आर्य तथा आर्येतर अवधारणा का भारोपीय रहस्य चिंतन
जैरोथी एम फिगरुआ का आर्य यहूदी और ब्राह्मण तीन सूत्री विमर्श
इस ब्लागर के एक स्नेही मित्र येसु वादियन ख्रिस्ती धर्मावलंबी मौन पाल थे। एपिकल्चर या बी कीपिंग के लिये समर्पित व्यक्तित्त्व की उनकी सामाजिक तथा जीव दया अत्यंत सराहनीय मानसिकता थी। उन्होंने इस ब्लागर को कहा - आप आर्य हो, मैं अनार्य हूँ। इस ब्लागर ने आर्य और अनार्य संबंधी वैचारिक भ्रम की उनकी संशयग्रस्तता को दूर करने का प्रयास किया। संवाद व विचार विमर्श के पश्चात उन्होंने स्वीकार किया कि भारत में आर्य-अनार्य विवाद वस्तुतः बनावटी है। येसु वादियन सुदूर केरल निवासी थे। मौन पालन पर उन्हें हिमालयी जीवन शैली ने आकर्षित किया था। मौन ढाड़ा या लांग हाइव तथा मौन घरवा या वाल हाइव पद्धति को वे एपिकल्चर का कदीमी सार मानते हुए मौन पालन को बढ़ावा देने के कुशल चितेरे थे। यह घटना पैंतीस वर्ष पुरानी है। जब यह ब्लागर व येसु वादियन सक्रिय जीवन जीरहे थे आज आक्टोजेनेरियन हैं। इस ब्लागर को पता नहीं उनके मित्र येसु वादियन अब कहां हैं। इस संसार में हैं भी या नहीं यह भी पता नहीं। वर्ष 2015 में प्रकाशित ‘आर्यन्स ज्यूज ब्राह्मण्स’ नवायन प्रकाशित पुस्तक डोरोथी एम. फिगरूआ संयुक्त राज्य अमरीका के जार्जिया विश्वविद्यालय में सापेक्ष साहित्य की प्राध्यापक हैं। उनकी मान्यता है कि आर्य शब्द की साहित्यिक कल्पनात्मक अवधारणा भारत व पश्चिमी चिंतन पोखर में कालजयी शास्त्रीय परम्परा युग के लिये वाणी अनुसंधान के लिये चुनौतियों वाला प्रसंग है फिर भी पूर्णतः साहित्यिक दृष्टि से आर्यत्व चिह्नांकन पड़ताल निरपेक्ष और निर्विकार होकर ही की जा सकती है। भारतीय चिंतन पोखर और पाश्चात्य चिंतन पोखर जिसने भारतीय अंग्रेजीदां सिविल सोसाइटी को अपने आगोश का बंदी बना डाला है और वे भारत विधा जिसे यह ब्लागर भारत वाङमय संज्ञा देना ज्यादा तार्किक मानता है। वाणी सहित साहित्य एवं वाणी विज्ञानियों भाषा विज्ञानी जिसे पाश्चात्य विद्वत् समाज फिलोलाजिस्ट लिंग्विस्टिक संबोधन देता है ध्वन्यात्मक दृष्टि से देखना होगा। आर्यन्स ज्यूज ब्राह्मण्स जिसे हम भारतीय परिवेश में आर्य, यहूदी और ब्राह्मण इस त्रिगुटी से पहचानने की कोशिश कर सकते हैं संस्कृत वाङमय में आर्य शब्द का प्रयोग सभ्य, सुसंस्कारी पुरूष तथा आर्या शब्द का प्रयोग भद्र लोक महिला के लिये हुआ है। तद्भव भारतीय भाषाओं में आर्या शब्द मराठी में आई, ब्रज भाषा में आजी तथा कुमइयां में ईजा कहलाता है। ये तीनों तद्भव वाणी वाले भारतीय शब्द क्रमशः मां, दादी तथा महतारी के पर्याय हैं। भारत में आर्यावर्त क्षेत्र मूल देश का प्रतीक है। आर्यवर्त कहां से कहां तक है ? सारस्वत पंचनद का पूर्ववर्ती क्षेत्र गंगा यमुना का दोआब जिसमें बिठूर ब्रह्मावर्त नाम का स्थान गंगा के दक्षिण कूल में वर्तमान कानपुर शहर से करीब दस मील पश्चिम में है। बिठूर ब्रह्मावर्त को भारतीय वाङमय ‘मूल देश’ संज्ञा देता है। यहां के शासक नाभि - मेरू देशी के पुत्र ऋषभ थे। ऋषभ को जैन धर्मावलंबी तीर्थंकर मानते हैं पर जिसे दुनियां आज हिन्दू धर्म के नाम से पुकारती है उस आस्था के विश्वासी लोग ऋषभ को महाविष्णु का अवतार मानते हैं। उनकी मान्यता है कि ऋषभ के पुत्र राजकुमार भरत के ही कारण यह देश भारत