छः नुक्कड़ नाटक - मनुष्य व्यवहार की अजीबोगरीब चकरघिन्नी
राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानने वाले हिन्द स्थानियों में रामनाथ गोइनका का अपना अनूठा आसन है। भारत में सवा अरब आबादी में से करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अहम् पूर्वम् के बजाय राष्ट्र पूर्वम् को ज्यादा वरीयता देते हैं। रामनाथ गोइनका के अखबार इंडियन ऐक्सप्रेस में संपादक रहे शेखर गुप्ता का राष्ट्र हित उनकी अखबारी सोच शक्ति की ज्ञान शलाका का काम करता है। उन्होंने 9 मार्च 2015 के इंडिया टुडे में अश्वमेध यज्ञ तथा बर्तानी औद्योगिक क्रांति के कटु आलोचक नेड लाड द्वारा बर्तानियां में 1811-1816 के बीच कपड़ा उद्योग में मशीनीकरण का पुरजोर विरोध किया। उनकी राय में कपड़ा उद्यमिता का मशीनीकरण बेरोजगारी को ही बढ़ावा देने वाला बताया। यह ब्लागर अपने पूर्ववर्ती ब्लाग में श्री शेखर गुप्ता का ध्यानाकर्षण कर चुका है। बात यहां अब केवल अश्वमेध यज्ञ की है। भारतीय पौराणिक गाथा के मुताबिक भारत में पहला अश्वमेेध यज्ञ राजा सगर व उसके पुत्रों ने किया था। बेटे संख्या में ज्यादा थे इसलिये भीड़ संयम नहीं मानते थे। उन्होंने यज्ञ अश्व को गंगा सागर कपिलाश्रम में देख कर कहा - यह वाजि चोर है। महासिद्ध कपिल महाराज ने अपनी क्रोधाग्नि से सगर पुत्रों को भस्म कर डाला। इन्दप्रस्थ में पहला राजसूय यज्ञ युधिष्ठिर ने 5175 वर्ष पहले किया था। शेखर गुप्ता ने मोदी अमित शाह अश्वमेध यज्ञ पशु को अरविन्द केजरीवाल के समर्थक मतदाताओं ने रोक डाला। अश्वमेध यज्ञ वाजि को रोकने वालों में अग्रणी अरविन्द केजरीवाल महाशय रहे। शेखर गुप्ता का मानना है कि मोदी से हारे राजनीतिज्ञों सहित भारत के सभी मोदी निंदक समाज को जिनमें अन्ना हजारे, मेधा पाटकर सहित भाजपा व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में नरेन्द्र विरोधी सभी तबकों को नयी जिन्दगी मिल गयी। यहां तक कि भूमि अधिग्रहण की खिलाफत में गोविन्दाचार्य, उद्धव ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, राम विलास पासवान ने भी अपने आपको किसान विरोधी न होने का डंका बजाया है। शरद जोशी व छंगल राव जो उदीयमान कृषक नेता हैं वे भी कह रहे हैं किसी भी हिन्दुस्तानी को किसानों सहित अपने कदीमी पेशे से छिटकने का अधिकार है। किसान खेती क्यों करें - शहरों में रहने वालों का अन्नदाता भिखारी क्यों रहे ? उसे भी व्यवसाय बदलने की आजादी चाहिये। अगर किसान ने खेती करना छोड़ दिया तो अन्न के बिना हिन्दुस्तान के शहराती कैसे जिन्दा रहेंगे। भूखे पेट की भूख ज्वाला को शांत करने वाला भोजनदाता अन्नदाता सदा सुखी भव के हिन्दुस्तानी आदर्श को क्या राजनीतिक धूर्तता घेर लेगी।
विचार पोखर व सौम्य चिंतन के प्रखर समर्थक योगेन्द्र यादव और शेखर गुप्ता के बीच संवाद होता रहता है। यह संवाद पूर्णतया वाचिक शुचिता पर आधारित रहता है। मनुष्य के मन वचन काया ये तीन कर्मरथ हैं। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र तथा ध्वन्यालोक जिसका मानना है कि ‘भिन्न रूचिर्हि लोकः’ धरती पर रहने वाले प्राणियों विशेष तौर पर मनुष्यों में रूचि भिन्नता होती है। योगेन्द्र यादव व शेखर गुप्ता के रूचि भिन्नता के बावजूद उनमें जो संवाद दक्षिण पंथी अर्थशास्त्र व वाम पंथी अर्थशास्त्र की विधाओं के बारे में हुआ। योगेन्द्र यादव की राय में साफ तथा खुले सारगर्भित अर्थ सार के संबंध में कहना है कि भारतीय दक्षिण पंथी राजनीति करने वालों में कोई तत्वदर्शी आर्थिकी कल्पना नहीं है। वे कांग्रेस तथा भाजपा आर्थिकी को नव उद्गार संज्ञा तो देते हैं तथा मानते हैं