मोबाइल सेवाओं की फुर्ती और सन्देश माध्यम फेसबुक
इकानामिस्ट सर्वश्रेष्ठ वैश्विक गाथायें और उनका विश्लेषण पूर्ण विवेचन करने वाली साप्ताहिकी है। उसके अनाम अधिष्ठाता ने लिखा कि संदेश ही माध्यम है। संदेश भेजने वाली सेवायें द्रुत गति से बढ़ती जारही हैं। जिसे कम्प्यूटर संसार ‘आनलाइन चैटिंग’ कहता है उस पर हिन्दुस्तानी नजरिये से विचार करने की तात्कालिक जरूरत है। प्रिय प्रवास काव्य रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने अपने काव्य में कहा - हे विश्वात्मा भरत मुनि के अंक में और होवें किन्तु ऐसी विरह व्यापी और घटना न होवे। संस्कृत कवि कालिदास ने मेघदूत काव्य में कुबेरधानी का एक नाम अलकापुरी का उल्लेख किया है। कुबेर मूलतः श्रीलंका के नरेश थे जिन्हें उनके सौतेले भाई रावण ने युद्ध कर पराजित किया एवं स्वयं लंकेश बन राज करना शुरू कर दिया। लंका से विस्थापित कुबेर हिमालय में कौशिकी शाल्मली मध्ये पुण्य काषाय पर्वत के समीपवर्ती अलकापुरी में रह कर कुबेरधानी का संचालन करने लग गये। निधिपति कुबेर अपने विश्वस्त अमात्य से असंतुष्ट क्या हुए उन्होंने यक्ष को देश निकाला ही दे डाला। हिमालय से उतर कर यक्ष विन्ध्य के पाश्ववर्ती पहाड़ों में रहने लगा। उसकी विरहिणी यक्षिणी अलकापुरी में ही रही जहां वह वर्तमान में जाखनदेवी कही जाने वाली जगह पर रह कर ही अपने पति के आगमन की बाट जोहती रही। अलकापुरी को आजकल अल्मोड़ा व कुमइयां भाषा में अल्माड़ कहा जाता है। जिस जाखनदेवी नामक जगह पर यक्षिणी रहती थी वर्तमान में अब वहां पर मंदिर बन चुका है तथा वह महात्मा गांधी मार्ग या माल रोड वाली सड़क पर बस स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर मोटर मार्ग के किनारे पर ही स्थित है। इसी जाखनदेवी मंदिर से लगभग 200 मीटर पूर्व की ओर अल्मोड़ा कालेज में संस्कृत अध्यापक पंडित मथुरा दत्त रहते थे। उन्हें सम्पूर्ण संस्कृत विद्या कंठाग्र थी। अपने विद्यार्थियों को जब वे कुमार संभव पढ़ाते थे तो वे कहा करते थे - शर्म आंखों में रहती है इसलिये यदि तुम्हें शर्म लगती हो तो या तो नेत्र झुका लिया करो या बंद कर लिया करो। वे स्वयं भी कुमार संभव पढ़ाते समय आंखें बंद किये रहते थे। वे कहते थे कि जब कालिदास ने कुमार संभव में शंकर पार्वती की रति क्रीड़ा का वर्णन किया तो जगन्माता पार्वती कालिदास से रूष्ट होगयी। उन्होंने अपना रोष देवाधिदेव महादेव से व्यक्त किया तो महादेव ने उन्हें समझाया कि उसने तो मात्र सत्य का वर्णन ही अपने काव्य में किया है। महादेव की दृष्टि में कालिदास श्राप दिये जाने के पात्र नहीं थे। पार्वती जी अपनी निजता जिसे वर्तमान की पाश्चात्य सभ्यता प्राइवेसी कहती है, सार्वजनिक किये जाने पर कालिदास से अत्यंत कुपित थीं। उसने उनकी निजता पर एक प्रकार से आक्रमण ही कर दिया था इसलिये वे उसे दण्डित करना चाहती थीं अतएव उन्होंने उसे श्राप दे डाला कि उसे कुष्ठ हो जाय। पार्वती के श्राप से कालिदास कुष्ठ रोग से ग्रसित होगये। कालिदास ने महादेव से प्रार्थना की कि वे माता पार्वती को मना कर उन्हें श्राप मुक्त करा