कहलाता है। भरत, जड़भरत, हिरण शरीर वाला भरत भारतीय वाङमय की मौलिकता प्रदर्शित करता है। आधुनिक यूरप में आज से दो हजार वर्ष पूर्व ईसामसीह जीसस क्राइस्ट से पूर्व धार्मिक आस्था का स्वरूप क्या था ? ईसा के समकालीन सेंट जोन वह पहले मजहबी शुद्धिता का मार्ग प्रशस्त करने वाले पवित्र जल से बपतिस्मा (पवित्र जल के छीटों से ईसाई धर्म की मौलिक प्रेरक प्रक्रिया) प्रथम सहयोगी थे। जीसस क्राइस्ट के संस्कृत वाङमय में एक शब्द जह्नु है। जह्नु महाराज ने आकाशगंगा जल उदरस्थ कर डाला जिससे गंगा जल का नाम जाह्नवी तोय हुआ और गंगा नदी जाह्नवी कहलाने लगी। आज भी भारत के लोग यह विश्वास करते हैं कि ‘औषधम् जाह्नवी तोयम् वैद्यो नारायणो हरिः’।
आर्य कौन ? यह चिह्नित करना वाणी के लिये अत्यंत चुनौती भरा लक्ष्य है। ख्रिस्ती गिरजाघरों विशेष तौर पर रोमन कैथोलिक गिरजाघरों में प्रार्थना की लय सामवेद के मंत्रों के उच्चारण शैली का है। वासुदेव श्रीकृष्ण ने परमात्मा की विभूतियों का उल्लेख करते हुए अर्जुन से कहा - वेदानाम् सामवेदोहम्। वृहत्साम तथा साम्नाम् गायत्री छन्दसामहम्। इसलिये डोरोथी एम. फिगरूआ ने साहित्यिक समीक्षा के लिये आर्य, यहूदी तथा ब्राह्मण इन तीन शब्दों को लेकर अपने विमर्श का जो आधार भूत ढांचा खड़ा किया तथा स्वामी दयानंद सरस्वती स्वामी विवेकानंद तथा बाल गंगाधर तिलक ने समय समय पर जो अभिव्यक्तियां अपने उद्गार व्यक्त करते हुए प्रस्तुत की उसे यदि तकनालाजी तंत्र ज्ञान और नैतिक उत्कर्ष का स्वर्णयुग प्रतिष्ठित करने की चेष्टा की जाये वह अतिशयोक्ति नहीं मानी जा सकती। वैदिक मंत्राच्चार की प्रक्रिया को अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के तत्वावधान में जर्मन भाषी मैक्समूलर ने ऋग्वेद का प्रकाशन कराया। ऋग्वेद की प्रकाशित प्रति में मैक्समूलर जो अपने आपको मोक्षमूलः अथवा मोक्षमूलर इंगित कर रहे थे उन्होंने आक्सफोर्ड शब्द के लिये अक्षदत्तन शब्द का प्रयोग किया। अक्ष का तात्पर्य नेत्र, दृष्टि के अलावा आध्यात्मिक मार्ग के अक्षत्व से भी है। हिब्रू भाषा और यहूदी धर्म तथा ख्रिस्ती मत की प्रेरक पुस्तक बाइबिल विश्व के तुलनात्मक साहित्य का पठन पाठन शिक्षण तथा वाणी अनुसंधान करने वाले प्राध्यापक की राय में आर्यत्व का उपयोग विषयक वास्तविकी को आर्यों का यूरप के लोगों का सुदूरस्थ चचेरा भाई संबंधी अवधारणा ही बाइबिल की भाषा हेब्रू है। ओल्ड टेस्टामेंट तथा न्यू टेस्टामेंट हेब्रू भाषा में इंगित हैं। यूरप की अन्य भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद तथा गिरजाघरों में प्रार्थना के समय बाइबिल का मंत्रपाठ रोमन कैथोलिक चर्च, प्रोस्टेटेंट चर्च अपनी अपनी भाषा में संपन्न करते हैं। कुरआन शरीफ की भाषा अरबी है इस्लाम धर्मावलंबी नमाज अता करते समय अरबी भाषा में ही कुरआन की आयतों को सस्वर उच्चारित करता है। भारत में वेदपाठी जन वेद - निघंटु व्याकरण वाली वैदिक संस्कृत ऋचाओं का सस्वर पाठ करते हैं। यह श्रौत विद्या कहलाती है।
डोरोथी एम. फिगरूआ की पुस्तक आर्य - यहूदी और ब्राह्मण ने यूरप में आर्य संबंधी भ्रांति को यूरोप के लोगों की आर्य संशयग्रस्तता पर प्रकाश डाला है। बाल गंगाधर तिलक डाक्टर संपूर्णानंद तथा डाक्टर भगवान सिंह सरीखे भारतीय विद्वान मानते हैं कि आर्यावर्त ही आर्यों का मूल देश था। आर्य बाहर से भारत नहीं आये उनकी मूलभूमि भारत ही थी। भारत से वे पश्चिम, उत्तर दक्षिण तथा उद्गम देवाधिदेव महादेव के ताण्डव नृत्यावसान में जो डमरू नौ और पांच याने चौदह बार बजा उससे ही ध्वनियां निकलीं।