कि मतदाता इस नव उदारता वाले बाजारवाद को नकार रहा है। योगेन्द्र यादव के तर्क के पूर्वार्धानुसार दक्षिण पंथी आर्थिकी में आश्वस्त करने वाली विवेचन शून्यता लगती है। दक्षिण पंथी आर्थिकी का नक्शा उसके पहले पूर्ण बजट में झलकता है। उनका मानना है कि वाम पंथी आर्थिकी विचार पोखर में भी आर्थिकी चिंतन विवेकपूर्ण विकल्प की जरूरत रखता है। वाम पंथी अथवा मार्क्स की आर्थिकी चिंतन धारा से उपजा सोवियत संघ लुप्त होगया। माओ त्से तुंग ने मार्क्स की राजनीति पर अपना माओवादी मुलम्मा चढ़ाया, विस्तारवादी रवैया अपनाया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगायी और जो नयी पी.एल.ए. तैयार की वह कहां से टूटेगी हांगकांग, तिब्बत अथवा सिक्यांग चीनी तुर्किस्तान किसी एक हिस्से से। ताइवान आज विश्व संगठन यू.एन.ओ. का भाग नहीं है। अगर ताइवान यू.एन.ओ. में मिलना भी चाहे चीन उसे अपने विशेषाधिकार वीटो से रोक देगा। सोवियत संघ बिखर गया तो चीनी गणराज्य जो विस्तारवादी है कैसे एक रह सकता है उसे भी बिखरना ही है। वह पर्व आरहा है जब दक्षिण पंथी आर्थिकी व वाम पंथी आर्थिकी दोनों लुप्त हो जायेंगे। दोनों में संवाद भी हो सकता है। हेनरी किसिंजर ने अपनी पुस्तक में भगवद्गीता और कौटिल्यीय अर्थशास्त्र की प्रासंगिकता का उल्लेख किया है। आज भारत की जरूरत दक्षिण व वाम पंथी आर्थिकी की नहीं कौटिल्य के अर्थशास्त्र के नियमों को अपनाने की है। महात्मा गांधी ने गांधी आर्थिकी का जो रास्ता अपनाया अपने वचनों में भारत के लोगों को बार बार कहा अपने आपको कुजात गांधी वादी ठप्पा जड़ने वाले डाक्टर राम मनोहर लोहिया ने भारतीय राज व्यवस्था गांव जिला शहर घटक राज्य तथा भारत चौखंभा राज की बात अपने साथियों और देश के सामने रखी। गांधी विनोबा चिंतन पथ के राही बाबू जयप्रकाश नारायण ने जो संपूर्ण क्रांति अथवा समग्र क्रांति का मार्ग दर्शन किया वह तत्कालीन राजनीतिज्ञों सहित अपनी राय बताने वाली जनता जनार्दन टोली के वयस्क मतदाताओं को भी पूरी पूरी नहीं जंची। लोकतंत्र का ढांचा कैसा हो ? यह ऊहापोह बना रहा। मनुष्यों में सांसारिक गुण दोष तो एक से दूसरे तक पहुंचते ही हैं। खरपतवार की तरह दोष संसर्ग ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं। गुणों को अपनाने में गुणग्राहिता की सामर्थ्य जुड़ाने में समय लगता है। जिस तरह पानी ढलान में तेजी से बहता है उसी तरह अवगुण या दोष अपना असर जल्दी करते हैं।
अरूण पुरी के अखबार इंडिया टुडे में मनीष सबरवाल की साफगोई वाली अभिव्यक्ति लौह आवरण वाला शासन तंत्र शास्ता चौखंभ हो या कोई अन्य तरीका यह हिन्दुस्तान के संदर्भ में अलग प्रसंग है। राजनीति की समझ व्यक्ति को तब सही तरीके से हो सकती है जब शास्ता शासित संबंध महाभारत के शांति पर्व का वाचक बन कर राजनीति तथा राजनीति जन्य नीतिमत्ता जिसे अंग्रेजी में पॉलिसी कहते हैं उसे सटीक समझ कर राजनीति के मैदान में उतरे। हिन्दुस्तान की राजनीतिक जरूरत को समझना हो तो भारतीय वाङमय ही पढ़ना होगा। भारत की वाणियों में लोककथाओं में लोकगीतों में पहेलियों और लोक व क्रांतियों में जो राजनीतिक गुर दिये हैं उन्हें सही तरीके से समझ कर ही भारतीय राजनीति को हृदयंगम किया जा सकता है। यहां पर अभी योगेन्द्र यादव व शेखर गुप्ता संवाद ही विवेचनीय वस्तु है। विचार पोखर के धनी व संयत भाषा का प्रयोग करने वाले योगेन्द्र यादव में संत विनोबा भावे की मैत्री वाला आभास होेता है। योगेन्द्र यादव ने अपने आपको आआपा आपन आपा खो रही पार्टी से जोड़ा। आपा खो चुकी आम आदमी पार्टी के विचार पोखर योगेेन्द्र यादव को दूध की मक्खी की तरह छिटका डाला। आपा खोने