भारत की मौजूदा काव्य जरूरत
एक सौ पचास रामधारी सिंह दिनकर
एक सौ पचास रामधारी सिंह दिनकर
भारतीय वाङमय काव्य साधना के चमकीले नक्षत्र रामधारी सिंह दिनकर के कविता पाठ को उनके जीवनकाल में इस ब्लागर ने भी सुना है। महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी की महान देन ही हिन्दुस्तानी राष्ट्रधर्म जागरण है। दिनकर भी दूसरे हिन्दी कवियों की तरह महात्मा के राष्ट्रप्रेम से प्रेरित कवि रहे। आधुनिक हिन्दी जिसे महात्मा गांधी के गांधी विचार के मूर्धण्य अंग्रेजी भाषा भाष्यकार डाक्टर जी. रामचंद्रन पंडित नेहरू के शासन काल में राज्यसभा सांसद भी थे। रामचंद्रन शांति निकेतन में अंग्रेजी प्राध्यापक भी रहे। श्रीमती इंदिरा गांधी उनके प्रियतम शिष्य मंडली में थीं। डाक्टर रामचंद्रन कहा करते थे - हिन्दी भाषा इलाहाबाद और वाराणसी की शब्द सृष्टि है। वे इलाहाबादी बनारसी हिन्दी के अलावा नदिया (नवद्वीप) की बांगला, पुणे की मराठी, कोंकण की कोंकणी, बड़ौदा की गुजराती, अमृतसर की पंजाबी, लखनऊ की उर्दू, पुरी की उड़िया, दक्षिण कन्नड़ की कन्नड़, कांची की तमिल, तिरूपति की तेलुगु, भारत विभाजन के पश्चात वृहन्मुंबई की सिन्धी, कामरूप की असमी, भारतीय भक्ति काव्य में अवधी का रामचरितमानस तथा ब्रजभाषा का सूर काव्य, अपनी जन्मभूमि त्रिवांकुर के तिरूअनंतपुरम की मलयाली को वे भाषायी हीरे-जवाहरात कहा करते थे। वे धाराप्रवाह अंग्रेजी भाषण के उद्गाता थे। उनकी अंग्रेजी कम पढ़ेलिखे को भी हृदयंगम हो जाया करती थी। वे अंग्रेजी में बोलते अपने अनुवादक की त्रुटियां भी बखानते पर जब महात्मा गांधी जीवनकाल में महात्मा गांधी से बतियाते तो वे हिन्दी में ही बात करते। महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज की वह आध्यात्मिक व्याख्या करते थे। धाराप्रवाह हिन्दी भाषणकर्त्ताओं में अटल बिहारी वाजपेयी का ऊँचा स्थान है। उनके अलावा हिन्दी भाषण करने वालों में जयप्रकााश नारायण, डाक्टर राममनोहर लोहिया और आचार्य नरेन्द्र देव प्रमुख थे। हिन्दी के समर्पित व्यक्तित्त्वों में राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविन्द दास, लोहिया जी के साथी सेठ दामोदर स्वरूप धाराप्रवाह हिन्दी भाषणकर्त्ता थे। जन्मना बांग्ला भाषी कोलकाता हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर आशुतोष मुखर्जी के यशस्वी पुत्र डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिन्दीतर भाषा भाषियों ही से अविरल शब्द चयनकर्त्ता धाराप्रवाह हिन्दी भाषण देने वाले व्यक्तित्त्व के स्वामी थे। हिन्दू महासभा भवन, बिरला मंदिर, रामलीला मैदान कहीं भी बोलना हो डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी को सुनने के लिये भीड़ एकत्र हो जाती थी। श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते थे। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा अटल बिहारी वाजपेयी को ध्यानमग्न होकर सुना करते थे। भारतीय गणराज्य के पंद्रहवें प्रधानमंत्री ने हिन्दुस्तान के लोगों का ध्यान राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की काव्य साधना की ओर आकर्षित कर भारतीय भाषाओं में कविता पाठ द्वारा राष्ट्रभक्ति का जो नया सौरमंडल उदय हुआ मैथिली शरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, कविकुल शिरोमणि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हरिवंश राय बच्चन, सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, सियावर शरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा नवीन हिन्दी कवियों ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह व अहिंसामूलक