संयुक्त राज्य अमरीका के जार्जिया विश्वविद्यालय प्राध्यापक डोरोथी ने भारत की संसद, भारत की सरकार, उस भारतीय गणतंत्र के घटक राज्यों - विविध आस्थाओं से जुड़े भारतीयों तथा वाणी विलास का जो अद्भुत चैत्यरथ है उसकी ओर आर्य - यहूदी और ब्राह्मण इन तीन विमर्शों के जरिये भारतीय वाङमय व भारतीय संस्कृति जिसे साने गुरू जी ने हिन्दू संस्कृति संज्ञा दी जिसे भारत की राष्ट्रीयता को अपनी प्रवृत्तियों का सूत्रधार मानने वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ - हिन्दुत्व संज्ञा देता है, महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज में अभिव्यक्त विचारों की भूरि भूरि प्रशंसा किसी भारतीय ने नहीं यूरप के ख्रिस्ती धर्मावलंबी विचारकों में टालस्टाय, जार्ज बर्नाड शा सहित श्रीमती सोफिया वाडिया ने आर्यन पाथ मासिक के जरिये हिन्द स्वराज के बारे में अध्यापक सोडी कोल, डिलाइल बर्न्स, मिडलटन मरी, वेरेस फर्ट, हयूफासेट, ब्लाडहुटन, जिराब हर्स, कुमारी रैथ बोना आदि अनेक नामी गिरामी यूरप के लेखक लेेखिकाओं के लेख हिन्द स्वराज की प्रशंसा में छापे। यही भारतीयता वैचारिक स्वातंत्र्य के समानांतर विविध प्रसंगों में जहां मतांतर हो उसमें सजीव व तर्कयुक्त बहस की जरूरत रहती है। डोरोेथी ने स्वामी दयानंद सरस्वती 1824-1883 की खण्डन मण्डन विधा से भारतीय वैदिकी आर्य विचार शीलता पर अपनी तूलिका चलायी। स्वामी दयानंद तार्किक थे उन्होंने अपने तर्कों से जहां सेमेटिक धर्मावलंबियों के पाखंड का पर्दाफाश किया वहीं भारत के धर्म जैन धर्म व बौद्ध धर्म के साथ साथ मूर्ति पूजक हिन्दुस्तानियों में चाहेे वे शाक्त हों, शैव हों य अपने को वैष्णव बताते रहे हों उनके पाखंडों का भी भण्डाफोड़ किया और आर्यसमाज की स्थापना की। वेद को ही मान्यता दी। सनातन धर्मावलंबियों के बीच फैले पाखंड का भी खुलासा कर पाखंड पथ से विरत होने की सलाह अपने देशवासियों को दी। स्वामी दयानंद सरस्वती के निर्वाण 1883 से लगभग सौ वर्ष 1983 तक आर्यसमाज की लौ भारत में थी। पिछले तीस चालीस वर्षों में आर्यसमाज का प्रभुत्व शनैः शनैः क्षीण होता गया। भारतीय फिर मूर्ति पूजा व्यक्ति पूजा में अग्रसर हो गये। स्वामी दयानंद सरस्वती के खंडन मंडन मार्ग से ज्यादा प्रभावी रास्ता स्वामी विवेकानंद का था जो आज भी रामकृष्ण मिशन के रूप में भारत ही नहीं विश्व भर में अद्वैत शंखनाद कर रहा है।
मूसा, ईसा और मोहम्मद प्रोफेट की प्रमुखता वाले ये तीनों मजहब सेमेटिक मजहब हैं जिनका सूत्र एकेश्वर वाद, मजहब की अकेली पुस्तक तथा मजहब सृष्टा इकला पैगम्बर जिसे अंग्रेजी साहित्य प्रोफेट कहता है। विभिन्न यूरोपीय भाषाओं में संस्कृत के मुहूर्त ग्रंथों का अनुवाद एवं प्रवृत्तियों का बिखराव बिछुड़न करता रहा तथा रहस्यवाद के परत उघाड़ने वाले इतिहासज्ञ लोग भारतीय आर्यत्व को अपनी जरूरत के मुताबिक कतर इस्लाम मजहब से यहूदी मजहब की कालगणना वाली दूरी दो हजार वर्ष पुरानी है। भारत में आस्थामूलक धर्मों के मुकाबले ये मजहब एकदम नयी स्लेट पर लिखे शब्द