Saturday, 21 March 2015

संकर अंग्रेजी का उलझन भरा मकड़जाल

  इस ब्लागर ने दुनियां की दस लोकप्रिय भाषाओं के इंटरनेट प्रयोक्ताओं का खुलासा एक पूर्ववर्ती ब्लाग में किया। दुनियां में अंग्रेजी भाषायी इंटरनेट प्रयोक्ता सबसे ज्यादा हैं। उसमें मन्दारिन (चीन की भाषा), स्पेनिश, अरबी, पुर्तगाली, जापानी, रूसी, जर्मन, फ्रेंच तथा मलय ये दस भाषायें इंटरनेट पर छायी हुई हैं। हिन्दुस्तानी भाषाओं में हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या दुनियां में चौथे क्रम में है यानि अंग्रेजी, मंदारिन, स्पेनिश के बाद हिन्दी का स्थान आता है पर हिन्दी व दूसरी दो भारतीय भाषायें बांग्ला व पंजाबी दुनियां की भाषा-बही में सातवें और ग्यारहवें पायदान पर हैं। इन तीनों हिन्दुस्तानी भाषाओं की शब्द शक्ति, उच्चारण शक्ति संस्कृतजन्य है। संस्कृत के स्वर व्यंजन मिला कर 51 उच्चारण हैं जबकि ग्रीक में 24 रोमन लिपि में केवल 26 उच्चारण हैं। सण्डे इंडियन ऐक्सप्रेस 8 मार्च 2015 के ज्ञान पन्ने अठारह में बी. टैगल वेब आफ इंग्लिश जिसे मूलतः न्यूयार्क टाइम्स के मिस्टर निकोलस वाड के खोज खबरी स्तंभ में प्रस्तुत किया गया है, भारत की मुख्य भाषा हिन्दी में मिस्टर निकोलस वाड के लेख का हिन्दुस्तानी शीर्षक दिया है - ‘संकर अंग्रेजी का उलझा हुआ भाषायी मकड़जाल’। मिस्टर वाड ने सवाल किया है कि क्या आदिम भारोपा वाणी का उद्गम साइबेरिया का घास का मैदान है ? काला सागर तथा कैस्पियन सागर से क्या यह आदिम वाणी यूरप, भारत और पश्चिमी चीन (चीनी तुर्किस्तान व तिब्बत) में तलवार की ताकत पर फैली अथवा टर्की के अनातोलिया से खेतीबाड़ी - हल बैलों की जोड़ी के वाणी के आदान प्रदान से ? टर्की का अनातोलिया इलाके को एसिया माइनर नाम से भी पुकारा जाता रहा है। निकोलस वाड ने वाणी के आगाज पर - आदिम भारोपी वाणी के आधारभूत सिद्धांत की व्याख्या करने का उपक्रम किया। आदिम वाणी सिद्धांतानुसार भारोपी बोलने वाले लगभग 6500 वर्ष पहले साइबेरियाई घास मैदानों में बसते थे पशु पाल थे। दूसरा सिद्धांत एसिया माइनर अनातोलिया के किसानों के हल बैल जोड़ी से निकली वाणी विलास की बात करता है। 
          इन सबसे अलग भारत में कश्यप संभवतः कश्यप ऋषि का आश्रम कैस्पियन सागर के आसपास था उनकी तीन प्रमुख पत्नियों में दक्ष प्रजापति की कन्यायें - दिति, अदिति और दनु थीं। दिति के जुड़वां बेटे हिण्यकश्यप व हिरण्याक्ष तथा अदिति के संतानों में बारह आदित्य थे जिनमें एक शक्र था। इन्द्र आदित्यों अथवा देवताओं के राजा थे। अदिति के पुत्रों में बटुक वामन व विश्वकर्मा भी हुआ करते थे। दनु के पुत्रों में शुंभ निशुंभ मय तथा अन्य अनेक बलवान तथा प्रतिभा संपन्न दानव थे। 