वाले आम आदमी पार्टी के स्वयंभू नेता ने प्रशांत भूषण व योगेन्द्र यादव को बारह पत्थर बाहर करने का स्वयं साहस नहीं जुटा सका। अपने अंध समर्थकों से दो चिंतकों की छुट्टी कर दी। केजरीवाल का यह व्यवहार बाबा रामदेव का रामलीला मैदान में स्त्री वेश में भगने सरीखा ही है। रामदेव साधु है राजनीतिक नहीं। राजनीतिज्ञ को हिम्मत कर सामने आकर अपने विरोधी का सामना करना चाहिये। प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव ने जो रास्ता अपनाया वह राजनीतिक परिपक्वता प्रदर्शित करता है।
आदि शंकर और मिथिला पंडित मण्डन मिश्र के बीच हुए शास्त्रार्थ को निर्णय मिला। मण्डन मिश्र की धर्मचारिणी भारती थीं। अपने पति और युवा सन्यासी शंकर के तर्कों को सुन कर भारती ने निर्णय सन्यासी शंकर के पक्ष में दिया। यह ब्लागर मानता है कि यदि हिन्दुस्तान की राजव्यवस्था कैसी हो इस पर वर्तमान दिल्लीश्वर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी और अण्णा हजारे के नये नारे - मोदी भगाओ और देश बचाओ पर ही शास्त्रार्थ हो। निर्णायक यदि योगेन्द्र यादव हों तो भारती की तरह वे यही फैसला दे सकते हैं कि आज हिन्दुस्तान की जरूरत निस्पृह-निस्वार्थ राष्ट्रहित चिंतक नरेन्द्र दामोदरदास मोदी है। वह परीक्षित है। दिल्ली की सत्ता पर नजर गड़ाये अरविन्द केजरीवाल अपरीक्षित हैं और वे केवल कोरे वायदे ही कर सकते हैं। उनकी 49 दिन की पड़ताल कोई प्रामाणिक तथ्य नहीं है। वे आकांक्षा तो जरूर कर रहे हैं कि वे हिन्दुस्तान पर राज करें इसीलिये उन्होंने नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के विरूद्ध काशी में चुनाव भी लड़ा। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को 281 सहयोगी सांसद मिले केजरीवाल की झोली में मात्र एक सौ नहीं मात्र चार सांसद मतदाताओं ने डाले। इस ब्लागर को नहीं लगता कि अरविन्द केजरीवाल की 12 अध्यायी स्वराज पुस्तक जारी होने से पहले योगेन्द्र यादव ने देखी या नहीं। केवल एक उदाहरण काफी है। यदि अरविन्द केजरीवाल महाशय ने भौंडसी गांव वाली अपनी उक्ति योगेन्द्र यादव के संज्ञान में लायी होती तो योगेन्द्र यादव अवश्य उन्हें कहते चन्द्रशेखर के भौंडसी आश्रम का भी उल्लेख करो।
अब सवाल उठता है दक्षिण पंथी आर्थिकी व वाम पंथी आर्थिकी। ये दोनों आर्थिकियां अपनी अपनी खामियों को लिये हुए हैं। भारत की मौलिक जरूरत कौटिल्यीय अर्थशास्त्र में व्यक्त आर्थिकी व राजनीति स्त्रोत की है। हिन्दुस्तान की कौटिल्यीय अर्थशास्त्र वाली आर्थिकी को सर हेनरी किसिंजर ने अपनी पुस्तक ताजा पुस्तक भगवद्गीता के समानांतर राजनीतिक महत्व दिया है। हिन्द की आर्थिकी व नीति का सही सही विश्लेषण के लिये आर्थिकी मसलों के हर चिंतनकर्ता व्यक्ति के हाथ में कौटिल्यीय अर्थशास्त्र तथा महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज की सुसंपादित सुपठित प्रति हिन्दुस्तान के हर राजनीतिकर्ता को अपनी मातृभाषा या चाहत भाषा में पढ़नी चाहिये तभी वह हिन्द की जरूरत वाला शास्ता व आर्थिकी प्रावधान Governance and economic updating of Indian Society पर अधिकार पूर्वक अपना मत व्यक्त कर सकता है। सोवियत संघ के लुप्त होने के पश्चात मार्क्स का आर्थिक चिंतन, माओ त्से तुंग का विस्तारवादी एकाधिकार सत्ताधिष्ठान और अमरीका व ब्रिटेन की पूंजीवादी व्यवस्था भारत के धरती पुत्रों के अनुकूल नहीं है। भारत की सही आर्थिकी और नीति संगत राजधर्म का अनुसरण करने के लिये दस्युधर्मा राजनीति को तिलांजलि देनी होगी। केवल आचार्य चाणक्य का आर्थिक व राजनीतिक चिंतन जो राजकोष के दुरूपयोग को रोकने वाला गुरूमंत्र था। चाणक्य राजकोष से अपने निजी दिये में तेल नहीं डालते थे। यह वित्तीय अथवा रूपये पैसों की सही सही उपयोग करने वाली प्रवृत्ति महात्मा गांधी और राम मनोहर लोहिया में भी वैसी ही थी जैसी चाणक्य में। गांधी लोहिया का मितव्ययी आचरण ही भारत में हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने की नैतिक क्षमता रखता है। नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की वैयक्तिक राष्ट्रधर्मिता पहले भारत बाद में दूसरे और बिन्दु आज भारत की पहली जरूरत है।
