Wednesday, 25 March 2015

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का अंतर्राष्ट्रीय गुरु बीजमन्त्र

           चीन के राष्ट्राध्यक्ष शी जिनपिंग वैश्विक तथा चीन राष्ट्र की राष्ट्रीय खोज पड़तालों के मुताबिक वैश्विक बीज मंत्र के ज्ञाता भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से एक कदम पिछड़ गये लगते हैं। चीन की राष्ट्रीय छवि वाले वैश्विक पड़ताल जो क्रमशः संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका, भारत, रूस, ब्राजील तथा चीन सहित नौ राष्ट्रों में संपन्न हुई। उसके नतीजे बताते हैं कि चीनी राष्ट्राध्यक्ष श्री शी जिनपिंग महाशय ने चीन को विश्व की द्वितीय सर्वोत्तम आर्थिकी का अधिपतित्व सुनिश्चित कर दिया है। नौ राष्ट्रों के ज्यादातर लोग चीन के उच्चतम भविष्य के लिये आश्वस्त लगते हैं। यह आर्थिकी उत्कर्ष का निष्कर्ष चीन के सरकारी अखबार ने इंगित किया है। नौ राष्ट्रों के नेतृत्व समाज में श्री शी जिनपिंग चौथे व्यक्ति हैं जिन्हें सत्तर प्रतिशत उत्तरदाताओं ने शी जिनपिंग को सुना है तथा उनकी प्रशंसा की है। विश्व नेतृत्व में शी जिनपिंग पहले पंक्ति में खड़े संयुक्त राज्य अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा सत्तानवे प्रतिशत, रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन इक्यानवे प्रतिशत, बर्तानी प्रधानमंत्री डेविड केमरान छियासी प्रतिशत के चहेते हैं। चीन की आर्थिकी उत्कर्ष गाथा को सस्वर बोलने वाले छियालीस प्रतिशत लोग मानते हैं कि चीन के लोग अपेक्षाकृत अच्छी जिन्दगी जीरहे हैं। वहीं दूसरी ओर पैंतालीस प्रतिशत लोगों का मानना है कि गरीब अमीर के बीच चीन में आर्थिकी खाई काफी असरदार होगयी है। उस खाई को पाटना एक कठिन लक्ष्य है। 
          चीन का उत्कर्ष राष्ट्रीय चीन की (जो अब ताइवान तक सीमित है) संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य न होने के बावजूद ताइवान दुनियां के उन छः राष्ट्रों में है जो संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़े नहीं हैं। ताइवान का क्षेत्रफल 35981 वर्ग किलामीटर आबादी 2 करोड़ तैंतीस लाख से ज्यादा है। ताइवान एक गणतंत्र है, चीन की तरह पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का कैदी नहीं। ताइवान की आर्थिकी उन्नति की राही है। ताइवान की दृष्टि चीन की मुख्य भूमि की तरफ है जिसे छोड़ चीनी राष्ट्रवादी नेता च्यांग काई शेक को चीन की मुख्य भूमि छोड़नी पड़ी। कार्ल मार्क्स का आर्थिक चिंतन तथा सामाजिकी को लेनिन ने 1917 में सोवियत संघ के रूप में खड़ा किया। रूस, रसिया या ऋषि देश मूलतः पारम्परिक विचार वाला मानव समाज था। कार्ल मार्क्स के साम्यवादी चिंतन को मुखर यू.एस.एस.