जो अहम सवाल निकोलस वाड ने विभिन्न वाणियों को बोलने वाले लोगों के संज्ञान में अंग्रेजी भाषा की भाषायी संकर स्थिति का जो खाका प्रस्तुत किया है हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानी सरकार की राजधर्म पुस्तक भारतीय संविधान में जिन 22 हिन्दुस्तानी भाषाओं का जिक्र भाषायी अनुसूची में किया है वह भारत के भाषायी स्वराज की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। नागरी लिपि अपनाने वाली भारतीय भाषाओं में संस्कृत सिन्धी नैपाली हिन्दी मराठी के अलावा डोंगरी मैथिली बोडो संथाली व कोंकणी की लिपि नागरी है। कश्मीरी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती कन्नड़ मलयाली तमिल तेलुगु उड़िया बांग्ला असमिया व मणिपुरी भाषाओं की अपनी अपनी लिपियां हैं पर उर्दू को छोड़ सभी के स्वर व्यंजन 51 उच्चारण हैं। इन भारतीय भाषाओं की लिपियां ध्वनि उच्चारण की दृष्टि से पूर्णतः ध्वनि विज्ञान आधारित हैं। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जी ने नटराज की कांस्य प्रतिमा जो तांडव नृत्य का प्रतीक है जिसे तमिलनाडु के मूर्तिकार ने ईसा से अढ़ाई हजार वर्ष पहले निर्मित किया। यह प्रतिमा खो गयी थी। इसे आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को सौंप कर - नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नव पंचवारम् को ताजा कर हिन्दुस्तान की भाषायी आजादी का मार्ग प्रशस्त किया है। जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार तांडव नृत्य व भाषा वाणी उत्पन्न होने की घटना के बारे में भारतीय वाणी इनक्वायरी कमीशन का गठन कर भारत की सभी वाणियों को महत्व देने की तात्कालिक निर्णय लें। वाणियों के फैलाव के बारे में आदिम-पशुपाल भाषा या वाणी का तमगा लगाते हैं। उसे PROTO INDIAN EUROPIAN  याने साइबेरिया के पशुपालों द्वारा सहेजी वाणी माना है। दूसरी ओर एसिया माइनर के तुर्किस्तान के अनातोलिया वाले खेतिहर वाणी को विभिन्न विचार पोखर वाणी उद्भव मानते हैं। निकोलस वाड ने इन दोनों भाषायी सिद्धांत निर्धारण कर्ताओं के विरोधी मत का भी उल्लेख अपने महत्वपूर्ण स्तंभ अंग्रेजी के मकड़जाल की उलझन भरी शब्दभेदिता को उजागर किया है। साइबेरियायी पशुपाल वाणी अथवा अनातोलिया के खेतिहरों द्वारा बोली जाने वाली वाणी का हिन्दुुस्तान की वाणियों से जोड़ना - भारत वाणी वाङमय में संस्कृत व्याकरण सम्मत निघंटु वैदिक संस्कृत अथवा पाणिनीय अष्टाध्यायी व्याकरण सम्मत लौकिक संस्कृत तथा व्याकरण हीन प्राकृत, संस्कृत प्राकृत, पालि, तथा आधुनिक भारतीय तद्भव भाषायें - विश्व भाषा वाणी सूची में क्रमशः मंदारिन, रूसी, अंग्रेजी हिन्दी (उर्दू व हिन्दुस्तानी सहित) स्पेनी अरबी, पुर्तगाली, पंजाबी बाङला, जापानी जर्मन बू (संघातीय) मराठी, तैलुगू, वियतनामी, फ्रेंच कोरियन, तमिल, तुर्क, पश्तो इतालवी, मिन नान, गुजराती पोलिश फारसी मलयालम कन्नड़ मराठी सूडानी वर्मा उड़िया, रोमानियन, डच सिन्धी उजबेकी, अजरबेजानी, असमी आदि हजारों बोलियां विश्व में बोली जाती हैं। मुख्य वाणियां जिनके बोलने वाले एक लाख से ज्यादा हों ऐसी सात हजार भाषायें अभी विद्यमान हैं। वर्ष 2050 तक इनमें अधिकांश के लुप्त होने की आशंका है। 