मथुरा - अथवा मधुरा यमुनातट में अयोध्या जब रामराज्य था यमुना तीर में लवणासुर नामक आततायी दैत्य राजा राज करता था। राम के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न ने लवणासुर को मार कर यमुना तट को स्वराज्य का रस चखाया था। कालांतर में यहां शूरसेन वंश के चित्रकेतु नामक राजा का राज था। अंगिरा और नारद ने चित्रकेतु का मार्गदर्शन किया। उसका राजकुमार जो महारानी कृतद्यूति का पुत्र था सौतिया डाह के कारण विष पिलाये जाने के कारण मर गया। पुत्र शोक से दुःखी चित्रकेतु को नारद और अंगिरा ने ढाढस बंधाया। नारद ने अपने वाक् तपोबल से मृत बालक को जीवन दिया। बालक ने जो बात नारद अंगिरा व चित्रकेतु को कही वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। बालक ने कहा - हर प्राणी दूसरे प्राणी का जाति, बंधु, मित्र, अरि, उदासीन और विद्विष (कच्चा खाऊँ कच्चा चबाऊँ) बारी बारी होता रहता है। इस जीवनी में जाति, अगली मनुष्य योनि में बंधु (पति पत्नी भाई बहन), बाद की इन्सानी जिन्दगी में मित्र, अगली जिन्दगी में शत्रु, पांचवे पड़ाव में उदासीन तथा छठे पड़ाव में घोर विद्विष याने मरूँ मारूँ वाला हिंसामूलक संबंध हुआ ही करता है। बालक ने जब बताया कि उसे जहर दूध में मिला कर पिलाया गया था जिससे वह मर गया। जिन्दगी का लेनदेन पूरा हो गया। चित्रकेतु के बेटे के रूप में रह कर राज करना उसके प्रारब्ध में है ही नहीं इसे कहते हैं करम गति टारे नाहिं टरे। राजनीतिक उठापटक में यदि राजनीति करने वाला व्यक्ति करम गति के दर्शन को आत्मसात कर चुका हो तो वह योद्धा की तरह निर्विकार होकर युद्ध करेगा। विजयी को बधाई देगा और अपना कर्तव्य पूरा करेगा। घृणा, द्वेष, क्रोध से ऊपर उठ कर मानवोचित व्यवहार करेगा। नरेन्द्र मोदी ने अपने धुर विरोधी को दिल्ली विधान सभा की 67 सीटेें जीतने पर तुरंत बधाई दी। चाय पर न्यौता देकर अपने साथियों को कहा - राजधर्मानुकूल आचरण कर अरविन्द केजरीवाल को यथायोग्य भरपूर सहयोग दो।
दिल्ली के राजपथ में अपनी भारतीय राष्ट्र राज्य की बागडोर हाथ में लिये नरेन्द्र दामोदरदास मोदी हैं जिनके राजनीतिक खाते में बारह वर्ष गुुजरात राज्य संचालन का अनुभव है। डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी की वह भाषण संभाषण कला है जो अपने श्रोेताओं को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखती है। शादीशुदा होते हुए भी वह नैष्ठिक ब्रह्मचर्य, परिवार के भाई भतीजावाद के आरोप उस व्यक्ति पर नहीं लग सकते। उस व्यक्ति में अपने धुर विरोधी से भी सौहार्दपूर्ण मेल मुलाकात करने की सामर्थ्य है। सबसे अहम बात यह है कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी सरकारी अमला नहीं रहा। वह जनता के बीच से उभरा व्यक्तित्त्व है जिसमें नेतृत्व की ताकत कूट कूट कर भरी हुई है। दिल्लीश्वर की दौड़़ में अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति की दूसरी पारी में याने आआपा की कार्यकारिणी में अनुपस्थित रह कर योगेन्द्र यादव व प्रशांत भूषण को बाहर निकालने का जो तरीका अपनाया लगता है अरविन्द