अक्षय तृतीया, क्षात्र धर्म और जामदग्न्य राम
अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया मंगलवार विक्रम संवत् 2072, 21 अप्रैल 2015
जामदग्न्य राम, जिन्हें पश्चिमी भारत के लोग परशुराम या फरसे वाले राम के नाम से जानते हैं उनका जन्म मेष के सूर्य में पहले भारतीय महीने वैशाख के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन जमदग्नि आश्रम में हुआ था जिसे आजकल लोग जमनिया रेलवे स्टेशन के नाम से जानते हैं। यह जगह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में गंगा बेसिन में है। संभवतः जब भगीरथ गंगा को धरती पर लाये जमदग्नि उससे पहले से विद्यमान थे। जमदग्नि के पिता ऋचीक माता सत्यवती तथा नाना राजा गाधि थे जिनकी राजधानी गाधिपुर आधुनिक गाजीपुर थी। राजा गाधि के पुत्र विश्वामित्र जमदग्नि के मामा थे। जमदग्नि सामवेद के मंत्रों को सस्वर गाने वाले सामवेदी ऋषि थे। उनकी पत्नी रेणुका क्षत्रियाणी थी। जमदग्नि से विवाह होने के पश्चात एक तपस्विनी ऋषि पत्नी का जीवनयापन करती थी। जमदग्नि के चार पुत्र थे जिनमें सबसे छोटे पुत्र का नाम राम था। संस्कृत वाङमय में राम की व्याख्या करते हुए कहा गया है - ‘येषाम् योगिनः रमन्ते सः रामः’। जमदग्नि पुत्र राम को लोग जामदग्न्य राम कहते थे। उनसे कई सहस्त्राब्दियों के पश्चात अयोध्या नरेश राजा दशरथ के घर में भी उनकी ज्येष्ठा रानी कौशल्या के गर्भ से राम नामक बालक जन्मा था, उस राम को भारतीय जनसामान्य दाशरथि राम कह कर पुकारते हैं। इन दोनों रामों के समानांतर कलियुग शुरू होने से 239 वर्ष पहले वसुदेव पुत्र बलराम का जन्म रोहिणी के गर्भ से हुआ, उन्हें लोग बलराम या वासुदेव राम के नाम से जानते हैं। इन तीनों रामों में जामदग्न्य राम सबसे पुराने हैं। उनकी जयंती को पश्चिमी भारत अक्खा तीज अथवा अक्षय तृतीया के उत्सव के रूप में मनाता है। फरसा वाले राम अविवाहित और ब्रह्मचारी जीवन जीते थे। दाशरथि राम राजकुमार थे उनका विवाह विदेह मिथिला नरेश राजा सीरध्वज जनक की कन्या सीता के साथ हुआ था। दाशरथि राम को लोग राजा राम के नाम से भी पुकारते थे। उनकी मान्यता थी कि दाशरथि राम ही वह तत्व हैं जिसमें योगी रमता है। सारा पश्चिमी भारत जिसमें महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, सिंध, पंचनद तथा हिमालय का जलधर खंड व कश्मीर खंड भी सम्मिलित है वहां के लोग अक्खा तीज में अपने बेटे-बेटी के हाथ पीले करना सौभाग्य समझते हैं। अक्षय तृतीया का त्यौहार सोने के आभूषण संग्रह का पर्व भी मानते हैं। फरसे वाले राम की जीवनी का उद्घोष भारतीय विद्या भवन के सृष्टा गुजराती साहित्यकार तथा प्रतिष्ठित अधिवक्ता कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी ने स्वरचित ग्रंथ - भगवान परशुराम में अद्वितीय साहित्यिक सृजन शक्ति तथा शब्द ‘खे’ का विवेचन किया है। भगवान परशुराम कुशिक वंशी राजा गाधि के दौहित्र तथा परमात्मा की