मनरेगा को मजबूर नहीं मजबूत बनाइये
स्किल्ड लेबर भी रोजगार गारंटी से जोड़िये
स्किल्ड लेबर भी रोजगार गारंटी से जोड़िये
हिन्दुस्तान में आजादी के संघर्ष तथा उत्तर गांधी युग में आम आदमियों में एक लोकोक्ति प्रचलित थी - ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ पर महात्मा गांधी पराधीन भारत के एकमात्र व्यक्तित्त्व थे जो भारत के लोगों के मन को भा गये थे। देश का घर घर गांव गांव मुहल्ला दर मुहल्ला हर जगह महात्मा गांधी का नाम लिया जाता था। विद्वान हो, धनी हो या चाहे निर्धन ही क्यों न हो हर हिन्दुस्तानी के जेहन में महात्मा गांधी की सूरत आंखों के आगे तैरती थी। डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्त्व की सरकार ने नेशनल रूरल इम्प्लायमेंट गारंटी कानून संसद से पास करा कर फरवरी 2006 में इस योजना को वर्ष में कम से कम 100 दिन गांवों के लोगों को जो मेहनतकश हैं, हाड़ तोड़ मेहनत कर सकते हैं और रोजगार की जिनको अत्यधिक जरूरत है उन्हें एक वर्ष में यानि 365 दिनों में से सौ दिन रोजगार मुहैया करा कर पारिश्रमिक उपलब्ध कराने का आश्वासन इस योजना की खासियत थी। रोजगार चाहने वाले व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध न कराये जाने की हालत में मुआवजे के तौर पर बेरोजगारी भत्ता तरीके के भुगतान की व्यवस्था भी रोजगार गारंटी कानून की प्रतिबद्धता थी। हाड़ तोड़ शरीर श्रम के जरिये गांवों में निर्माण कार्य संपन्न कर रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने का शिव संकल्प भी रोजगार गारंटी कानून का मकसद था। ग्राम विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार रोजगार गारंटी में 100 दिनों के रोजगार मुहैया कराने वाला आंकड़ा सौ दिन में 54 दिन रोजगार दिये जाने का शीर्ष स्तर वित्तीय वर्ष 2009-10 में हुआ। योजना लागू होने के दूसरे वित्त वर्ष 2007-08 में रोजगार मुहैया किये जाने वाली सबसे कम अवधि 42 दिन थी। डा. मनमोहन सिंह सरकार ने योजना को महात्मा गांधी से जोड़ डाला परन्तु अपने एम.एस.एम.ई. कैबिनेट मंत्री के प्रस्ताव कि चर्खा कताई, करघे में सूत बुनाई के दो स्किल्ड लेबर वाले महात्मा गांधी द्वारा खादी अभियान जिसकी सार्वजनिक घोषणा जयपुर में तत्कालीन एम.एस.एम.ई. कैबिनेट मंत्री श्री वीरभद्र सिंह ने अप्रेल 2012 में की थी कि वे केन्द्रीय मंत्रिमंडल में चर्खा कताई व करघा बुनाई के स्किल्ड लेबर कार्य को भी रोजगार गारंटी से जोड़ने का प्रस्ताव रखेंगे। संभव है एम.एस.एम.ई. कैबिनेट मंत्री महोदय ने कैबिनेट में प्रस्ताव रखा हो पर स्वीकार न हो पाया हो। जब केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नया नामकरण कर उसे मनरेगा नाम से प्रचारित किया तब केन्द्र सरकार को महात्मा गांधी की प्रिय आर्थिकी - चर्खा पर कताई, हथकरघा पर बुनाई के स्किल्ड लेबर को गांवों की आधी आबादी महिलाओं में आर्थिक आश्वस्ति के लिये जोड़ना चाहिये था। वह सरकार न वीरभद्र सिंह तत्कालीन मंत्री के प्रस्ताव को स्वीकृति दे सकी न ही योजना का नाम महात्मा गांधी से जोड़ते समय उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि चर्खा व करघा के उद्यम को गांवों में रोजगार गारंटी से जोड़ा जाये। मनमोहन सरकार ने 100 दिन की ग्रामीण रोजगार गारंटी का सबसे ऊँचा स्तर 2008-09 में 54 तक पहुंच की। दिल्ली में केन्द्रीय सरकार में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्त्व में सोलहवीं लोकसभा व राजग सरकार के आने के पश्चात वित्त वर्ष 2014-15 ग्रामीण रोजगार गारंटी का आंकड़ा नीचे खिसक कर 39.2 पर आगया। राज बदल के पश्चात इस योजना पर बहस भी होने लगी। आंकड़ा लुढ़कने के अनेकानेक कारण हैं। राजनीतिक होने के समानांतर योजना का सटीक रूप से क्रियान्वयन में अरूचि होने के कारण भी पिछले दस वर्ष में 365 दिन के एक वर्ष में 100 दिन की जगह ज्यादा