दें। महादेव की करूणा का सम्मान करते हुए माता पार्वती ने महादेव का आग्रह मान लिया कि यदि कालिदास रामकथा कहें रामगाथा गाये तो अवश्य ही रोग मुक्त हो सकते हैं। सगुण राम भक्ति, कृष्ण भक्ति तथा निर्गुण राम भक्ति जिसका सहारा कबीर ने लिया था वह भी ‘रामानंदी’ वैष्णव भक्ति है। यह वैष्णव भक्ति प्रह्लाद की नवधा भक्ति भी हो सकती है तथा गुजराती भक्त कवि नरसी मेहता की दशधा भक्ति भी। वैष्णव भक्ति का एक अनोखा स्वरूप और भी है वह है परमात्मा की वैर भक्ति का। चेदिराज शिशुपाल में यह वैर भक्ति विद्यमान थी। सदाचार के प्रवक्ता देवर्षि नारद का मानना है कि -
यथा वैरानुबन्धेन मतीस्तन् सात्मताम् नीतौ पुनः हर्रेपार्श्व जन्मतुः विष्णु पार्श्वमे।
भारतीय सदाचार वाङमय की मान्यता है कि तीव्र वैरानुबंध भी भक्ति का एक ईश्वरावलंबन है। देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर की शंका का समाधान करते हुए कहा था - वैर भाव से भी परमात्मा की स्मृति परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग है। जब राजसूय यज्ञ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने चक्र सुदर्शन से चेदिराज शिशुपाल को मार डाला तो चेदिराज शिशुपाल के शरीर से दिव्य ज्योति निकल कर श्रीकृष्ण में समा गयी। ख्रिस्ती धर्म व इस्लाम धर्म में ईश निन्दा करना वर्जित है बल्कि इस्लाम धर्म में तो ईश निन्दा करने पर प्राण भी हरण हो जाते हैं। सनातन धर्मी ईश निन्दा को भी भक्ति की एक विधा मानते हैं। ख्रिस्ती धर्मावलंबी भी ईश निन्दा से उत्तेजित हो जाते हैं पर उनका मजहबी संयम इस्लाम धर्मावलंबियों से धार्मिक उग्रता के नजरिये से अर्ध सौम्य है। मजहबी असहिष्णुता के कारण आततायी अथवा मजहबी हिंसा को भी जन्म देता है।
सन्देश देने का एक तरीका हिन्दुस्तानी भी है जिसे कालिदास के मेघदूत महाकाव्य ने उजागर किया है। यह संदेश वाहक बादल रहे हैं। देश निकाला भोग रहे यक्ष की विरहिणी याक्षायणी जिसे तद्भव भारतीय भाषाओं में से एक कुमांऊँनी में जाखन देवी कहा जाता है, अपने पति का संदेशा बादलों के माध्यम से प्राप्त करती है। भारत के घटक राज्य छत्तीसगढ़ में रामगिरि नामक पर्वत में खरोष्ट्री लिपि और संस्कृत-प्राकृत मिश्रित भाषा में यक्ष द्वारा बादल के माध्यम से प्रेषित संदेश प्रस्तर शिला में अंकित हैं। कालिदास रचित महाकाव्य मेघूदत में वर्णित सन्देश तथा सन्देश संबंधी शिलालेख अध्ययन और अनुसंधान के बिन्दु हैं। इस ब्लाग को शुरू करते समय ब्लागर ने सूरदास की बालकृष्ण तथा हिन्दी के स्वातंत्र्य संघर्ष में रत भारतीय काव्यात्मकता ने श्रीकृष्ण की रासलीला जन्य संवादशीलता, गोपियों से, यज्ञ पत्नियों से, वृन्दावन के तिर्यक् योनियों वाले पशु-पक्षियों तथा स्थावर वृक्षों से जो अद्वितीय संवाद किशोर श्रीकृष्ण ने संपन्न किया, संवाद के उस माध्यम का मनोहारी वर्णन करते हुए कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने लिखा -
क्वचित् वनाशाय मनोदधम् ब्रजात् प्रातः समुत्थाय वदस्यवत्स्यान।
प्रबोधमन् श्रंगरवेण चारूयाः विनिर्गतो वत्सपुरः सरो हरिः।।