सृष्टि में एक खासा नयापन लाने वाले ब्रह्मवेत्ता विश्वामित्र के भागिनेय पुत्र थे। सरस्वती प्रवाह क्षेत्र पंचनद सामंत पंचक क्षेत्र में जामदग्न्य राम ने तत्कालीन धरती को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन कर उनके रूधिर से पितृ तर्पण संपन्न किया था। विशाल मात्रा में क्षत्रिय हनन करने वाले जामदग्न्य राम को उनकी जयंती अक्षय तृतीया के अवसर पर अलौकिक सम्मान क्यों मिलता है ? क्षात्र धर्म क्या है ? क्षत्रिय कौन है ? कौन से ऐसे कारण थे जिनकी वजह से जामदग्न्य राम को पश्चिमी भारत को क्षत्रिय विहीन करना पड़ा था ? आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के पारंगत योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने अपने सखा, सुहृद और पैतृष्वसेय कौंतेय अर्जुन से कहा था - चातुर्वण्यम् मया सृष्टम् गुण कर्म विभागशः। महात्मा गांधी ने छाती फुला कर ऊर्ध्व बाहु होकर उद्घोष किया कि वे चातुवर्ण्य पर आस्था रखते हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह भी कहा - यद्यपि वर्णाश्रम मेरी रचना है पर मैं स्वयं उसमें लिप्त नहीं हूँ। गुण तथा कर्म विभाग करते हुए परमात्मा ने जो वर्णाश्रम व्यवस्था की, मनुष्यों के बीच में कालांतर में उस सोच में सड़ांध आगयी। संत विनोबा ने वर्णाश्रम भेद की सही व्याख्या करते हुए कार्मिक आर्थिकी का एलान किया। उन्होंने व्यवस्था दी कि एक आदमी कमाये उसके सहित सोलह व्यक्ति उसके परिश्रम उत्पादन का उपभोग करें। वर्णाश्रम व्यवस्था को सांगोपांग व्याख्यायित करते हुए विनोबा ने मानवता के सामने निरंतर कर्म करते रहने का दर्शन प्रस्तुत किया। विद्यार्थी पढ़े, अध्ययन करे व योग्यता अर्जित कर जब जिन्दगी के क्षेत्र में उतरता है उत्पादकता का कार्य विस्तार करे। साठ पैंसठ वर्ष की उम्र प्राप्त करने पर वानप्रस्थी बने और परिवार की जिम्मेदारी से उठ कर समाज की साझा जिम्मेदारी अंगीकृत करे। उम्र के आखिरी छोर पर त्याग का मार्ग अपना कर सन्यस्त जीवन जीये। जब तक जिन्दा है स्वस्थ रहे - जीवेम शरदः शतम् पश्येम शरदः शतम् श्रणुयाम शरदः शतम् प्रव्रजाम शरदः शतम्। जिन्दगी भर उसकी आंख कान वाणी तथा काया शरीर सामर्थ्य बनी रहे ताकि मरते दम तक दूसरे की सहायता याने शरीर संचरण में शरीर पराधीन न रहे। शारीरिक क्रियाओं में वह स्वसामर्थ्यवान हो यह कल्पना थी आरोग्य शरीर की। फरसा लेकर चलने वाले रेणुकेय जामदग्न्य राम का समूचा जीवन परोपकार पूर्ण है। अक्षय तृतीया का पर्व पश्चिमी भारत की समृद्धि का परिचायक है। स्वाभाविकतया यह सवाल उठता है कि जिस भगवान परशुराम की सामर्थ्य का लाभार्जन पश्चिमी भारत का जन जन अक्षय तृतीया के पर्व के तौर पर अनेक सहस्त्राब्दियों से अक्षुण्ण तरीके से मनाता आरहा है सरस्वती के प्रवाह व जलधारा के बावजूद वे ऐसी कौन सी हालात थे जिनके कारण भगवान परशुराम को क्षात्र धर्म के प्रति असहिष्णु होना पड़ा ? आधुनिक भारत और उसके लोकतंत्रात्मक सार्वभौम शासन व्यवस्था में आज के युग में क्षत्रिय कौन है ? क्षत्रिय व क्षात्र धर्म का ब्यौरा देते हुए योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण ने कौंतेय अर्जुन से कहा -