से ज्यादा 54 दिन कम से कम 39 दिन रोजगार मुहैया करा पाने की सरकारी तंत्र की व्यवस्था ने एक नया सवाल उठाया है। रोजगार गारंटी में गांव की महिलाओं व विकलांग जन जो चर्खे करघे के जरिये रोजगार पाने की क्षमता रखते हैं उन्हें भी रोजगार गारंटी का लाभार्थी बनाये जाने की तात्कालिक जरूरत है। भारत सरकार के मौजूदा ग्राम विकास मंत्री महोदय हिन्दुस्तान के उस हिस्से के भूमि पुत्र हैं जहां बिटिया के विवाह के समय उसे दहेज में चर्खा दिया जाता था ताकि वह घर गृहस्थी के कामकाज से बचे हुए समय में चर्खा कात कर कम से कम घर के ओढ़न बिछावन के लिये खेस, दुतई कात कर बुनाई के लिये बुनकर को दे सके। इसलिये मौजूदा ग्राम विकास मंत्री महोदय को एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के मंत्री महोदय का ध्यानाकर्षण करना ही चाहिये कि माननीय कलराज मिश्र से पूर्व में कैबिनेट मंत्री रहे श्री वीरभद्र सिंह जी ने जो प्रस्ताव स्किल्ड लेबर के दो काम 1. चर्खा पर सूत, ऊन, रेशम कताई 2. करघे पर हैंडलूम बुनाई को रोजगार गारंटी के उद्यमों में जुड़वायें और गांव की महिलाओं व विकलांगों को भी योजना का लाभार्थी बनाया जाये। पहली और दूसरी योजना अवधियों में जब जब सूखा पड़ता था या बाढ़ की विपदा से लोग पीड़ित होते थे तब सरकारें चर्खा कातने वाली महिलाओं को कते हुए सूत की गुंडी के जरिये राहत देने का काम करती थी। एक गुंडी 1000 मीटर का सूत के गुच्छे पर कताई पारिश्रमिक के अलावा अतिरिक्त मजदूरी भी दी जाती थी जिससे भ्रष्टाचार की कोई शिकायत नहीं रहती थी साथ ही खादी के काम को भी बढ़ावा मिलता था। सूत की गुंडी के जरिये राहत मुहैया किये जाने वाले उस कार्य को छोड़ दिया गया। राहत देने के दूसरे रास्ते खोजे गये जिनमें सरकारी धन के अपव्यय के अनेक नये नये रास्ते ही खुलते गये। आज हमारे देश की मूल समस्या ही ब्रिटिश राज ने अपना राज कायम रखने के लिये जो पद्धति या सिस्टम निश्चित किया आजादी के बाद के साढ़े छः दशकों में वह पुरानी पद्धति असफल सिद्ध हो चुकी है। महात्मा गांधी ने जो रास्ता सुझाया वह हमने पूरी तरह से अपनाया ही नहीं। उसे मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कह कर दुत्कार दिया इसलिये अत्यंत आवश्यक है कि जब तक हमारा देश संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी या चीन सरीखी सामर्थ्य अर्जित नहीं कर लेता हमें गांधी का ही रास्ता तब तक अपनाना होगा। चीन की व्यवस्था व लोकमत में व हिन्दुस्तान की व्यवस्था व लोकमत में बहुत बड़ा फर्क है। भारत के लोग चीन की व्यवस्था में अपने आप को फिट नहीं बैठा पायेंगे फिर चीन का जो तरीका है मार्क्स का चिंतन वाला वह असफल हो चुका। सोवियत बोलशिविक तंत्र टूट चुका है और अंततोगत्वा चीन की भी देर सवेर वही दशा होनी है जो सोवियत संघ के बिखराव से रूस के पड़ोसी देशों में हुई है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन की भाषा मंदारिन केवल एक भाषा हैै। चीन के स्वायत्तशासी इलाकों यथा तिब्बत, सिक्यांग व हांगकांग चीन के दबाव में ज्यादा दिन नहीं रह सकते। दूसरी ओर राष्ट्रवादी चीन जो अब केवल ताइवान तक सीमित है वह भी चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के आतंक का सामना करने की जुगत में लगा हुआ है। इसलिये भारत जहां भारतीय संविधान के अनुसार अंग्रेजी सहित तेईस भाषायें व उनकी ग्यारह लिपियां अपने अपने भाषायी क्षेत्र में गहरी जड़ें जमायी हुई हैं भारत के तौर तरीकों व चीन के तौर तरीकों में जमीन आसमान का फर्क है। इसलिये भारत के लिये केवल गांधी आर्थिकी विचार तथा अढ़ाई हजार वर्ष पहले विष्णु शर्मा - आचार्य चाणक्य रचित कौटिल्यीय अर्थशास्त्र ही भारत का रक्षक है। हेनरी किसिंजर ने अपनी ताजा पुस्तक में श्रीमद्भगवदगीता और कौटिल्य के अर्थशास्त्र को संसार की राजनीति का भावी स्त्रोत बताया है। अमेरिकी विद्वानों