केजरीवाल की 67 सदस्यीय सत्तापक्ष को दोफाड़ होने में ज्यादा समय नहीं लगने वाला है। जरूरत केवल इतनी है कि यदि भारतीय जनता पार्टी के तीन विजयी घोषित विधायकों को मिले हुए मत संख्या विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं द्वारा दिये गये कुल मतों से यदि पचास प्रतिशत से कम है याने भाजपा के विजयी घोषित विधायक के विपक्ष में ज्यादा मतदान हुआ है तो अमित शाह को चाहिये कि वे अपने तीनों विधायकों से त्यागपत्र दिलवायें ताकि अरविन्द केजरीवाल सत्तापक्ष विपक्ष दोनों भूमिकायें निर्वाह कर सकें। केजरीवाल पांच साल मुख्यमंत्री रहें यह तभी संभव है जब उनके मतदाताओं का उनके वादों से मोह भंग न हो जाये और वे अपनी राजनीतिक पूंजी को सहेज कर रखने की पात्रता अर्जित कर लें। 2013 में उनका सामना कांग्रेस से था जिसे अनेकानेक विरोधाभासी तत्वों ने घेरा था। आज उनका सामना ऐसे व्यक्ति से है जिसके दुश्मन अनेक हैं पर राजनीतिक कौशल व्यक्तित्त्व को निखार रहा है। राजनीतिक शतरंज के इस अजूबे खेल में अरविन्द केजरीवाल एकदम नौसिखिये हैं। सुमंत्रदाताओं को उन्होंने बाहर धकेल दिया है इसलिये अरविन्द केजरीवाल महाशय के सामने यक्ष प्रश्न है अण्णा हजारे के साथ पद यात्रा करें या दिल्ली के मतदाताओं की आकांक्षाओं की पूर्ति की सोचें। दिल्ली को पूर्ण घटक राज्य का दर्जा और दिल्ली पुलिस का कब्जा मिलना संवैधानिक और राजनीतिक नजरिये से क्या आकार लेगा यह भविष्य के गर्भ में है। अरविन्द केजरीवाल नुक्कड़ नाटक देखते रहिये।
दिल्ली के मतदाताओं के बहुमत ने केजरीवाल महाशय की 49 दिन वाली भूलचूक माफ कर उनकी झोली में उनके अलावा छियासठ विधायक डाल दिये। अगर केजरीवाल महाशय राजनीतिक विवेक के बजाय योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण सरीखे राजनीतिक मर्म के ज्ञाता अनुभवी विचारकों का अपमान करते रहेंगे वे शायद ही पांच साल दिल्ली के मतदाताओं की आकांक्षाओं की पूर्ति कर सकें। सफल राजनीतिज्ञ बनने के लिये केजरीवाल महाशय को महाभारत का शांतिपर्व के साथ कौटिल्य अर्थशास्त्र, शुक्रनीति, विदुरनीति, चाणक्य नीति तथा भतृहरि का नीतिशतक के साथ साथ श्रंगार शतक व वैराग्य शतक के समानांतर अष्टावक्र गीता का अनुशीलन करना चाहिये तभी नौजवान अरविन्द केजरीवाल महाशय राजनीति की रणनीतिक नदी के मत्स्यन्याय से उबर सकते हैं। झील तालाब नदी यहां तक कि सरित पति समुद्र में जो मत्स्यन्याय युगयुगांतर से चलता आरहा है उसे जलचरों के अलावा थलचर और थलचरोें में सृष्टिकर्ता ईश्वर के बराबर चलने वाले मनुष्य भी मत्स्यन्याय का सहारा लेते हैं। मत्स्यन्याय को किनारे करने वाला नेतृत्व आज विश्व की पहली जरूरत है। केजरीवाल महाशय ने योगेन्द्र यादव व प्रशांत भूषण जो उनके प्रतिस्पर्धी नहीं थे न ही भविष्य में बनना चाहते हैं उन्हें दूध की मक्खी की तरह छिटकने का उत्तरदायित्त्व अपने उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सौंप कर राजनीतिक अनैतिक रास्ता अपनाया। उन्हें स्वयं आ आ पा कार्यकारिणी की इस महत्वपूर्ण बैठक में सम्मिलित होना चाहिये था। उनकी गैर हाजिरी ही मत्स्यन्याय का कारक है। यह तरीका राजधर्म नहीं दस्युधर्मी रास्ता है। उस रास्ते केजरीवाल न जायें। इवेंजिकल एंग्लिकन राजनीति ने कांग्रेस को डुबो दिया।
मनुष्य मात्र बंधु है-यही बड़ा विवेक है