आर. यूनियन आफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक की सृष्टि हुई। ठीक उसी तरह जिस तरह यूरप के देशों ने अब यूरोपीय पार्लियामंेट का गठन कर विभिन्न भाषी यूरोपीय लोगों को जोड़ा है। यूरप के देशों की अपनी राष्ट्रीयता भी पूर्ववत बरकरार है पर यह ढांचा ढीला ढाला तथा सोवियत संघ की तरह ही कभी न कभी बिखरने वाला ही है। चीन की मुख्यभूमि पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के माध्यम से एकाधिकारी चीन कम्यूनिस्ट का कब्जा है। सोवियत संघ 1917 से केवल 74 वर्ष तक जुड़ा रहा। सोवियत संघ एक बेमेल खिचड़ीनुमा आर्थिक दर्शन कार्ल मार्क्स का साम्य दर्शन जिसे उपयोग करने में लेनिन, स्टालिन आदि ने सत्तामूलक हिंसा का मार्ग अपनाया नतीजतन सोवियत संघ शतायु होने से रह गया। दिसंबर 1991 में बिखर गया। इसलिये आधुनिक संसार की गति-दुर्गति अथवा प्रगति को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिये राजा या शासक क्यों चाहिये ? सार्वभौम शास्ता कौन है ? इस धरती पर दस्यु धर्मी अराजकता को मिटाने के लिये शास्ता की व्यवस्था हुई। सोवियत संघ जब एक राष्ट्र राज्य था वर्तमान रूस का क्षेत्रफल 1,70,75,000 वर्ग किलोमीटर है तथा आबादी 14,24,70,272 है। सोवियत संघ के शेष नौ राज्यों का क्षेत्रफल लगभग 26 लाख वर्ग किलोमीटर तथा आबादी लगभग 14 करोड़ है। सोवियत संघ का क्षेत्रफल 2 करोड़ वर्ग मील तथा आबादी लगभग 30 करोड़ थी। वह व्यवस्था छिन्न भिन्न होगयी, बिखर गयी इसलियेयह मान कर चलना कि किसी एक देश का राजतंत्र सर्वदा समान रहेगा यह केवल कोरी कल्पना का ही स्त्रोत है। राजनीतिक हलचलों को समझने के लिये मानव मनोविज्ञान के अलावा प्राकृतिक बदलाव भी चिंतनीय वियय है। आज संसार के वैज्ञानिक नित नये नये शोध तथा वैज्ञानिक चमत्कारों का नजारा दिखा रहे हैं। वैज्ञानिक शोध की भी एक मर्यादा है उस मर्यादा गिरि को लांघनेे के पश्चात प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक उत्कर्ष मनुष्य के लिये नये अवरोध भी खड़ा कर सकते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका अन्य इतर राष्ट्र राज्यों के मुकाबले एक नया मानव समुच्चय है जिसने यूरप अथवा पौर्वात्य देशों सरीखे उठापटक का अनुभव नहीं लिया है। अढ़ाई सौ वर्ष किसी राष्ट्र राज्य के लिये एक लंबी ऐतिहासिक अनुभूति नहीं है इसलिये अमेरिका सरीखे राष्ट्र की भी दुनियां के पुराने सांस्कृति तथा राजनैतिक समुच्चयों का ऐतिहासिक उत्थान पतन देखना होगा। सोेवियत संघ व रूस के मुकाबले चीन का 1959 से अब तक का जो उत्कर्ष पथ है वह रूस से ज्यादा टेढ़़े मेढ़े रास्ते वाला है। चीन दुनियां की सबसे समर्थ आर्थिकी तथा प्रौद्योगिकी का दर्जा हासिल करना चाहता है। राजनीतिक आदर्श जो कार्ल मार्क्स द्वारा अभिव्यक्त समाजवादी आदर्श पर आधारित था पर लेनिन व उनके परवर्ती उत्तराधिकारियों में स्टालिन से लेकर गोर्बाचोव तक सोवियत संघ के जितने भी नीति नियंता हुए उन्होंने कार्ल मार्क्स द्वारा स्थापित आर्थिकी एवं सामाजिकी स्थितियों का सटीक अनुशीलन नहीं किया। यहां पर महाकवि तुलसीदास का कथन ‘प्रभुता पाहि काहि मद नाहीं’ प्रभुता में भी राजनीतिक शास्ता प्रभुत्व को अहंकार में बदल डालता है और ज्योंही शास्ता अपने शासितों पर अनुशासन का डंडा चलाता है विचारशील व्यक्ति को भी राजदण्ड के भय से शांत व संयत रहना पड़ता है। सोवियत संघ के पतन के पश्चात सोवियत सत्ता की डोर सूत्र ऐसे नेेताओं के हाथ लगी जिन्हें भारतीय राजनीति तथा भारत विज्ञान की जानकारी थी क्योंकि रूस का भारतीय वाङमय नामकरण ऋषि देश है। पुरानी रूसी भाषा में 90 प्रतिशत शब्द संस्कृत जन्य हैं। यूरोप के इतर राष्ट्र राज्यों में रूस की तरह भारत से सामीप्यता वाला दूसरा देश जर्मनी है। जर्मनी शब्द भारतीय वाङमय के शर्मणी शब्द का पर्याय है। जर्मनी का परिचय चिह्न भी स्वस्तिक होने से यह प्रतीति कराता है कि प्राचीन भारत का स्वस्तिवाचन अथवा स्वस्ति पाठ के प्रति जर्मनी के लोगों की महती श्रद्धा थी। रूस तथा जर्मनी के साथ भारतीय वाङमय की जो सप्तपदी है तथा वर्तमान चीनी गणराज्य जिसका क्षेत्र विस्तार 96,51,000 वर्ग किलोमीटर है पहली अक्टूबर 1949 से पीपल्स लिबरेशन आर्मी के तहत चीनी गणतंत्र के नाम से विख्यात है। 26 अक्टूबर 1971 को राष्ट्रीय चीन (ताइवान) के स्थान पर मुख्य चीनी भूमि के कब्जेदार चीनी गण राज्य के चितेरे माओ त्से तुंग के नेेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन का प्रतिनिधत्व सुनिश्चित हुआ पर राष्ट्रवादी चीन अस्तित्वहीन नहीं हो पाया। आज भी साम्यवादी चीन का प्रमुख विरोधी ताइवान तथा विस्तारवादी चीन जो तिब्बत सहित पांच पूर्णतः स्वतंत्र घटकों को स्वायत्त क्षेत्र या अटानामस रीजन नाम से पुकारता है। चीन के 22 प्रांत वाले मुख्य भूमि भाग के हिस्से नहीं हैं उनकी संस्कृति, सभ्यता, भाषा वाणी अथवा आस्थामूलक यथार्थतायें भी चीन से बिल्कुल अलग हैं। उदाहरण के लिये तिब्बत ही पृथक अस्तित्वधारक है। तिब्बत शब्द भारतीय वाङमय में त्रिविष्टप कहलाता है। यह मूलतः त्रिदश - कश्यप अदिति संतान आदित्य समूह का क्षेत्र है। तिब्बती भाषा व वाणी का संस्कृत से संबंध है। दस भारतीय भाषाओं  - पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमी, मइती मणिपुरी की स्वतंत्र लिपियां हैं। तिब्बती भाषा की लिपि बांग्ला लिपि की भगिनी है। विश्रवा नंदन दशग्रीव कहलाने वाल रावण ने वेदों का जो भाष्य लिखा उसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि तिब्बती है। रावण संहिता नामक पुस्तक तिब्बती भाषा में आज भी उपलब्ध है इसलिये तिब्बत हीनयान बौद्ध धर्म के साथ साथ सांस्कृतिक तथा सभ्यता के दृष्टिकोण से भारत का नजदीकी हिस्सा रहा है। तिब्बत के चौदहवें धर्माचार्य परम पावन दलाई लामा पिछले छप्पन वर्षों से भारत में रह कर एक लाख बौद्ध धर्मावलंबियों के साथ महात्मा बुद्ध का अनुसरण कर रहे हैं। तिब्बती बौद्धों की प्रवासी संसद तथा सरकार भी भारत में कार्यरत है। एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि जब शांतिलाल त्रिवेदी पंडित नेहरू की इच्छा पर कुमांऊँ के वर्तमान पिथौरागढ़ जनपद के अस्कोट क्षेत्र के गांवों के किसानों का ब्यौरा पंडित नेहरू को भेज रहे थे डाक्टर राममनोहर लोेहिया तब अ.