भारती स्वातंत्र्य संग्राम को सौरमंडल सरीखा संबल दिया। आजादी मिलने के पौने सात दशक बीत जाने पर रामधारी सिंह दिनकर की याद को ताजगी देने वाला प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की मुहिम को राष्ट्रीय काव्य को भारत की आगे आने वाली पीढ़ियोें के लिये प्रकाश स्तंभ के रूप में संजोये जाने की जरूरत है। हिन्दी सहित भारतीय संघ के जिन घटक राज्य - विधान मंडलों ने अपने अपने राज्य की राजभाषा घोषित करनी है प्रधानमंत्री 39 घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों उन राज्यों में जो शासक दल हैं यदि शासक दल सुप्रीमो शैली से चलने वाले राजनीतिक दल हों तमिलनाडु के दोनों राजनयिक सुप्रीमोओं कर्णाटक के प्रक्षिप्त सुप्रीमो देवगौड़ा महाराष्ट्र के सुप्रीमो द्वय उद्धव ठाकरे व शरद पवार पंजाब के सुप्रीमो प्रकाश सिंह बादल जम्मू कश्मीर के सुप्रीमो मुफ्ती मोहम्मद सईद और शेख अब्दुल्ला पौत्र उमर अब्दुल्ला उत्तर प्रदेश में देा राजनीतिक सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव व बसपा नेता मायावती बिहार के लालू प्रसाद यादव पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी उत्कल केसरी नवीन पटनायक इन सब से नये सुप्रीमो हैं दिल्ली की जनता के लाड़ले नेता अरविन्द केजरीवाल एक सौ तीस साल बूढ़ी कांग्रेस की अगुआई करने वाली श्रीमती सोनिया गांधी भी सुप्रीमो संस्कृति की वाहक हैं। कुल मिला कर प्रधानमंत्री इन पंद्रह सुप्रीमोओं को आमंत्रित कर उनसे सलाह मशविरा करें। उनकी राय जानेें कि भारत के पंद्रह राजनीतिक सुप्रीमो भद्रलोक हो अथवा भद्र महिला हो उनकी राय में राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद भारतीय संघवाद को प्रोत्साहित करने वाले कवियों का वे अपने अपने राज्य की दृष्टि से मशविरा दें। भारत के घटक राज्यों में दिल्ली सहित दस घटक राज्यों की राजभाषा जम्मू कश्मीर में उर्दू पंजाब में पंजाबी गुजरात में गुजराती महाराष्ट्र में मराठी गोआ में कोंकणी कर्णाटक में कन्नड़ केरल में मलयाली तमिलनाडु में तमिल तेलंगाना व आंध्र में तेलुगु उत्कल में उड़िया पश्चिम बंग व त्रिपुरा में बांग्ला असम में असमी तथा सिक्किम में नैपाली राजभाषायें हैं। सिक्किम को छोड़ कर शेष तेरह घटक राज्यों की समृद्ध भाषाओं में राष्ट्रभक्ति के उद्गाता अनेक कवि हुए हैं इसलिये भारत की भाषायी पहचान को सामर्थ्यवान बनाने के लिये कश्मीरी डोगरी संस्कृत सिन्धी बोडो मैथिली नैपाली भोजपुरी लेपचा (भूटिया) भूटानी तिब्बती मेघालयी लोकभाषा मिजोरमी लोकभाषा नगा लोकभाषा अरूणाचल लोकभाषा मैइती (मणिपुरी) कोंकणी प्राकृत - अर्ध मागधी पालि और अवधी इन बीस भाषाओं के या भाषायी समूहों की दो दो राष्ट्रीय महत्व की काव्य रचनायें उनके रचनाकारों के व्यक्तित्त्व सहित उर्दू पंजाबी गुजराती मराठी कन्नड़ मलयाली तमिल तेलुगु उड़िया बांग्ला व असमी इन ग्यारह भारतीय भाषाओं के आठ आठ राष्ट्रीय महत्व के काव्य तथा भारत के नौ घटक राज्यों की राजभाषा हिन्दी एवं दिल्ली जिसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा प्राप्त है इन दस राज्यों से हिन्दी काव्य के कर्णधार 22 व्यक्तियों को चुन कर देश में गांधी ड्योढ़ी शती के अवसर पर सितंबर अक्टूबर 2019 में जब भारतीय गुजराती पंचांग के अनुसार महात्मा गांधी की 150वीं जयंती आश्विन बदी द्वादशी तथा अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 2.4.2019 में प्रधानमंत्री मोदी महात्मा गांधी द्वारा अपनी जयंती चर्खा द्वादशी के रूप में मनायी जाती थी क्यों न भारत के 150 राष्ट्रीय काव्यकर्ताओं की काव्य राष्ट्रीय कविता के 150 महत्वपूर्ण कविता