शौर्यम् तेजोधृतिर्दाक्षम् युद्धे चाप्यऽपलायनम्। दानमीश्वर भावश्च क्षात्र धर्म स्वभाववम्।।
क्षात्र धर्म क्या है ? शूरवीरता याने कायरता की तरफ न बढ़ना, शरीर के प्रभामंडल का तेज धैर्य दक्षता (दक्षता को आजकल लोग कौशल संवर्धन कहने लगे हैं) ये क्षात्र धर्मा व्यक्तित्त्व के मुख्य गुण व कर्म हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आज वह हर व्यक्ति क्षात्र धर्मा है जो ग्रामसभा से लोकसभा तक जनप्रतिनिधित्व प्राप्ति हेतु चुनाव दंगल में सम्मिलित होता है। वह हर व्यक्ति क्षात्र धर्मा है जो देश की रक्षा के लिये अपनी आत्माहुति देने के लिये तत्पर रहता है। भारत का हर राज करने का इच्छुक चुनाव समर में योद्धा बनने वाला व्यक्ति केन्द्र व राज्य सरकार में सत्ता शक्ति का प्रतिनिधायन उपयोग करने वाला क्षत्रिय है। आज हम भारत में जो सामाजिक संरचना में लगे हुए हैं उनमें सबसे श्रेष्ठ भूमिका क्षात्र धर्मा व्यक्ति की है। जामदग्न्य राम ने इक्कीस बार सरस्वती क्षेत्र के सामंत पंचक क्षेत्र में क्षत्रियों के उन्मूलन की जो विधि अपनायी वह यह साफ करती है कि परशुराम ऐसा समाज निर्मित करने के पक्षधर थे जिसमें शोषण, उत्पीड़न तथा अमर्यादित आचरण के लिये कोई स्थान नहीं था। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि परशुराम उन क्षत्रियों का सफाया करना अपना वैयक्तिक कर्त्तव्य मानते थे जो निरंकुश शास्ता की भूमिका निर्वाह करते रहे थे। ऐसी राजसत्ता के प्रवर्तक हिरण्यकश्यप, वेन व रावण थे जिन्हें भारतीय वाङमय दस्युधर्मी राजा की श्रेणी में गिनता था। ऐसे दस्यु धर्मी राजाओं में एक राजा सहस्त्रार्जुन भी थे जिनके निर्देश पर उनके सैनिकों ने महर्षि जमदग्नि को शारीरिक कष्ट पहुंचाया था। सहस्त्रार्जुन कार्तवीर्य को दत्तात्रेय महाराज का संबल था। दत्तात्रेय के प्रभाव क्षेत्र के बारे में मार्कण्डेय पुराण के कथ्यों ने आत्रे-अनुसूया के यशस्वी पुत्र दत्तात्रेय के संबंध में पिता पुत्र संवाद में दत्तात्रेय उपाख्यान का वर्णन है। कृष्णार्जुन संवाद श्रीमद्भगवदगीता ने अर्जुन के सवालों का जवाब योगेश्वर श्रीकृष्ण देते हैं। मार्कण्डेय पुराण में पिता की जिज्ञासा को पुत्र उसी तरह व्याख्यायित करता है जिस तरह कपिल ऋषि ने अपनी माता देवहूति को सांख्य दर्शन बताया था। मार्कण्डेय पुराण की अत्यंत विस्मयकारी गाथा सत्यवादी हरिश्चन्द्र उपाख्यान है। वशिष्ठ व विश्वामित्र में वैरभाव तो था ही, विश्वामित्र ने वशिष्ठ के सौ पुत्रों को मार डाला था पर जब विश्वामित्र ने सत्यवादी हरिश्चन्द्र को अपने आपको चाण्डाल को बेचने के लिये बाध्य किया तो इस बात को काशी के मणिकर्णिका घाट पर चाण्डाल ने