दुनियां के प्रत्येक देश में आज मानवाधिकार की चर्चा अहर्निश होेती आरही है पर हर देश के मनुष्यों में उत्पन्न हो चुकी सम्पन्नता व विपन्नता की खाई निरंतर चौड़ी होती जारही है। लोकतंत्र अथवा डैमोक्रेसी के नाम पर वयस्क मताधिकार के ‘एतो मतो हमारो’ के तुलसीदास के स्वान्तः सुखाय वाली अंतरात्मा की आवाज ऊर्ध्वबाहु होकर उच्च से उच्चतर स्वर में व्यक्त होरही है परंतु ऊँचे स्वर में लोकतांत्रिक सत्ता के गलियारों में लोकसत्ता के अलमबरदार राजधर्म के उदात्त स्वरूप को नकार कर उप राजधर्म अथवा राजधर्म के पाखण्ड पथ का अनुसरण कर एक अजीबोगरीब लोकलुभावनी दिखने वाली दस्युधर्मी राजनीति का रास्ता राजधर्म के पथ के बजाय सत्ता के गलियारों में टेढ़ी मेढ़ी सीढ़ीनुमा घुमावदार पगडंडी के रास्ते चल कर सत्ता का राजनैतिक पाखंड नाटक करते आरहे हैं। इस पाखण्ड पथ को क्रिकेट सहित सभी क्रीड़ा क्षेत्रों मौजूदा सोशल मीडिया तथा स्वांग संस्कार की नाटकीयता फिल्मी रंगमंचों सहित जागतिक कूट योधी सत्ता की दौड़ में सत्ता हथियाने वाले व्यक्ति अथवा दल सत्ता चाहत वाले महानुभावों का समुच्चय अपनी अपनी राजनीतिक चालों की शतरंज क्रीड़ा में व्यस्त हैं। एक जमाना था जब अखबार संपादक अपने कलम की करामात से जन मानस में नयी चेतना उत्पन्न करने की क्षमता रखता था आज अखबारी संपादकीय कला ने अपना रूप, सुर, स्वर बदल कर संपादकीय क्षमता को ऐडवटॉरियल में तब्दील कर दिया है। यह ऐडवटॉरियल क्या है ? विज्ञापन अथवा ऐडवर्टाइजमेंट को शब्द शक्ति प्रयोक्ताओं ने विज्ञापनीय व्यापार को नये फैशन वाले परिधान रूपी संपादकीय शब्द शक्ति की मदद से पेइंग गेस्ट, पेड न्यूज पैसा लेकर आतिथ्य सत्कार अथवा पहले नकदी वसूल कर खोटे समाचार द्वारा भ्रम का वातावरण निर्मित करना। हिन्दुस्तान में खबरचियों के सरताज देवर्षि नारद माने जाते हैं। वे हिन्दुस्तान के सोच विचार वाले विचार पोखर के पहले खबरची थे। हिन्दुस्तान के लोग वासुदेव श्रीकृष्ण को महाविष्णु का सोलह कलाओं वाला अवतार मानते हैं। वासुदेव श्रीकृष्ण का जन्म आज से 5239 वर्ष पूर्व मथुरा में कंस के कारागार में हुआ था। पारब्रह्म परमात्मा महाविष्णु के सोलह कलाओं वाले अवतार को भी खबरें नारद से ही मिलती थीं। वासुदेव श्रीकृष्ण के पोते अनिरूद्ध का रूक्मिणी के राजप्रासाद से अपहरण होगया। प्रह््लाद के पड़पोते विरोचन के पोते सत्यवादी राजा बलि के पुत्र बाणासुर की राजकुमारी ऊषा की अंतरंग सहेेली चित्रलेखा थी। चित्रलेखा बाणासुर के अमात्य कुंभाड की कन्या थी। चित्रलेखा यथा नाम तथा गुण व्यक्तित्त्व की मलकिनियां थी। राजकुमारी ऊषा को स्वप्नावस्था में कामात्मज प्रद्युम्न के पुत्र अनिरूद्ध से रति होगयी। इस स्वप्न घटना का जिक्र ऊषा ने अपनी सहेली चित्रलेखा से किया। चित्रलेखा योगमार्ग का अनुसरण करने वाली विदुषी युवा स्त्री थी, विवाहिता नहीें थी। उसने राजकुमारी ऊषा से कहा - चिंता मत करो मैं चित्र बनाती हूँ तुम्हें स्वप्न में जो युवक दिखा है उसे अपने योगबल से तुम्हारे हवाले कर सकती हूँ। चित्रलेखा ने अनेक चित्र बनाये। संकर्षण, वासुदेव राम और वासुदेव श्रीकृष्ण के चित्र बनाये किन्तु उन्हें देख ऊषा ने कहा और चित्र बनाओ। चित्रलेखा ने रूक्मिणी नंदन प्रद्युम्न का चित्र बनाया तत्पश्चात प्रद्युम्न के पुत्र अनिरूद्ध का चित्र भी बना कर ऊषा को दिखाया। ऊषा ने चित्रलेखा से कहा - सखी यही वह युवा है जिसके साथ मेरी स्वप्न रति हुई। चित्रलेखा ने कहा - चिन्ता मत करो। मैं उस अनिरूद्ध को तुम्हारे प्रासाद में ला देेती हूँ। योगमार्गिणी चित्रलेखा ने रूक्मिणी के प्रासाद से प्रद्युम्न पुत्र अनिरूद्ध का अपहरण अपनी योगशक्ति से किया। भारत के पश्चिमी जगत भाग द्वारका से एकदम पूर्वी भारत के शोणितपुर राजा बाणासुर के राजमहल में ऊषा के प्रासाद में दाखिल कर डाला। ऊषा अत्यंत प्रसन्न हुई। राजभटों ने कन्या दूषण (आज की भाषा बलात्कार या रेप) का प्रसंग राजा