पाठों को भारतीय राष्ट्र की आत्मा का स्वरूप दिया जाये। तमिलनाडु जिसे भारतीय वाङमय द्रविड़ संज्ञा देता है इस द्रविड़ भूमि से ही हिन्द महासागर में मानसून उपजता है सेतुबंध रामेश्वर के बारे में लोकोक्ति है कि जब दाशरथि राम ने रामेश्वरम में शिवार्चन संपन्न किया उन्हें पुरोहित की जरूरत थी। दाशरथि राम के कुल पुरोहित वशिष्ठ थे। रामेश्वरम में उनका पहुंचना संभव नहीं था। विश्रवा पुत्र लंकेश दशग्रीव रावण को जब पता चला कि राम शिव स्थापन कर रहे हैं तो रावण के अंतर्मन का पौरोहित्य तथा शंकर भक्ति जाग्रत हुई। रावण ने सीता हरण के समय भी वेश बदला था। सेतुबंध रामेश्वर में भी वह वेश बदल कर गया और उसने राम की पुरोहिताई संपन्न कर राम को आशीर्वाद दिया - मंत्रार्था सफला संतु पूर्णा संतु मनोरथाः। शत्रुणां बुद्धि नाशीस्तु मित्रणां बुद्धयस्तयः। अध्यात्म रामायण ने इस प्रसंग को रूचिकर रूप में प्रस्तुत किया। द्रविड़ देश भारत के लिये मानसून के अलावा भक्ति का भी स्त्रोत है। कबीर ने साखी में कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने नारद को अपना जीवन परिचय देने वाली भक्ति से कहलाया - द्रविड़े साहम् समुत्पन्ना वृद्धिम कर्णाटके गता क्वचित् क्वचित् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णताम् गता। मानसून की तरह भक्ति भी भारत भर में द्रविड़ देश तमिलनाडु से फैली। रामास्वामी नायकर पेरियार उनके पश्चात सी.एन. अन्नादुरई ने राजनीतिक सुप्रीमो की जड़ें भी तमिलनाडु में ही गहरायी तक पहुंची। आज भारत में पंद्रह राजनीतिक सुप्रीमो अपने प्रशंसकों अनुयायियों को मार्गदर्शन देरहे हैं। भारतीय जनता पार्टी तथा साम्यवादी दृष्टिकोण वाले राजनीतिक दलों के अधिकतर राजनीतिक संगठन एकल अधिकार संपन्न क्षत्रप शैली से अपने अपने राजनीतिक मेढ़ियों का संचालन कर रहे हैं। भारत की वह भाषा जिसे दुनियां के लोग हिन्दी - हिन्दुस्तानी और उर्दू के नाम से पुकारते हैं उसमें एक देसभाषा अवधी भी है जिसमें तुलसीदास ने स्वांतः सुखाय रघुनाथ गाथा का भाषा निबंधन कर राम को विद्वानों की श्रेणी से जनसामान्य तक की श्रेणी तक पहुंचा दिया। रामचरितमानस के अलावा अवधी का दूसरा महाकाव्य - मलिक मुहम्मद जायसी रचित पद्मावत है।पद्मावत की भाषा तुलसी की तरह अवधी है पर लिपि फारसी का प्रयोग किया। कवि जायसी ने अपना परिचय देते हुए लिखा - जायस नगर धरम अस्थानू तहां जाय कवि कीन्ह बखानूं। जायसी परमात्मा के अस्तित्व को बखान करते हुए कहते हैं - विधना के मारग हैं ते ते सरग नखत तन रोआं जेते।
महात्मा गांधी की ड्योढ़ी शती चार वर्ष पश्चात विक्रम संवत 2076 शक संवत 1791 आश्विन बदी द्वादशी को संपन्न होगी। अंग्रेजी तरीके से भारत के लोग गांधी ड्योढ़ी शती 2.10.2019 को मनाने का संकल्प लेंगे। प्रधानमंत्री मोदी जी से अनुरोध है कि गांधी ड्योढ़ी शती का मुख्य पर्व संवत 2076 के गुजराती पंचांगानुसार आश्विन कृष्ण द्वादशी श्राद्ध तदनुसार अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 2.10.2019 को संपन्न किया जाये। गांधी जी अपना जन्मदिन चर्खा द्वादशी के रूप में मनाते थे। प्रधानमंत्री मोदी जी जिस मेक इन इंडिया के जरिये भारत की हस्तकला, हस्तकौशल हाथ की उद्यमिता को बढ़ावा देने का संकल्प लिये हुए हैं यदि वे संवत 2076 आश्विन बदी द्वादशी श्राद्ध के दिन से भारत में महात्मा गांधी का जन्मदिन हिन्दुस्तानी चांद्रमास विधि से मनाने का संकल्प लेते हैं तो परशुराम जयंती, अक्खा तीज, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, वाल्मीकि जयंती, संत रैदास जयंती, व्यास जयंती गुरू पूर्णिमा, महावीर जयंती, बुद्ध जयंती, गुरूनानक जयंती की