स्वयं स्वीकारा। इस दुर्दांत घटना ने वशिष्ठ के क्रोध का विश्वामित्र द्वारा अपने 100 पुत्रों को मार डालने की जो व्यथा भोगी थी हरिश्चन्द्र प्रकरण में उनका दुःख दर्शन अत्यंत उग्र था। अंततः विवाद के फलस्वरूप दोनों में भीषण युद्ध हुआ। इस ग्रंथ में इस सारी घटना का विस्तारपूर्वक वर्णन उपलब्ध है। मार्कण्डेय पुराण स्वयं मार्कण्डेय के ही वचन हैं उन्हीं की वाणी है। जिह्वा के दो कार्य हैं आहार और वाणी विलास। जब वेद, पुराण, उपनिषद आदि का युग था तब वाणी कंठाग्र विद्या का स्त्रोत थी। आज वाणी का विस्तार हो चुका है ध्वनि में ही सब कुछ निहित है। मार्कण्डेय का कथन है - अक्षरम् परमम् ब्रह्म जगच्चैतत्क्षरात्मकम् भौमश्च परमाणवः। अर्थात अक्षर ही ऊष्मा का पर्याय भी है, अक्षर ही प्राण भी है, प्रकाशकर्ता और आदित्य भी। अक्षर ही अक्षय भी है। भारत के लोगों ने जामदग्न्य राम की जयंती का पर्व सामुदायिक रूप से मनाने, अक्षय तृतीया को भारतीय महिलायें अपने लिये गहने खरीदना अत्यंत शगुन मानती हैं। अक्षय तृतीया अथवा अक्खा तीज का जो महत्व पश्चिमी भारत के घर घर तक पहुंचा हुआ है उसके फलस्वरूप अक्खा तीज मनाने वालों लोगों में संपन्नता की बयार भी प्रचुरता से बह रही है।
जामदग्न्य रेणुकेय राम ने जहां आत्मजीवन ब्रह्मवर्चस्वी रखा वहीं उन्होंने शांतनु-गंगा के बेटे शांतनव गांगेय जिसका जन्म का माता-पिता का दिया हुआ नाम देवव्रत था। गंगा और शांतनु ने जब विवाह किया था उनकी शादी में गंगा ने पूर्व शर्त्त रख दी थी कि जब उसे शांतनु मना करेगा शादी टूट जायेगी। आजकल के लोग पति-पत्नी के एक दूसरे को त्यागने का नाम तलाक या डायवोर्स कहते हैं। वास्तविक घटना तो यह थी कि गंगा नदी से नारी बन कर दुष्यंत शकुंतला नंदन भरत के पास गयी थी उद्देश्य भरत से विवाह करना था। वह भरत के दाहिने बैठ गयी और उससे अपना प्रणय निवेदन किया। भरत ने कहा - भद्रे तुम मेरी दाहिनी ओर बैठी हुई हो और यह स्थान पुत्री या पुत्रवधू का होता है भार्या का नहीं। गंगा ने कहा - मैं प्रणय आवेश में थी आपके पास आयी और आपने मना कर दिया। ठीक है आपके पुत्र पौत्र के पास जरूर जाऊँगी पर तब शादी मेरी शर्त्तों पर ही होगी आपके पुत्र या पौत्रों की शर्त्तों पर नहीं। घटना हस्तिनापुर गंगा तट की थी। गंगा को लगा शांतनु पुत्र का पालन पोषण तथा शिक्षण कैसे करेगा। उसने फिर शांतनु के पास जाकर बालक देवव्रत को अपनी गोद में ले लिया और अपने पति राजा शांतनु से कहा - जब देवव्रत सोलह वर्ष का हो जायेगा मैं तुम्हारे राजकुमार को तुम्हें सौंप जाऊँगी। गंगा ने बालक का पालन पोषण अपने तरीके से किया। जब वह छठे वर्ष में प्रवेश कर गया तो बालक देवव्रत को लेकर गंगा जामदग्न्य राम के पास बदरिका आश्रम पहुँची। उसने परशुराम से कहा - मैं जानती हूँ कि तुम क्षत्रियों को विद्याभ्यास नहीं कराते पर मेरे पुत्र को पढ़ाने की बात स्वीकार करनी ही होगी। यह गांगेय शांतनव क्षत्रिय