शक्ति स्त्रोत हैं। तुलनात्मक साहित्यिक नजरिये से यहूदी मजहब तथा भारत के सनातन धर्म की सभी मुख्य शाखायें यथा वैष्णव, शैव, स्मार्त तथा भक्तिमार्गी पंथ जो भारतीय पुष्टि मार्गी भक्ति पथ की उपज हैं वे सभी चिंतन ज्ञान भक्ति कर्म तथा कर्म सन्यास मूलक हैं। डोरोथी ने अपनी कृति में राजाराम मोहनराय के धर्मोद्धार का जिक्र किया है। भारतीय मानसिकता में ब्राह्मणवाद के प्रभुत्व का तात्विक विरोध ज्योतिबा फुले और भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन काल में किया। महात्मा गांधी के एकादश व्रतों में एक महत्वपूर्ण व्रत - अस्पृश्यता निवारण था पर महात्मा वर्णाश्रम व्यवस्था के पक्षधर थे। उनका कहना था कि वे चातुवर्ण्य ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र इन चार कर्म वर्णों पर पूरा यकीन रखते हैं। अफरीका से भारत आने पर ठीक सौ वर्ष पहले सन् 1915 में उन्होंने कोचरब आश्रम में दूधाभाई हरिजन परिवार को आश्रम का एक अंग बना कर रखा। महात्मा के प्रशंसकों में वैष्णव डाक्टर मेहता सहित गुजरात के सारे वामन बनिये महात्मा से रूठ गये। उन्होंने महात्मा को कोचरब आश्रम चलाने के लिये चन्दा देना बन्द कर दिया। तेरापंथी जैन समुदाय के सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी को तेरह हजार रूपये की थैली सौंपी। आश्रम पूर्ववत चलता रहा। अस्पृश्यता निवारण के लिये महात्मा गांधी ने महामना मदन मोहन मालवीय का काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के समय अपने मन के उद्गार रखे। मालवीय जी ने महात्मा से कहा - अस्पृश्यता आचरण क्या शास्त्र सम्मत है ? इस विषय पर मैं आपकी शंका का समाधान नहीं कर सकता। डाक्टर राधाकृष्णन हिन्दू धर्म व आचार शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता हैं। वे ही जो राय देंगे वह सटीक होगी। डाक्टर राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी की शंका का समाधान करते हुए बताया कि छुआछूत मानना शास्त्र सम्मत नहीं है। चातुवर्ण्य के अलावा हिन्दू समाज में अन्त्यज अथवा परिहा संज्ञा से जाना जाने वाला जनसमूह भी था। यद्यपि योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा है - ‘विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गविहस्तिनि शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः’। पर हिन्दू समाज की वास्तविकता यह थी कि अछूतोद्धार के लिये महात्मा गांधी को अभियान चलाना पड़ा। ज्योति बा फुले की मुहिम दलित दमित को शिक्षित करना उनमें आत्मविश्वास जाग्रत करने के साथ साथ तथाकथित सवर्ण कहे जाने वाले समूहों व दलित समूहों में एक चौड़ी खाई निरंतर बढ़ती जारही है। डोरोथी ने ज्योति बा फुले व भीमराव अंबेडकर के सत्प्रयासों का प्रशंसनीय उल्लेख किया पर महात्मा गांधी की अछूतोद्धार संबंधी मानवीय अवधारणा को दलित समाज के उत्प्रेरक चिंतन पोखर के अग्रणी व्यक्तित्त्व महात्मा गांधी की सदाशयता स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। उनमें एक आक्रोश व्याप्त है। यही कारण है कि भारतीय दलित समाज का एक महत्वाकांक्षी समूह बीफ महोत्सव आयोजित कर पारम्परिक हिन्दुस्तानियत जिसमें दलित समाज का एक बड़ा वर्ग भी भक्ति मार्गी भारतीयता का पोषक है, हिंसा प्रतिहिंसा जागरण के लिये गौपालन