बाणासुर के संज्ञान में प्रस्तुत किया। राजा बाणासुर ने अनिरूद्ध को कारागार में डाल दिया। देवर्षि नारद ने यह खबर द्वारका में वासुदेव श्रीकृष्ण व रूक्मिणी को पहुंचायी। अनिरूद्ध को स्वतंत्र करने के लिये यादव सेना ने शोणितपुर पर आक्रमण कर डाला। लड़ाई इतनी बढ़ गयी कि आदिदेव महादेव बाणासुर की तरफ से लड़ने मैदान में आगये। युद्ध में बड़ा अनोखा तरीका प्रयोग में आया। श्रीकृष्ण और गौर शंकर के बीच लड़ाई हुई। इस युद्ध में एक नयी विधि काम में आयी वह थी ज्वरों की लड़ाई। माहेश्वर ज्वर व वैष्णव ज्वर में भयानक युद्ध हुआ। युद्ध में वैष्णव ज्वर ने माहेश्वर ज्वर को परास्त कर डाला। बाणासुर से शंकर जी ने कहा - संधि कर डालो। अनिरूद्ध से ऊषा का विवाह संपन्न करा दो। यह कहानी भागवत महापुराण की दो ज्वरों की लड़ाई की गाथा है।
शेखर गुप्ता रामनाथ गोयनका द्वारा शुरू किये गये अंग्रेजी अखबार इंडियन ऐक्सप्रेस के संपादक रहे हैं। संपादन कार्य में उन्हें वह स्वतंत्रता संभवतः नहीं थी जिसका खुला प्रयोग फ्रेंक मोरिस करते थे। रामनाथ गोयनका अखबार के मालिक जरूर थे पर संपादन कार्य में वे अपने अखबार नवीसों को पूरी पूरी आजादी देते थे। वे सही अर्थों में लोकतांत्रिक लोकसत्ता के रक्षक थे। शायद उन पर हिन्दुस्तान की आजादी के संघर्ष में रमे हुए व्यक्तित्त्व का प्रभाव था। शेखर गुप्ता ने कहा - अधिकतर अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्रों के मालिक अथवा कलम तूलिका का प्रयोग न करने वाले गैर लेखक संपादक समूह ने समाचार कक्षों (न्यूज रूम) तथा नामदार संपादक गण जो अपने सुरक्षित खोह में छिपे रहते हैं उनके और खुले आसमान के नीचे देवर्षि नारद की तरह खबर खोजने में लगे खबरची लोगों में जो मानसिक, कायिक और वैचारिक खाई दिन दूनी रात चौगुनी चौड़ी होती जारही है। उसकी एक झलक निकोलस वाड ने न्यूयार्क टाइम्स के जरिये संकर अंग्रेजी वाणी ने जो उलझन पैदा की है उससे अमरीका का उतना नुकसान नहीं होरहा होगा जितना डाक्टर ग्रियर्सन की राय में 276 वाणियों के भारत के अंग्रेजी के मुलम्मे से अपनी पहचान खोने का नया संकट पैदा हुआ है। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के अंतिम पच्चीस वर्ष जर्मन विद्वान मैक्समूलर (उन्होंने अपने आपको मोक्षमूलः संज्ञा दी) ऋग्वेद के आक्सफोेर्ड विश्वविद्यालय द्वारा सुसंपादित तथा प्रथम बार ऋग्वेद का प्रकाशन कराने का भगीरथ प्रयास किया। वेद श्रुति ग्रंथ हैं। पिता ने पुत्र को पढ़ाया पुत्र ने अपने पुत्र को वेदपाठ सिखाया गुरू ने शिष्य को बताया शिष्य ने प्रशिष्यों को वेद मंत्र उच्चारण की विधि बतायी। चारों वेदों का सुसंपादन श्रौत विद्या के मूल स्तर में बादरायण, कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने आज से पांच हजार दो सौ पिचहत्तर वर्ष पूर्व किया। ऋग, यजु, साम और अथर्व चार वेदों की ऋचायें मंत्र दृष्टा ऋषियों ने रचीं। अपने शिष्यों को कंठस्थ करायीं। कंठाग्र विद्या का चार भागों में विभक्त कर श्रौत विद्या का वेद मंत्र पाठ आज भी बटुक भारत में यत्र तत्र करते हैं। संपादक वह है जो सही शब्द का सही जगह उपयोग करता है और अपने पाठक के मन में गहरा असर करता है। हिन्दी समाचार पत्रों में कम से कम उन हिन्दी अखबारों में जिनमें अंग्रेजी का राहुकाल अपना असर नहीं करता। बाबूराव पराडकर तथा कमलापति त्रिपाठी के भड़काने वाले संपादकीय अपना सानी नहीं रखते थे। हिन्दी, मराठी, बांग्ला, गुजराती, तमिल, तैलुगु, कन्नड़, मलयाली, उड़िया, असमिया, मणिपुरी, सिन्धी, उर्दू, पंजाबी के अखबार अपने अपने पाठकों को वैचारिकी सामग्री प्रस्तुत करते रहते हैं। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने वेदों के संपादन तथा अठारह पुराणों के सृजन के समानांतर पंचम वेद ‘भारत जय’ आख्यान लिखा। महाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भगवदगीता का अठारह अध्यायों सात सौ श्लोकों वाला कृष्णार्जुन संवाद है। इस संवाद के चौथे अध्याय में दूसरे श्लोक के जरिये अर्जुन से कहा -
