदोलन को सहारा देने के लिये केजरीवाल महाशय को राजनीति के समानांतर आदर्श लोकनीति को प्रयोग में लाने के लिये पंडित नेहरू की तरह भारत सेवक समाज तथा गुलजारी लाल नंदा की तरह भारत साधु समाज जैसे अराजनीतिक अव्यावहारिक प्रतियोगिता होड़तोड़ न करने वाले सामाजिक संगठन जिसे उत्तरी यूरप ओंबडसमैन कहता है जिसे भारतीय अखबार नवीसी में नयापन लाने वाले दिनमान के संपादक रहे रघुवीर सहाय तथा जनसत्ता को दैनिक अखबारों में ऊँचा स्थान दिलाने वाले प्रभाष जोशी के तौरतरीकों को अपना कर सरकार व सरकारी तंत्र के समानांतर लोकहितकारी अंबुद समान व्यक्तियों का संगठन खड़ा करना होगा तभी राजनीतिक व नौकरशाही की ज्यादतियों पर रोक लग सकती है। बहरहाल दिल्ली का सुप्रबंध संकल्प साधने में अरविन्द केजरीवाल महाशय को सफलता मिले यह हार्दिक शुभ कामना है। अहंकार तो जिन्दा रहने के लिये जरूरी तत्व है जिस क्षण व्यक्ति का अहंकार मिट जायेगा वह शिव नहीं शव रह जायेगा। जरूरत केवल इस बात की है कि अपने अहंकार पर व्यक्ति नियंत्रण रखे। उसे छुट्टा घूमने का मौका न दे। कवि तुलसीदास ने कहा है - ‘प्रभुता पाहि केहि मद नाहीं’ सत्ता, धन, रूप, समर्थ को भी भीड़ व्यक्ति को मतवाला बनाने में देर नहीं लगती। 
          दिल्ली के लोगों की हालत चाहे वह नयी दिल्ली में रहते हों चाहे दिल्ली के भीड़ भड़ाके वाले चांदनी चौक सरीखे इलाकों में, दिल्ली वालों के हालात भारत के महानगर अर्थधानी मुंबई, जनधानी कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरू, अहमदाबाद, हैदराबाद भारत के शेष इलाकोें से सैकड़ों गुना अच्छी है। आमदनी ज्यादा है और आमदनी के साधन भी हैं। दिल्ली  की पहली जरूरत मुफ्तखोरी पर लगाम लगाने की है। पहला काम जो करना चाहिये वह है मतदाताओं को मुफ्त उपहार देना बंद किया जाना है। राजनीतिक दलों को चाहिये कि आपस में मिल कर चुनाव संहिता संकल्पित करें। 
          भारतीय गणतंत्र के तेरहवें राष्ट्रपति महोदय ने नया तथा राजनीतिक प्रेरित दिल्ली विधान सभा चुनाव यज्ञ में प्रमुख होता (आहुति दाता) का गले लगा कर अद्वितीय अभिनंदन किया जिससे मुख्य आहुति दाता का उत्साह वर्धन हुआ। उन्होंने प्रधानमंत्री गृह मंत्री से अपनी मांग रखी कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाये। अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न है क्या 1991 में दिल्ली को राज्य का दर्जा दिया जाना दिल्ली की पूर्व सरकार द्वारा नगर निगम दिल्ली को टुकड़ों में बांटा जाना तथा ताजा मांग कि दिल्ली को पूर्ण घटक राज्य का दर्जा दिया जाये। नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल को विजयी अरविन्द केजरीवाल महाशय से कहना चाहिये कि जो जो सुविधायें वे केन्द्र से चाहते हैं विधान सभा में सर्वसम्मत प्रस्ताव कर केन्द्र को भेजें। केन्द्र सरकार भारत के तेरहवें राष्ट्रपति महोदय से मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव के जरिये अनुरोध करें कि राष्ट्रपति महोदय दिल्ली राज्य प्रकरण पर संवैधानिक संशोधनों 73 व 74 के संदर्भ में तथा दिल्ली शहर दिल्ली के नगर निगम के अलावा नगर क्षेत्र तथा ग्राम पंचायतों व दिल्ली सरकार तथा दिल्ली सरकार व भारत सरकार के मध्य वैधानिक लक्ष्मण रेखा से भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनिश्चित की जायें। एक म्यान में दो तलवारें कैसे रहें ? इसका समाधान भारतीय संविधान की व्याख्या में निहित है। दलीय राजनीति से ऊपर उठ कर ही दिल्ली के दिल का दर्द दूर किया जा सकता है।
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