          तलवार के प्रहार से वाणी प्रसार केन्द्रों के रूप ने कश्यप सागर (कैस्पियन सी) पश्चिमी चीन (याने चीनी तुर्किस्तान व तिब्बत) भारत तथा यूरप में हिंस्रक तरीकों से भाषा-वाणी प्रवाह की कल्पना की गयी है। कश्यप ऋषि के संतानों में आदित्यादि देव हिरण्यकश्यपादि दैत्य तथा शुंभ निशुंभ नकुचि मय आदि दानवों में हिंसा विहार की स्थिति भारतीय पौराणेतिहास भी स्वीकार करता है परंतु वाणी विलास युद्ध से नहीं संभाषण व संवादजन्य माना गया है। दूसरी ओर अनातोलिया - तुर्की चिंतन बैलों की जोड़ी और हल के जरिये अनाज उत्पादन द्वारा वाणी विलास का चिंतन पोखर वाणी यात्रा पथ प्रदर्शित करता है। निकोलस वाड कोलिन रेनक्रू पुरातत्व विद चिंतन पोखर वाणी विस्तार कृषि आधारित मानते हैं। भारोपी वाणी वृक्ष को यूरप के विद्वानों के नजरिये से देखना समझना भाषा या वाणी प्रसार हिंसा के जरिये सेे किये जाने तथा विलोम विचार मंथन की एकांगी प्रतीत होते हैं। इसाइयत और इस्लाम की जागतिक बढ़त के पीछे तलवार की ताकत ने बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया इसलिये यूरप के विद्वानों वाणी-विलास वाली स्थिति को संवाद के नजरिये से नहीं देखा गया है। भारोपी भाषायी वृक्ष के बारे सोचते समय पश्चिम के विद्वानों ने भारत के युद्ध काल वह रामायण काल का राम रावण युद्ध हो या महाभारत काल का कुरूक्षेत्र में लड़ा गया महाभारत युद्ध के मैदान में केवल योद्धागण युद्ध के मैदान में युद्ध सूर्योदय - सूर्यास्त के मध्य हुआ रात्रिकाल में दोनों पक्षों के योद्धा खिलाड़ियों की तरह योद्धा के युद्ध की प्रशंसा अथवा योद्धा की कमजोरियों पर विमर्श करते थे। इसीलिये भारत में युद्ध को धर्मयुद्ध अथवा मर्यादाओं का पालन का मार्ग माना गया है। महाभारत का युद्ध कुरूक्षेत्र में लड़ा जारहा था पर नैमिषारण्य में लाखों व्यक्ति धर्म संवाद कर रहे थे। 
          भारतीय मान्यता कोरी धर्मान्धता अथवा रहस्यवाद नहीं जिसमें ताण्डव नृत्य के पश्चात महादेव के डमरू से जो ध्वनियां निकलीं वे ही वाणी का मौलिक स्त्रोत है। ध्वनि शब्द वायुमंडल की देन है। नभोमंडल जिसे आकाश खं वायुमंडल तथा आकाश बादलों से ऊपर अंतरिक्ष-नक्षत्र मंडल या तारा मंडल एवं समूचा ब्रह्माण्ड ध्वन्यालोकमय है तथा अपने अपने कर्तव्य पथ का अनुसरण करता है। जब जब कर्तव्य व स्वधर्म के प्रति व्यतिक्रम अथवा व्यवधान उपस्थित होता है यदा कदा प्राकृतिक आपदा व विपदा भी आजाती है उनका सामना करने के लिये जीवधारी को धैर्य मार्ग अपनाना आवश्यक होता है। धैर्य व स्वधर्म ही मनुष्य की आंतरिक शक्ति है। शरीर से बाहर जो तत्व है यदि व्यक्ति विवाहित है उसकी शक्ति दाता उसकी विलोम लिंगी पुरूष अथवा नारी होते हैं। शरीर से बाहर का मददगार भिन्न होेता है। वाणी ही इस सत्वबोध की कारक शक्ति है। महादेव नटराज के