का मत है कि आने वाले युग में अरविन्द घोष का सावित्री महाकाव्य संसार का सर्वादृष्ट महाकाव्य होने वाला है। सविता - सूर्य की शक्ति, सूर्य का सृष्टि पर प्रभाव तथा सौर ऊर्जा आने वाले युग के मानव को त्राण देने वाली शक्ति है। जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार अरविन्द घोष रचित महाकाव्य सावित्री का प्रत्येक भारतीय भाषा में अनुवाद कराये और भारतीय सूर्य सिद्धांत द्वारा निर्धारित विधियों से भारतीय भाषाओं में वैदिक साहित्य सहित लौकिक संस्कृत साहित्य में एवं भारत की तद्भव भाषाओं में सूर्य का जो महत्व है उसे आधुनिक वैज्ञानिक विधि से अध्ययन करने वाले भारतीयों, भारतीय भाषाओं में भारतीय संस्कृति में सूर्य का जो स्थान है उस पर भारतीय वैज्ञानिक व गणितीय दृष्टिकोण निश्चित करने की जरूरत भी है। विज्ञान के उत्कर्ष एवं पाश्चात्य वैज्ञानिक चिंतन में भारतीय वाङमय का आध्यात्मिक चिंतन योग समय की जरूरत महसूस होती है। भारत की आबादी अभी सवा अरब है विश्व जनसंख्या विशेषज्ञों का मत है कि आगामी 35 वर्ष याने सन 2050 तक भारत की जनसंख्या का और ज्यों ज्यों जनसंख्या बढ़ेगी बढ़ी हुई जनसंख्या के लिये उनके हाथों का काम दिलाना सामाजिक आवश्यकता होगी इसलिये भारत सरकार को गांधी की खादी पर पुनर्विचार करना ही चाहिये। जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि आज इंडोनेशिया में दुनियां की मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है आने वाले 35 वर्ष तक भारत दुनियां की मुस्लिम आबादी वाला सबसे बड़ा देश होगा। उस मुस्लिम आबादी में एक बड़ी संख्या जुलाहों की होगी। जुलाहों व सूत कातने वाली भारत की महिला श्रम शक्ति के हाथों को निरंतर काम मिले और वे सूत कताई व करघे पर बुनाई कर रोजगार पायें इसके लिये अत्यंत आवश्यक है कि गांधी आर्थिकी को मजबूत किया जाये। अतएव भारत के ग्राम विकास मंत्री एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के मंत्री वित्त मंत्री तथा नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पानगरिया महाशय मनरेगा का कायाकल्प कर उसे ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर संवर्धन के साथ साथ स्किल्ड लेबर के 1. चर्खे पर सूत, ऊन व रेशम कताई 2. हथकरघे पर बुनाई 3. हैंड निटिंग यार्न की कताई तथा हैंड निटिंग के कामों को स्किल्ड लेबर पेटे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का पचास प्रतिशत आवंटन इन स्किल्ड लेबर वाले कामों के लिये निश्चित किया जाये ताकि आवंटन का पचास प्रतिशत भाग ग्रामीण निर्माण कार्यों में निवेशित होने से जहां एक ओर रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत हो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों की महिला श्रम शक्ति व गांवों में रहने वाले विकलांग लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करा कर राहत दी जाये। पानगरिया महाशय ने बाढ़ पीड़ित गांवों के लिये रोजगार गारंटी स्कीम में 100 दिन के अलावा 50 अतिरिक्त दिन रोजगार दिये जाने का जो शिव संकल्प किया है उस आवंटन को स्किल्ड लेबर पेटे विनिवेशित किया जाये। स्थानीय विनिर्माण के जरिये प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने मेक इन इंडिया का जो नारा बुलन्द किया है उसकी सही सही क्रियान्विति गांधी आर्थिकी प्रयोग से ही संभव है। पिछले दस वर्षों में वर्ष में 100 दिन की रोजगार की गारंटी की उपलब्धि ज्यादा से ज्यादा 54 दिन केवल वित्त वर्ष 2008-09 में हो पायी है इसलिये भी 100 दिन रोजगार गारंटी को सफलतापूर्वक संचालन के लिये स्किल्ड लेबर वाली मेहनत को भी योजना का हिस्सा बनाना राष्ट्रीय दृष्टि से लाभदायक है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष श्री अरविन्द पानगरिया जी ने किसानों को बेमौसमी बरसात से हुए नुकसान की तात्कालिक भरपाई के लिये पचास दिन के अतिरिक्त रोजगार मुहैया कराने की जो घोषणा की है उनसे अनुरोध है कि वे नीति आयोग में अगर के.