नहीं अपितु गांगेय चातुवर्ण्य से ऊपर स्थित है अतः तुम इसे विद्याभ्यास कराओ। जामदग्न्य राम ने बालक देवव्रत को वेद-वेदांग, वेदांत, आयुर्वेद, धनुर्वेद सहित सारी चौंसठ विद्याओं का पारंगत बनाया और उपरांत गंगा का स्मरण किया। गंगा बदरिका आश्रम पहुंची और अपने पुत्र विद्वान गांगेय देवव्रत को लेकर हस्तिनापुर लौटी। उसने राजकुमार गांगेय को उसके पिता राजा शांतनु के हवाले कर दिया। हिन्दुस्तान में माता पिता द्वारा पुत्र पुत्री का विवाह तय करना औरस विवाह कहलाता है। क्षत्रियों में स्वयंवर अथवा स्वयंवरा विवाह भी राजकुमार या राजकुमारी करते हैं। राजकुमार या राजकुमारी के उस निर्णय को राजा स्वीकार कर विवाह प्रक्रिया संपन्न कराते हैं। प्रेम विवाह या गंधर्व विवाह, राक्षसी विवाह भी कन्या का अपहरण कर किये जाते हैं। शांतनु ने गंगा के द्वारा उनका परित्याग किये जाने के बाद सोलह वर्ष एकांकी जीवन व्यतीत किया। उन्हें कालपी में मछुआरे दासराज की कन्या सत्यवती जिसे मत्स्यगंधा कहा जाता था के सौंदर्य ने आकर्षित किया। राजा शांतनु ने दासराज मांझी से बात की। मांझी ने कहा - मुझे पंगु मुनि(पराशर) ने कहा है तुम्हारी पुत्री राजरानी बनेगी व तुम्हारा धेवता राज करेगा। तुम अगर सत्यवती से ब्याह करना चाहते हो तो मैं तैयार हूँ पर तुम्हारे पिता के साथ उसका विवाह संभव नहीं है क्योंकि कुरूराज महाराज के कुमार आप हैं। शांतनु के बाद आप ही राजा बनेंगे। देवव्रत ने कहा - दासराज अपनी कन्या मेरे पिता को ब्याह दो। राज्याधिकार आपके धेवते का ही होगा। मांझी बोला - राजकुमार आप क्षत्रिय हैं मैं मांझी हूँ। आप महाराज शांतनु के ज्येष्ठ पुत्र हैं राज्याधिकार आपका ही होगा और उसके बाद भी आपके पुत्र का ही होगा। देवव्रत ने मांझी से कहा - मैं राज्य की चाह नहीं करूँगा। जो तुम्हें ईष्ट हो वही करूँगा। संतान जो सत्यवती जनेगी वही राज्याधिकारी बन कर रहेगी। इस प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत भीष्म कहलाये। काशी नरेश वीतिहोत्र की कन्या अंबा का अपहरण करके भीष्म ने अपने दो सौतेले भाईयों के साथ शादी कराने के लिये किया। यदि भीष्म को पता होता या अंबा बताती कि वह मंगेतर निश्चित कर चुकी है संभवतः भीष्म उसका अपहरण न करके उसकी दो बहनों अंबिका व अंबालिका को ही हस्तिनापुर ले जाते। अंबा ने भीष्म की बांह पकड़ी कहा - तुम मुझे अपहरण करके लाये हो इसलिये अब मुझसे विवाह करो। भीष्म ने मना किया और कहा कि मैं तो ब्रह्मचारी हूँ। अंबा का परिचय वीतिहोत्र ने परशुराम जी से करा दिया। परशुराम जी ने भीष्म से कहा - पुत्र इस लड़की से शादी कर लो। भीष्म बोले - गुरू जी मेरा वध कर दो पर मैं शादी नहीं करूँगा। परशुराम बोले - मैं ब्राह्मण योद्धा हूँ इसलिये बिना युद्ध के वध नहीं कर सकता। तब भीष्म व परशुराम में 21 दिन तक युद्ध हुआ। भीष्म ने अपने गुरू परशुराम जी को पराजित कर दिया। परशुराम ने अंबा से कहा - ईश्वर से