भा. कांग्रेस कमेटी मुख्यालय इलाहाबाद स्वराज्य भवन में कांग्रेस के विदेश विभाग के सचिव थे। लोहिया जी की ननिहाल अल्मोड़ा में थी। अल्मोड़़ा उन्हें महात्मा गांधी व जवाहरलाल नेहरू की ही तरह प्रिय था। शांतिलाल त्रिवेदी के अस्कोट रियासत के मालगुजारी ब्यौरों को एकत्र करते समय मानसरोवर क्षेत्र की मालगुजारी रकम अस्कोट के रजवार रियासत के मार्फत पिथौरागढ़ की सब ट्रेजरी में जमा होती थी। यह प्रसंग पंडित नेहरू के संज्ञान में भी था। डाक्टर लोेहिया ने अनेक बार अल्मोड़ा नंदा देवी में व्याख्यान देेते हुए यह व्यक्त किया कि वर्तमान तिब्बत का मानसरोवर राकस ताल व कैलास इलाका, तकलाकोट, ज्ञानिमा मंडी सहित भारतीय क्षेत्र है। अक्टूबर 1949 में जब चीन में माओ त्से तुंग के नेतृत्व वाली पीपल्स लिबरेशन आर्मी का प्रभुत्व हुआ भारत सरकार ने तिब्बत को चीन का क्षेत्र स्वीकार कर लिया जब कि भारत की आजादी से पहले ब्रिटिश राज तिब्बत को मध्यवर्ती (बफर स्टेट) राज्य का दर्जा देता था। चीन ने भारत के साथ सीमा विवाद की बात निरंतर की है विशेष तौर पर पूर्वकाल में नेफा संज्ञा प्राप्त वर्तमान अरूणाचल प्रदेश को चीन अपना क्षेत्र बताता रहता है। मैकमोहन लाइन को वह मान्यता नहीं देेता। चीन में च्यांग काई शेेक की राष्ट्रीय चीनी सत्ताच्युति तथा पीपल्स लिबरेशन आर्मी के तत्वावधान में अक्टूबर के पश्चात तथा परम पावन दलाई लामा के 1949 में भारत प्रवेश, भारत में उनकी प्रवासी सरकार की स्थापना पर प्रवासी सरकार को कूटनीतिक मान्यता न दिया जाना एक ऐसा प्रसंग है जिस पर भारत की आजादी दिवस 15.8.1947 के पश्चात चीन के भारत पर आक्रमण 1962 पर्यन्त 1949 से लेकर 1962 तक की तिब्बत संबंधी प्रत्येक राजनीतिक घटना का पुनरावलोकन समय की मांग है। भारत के प्रधानमंत्री जी ने अपने शपथ समारोह में तिब्बत की प्रवासी सरकार के प्रधानमंत्री को न्योंता तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि हांगकांग, ताइवान तथा सिक्यांग में जो राजनीतिक स्थितियां हैं भारत सरकार तिब्बत के प्रश्न को तिब्बत के बफर स्टेट अस्तित्व को नजरअन्दाज करने में जो राजनीतिक भूल 1949 में हुई उसे सुधारा जाय। मानवाधिकार समर्थक जो समर्थ राष्ट्र तिब्बत को स्वतंत्रता के पक्षधर हैं उनसे राजनीतिक संपर्क रख कर भारत में तिब्बत की प्रवासी सरकार को मान्यता देने के बाबत तात्कालिक प्रयत्न जरूरी है। रूस के नेतृत्व वाले सोवियत संघ के बिखरने से जो राजनीतिक अस्थिरता सोवियत संघ के सभी घटकों में आयी अगर चीन ताइवान, तिब्बत, हांगकांग व चीनी तुर्किस्तान में बदलते हुए राजनीतिक ढर्रे और चीन की छुपी हुई क्षेत्र विस्तार तथा जिन पांच इलाकों को चीन अटोनामस रीजन संज्ञा देता है उनमें राजनीतिक उबाल आ जाये और पीकिंग उसे रोक न पाये तो चीन का बिखराव सोवियत संघ के बिखराव से ज्यादा तकलीफदेह घटना होगी इसलिये भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को अपना बीज मंत्र चीन के साथ कूटनीतिक व्यवहार के मामले में प्रयोग करना ही होगा। चीन केा यह बताने का मुहूर्त आगया है कि तिब्बत एक स्वतंत्र अस्तित्व वाला भू भाग है। नृ वंशीय सांस्कृतिक वाणी विलास भाषा तथा सभ्यता किसी भी नजरिये से तिब्बत चीन की सभ्यता व शास्ता पद्धति का अंग नहीं है। अतः भारत तिब्बत की स्वतंत्रता का पक्षधर है। 