ताण्डव नृत्य नृत्यावसान के उपरांत जो नौ और पांच बार डमरू के बजने से ध्वनियां उत्पन्न हुईं वे ही वाणी विलास बनीं। इसलिये यूरोपीय और भारतीय दोनों वाणी बोध में मौलिक पार्थक्य है। हिन्दुस्तान सरीखे देश जिसके लोग - ‘अत्र पृथिव्यायाम् जंबू द्वीपे भरत खण्डे’ के पश्चात उत्तर भारत गंगा यमुना के मैदान वाले लोग आर्यावर्त का नाम लेते हैं। हिमालयी लोग हिमवत् पर्वत देशे, पंजाब के लोग पंचनद सारस्वत क्षेत्र, कश्मीर के लोग कश्मीर मण्डले, सिन्धु के लोग सिन्धु देशे, सौराष्ट्र के लोग सौवीर भृगुकच्छे, महाराष्ट्र के लोग सह्याद्रे महाराष्ट्र देशे तथा सप्त गोदावरी देशे, विदर्भ के लोग विदर्भ खण्डे, कोंकण के लोग कोंकण क्षेत्रे, कर्णाटक उत्तर के लोग गोकर्ण देशे, दक्षिण कर्णाटक के लोग कावेरी क्षेत्रे, त्रिगर्ते, भिवांकुर क्षेत्रे, केरलाख्ये रामसेतु क्षेत्रे, कांची क्षेत्रे, सप्तशैले गोदावरी क्षेत्रेे, अंध्र के कलिंग देशे, नवद्वीप अंगबंग मिथिला देशे, मगध क्षेत्रे, प्राग् ज्योतिष पुरे कामाख्या क्षेत्रे, आदि का उद्घोष किया जाता रहा है। भारत की वाणियों को सटीक रूप में समझने के लिये वैदिक व्याकरण निघंटु, वेद गणित अभ्यास की आवश्यकता है। वैदिक संस्कृत के पश्चात लौकिक संस्कृत का स्थान आता है जिसका मूलाधार पाणिनी की अष्टाध्यायी है। यहां वाणी के दो रूप हैं संस्कृत और प्राकृत। व्याकरण सम्मत वाणी संस्कृत कहलाती है और व्याकरण रहित वाणी प्राकृत है इसलिये भारतीय वाणी में संस्कृत प्राकृत, पालि और आधुनिक भारतीय तद्भव भाषाओं असमी सहित 22 भारतीय वाणियां जिन्हें भारतीय संविधान की भाषा अनुसूची में लोकभाषा प्रतिष्ठा प्राप्त है। साइबेरिया के वृक्ष रहित घास के मैदान और चरवाहों द्वारा पशुपालक जनित वाणी विलास जिसे भारतीय परिवेश में हम अहीर, ग्वाला, धनगर, पशुपाल आदि संज्ञायें देते हैं। भारोपीय भाषा वृक्ष चिंतन पोखर की वाणी निर्णायकता पुरातात्विक (आर्कोलाजिकल) तथा जीवाश्म प्रतीक (बायोलाजिकल डी.एन.ए.) आधुनिक परीक्षण भारोपीय वाणियों के स्त्रोत 1. हिंस्रक साइबेरियायी पशुपाल सवंर्धित वाणी 2. अनातोलिया वाली एसिया माइनर की हल बैल जोड़ी वाली खेतीबाड़ी से उपजा वाणी विस्तार इन दोनों पक्षों को अनुकूलता प्रतिकूलता विवेचनकर्ताओं को उपलब्ध हुई है उसमें डी.एन.ए. व पुरातात्विक वास्तुकारिता का सम्मान साइबेरियायी वाणी के हिंस्र विस्तार के पक्ष में अधिक झुका है। यूरप के मनीषी विद्वान वाणी विलास के क्षेत्र में भारत को जबर्दस्ती खींच रहे हैं जबकि भारत की वाणी विशेषता ध्वन्यालोक मूलक है। पशुपाल, भेड़पाल, हिंस्र संक्रमण अथवा एसिया माइनर की खेतीबाड़ी से वाणी विस्तार का कोई सीधा संबंध नहीं है इसलिये इसे अब भारत की ओर अपनी वाणी विलास दृष्टि को बढ़ा रहे हैं। 
भाषा विज्ञानी सुनीति कुमार चाटुर्ज्या - हेम चंद्र जोशी का वाणी अभिमत