नहीं गौ वध के द्वारा बीफ महोत्सव मनाने की ओर नवोदित धनाढ्य दलित चिंतक हिंसा विहार का तरीका अपना कर भीमराव अंबेडकर ने हिन्दुस्तानियों के दलित समूह को धर्मांतरण के द्वारा ख्रिस्ती अथवा मोहम्मदी मजहब परिधि में घुसने के बजाय आदि शंकर ने जिस गौतम बुद्ध को महाविष्णु का अवतार घोषित किया उस बौद्ध धर्मिता की शरण में जाना - बुद्धम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि का मार्ग अपनाया इसलिये आर्य भारतीय ही थे। भारत से ही बाहर गये इस तात्विक मंत्र के उद्गाता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, डाक्टर सम्पूर्णानन्द तथा डा. भगवान सिंह ने आर्यों के बारे में जो समीक्षित अवधारणा की स्थापना की जिसे प्राध्यापक डोरोथी की ताजी पुस्तक आर्यन्स ज्यूज एंड ब्राह्मण में वाणी शब्द तथा भाषा विज्ञान मूलक विभिन्न साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात स्थापित करने का प्रयास किया है। भारतीय संसद, भारतीय इतिहास अनुसंधान संस्थान सरीखे संगठनों को भारतीय विश्वविद्यालयों के इतिहास संकायों को पाश्चात्य इतिहासकारों यूरोपीय भाषाविदों एवं भारतीय इतिहासज्ञ समाज में मार्क्सवादी एवं यूरोपीय आत्मप्रशंसक सभ्यता तथा ख्रिस्ती धर्मावलंबियों में जो भ्रांत धारणायें भारत शास्त्र विषयक बिन्दुओं में गहरा प्रभाव डाल रही है। डाक्टर संपूर्णानंद के ब्राह्मण सावधान अभिव्यक्ति को डोरोथी के साहित्यिक तुलनात्मक अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में देेखे जाने की तात्कालिक जरूरत है। भारतीय भाषा विज्ञानियों के शीर्ष पुरूष सुनीति कुमार चाटुर्ज्या ने बीसवीं शताब्दी में वाणी के क्षेत्र में जो आह््वान किया ‘शब्द: खे’ ध्वनि शब्द यात्रा का जो मार्ग निश्चित किया वह भारत के नवद्वीप, काशी, कांची, अवन्तिका से शुरू होकर पंचनद तक्षशिला होते हुए ईरान (ईरान शब्द वस्तुतः आर्यान अथवा आर्यावर्त का उपावर्त प्रतीक है। संस्कृत-प्राकृत, भारतीय तद्भव भाषायें परसियन (फारसी) ग्रीक, यूरप की पुरानी भाषायें यथा पुरानी जर्मन, पुरानी फ्रेंच, पुरानी अंग्रेजी पर भारतीय शब्द शक्ति का कितना प्रभाव है ? डोरोथी का साहित्यिक अनुसंधान सुनीति कुमार चाटुर्ज्या प्रस्तावित शब्द यात्रा का महत्वपूर्ण मील पत्थर है इसलिये वाणी के क्षेत्र में अपने लिये आसन सुनिश्चित करने के लिये आर्यों का भारतीय होना और भारत से बाहर अपनी वाणी को साथ ले जाकर मनुष्य समाज में ज्ञान दीप को निरंतर प्रज्वलित करते रहने का जो भगीरथ प्रयास हुआ है वह आगे बढ़ता रहे - आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री को जो तांडव नृत्य मुद्रा में नटराज की कांस्य प्रतिमा दिल्ली आकर लौटायी है - वाणी तथा विभिन्न मातृभाषाओं के द्वारा भारतवासियों में जो पारम्परिक ज्ञानकोेष इस्लामी सल्तनत तथा अंग्रेजी राज के दौरान विकसित हुआ जो राष्ट्रीयता उद्भूत हुई उसे सहेज कर रखने का मूहूर्त आगया है इसलिये आर्यों संबंधी यूरोपीय अवधारणा तथा भारत के विद्वानों की अवधारणा कि आर्य मूलतः आर्यावर्त के ही रहने वाले थे वहीं से विशाल भारत के साथ साथ विश्व में फैले। आर्यों संबंधी बहस शुरू करने का पर्व व मुहूर्त का लाभार्जन भारत की सांस्कृतिक आवश्यकता है।
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