तेनेव साकम् पृथुका सहावसः स्निग्धाः सुशिग्वेन विस्त्राण वेणवः।
स्वानु स्वानु सहस्त्रे परिसंख्या यान्वितान् वत्सान् पुराकृत्य विनियुर्मुदा।।
यही है बादरायण वेदव्यास का किशोर काल, उनके समवयस्क ग्वाल बाल, गोपिकायें, पशु पक्षी तथा स्थावर पेड़ पौधों से सजीव संवाद एवं उन्हें संदेश के माध्यम से एक नयी ऊर्जा को उपलब्ध कराना। बादरायण वेदव्यास अपने अवधूत पुत्र शुकदेव से कहलाते हैं -
अहोतिरम्यम् पुलिनम् वयस्याः स्वकेलिसंयन् मृदुलाच्छ बालुकम््।
स्फुट सरोगंध हूतानि पत्रिक् ध्वनि प्रति ध्वान लास्य् द्र्रुमाकुलम्।
अत्र भोक्तव्यम् अस्माभिर्दिना रूढ़ क्षुधार्दिता, वत्सा समीपेऽयः पीत्वा चरन्तु शनकै स्तृणम्।
उपरोक्त संदेश समवयस्क किशोर समूह को श्रीकृष्ण ने दिया साथ ही गायों के बछड़ों सहित यमुना तट वृन्दावन की बालू कणों में रम कर यमुना का जलपान बछड़ों ने भी किया। बछड़ों की देखा देखी गोप कुमार भी जलक्रीडा करने लगे व गोपिका गीत गाने लगीं। यमुना तट में यज्ञ याग हवन करने वाले ब्राह्मण समाज की विप्र पत्नियां थीं। वे भी कृष्णभक्ति रस में डूबी थीं। पत्नी शाला में मधुर सुस्वादु भोजन बना रही थीं। श्रीकृष्ण ने किशोर समवयस्क ग्वालबाल समूह से कहा - जाओ और यज्ञपत्नियों से सुस्वादु भोजन दधि ओदन दही च्यूड़ा खीर और दूसरे सरस भोजन मांग लाओ। कहना श्रीकृष्ण को भूख लगी है। यज्ञ पत्नियों को उनके पति, भ्राता, पुत्र आदि ने मना किया कि इन ग्वालबालों को भोजन मत दो पर उन्होंने अपने पुरूष वर्ग की बात नकार दी और ग्वालबालों को भरपेट भोजन दिया साथ ही श्रीकृष्ण को दही च्यूड़ा व खीर भी खिलायी। हवन, यज्ञ तथा जप तप करने वाले ब्राह्मणों को जब पता चला कि उनका नारी समाज श्रीकृष्णानुरक्त है तो उन्हें अपने अज्ञान पर, श्रीकृष्ण के संदेश को न समझ पाने के कारण अत्यंत ग्लानि हुई। वे अज्ञान के अवसाद से घिर गये जब कि यज्ञ पत्नियां योगेश्वर श्रीकृष्ण से प्राप्त संदेश से आह्लादित हुईं और उन्हें सहज ही पारब्रह्म परमेश्वर का साक्षात्कार होगया।
चार्वाक नामक आचार्य इस सिद्धांत के मानने वाले थे कि ‘खाओ पियो और बम बजाओ’। उनका आदर्श वाक्य ‘यावत् जीवेत् सुखम् जीवेत् ऋणम् कृत्वा घृतम् पिवेत्’। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार वशिष्ठ ब्रह्मर्षि थे। तत्कालीन समाज में वशिष्ठ एक सुस्थापित आचार्य थे। उनके मुकाबले विश्वामित्र राजर्षि थे पर अपनी योग तपस्या साधना से ब्रह्मर्षि पद के दावेदार भी थे, उनमें और वशिष्ठ में पारस्परिक अनबन के अलावा मानवत्व के समानांतर तिर्यक् पक्षि युद्ध भी हुआ था वर्षों तक एक दूसरे के विरोध में रहने वाले वशिष्ठ विश्वामित्र वैमनस्य ने वशिष्ठ के सौ पुत्र विश्वामित्र द्वारा मारे गये। उनके ज्येष्ठ पुत्र शक्ति को जब विश्वामित्र ने मार डाला शक्ति का पौत्र पराशर केवल पांच वर्ष का बालक था वशिष्ठ ने तय किया कि वे ही अपने पुत्र शक्ति का मृत्युजन्य कार्यक्रम स्वयं संपन्न करेंगे। उन्होंने शक्ति के त्रयोदशाह में विश्वामित्र और चार्वाक को भी आमंत्रित किया। विश्वामित्र अचंभे में थे सोचते थे कि उन्होंने वशिष्ठ के साथ बहुत बड़ा अशालीन दुर्व्यवहार किया है फिर भी वशिष्ठ उन्हें न्यौत रहे हैं। चार्वाक लगभग निरीश्वरवादी थे अतः श्राद्ध पर भी यकीन नहीं करते थे। जब वशिष्ठ का न्यौता मिला तो उन्होंने कहा - जिस तरह बुझे हुए दीपक के तेल का उपयोग बाती नहीं कर सकती मरे हुए व्यक्ति को श्राद्ध भोग कैसे हो सकता है। वशिष्ठ ने जवाब दिया - मृत व्यक्ति तो निमित्त मात्र है भोजन तो मुझे और आपको करना है। चार्वाक ने निमंत्रण स्वीकार कर वशिष्ठ पुत्र शक्ति के श्राद्ध का भोज आनंद लिया। विश्वामित्र का आश्चर्य यह था कि इतनी कटुता होने के बावजूद वशिष्ठ उन्हें न्यौत रहे हैं उन्होंने वशिष्ठ का ही काम तमाम करने का मन बनाया और वशिष्ठ को मारने पहुंचे। वशिष्ठ अरून्धती से कह रहे थे विश्वामित्र ब्रह्मर्षि तो हैं ही पर क्रोधी हैं। यह बात विश्वामित्र ने सुन ली और वशिष्ठ के पास जाकर प्रायश्चित्त किया। वशिष्ठ ने उद्घोष किया कि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हैं।
दूत प्रकरण का एक विस्मय कारी उदाहरण मार्कण्डेय पुराण में मिलता हैै। मार्कण्डेय पुराण का अत्यंत महत्वपूर्ण अंश देवी माहात्म्य है। पार्वती की ससुराल कैलास में थी। पार्वती का मायका (पितृगेह राजा हिमवान की हिमधानी बैजनाथ में थी उसे कार्तिकेयपुर अथवा कत्यूर कहा जाता था) वर्तमान गरूड़-बैजनाथ था। पार्वती ससुराल से जब मायके आती थी बीच में कश्यप-दनु संतानों की दानवधानी शुम्भगढ़ थी। यह स्थान सरयू तट था। पार्वती को कैलास से आते, अपने मायके पहुंचने के लिये दानवपुरी होकर ही आना पड़ता था। पार्वती के सौंदर्य को देख कर दानव नरेश शुंभ ने अपना दूत भेज कर पार्वती से ब्याह रचाने का उपक्रम संकल्पित किया। दूत पार्वती के पास पहुंच कर पार्वती से बोला - मैं दानव नरेश शुंभ का दूत हूँ। दानव नरेश चाहते हैं कि आप उनसे विवाह कर लें या उनके भाई से ब्याह रचा लो। दूत की बात को सुन कर पार्वती ने दूत से कहा - मुझे ज्ञात है कि शुंभ व निशुंभ प्रतापी दानव नरेश हैं पर क्या करूँ मैं बचपन में अनजाने में ही एक प्रतिज्ञा कर बैठी हूँ कि मैं उसी से ब्याह करूँगी जो मुझसे बलवान हो, मुझे युद्ध में हरा सके। मेरे दर्प को नष्ट कर सके। तुम जाकर मेरी यह प्रतिज्ञा अपने नरेश को बता दो। मार्कण्डेय कहते हैं - यो माम् जयति संग्रामे, यो मे दर्पम् व्यपोहति, यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति। पार्वती ने शुंभ-निशुंभ सहित रक्तबीज आदि सभी दानवों का वध कर मनुष्य समाज में दानवी शक्ति को सदा सर्वदा के लिये नष्ट कर डाला। पार्वती की इस शक्ति की आज के विश्व नारी समाज को अपेक्षा है ताकि नारी आज के विश्व में अपना माथा ऊँचा रख कर जी सके और नरपशु की तरह व्यवहार करने वाले मनुष्यों को सटीक सीख मिल सके। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’ का वातावरण मनुष्य समाज नर-नारी के बीच बन सके।