वी.आई. ऐडवाइजर अथवा ए.आर.आई. विशेष कार्याधिकारी अभी भी कार्यरत हों उनसे परामर्श कर एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के संयुक्त सचिव ए.आर.आई. का ध्यानाकर्षण करें कि प्रथम द्वितीय कुछ हद तक तृतीय पंच वर्षीय योजनाओं में सूखे और बाढ़ की राहत के लिये चर्खा कातने वाले पुरूषों व स्त्रियों को सूत की एक गुंडी जो कि लगभग 1000 मीटर सूत का एक लच्छा होता है पर सूत कताई पारिश्रमिक की दुगनी राशि राहत के रूप में दी जाती थी। आज जहां जहां बेमौसमी बारिश से फसलें तबाह हो गयी हैं उन राज्यों से परामर्श कर प्रति गुंडी सूत राहत की राशि आज की महंगाई के आधार पर तय की जाये। कातने वाल महिला श्रम शक्ति को प्रेरित किया जाये कि वे अपना चर्खा फिर चलायें और बाढ़ राहत की रकम तुरंत पायें। इस ब्लागर ने भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री महोदय से प्रार्थना की थी कि वे विनोबा भावे के पट्ट शिष्य बाल विजय सहित खादी के काम से जुड़े लोगों को बुला कर उनसे बात करें। यह सही है कि गांधी विचार से फले फूले बहुत से तथाकथित गांधी चिंतक प्रधानमंत्री जी के कटु आलोचक हैं किन्तु उन्हें ‘निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय’ की तात्कालिक जरूरत है। आज जो वातावरण विरोध करने वाले लोगों ने नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी के किसान विरोधी व गरीब विरोधी होने का हो हल्ला राजनीतिक रूप से चालू किया है उसकी एकमात्र काट चर्खा पर सूत कताई के रूक गये कार्यक्रम को फिर जिन्दा करना है। बाढ़ पीड़ित इलाकों राज्य सरकारों वहां काम करने वाली सही खादी संस्थाओं के प्रमुखों तथा शीर्ष विहीन खादी ग्रामोद्योग आयोग और एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के माननीय मंत्री जी तथा संयुक्त सचिव ए.आर.आई. से तत्काल मशविरा कर रोजगार गारंटी में चर्खे पर सूत, ऊन व रेशम कताई, हथकरघे पर बुनाई, हैंड निटिंग यार्न की कताई तथा हैंड निटिंग के कार्य करने वाले उन इलाके के लोगों को पचास दिन वाला अतिरिक्त अवधि की रोजगार गारंटी चर्खे व करघे से जोड़ी जाये और जिन लोगों की फसल बर्बाद हुई है व जिन्हें तत्काल राहत की जरूरत है मरती हुई खादी को फिर जिन्दा करने के लिये गांधी आर्थिकी का सहारा लेना आज की तात्कालिक जरूरत है। यूनाइटेड प्रोग्रेस एलायंस ने 2004 में सत्ता में आने के बाद सबसे पहला काम तत्कालीन खादी ग्रामोद्योग आयोग को बर्खास्त कर गांधी आर्थिकी को सबसे गहरा आघात पहुंचाया था। जवाहरलाल नेहरू द्वारा रूरल इंडस्ट्रियलाइजेशन के लिये गठित गैर सरकारी सदस्यों वाले खादी ग्रामोद्योग आयोग का गठन 1.4.1957 को किया था। विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा वैकुंठ ल. मेहता को उसका सदर तय किया। श्री मेहता ने रूर्बन सोसाइटी के संकल्प को निरंतर दस वर्ष सफलतापूर्वक संपन्न किया। उन्हें पंडित नेहरू का नैतिक समर्थन था। रूर्बन सोसाइटी के संकल्प को साकार करने के लिये श्री मेहता के अलावा भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की ‘पूरा’ योजना एवं भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की रूर्बनाइजेशन गांव की आत्मा को बरकरार रखते हुए संपन्न करने की दिशा में गांधी की खादी का खेतीबाड़ी के बाद दूसरा महत्वपूर्ण स्थान है। जिसे आज ‘मेक इन इंडिया’ की संज्ञा दी जारही है वह माइक्रोक्राफ्ट संवर्धन से ही संभव है। इसलिये बिना विलंब 1. चर्खे पर सूत, ऊन व रेशम कताई 2. हथकरघे पर बुनाई 3. हैंड निटिंग यार्न की कताई 4. हैंड निटिंग इन चार दस्तकारियों देहाती रोजगार गारंटी से तुरंत जोड़ा जाये तभी तात्कालिक राहत का मार्ग प्रशस्त होगा।
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