1949 में जो राजनीतिक चूक हुई उसका आंशिक सुधार पंडित नेेहरू ने दलाई लामा की प्रवासी सरकार को मान्यता देने के अलावा सभी सुविधायें भी देकर किया। आज भारत की मानवीय रक्षा की व्यावहारिक जरूरत उपस्थित होगयी है कि धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में तिब्बत की प्रवासी सरकार को स्वयं मान्यता देने के साथ साथ मानवाधिकार पक्षधर राष्ट्रों से अनुरोध किया जाये कि तिब्बत की प्रवासी सरकार को वे भी मान्यता प्रदान करें ताकि चीन के संभावित बिखराव से राष्ट्रवादी चीन को सामर्थ्य मिले जिससे पीपल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा चीन के 22 प्रांतों व पांच अटानामस क्षेत्रों में अराजकता का तांडव रोका जा सके। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने केवल राष्ट्रवादी चीन को पछाड़ कर अपना एकाधिकारवादी शासन तंत्र ही नहीं चलाया बल्कि तिब्बत या त्रिविष्टप सरीखे हीनयान मार्गी बुद्ध समाज को भी अपनी जड़ों से उखाड़ने का कृत्य किया है। अमेरिकी चिंतन पोखर चीन के राजनीतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवहार को युक्तिसंगत नहीं मानता। तिब्बत के साथ जो अमानवीय व्यवहार चीन ने किया है उसे पश्चिमी जगत उचित तो नहीं मानता पर पश्चिमी सभ्यता को डर है कि कहीं चीन को छेड़ने से विश्व युद्ध की पुनरावृत्ति न हो। चीन का व्यापारिक तथा आर्थिकी पक्ष निरंतर उन्नति के मार्ग पर अग्रसर है। पश्चिम के कुछ विचारकों का मत है कि सोवियत संघ की तरह ही चीन को भी बिखराव सहना ही पड़ेगा। चीन के बिखराव से एशिया के वे देश उत्पीड़ित होंगे जो चीन की छत्रछाया में रहने के आदी होगये हैं। 
          उनके मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा राष्ट्रवादी चीन है जो अब अपने आप को ताइवान तक सीमित कर चुका है पर जिसकी राष्ट्रीयता पीपल्स लिबरेशन आर्मी के एकाधिकार से ज्यादा लचक वाली है। राष्ट्रवादी चीन ने पिछले छियासठ वर्षों में ताइवान को एक समर्थ सक्षम तथा दुनियां की नजर में एक प्रगतिशील राष्ट्र लोकतांत्रिक मर्यादाओं के चौखट में फिट होकर संपन्न किया है। ताइवान के अलावा हांगकांग जो 1071 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का समुद्री सीमा वाला क्षेत्र है जिसमें इकहत्तर लाख से ज्यादा लोग बसते हैं, की चीनी धार्मिक आस्था कन्फ्यूसियस और बौद्ध मतावलंबी है। यहां की भाषायी पहचान अंग्रेजी है। 
          विस्तारवादी चीन के सामाजिक पराभव से चीन के कब्जे वाले इलाकों के अलावा चीन की सैन्य शक्ति तथा विकास पथ की जो राह चीन ने अपनायी है उसका प्रतिकूल प्रभाव पाकिस्तान सरीखे देश में पड़ने ही वाला है। पूर्व एशिया के वे देश जो चीन से प्रभावित हैं उन्हें भी चीन की संभावित उलटबांसियों का भुक्तभोगी बनना पड़ सकता है।
भारत चीन सीमा निपटारा व तिब्बत का वैश्विक 

          पीपुल्स लिबरेशन आर्मी व चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी द्वारा चीन की मुख्य भूमि तथा चीन द्वारा घोषित पांचों अटानामस रीजनों में विशेषतया तिब्बती समाज, तिब्बती संस्कृति एवं तिब्बत की राजनीति में चीन निरंतर दखल देता रहा है जबकि तिब्बत और चीन के सामाजिक व राजनैतिक तौर तरीके अलग अलग हैं। चीन के उत्पीड़न से पीड़ित तिब्बती धर्मगुरू तथा पूर्व शासक 1959 में पलायन कर भारत आगये। परम पावन दलाई लामा के साथ एक लाख तिब्बती भी स्वभूमि से पलायन कर भारत भूमि आये। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने 1949 में तिब्बत चीन का अविभाज्य अंग होने की जो घोषणा की थी, राजनीतिक त्रुटि सुधार कर मानवीय आधार पर तिब्बती समाज को प्रवासी सरकार चलाने के लिये सभी सहूलियतें दीं पर प्रवासी तिब्बत सरकार को राजनीतिक मान्यता न मिलने से चीन का हौसला बढ़ता रहा। चीन ने यह मान्यता बना ली कि परम पावन दलाई लामा विद्रोही हैं। सोवियत यूनियन चौबीस वर्ष पहले बिखर गया, मार्क्स का साम्यवादी आर्थिकी चिंतन पर ग्रहण लग गया। सोवियत संघ के पतन से पूर्व जो दो खेमे पूंजीवादी आर्थिकी व साम्यवादी आर्थिकी दोनों को एक झटका लगा। इस बीच संयुक्त राज्य अमेरिका में अमेरिकी सत्ता के केन्द्र बिन्दु रहे हेनरी किसिंजर ने एक पुस्तक के द्वारा भारत की गीतामूलक आध्यात्मिकता और कौटिल्यीय अर्थशास्त्र की राजनीति मूलक आर्थिकी की तरफ दुनियां का ध्यानाकर्षण किया। विज्ञान व तकलालाजी के नित नये नये अनुसंधान मनुष्य समाज के लिये एक अबूझ पहेली बन गये हैं जिससे मौजूदा पूंजीवादी आर्थिकी को भी झटका लग गया है। भारत में अनेक नीतिकार हुए हैं जिनमें पौराणिक शुक्र नीति - शुक्राचार्य ने जो रास्ता राजा बलि को बताया वह शुक्रनीति कहलाती है। महाभारत काल की विदुर नीति, आचार्य चाणक्य की चाणक्य नीति के समानांतर भर्तृहरि के नीतिशतक हिन्दुस्तानी लोगों के आदर्श रहे हैं। कौटिल्य अर्थशास्त्र में आचार्य चाणक्य ने राजतंत्र व अर्थतंत्र में जो तालमेल बिठाया और भारत में मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त को एक ग्वालबाल से उठा कर चक्रवर्ती सार्वभौम राज्य का सम्राट बना डाला। आज तकनालाजी के उत्कर्ष को कौटिल्यीय आर्थिकी के ढांचे को पुनर्वाचन करने के लिये इंसानियत को झकझोर डाला है। सोेवियत संघ के पतन तथा विस्तारवादी चीन की संभावित दुर्गति के बारे में दुनियां का चिंतन पोखर सोचने लग गया है। सवाल यह उठता है कि चीन के बिखराव का सूत्र राष्ट्रवादी चीनी परम्परा होगी अथवा हांगकांग के लोग विद्रोह का बिगुल बजायेंगे किंवा चीन में गरीब और अमीर के बीच जो खाई निरंतर चौड़ी होती जारही है क्या वह खाई ही चीन के बिखराव का कारण और चीन के 22 प्रांत फिर छिटक जायेंगे। चीन के संभावित बिखराव से सबसे ज्यादा लाभ तिब्बत को ही मिलने वाला है। तिब्बत से भारत की सीमा लद्दाख लेह, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम तथा अरूणाचल प्रदेश में मिलती है। उत्तराखंड का केदारखंड पथ व मानसखंड पथ तिब्बत की यात्रा के लिये भारत की राजधानी दिल्ली से सबसे कम दूरी का रास्ता है। वह भले ही नीति माणा, बाराहोती होकर हो अथवा मिलम, कुगरी बिगरी, कैलास होकर हो या फिर पिथौरागढ़ जनपद के नैपाल से सटे इलाके धारचूला, गर्ब्यांग, लिपुलेख दर्रे होकर हो। उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड राज्य इसलिये अलग बनाया गया था क्योंकि मैदानी क्षेत्र पहाड़ी क्षेत्र पर हावी था। देहरादून को मध्यवर्ती स्थान मानते हुए जिस उत्तराखंड राज्य की संरचना हुई उसमें आज भी सामाजिकी व आर्थिकी संबल उत्तराखंड राज्य ने देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर तथा नैनीताल के तराई भाबर का ही है। इन इलाकों की समूची जनसंख्या उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों से ज्यादा होने के कारण उत्तराखंड की सत्ता का तराजू और आर्थिकी उत्कर्ष की डोर देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर तथा नैनीताल के तराई भाबर में अटका हुआ है। इन इलाकों के लोगों की प्रति व्यक्ति आय का स्तर उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत के अठाईस विकास खंडों के मुकाबले अढ़ाई से तीन गुनी ज्यादा है। सीमावर्ती उत्तराखंड की सरकार सुगम दुर्गम के चक्रव्यूह में फंसी हुई है। मैदानी इलाकों की प्रति व्यक्ति आय ज्यादा होने के कारण समूचा उत्तराखंड विकसित राज्य की श्रेणी में आगया है इसलिये तात्कालिक जरूरत यह है कि राज्य के सीमावर्ती जिलों की आर्थिकी का ताजा रोड मैप बनाने के लिये भारत सरकार उत्तराखंड सरकार के परामर्श से उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत इन छः जिलों के 28 विकास खंडों का तात्कालिक आर्थिक सामाजिक खेती बागवानी की वर्तमान स्थिति तथा 28 विकास खंडों से स्थायी पलायन, अस्थायी पलायन तथा 1960 से अद्यपर्यंत संपन्न विकास कार्यों का स्थानीय जनसंख्या पर प्रभाव, पलायन के कारण जो लोग अभी भी गांवों में रह रहे हैं उनकी खेती बाड़ी, बगीचा, व्यापार, व्यवसाय तथा सार्वजनिक अथवा व्यापारिक सहित विभिन्न सेवाओं के जरिये आजीविका साधनों का ब्यौरा, 1960 से अब तक इन गांवों कस्बों से जो स्थायी पलायन हुआ है कितने व किन किन लोगों ने अपना स्थायी निवास उपरोक्त 28 विकास खंडों से हट कर अन्यत्र बना लिये हैं। पलायन हुए लोगों का अपने मूल गांव, घर जमीन से क्या ताल्लुक रह गया है यह सही सही पड़ताल करने पर कुमांऊँ के तीन जिलों बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत को मानसखंड का इलाका घोषित किया जाये। गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग को केदारखंड घोषित किया जाये। जो लोग अभी भी इन इलाकों में रह रहे हैं उन्हें प्रोत्साहन देने के लिये भारत सरकार को विचार विमर्श करना चाहिये ताकि उत्तराखंड के ये इलाके निर्जन न हो जायें। कुमांऊँ का सीमावर्ती क्षेत्र पंडित नैन सिंह सरीखे व्यक्तियों का प्रदाता है जिसने तिब्बत व सिक्यांग संबंधी जानकारी एकत्र की। भारत सरकार तिब्बत भारत बार्डर इन्क्वायरी कमीशन के जरिये मैकमोहन लाइन, सीमावर्ती लोग, सीमावर्ती वनस्पति, सीमावर्ती पशु पक्षी वर्ग सहित भारत तिब्बत सीमा रेखा से धरती दूरी पचास मील या अस्सी किलोमीटर तक का क्षेत्र, वह आबादी का क्षेत्र हो अथवा निर्जन क्षेत्र हो लेह लद्दाख हिमाचल की तिब्बत सीमा उत्तराखंड के केदारखंड तथा मानसखंड सिक्किम व अरूणाचल प्रदेश के तिब्बत सीमा क्षेत्र को केन्द्र शासित क्षेत्र का दर्जा दिया जाना आवश्यक है क्योंकि सीमा के उस पार चीनी सत्ता ने रेल, रोड तथा वायु पथ का सशक्त जाल बिछाया है जब कि भारत की तिब्बत से मिलने वाली सीमावर्ती इलाके भारतीय संघ के घटक राज्यों की नजर में आज भी दुर्गम स्तर है। पंडित नैन सिंह को ब्रिटिश ने के.