प्रार्थना करो कि तुम्हें भीष्म को मारने की शक्ति मिले। मैं भीष्म से पराजित होगया हूँ। वह मेरा प्रिय शिष्य है इसलिये उसका व्रत तोड़ना मेरा धर्म नहीं है। यही अंबा दूसरे जन्म में राजा द्रुपद की पुत्री के रूप में जन्मी। उसका लिंग परिवर्तन हुआ। उसका नाम शिखंडी हुआ। शिखंडी को अपने आगे खड़ा कर अर्जुन ने भीष्म पर बाणों की वर्षा कर दी किन्तु भीष्म अर्जुन पर बाण अथवा अन्य अस्त्र शस्त्र नहीं चला सके क्योंकि भीष्म का यह भी व्रत था कि मैं किसी नपुंसक पर शस्त्र प्रहार नहीं करूँगा और चूंकि अर्जुन शिखंडी को आगे से खड़ा करके पीछे से छुप कर युद्ध कर रहा था इसलिये सुरक्षित रह कर उसने भीष्म को बाणों की शरशय्या पर सुला दिया किन्तु भीष्म अपने व्रत के कारण अर्जुन को ऐसा करने से न रोक सके। इस प्रकार शिखंडी ने महाभारत युद्ध में निमित्त बन कर भीष्म को मृत्यु का वरण करने को विवश कर दिया।
भारत के लोग भगवान परशुराम की जयंती अक्षय तृतीया 21 अप्रेल 2015 को यह निश्चित करें कि भारत की जो लोकतांत्रिक व्यवस्था है उसमें ग्रामसभा से लोकसभा तक का चुनाव लड़ने का हर इच्छुक व्यक्ति क्षात्र धर्म का अनुपालन करेगा। वह हर व्यक्ति जो संवैधानिक शासन व्यवस्था में भारतीय संसद घटक राज्य विधान मंडल जिला सरकार तथा नगर सरकार व गांव सरकार में कारिन्दा होगा जिसे सरकार प्रशासनिक अधिकारों का प्रतिनिधायन करेगी याने जो जो लोग शासन करने में जनप्रतिनिधि अथवा लोकसेवक कार्य संपादन करेंगे वे सभी क्षात्र धर्मा होंगे तथा देश की सीमाओं की रक्षा करने पर देश के लिये देह का बलिदान करने वाले भी महत्वपूर्ण क्षत्रिय कहलायेंगे। यह समाज अपनी उम्र के वयस्क होने की अवधि से साठ पैंसठ ज्यादा से ज्यादा सत्तर वर्ष तक राजकरण से जुड़ा रहेगा। श्रीमद्भगवदगीता के उस आदर्श का यावत् जीवन अनुपालन करेगा जो क्षत्रिय को कर्त्तव्य की सूली पर गिनाते हुए कहता है - शौर्यम् तेजो धृति दास्यम् युद्धे चापिऽपलायनम् दानमीश्वर भवश्च क्षात्र कर्म स्वभावम्। क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म - शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता(कर्म कौशल), युद्ध से भागना नहीं, दान देने की नियत, ईश्वर भाव, राज करते समय पंक्तिभेद नहीं करना क्षात्र धर्म के ये प्रमुख कर्त्तव्य हैं उनके लिये जो क्षात्र धर्म का पालन करना चाहते हैं। अक्खा तीज उस व्यक्ति की जयंती है जिसने भारत को 21 बार क्षत्रिय विहीन किया और क्षत्रियों को उनका स्वधर्म पालन का पाठ पढ़ाया इसलिये भगवान परशुराम का स्मरण करते हुए हिन्दुस्तान के लोगों को पहल इस बात की करनी है कि वह हर व्यक्ति जो लोकप्रतिनिधि व लोकसेवक हैं वह क्षात्र धर्म का पूर्णतः पालन करेंगे। अन्याय न सहेंगे न ही दूसरों पर करेंगे। क्षात्र धर्म के सटीक अनुपालन से भारत की भ्रष्टाचार की समस्या का भी सटीक निदान हो सकेगा।
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