अंग्रेजी भाषा के WATER शब्द के बारे में निकोलस वाड का कहना है कि जर्मन भाषा में WASSES शब्द स्वीडिश भाषा में VATTEN तथा ग्रीक भाषा में NERO कहा जाता है। भारतीय वाङमय में अंग्रेजी के WATER शब्द के अनेकों पर्यायवाची शब्द हैं जैसे - जल, उदक, सलिल, पानी, नीर, तोय, वारि, पावस, अंबु, अप आदि। जर्मन भाषा में जल को WASSES तथा स्वीडिश भाषा में NERO उद्धृत किया गया है। नीरो संस्कृत शब्द नीर का पर्याय है। श्री रेन्क के मत में इस बात की महती संभावना है कि साइबेरिया के घास मैदानों के प्रव्रजन के अपेक्षा वे मानते हैं कि अनातोलिया एसिया माइनर के हल बैल जोड़ी ने भारोपा वाणी वृक्ष को खड़े रहने में ज्यादा शक्ति दी है। अब हम हिन्दुस्तान के शब्द विज्ञानियों भाषा विज्ञानियों तथा वाणी विश्लेषण कर्ता समूह की तरफ बढ़ते हैं। डाक्टर सुनीति कुमार चाटुर्ज्या, हेम चंद्र जोशी भाषा विज्ञानियों ने भारत से शब्द यात्रा पथ का निर्धारण करते हुए भारत में प्रयुक्त मातृ, पितृ, भ्रातृ, स्वसा, दुहिता, शब्दों को पश्चिमी यात्रा पथ के आखिरी पड़ाव इंग्लैंड की वाणी अंग्रेजी में MOTHER, FATHER,BROTHER,SISTER,DAUGHTER  का शब्द बल आंका। पुरानी रूसी भाषा साइबेरिया के घास के मैदान के डंगर पाल भाषा ऋषि भाषा तथा देश रूस ऋषि देश कहलाता है और जर्मनी का संस्कृत पर्याय शर्मणी व जर्मन भाषा के संस्कृत नाम शर्मन हैं। पुरानी रूसी व जर्मनी भाषा में शत प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। जरूरत इस बात की है कि पुरानी रूसी व संस्कृत भाषा का जर्मन भाषा सहित त्रिभाषी कोश तैयार हो। चूंकि ज्यादातर भारतवासी जर्मन व रूसी भाषा पढ़ते नहीं इसलिये अंतर्राष्ट्ररीय भाषायी सौहार्द के लिये अंग्रेजी, पुरानी जर्मन, पुरानी रूसी तथा संस्कृत, प्राकृत व हिन्दी पंचभाषी विश्वकोश तैयार हो। चांसलर अंगेला मर्केल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ध्यानाकर्षण किया। वैदेशिक भाषायी सामंजस्य के लिये भी भारत सरकार की पहली भाषायी वैदेशिक नीति निर्धारण के लिये अंग्रेजी, पुरानी जर्मन, पुरानी रूसी तथा संस्कृत, प्राकृत, पालि व हिन्दी इन सात भाषाओं के शब्द पर्याय सुनिश्चित कर भारतीय भाषायी कूटनीतिक वाणी विलास का मार्ग प्रशस्त करना चाहिये। अंग्रेजी भाषा के वर्तमान शब्द सौष्ठव ने केवल संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का नहीं अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करने वाले प्रत्येक राष्ट्र राज्य व उसके राष्ट्र जनों के सामने भाषायी उलझन का बहुत बड़ा संशयाग्रस्त भाषायी वाणी वर्ण संकरता का रोड़ा खड़ा किया है। भारत की सरकार को, भारत के लोगों को वाणी संकरता से मुक्ति पाने के लिये जितनी जल्दी अंग्रेजी व 22 भारतीय भाषाओं में पारम्परिक पत्र व्यवहार शुरू हो सके उतना ही अच्छा है। भाषायी वाणी वर्ण संकरता से हिन्दुस्तान तभी उबर सकता है जब भारतीय गणराज्य के घटक राज्य केन्द्र के साथ अपनी अपनी राजभाषा में पत्र व्यवहार