सी.आई. की उपाधि दी। उन्होंने एटकिंसन के कुमांऊँ गजेटियर जिसे अब भारत सरकार व उत्तराखंड की सरकार हिमालय गजेटियर नाम से प्रकाशित कर रही हैं, भारत तिब्बत सीमावर्ती समूचे क्षेत्र का तात्विक भौगोलिक ब्यौरा है। चीन के साथ व्यापार के अलावा को सीमा संबंधी मौलिक व वैचारिक प्रसंग हैं उनका समाधान खोजने के लिये भारत सरकार को तात्कालिक कर्तव्य पथ का अनुसरण करना ही होगा अन्यथ यदि चीन का विस्तारवादी दृष्टिकोण अवरूद्ध नहीं हो पाया तो वह भारत व भारत के मुकुट हिमालय को रौंदना ही चाहेगा इसलिये तिब्बत जो भारत चीन के मध्यस्थ एक भारत संस्कृति का वाहक है उसे चीन के चंगुल से यथाशीघ्र ही निकालना ही भारत की पहली राष्ट्रीय जरूरत है। भारत सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिये से उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग के केदारखंड तथा बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत के मानसखंड इलाकों को देहरादून से छिटक कर ही देखना होगा। मानसखंड व केदारखंड के 28 विकास खंडों को केन्द्रीय शासित क्षेत्र घोषित किये बिना सीमा समस्या का समाधान लगभग असंभव ही है इसलिये तिब्बती प्रवासी सरकार के समानांतर केदारखंड-मानसखंड को केवल राष्ट्रीय सीमा सुरक्षा के दृष्टिकोण से ही देखना होगा। भारत सरकार जितना विलंब करेगी समस्यायें उतना ही उग्रतर होती जायेंगी। भारतीय जनता पार्टी के प्रथम राज्यारोहण में उत्तराखंड राज्य की संरचना में पहाड़ और मैदान का जो भौगोलिक तथा पर्यावरण मूलक फासला है उसे पाटने का एकमात्र उपाय केदारखंड व मानसखंड के छः जिलों के 28 विकास खंडों को केन्द्र शासित क्षेत्र घोषित कर भारत सरकार सीमावर्ती इलाकों का योगक्षेम दिल्ली से देखे। देहरादून का नजरिया क्योंकि सुगम दुर्गम के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। पहाड़ का हर आदमी जो आर्थिक रूप से समर्थ है स्वास्थ्य सुरक्षा संतति शिक्षा सुरक्षा के लिये तराई भाबर में रहना ज्यादा अनुकूल मानने लग गया है इसलिये केदारखंड व मानसखंड को निर्जन होने से बचाने के लिये तात्कालिक उपाय अत्यावश्यक हैं जो गरीब लोग पहाड़ के गांवों में रह रहे हैं उन्हें सीमा सुरक्षा निधि से पहाड़ में रहने के लिये प्रोत्साहित करने की जरूरी है। 
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।   

1 comment:

  1. म एडम्स KEVIN, Aiico बीमा plc को एक प्रतिनिधि, हामी भरोसा र एक ऋण बाहिर दिन मा व्यक्तिगत मतभेद आदर। हामी ऋण चासो दर को 2% प्रदान गर्नेछ। तपाईं यस व्यवसाय मा चासो हो भने अब आफ्नो ऋण कागजातहरू ठीक जारी हस्तांतरण ई-मेल (adams.credi@gmail.com) गरेर हामीलाई सम्पर्क। Plc.you पनि इमेल गरेर हामीलाई सम्पर्क गर्न सक्नुहुन्छ तपाईं aiico बीमा गर्न धेरै स्वागत छ भने व्यापार वा स्कूल स्थापित गर्न एक ऋण आवश्यकता हो (aiicco_insuranceplc@yahoo.com) हामी सन्तुलन स्थानान्तरण अनुरोध गर्न सक्छौं पहिलो हप्ता।

    व्यक्तिगत व्यवसायका लागि ऋण चाहिन्छ? तपाईं आफ्नो इमेल संपर्क भने उपरोक्त तुरुन्तै आफ्नो ऋण स्थानान्तरण प्रक्रिया गर्न
    ठीक।

    ReplyDelete