एवं परम्परा प्राप्तम् इमम् राजर्षयो विदुः। स काले नेह महता योगो नष्टः परत्तप।।
हिन्दुस्तान का सबसे पुराना खबरची देवर्षि नारद ने कभी भी मुफ्तखोरी नहीं की। खबर के साथ साथ सदा नारायण को ही याद किया। आज का अखबार नवीस शेखर गुप्ता की राय में यह आस लगाये रहता है कि उसे अपने दैनंदिन पारश्रमिक के अलावा कुछ आमदनी भी हो जाये, अनर्जित धन मिल जाये। अखबार नवीस जब आमदनी के इन जरियों को लालच भरी नजर से देखेगा तो उसकी कर्त्तव्यच्युति तो होगी ही। उच्चकोटि की राजनीति के मर्मज्ञ यह मानते हैं कि डेमोक्रेसी अथवा जनतंत्र लोकतंत्र जो भी संज्ञा उसे आप दें मतदाता का हासिल करने के लिये मुफ्तखोरी का रास्ता एक बहुत पुराना तरीका है। मतदाता को केवल सिद्धांत जन सेवा तथा सामूहिक हित साधन के सैद्धांतिक मार्ग का राही इसलिये नहीं बनाया जा सकता क्योंकि भारत की चालीस प्रतिशत जनसंख्या आज भी दारिद्र्य दुःख पीड़ि़त है गरीब है दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होरही है। शहरी काम की चौतरफा हमलावर आर्थिकी ने गरीब को हतोत्साहित कर डाला है। स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी ने गरीब को नया नाम दिया - दरिद्र नारायण और इन दो महापुरूषों ने गरीबी ओढ़ कर गरीब की नाईं जिन्दगी जीने का रास्ता स्वयं भी अपनाया तथा अपने हमराहियों को भी गरीब के दुःख दारिद्र्य से आत्मीयता रखने का मार्ग सुझाया। इसलिये गरीब और अमीर के बीच चौड़ी होती जारही आर्थिकी खाई को कैसे पाटा जाये यही आज का आर्थिकी यक्ष प्रश्न है। मनुष्य के मन में करूणा का रस उपजेगा तभी मनुष्य मनुष्य के बीच सौहार्द उत्पन्न होगा। भारत का आज का समाज एक बंटा हुआ, एक दूसरे से ईर्ष्या करने वाला समाज बन गया है। निर्वाचन एक महंगी आर्थिक प्रक्रिया होगयी है। चुनाव लड़ने के लिये बेतहाशा धन चाहिये इसलिये ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवारी उन लोगों की होती है जो राजनीतिक दल को मुंहमांगा चन्दा दे सकते हैं तथा अपने चुनाव में भी असीमित धन खर्च कर सकते हैं। आर्थिक विषमता पर तभी रोक लग सकती है जब मनुष्य में मनुष्यता की ताकत बढ़े एवं उसमें नया विवेक उपजे कि मनुष्य का धर्म दूसरे तिरछे चलने वाले पशु पक्षी सरीसृप कीट पतंग से कुछ हट कर है। उसे वाणी मिली है काम करने के लिये दो हाथ मिले हैं इसलिये वाणी और कर्मशक्ति का ज्ञान विज्ञान पूर्वक सदुपयोग मनुष्य की पहली जरूरत है। मनुष्य ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का बाहुबली शक्ति का कायल नहीं है इसलिये मनुष्य को मनुष्यता अपनानी होगी तभी वह सर्वे भवन्तु सुखिनः का मानवोचित रास्ता अपना सकता है। हिन्दुस्तान सरीखे देश में पाश्चात्य सभ्यता का जो कानून वाला रास्ता है केवल वही मात्र नहीं चल सकता है। कानून के समानांतर मानवीय करूणा का होना नितांत आवश्यक है इसलिये विवेक सम्मत सामाजिकता अपनाने के लिये प्रत्येक मनुष्य को - आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत - वह व्यवहार जो मुझे अच्छा नहीं लगता मैं सामने वाले से वैसा व्यवहार न करूँ यह सोच कर मनुष्य मनुष्य उत्पन्न होना आज के भारतीय जनमानस की पहली जरूरत है।
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