एक गरीब हिन्दुस्तानी प्रयाग में गंगा तट पर बारह वर्षीय कुंभ मेले के अवसर पर शरीर पर केवल एक गांधीनुमा घुटने तक की धोती पहले बालू में चलता जारहा था साथ ही जोर जोर से चिल्ला भी रहा था - टका धर्मः टका कर्मः टका सर्वस्य भूषणम्, टका श्रेयः टका प्रेयः यस्य हस्ते टका नास्ति स टका टकटकाये। गंगा तट में स्नानार्थी समाज उस अधनंगे फकीरनुमा व्यक्ति के घोष नाद को सुन रहा था। संस्कृत वाङमय में रूपये को टका कहते हैं। दुनियां में सातवें क्रम की बोलचाल वाणी बांग्ला में रूपये को टाका कहा जाता है। जिसे हाथ टाका नहीं है वह नजर की टकटकी लगाये टाका को देखता रहता है। यह टाका वाले लोगों और टाकाविहीन लोगों के बीच आर्थिकी दीवार है। टाका वालों को संदेश और टाका रहित लोगों को संदेश में भी टाका की टकाटकाहट घूम रही है। इस समय सूचना प्रौद्योगिकीजगत की आर्थिकी इकानामी में मुख्य केन्द्र बिन्दु केवल टका ही है। बनारस जिसे डाक्टर संपूर्णानंद ने वाराणसी नाम दिया जिसे हिन्दुस्तान का आम आदमी काशी कहता है यहीं अवढरदानी काशी-विश्वनाथ का वास है। कुछ शताब्दी पूर्व इस पुराने गांवनुमा शहर के जुलाहों के बीच कबीर नामक रामानंदी साधु रहता था जो जोगी नहीं था अपितु उसकी स्त्री व पुत्र भी थे। वह गृहस्थी ही था पर कहता जाता था - कबिरा खड़ा बाजार में लिये लुकाठी हाथ जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ। कबीर के बाजार में और आज के मार्केटनुमा चहलपहल वाले बाजार में एक नयी आवाज - मैसेज जिसे हम हिन्दुस्तानी संदेश कहते हैं वह तेजी से बढ़ रही है। कैलिफोर्निया के शहर सैनफ्रांसिस्को में मार्च महीने 2015 की पचीसवीं तारीख को एक अद्भुत ध्यान खिंचाऊ घटना में फेसबुक (हिन्दुस्तान के संदर्भ में यह ब्लागर फेसबुक नाम का भारतीयकरण नांदीमुख करने का पक्षधर है) के संदेश संप्रेषण को एक प्लेटफार्मनुमा - सेवा धर्मः परम गहनो बना डाला है। हिन्दुस्तानी संदर्भ में प्लेटफार्म को चौपाल कहना ज्यादा तर्कसंगत है। इस नांदीमुख संदेश ने एक ऐप भंडार संदेश खजाना खोज डाला है। इकानामिस्ट यूजर शब्द अपना रहा है हम योगकर्त्ता योक्ता कहें तो विवेकसंगत होगा। इकानामिस्ट के मुताबिक तीन अरब व्हाट्स ऐप के जरिये वार्तारत हैं जिसने अकेले सत्तर करोड़ योक्ता जुड़ा कर नांदीमुख फेसबुक के जरिये पिछले वर्ष 22 अरब डालर की राशि अर्जित करते हुए वितरित की। फजरी नाम की मार्केट रिसर्च के जरिये योक्ताओं में शत प्रतिशत बढ़ती हुई है। इकानामिस्ट का मानना है कि संदेश की भाषा सीधी सादी होनी चाहिये ताकि संदेशा पाने वाले व्यक्ति को भ्रम या संशयग्रस्तता ना व्यापे। इतना तो तय है कि संदेश देने वाले व पाने वाले व्यक्ति में क्या शब्द शक्ति का इतना व्यापक असर होगया कि संदेश दाता ने जो संदेश भेजा क्या संदेश प्राप्तकर्त्ता ने उसे उसी भावना से समझा। वाणी वैभव वक्ता जो कह रहा है क्या श्रोता उसे उसी भाव में अपना रहा है जो भाव वक्ता के मन पर असर किये हैं। यहां फिर ध्वन्यालोक की वह बात दोहरानी ही पड़ती है - भिन्न रूचिर्हि लोकः। ब्रह्माण्ड में विभिन्न व्यक्तियों की रूचियां एक सी नहीं अपितु अनेक हैं अलग अलग हैं। इसलिये संदेश दाता के संदेश को संदेश प्राप्तकर्त्ता किस रूप में लेता है यही बड़ा यक्ष प्रश्न है।
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