करें। भारत में आज जो अंग्रेजी लिखी व बोली जारही है वह विलायती किंग्स इंग्लिश या क्वीन्स इंग्लिश नहीं है यह तो हिंग्लिश, गुजलिश, तमिलिश, कन्नड़िश, मलयालिश, तैलुगुइश, उड़ियाइश, बंगलिश, असमिश, पंजाबिश, मइतिश, संकर अंग्रेजी वाणियां हैं। वाणी की संकरता मानव को अशिष्ट और आततायी बनाने में ही योगदान करती है। निकोलस वाड ने जो चेतावनी अमरीकी अंग्रेजी भाषियों को दी है भाषायी वर्ण संकरता से उबरने का जो आह्वान किया है वह अंग्रेजीदां भारतीयों के लिये भी प्रेरक प्रसंग है। वाणी की उलझन से मुक्ति पाने के लिये वाणी को लोकहित से जोड़ो। 
          संसार में धर्म, मजहब या रिलीजन तथा वाणी मनुष्य मात्र को सत्-असत्, सदाचार, दुराचार, कायिक, वाचिक, मानसिक आनंद अथवा विलोम स्थिति कष्ट, सुख दुःख, जय पराजय, लाभ हानि सभी प्रकार के मन संतोष व मन संताप के कारक तत्व हैं। विज्ञान ने आज विश्व को एकाकार कर दिया है। वैश्विक आचार विचार व्यवहार सूचना तकनीक के कारण सर्वजन सुलभ होगये हैं। विश्व धर्म संसद समय समय पर मजहबों के बीच व्यावहारिक क्रियात्मक सेतु का निर्माण किया करती है। शिकागो की धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने भारत धर्म जिसे भारतेतर दुनियां हिन्दू धर्म नाम से पुकारती है स्वामी जी ने इस्लाम, इसाइयत, यहूदी, ताओ, बौद्ध धर्म सहित वे मनुष्य जो धर्म की चहारदिवारी में स्वयं को बांध कर नहीं रखते अपने आपको वे मजहब अथवा नानरिलीजियस तबके में गिनते हैं। उनकी श्वास प्रक्रिया को भी स्वामी विवेकानंद ने ईश्वर प्रदत्त प्रमाणित किया। 
आहार निद्रा भय मैथुनंच सामान्य मेतद् पशुभिर्नराणाम्। 
धर्मोहि तेषो अधिको विशेषो धर्मेण हीनः पशुभिः समानाः।। 
          मनुष्य की धर्मेतर दूसरी विशेषता वाणी है। इस विश्व में कितनी वाणियां हैं, कितनी सरस्वती लोक लोक में हैं उन्हें संवारने की जरूरत है। दुनियां में एक मजहब रिलीजन भिन्न प्रकृतिः हि लोकः के कारण अव्यावहारिक है। ख्रिस्ती व इस्लाम धर्म में भी उपधर्म शाखायें हैं इसलिये धर्म के क्षेत्र में सभी धर्मों धर्म शाखाओं को समान सम्मान देने की जरूरत है। संत विनोबा का कहना ‘श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिंदा अन्यत्र क्वापि हि’ सर्व धर्म समादर का सिद्धांत है। वाणी भी धर्म की संगिनी है इसलिये संसार की सभी वाणियों का सम्मान आज का युग धर्म है। तात्कालिक जरूरत यह है कि धर्म संसद के समानांतर विश्व वाणी संसद का तुरंत आयोजन किया जाये। हिन्दुस्तान के संदर्भ में विश्व वाणी संसद का पहला सत्र भारत में हो जहां वाणी के प्रस्फुटन का उद्घोष नटराज के डमरू से नौ और पांच बार वाणी का उच्चार हुआ। विश्व वाणी संसद आज दुनियां की भाषायी अराजकता को भगाने के लिये मानवीय आवश्यकता है। न्यूयार्क टाइम्स ने अंग्रेजी के भाषायी उलझन से निबटने का रास्ता दिखाया है।
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