तर्ज पर महात्मा गांधी जयंती 2 अक्टूबर 2019 को मनाये जाने के बजाय गांधी चर्खा द्वादशी आश्विन बदी द्वादशी संवत 2076 से प्रतिवर्ष भारत में मेक इन इंडिया केक प्रतीक के तौर पर चर्खा द्वादशी का पर्व मनाया जाये। ज्ञातव्य है कि महात्मा गांधी अपना जन्मदिन आश्विन बदी द्वादशी को ही मनाया करते थे। अगर हिन्दुस्तान के सेकुलर मतावलंबी सज्जन 2 अक्टूबर को ही गांधी जयंती की छुट्टी मनाना चाहें उन्हें अपने रास्ते चलने दिया जाये परन्तु महात्मा गांधी का भारतीय परम्परा वाला जन्मदिन चर्खा द्वादशी को ही चर्खा कात कर मेक इन इंडिया अभियान को मजबूत किया जाये।
राष्ट्रीय काव्य साहित्य के अलावा भारत की तात्कालिक जरूरत रैदास-मीराबाई गुरू शिष्य परम्परा को निखार देने की जरूरत है। भारतीय दलित साहित्य में से उन काव्यकारों को आगे लाने की जरूरत है जिन्होंने मनुष्य मात्र के बंधुत्व विकास का मार्ग अपनाया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उत्साही दलित समाज ने बीफ महोत्सव तथा महिषासुर महिमा मंडित किये जाने के प्रसंगों को उभारा है। दुनिया की तीन चौथाई आबादी मांसाहारी समाज है। मांसाहार में गौ मांस जिसे अंग्रेजी में बीफ कहा जाता है बीफ भोज्य के उत्साही लोक संख्या सर्वाधिक है। थोड़े दिनों पहले मैडकाउ बीफ से उत्पीड़ित लोगों में श्मशान वैराग्य उदय हुआ। मैडकाउ बीफ के प्रति उपजी तात्कालिक श्मशान वैराग्य उड़न छू होगया। आज दुनिया में भोजन के लिये हिंसा की जो अनवरत बाढ़ बढ़ी है परपीड़ा के प्रति जो अनुदार असहनशीलता घर घर तक अपने पांव पसार रही है उसने मनुष्य जीवन के सौंदर्य तथा परोपकारी भाव को संकुचित तात्कालिक सुख अथवा तात्कालिक लाभ के लालच ने मनुष्य को आततायी तक बना डाला है इसलिये विवेक को जाग्रत करने की पहली पहल केवल राष्ट्रवादी 150 कविताओं तथा उन सविताओं का ज्ञान करने वाले उन उन कविताओं को लिखने वाले आत्मविश्वास से उन कविताओं को पढ़ कर सस्वर उन्हें गा गा कर लोगों में राष्ट्रीयता भावना को जाग्रत करने वाले अग्रणी मूर्धण्य व्यक्तित्त्व के धनी रामधारी सिंह दिनकर के काव्य के साथ साथ हिन्दी कवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रा नंदन पंत, हरिऔध अयोध्या सिंह उपाध्याय, मैथिली शरण गुप्त उनके अनुज सियावर शरण गुप्त जिन्होंने महात्मा गांधी के आग्रह पर भगवद्गीता का हिन्दी काव्यानुवाद प्रस्तुत किया। बालकृष्ण शर्मा नवीन सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे उदीयमान राष्ट्रीय कवियों का स्त्रोत उत्तर प्रदेश बिहार रहा है परंतु संघीय व्यवस्था में हरयाणा, हिमाचल उत्तराखंड दिल्ली राजस्थान म.प्र. छत्तीसगढ़ झारखंड के हिन्दी कवियों को भी पहचानना होगा। संबंधित घटक राज्य की सरकार वहां के विश्वविद्यालयों तथा भाषायी संगठनों के लोगों का लोकमत जानना होगा। उन कवियों की पहचान बनानी होगी जिसे राष्ट्र स्तरीय कविता सर्जक का स्तर दिया जाये। भारत जातीय तथा क्षेत्रीय खेमों वाला राष्ट्र है। भारत के प्रधानमंत्री महोदय को राजनीतिक नेतृत्त्व को जाग्रत करने के साथ साथ सामाजिक सांस्कृतिक लोक साहित्य संवर्धक तत्वों को भी विश्वास में लेकर राष्ट्रीय कविता का सुदृढ़ मंच बनाना होगा। विश्व ज्ञान वातायन केवल अंग्रेजी से ही समृद्ध नहीं हो सकता। आज देश में अंग्रेजी के प्रति उद्भट आसक्ति का जो दौर चल रहा है वह देश में भाषायी उन्माद पैदा न करे यह देखना जरूरी है। पंडित नेहरू की सरकार में सुयोग्य सांसद संसदीय व्यवहार नेता पंडित गोविन्द वल्लभ पंत अपने घर में तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह गृह सचिव विश्वनाथन के साथ अपने अंग्रेजी स्टेनोग्राफर को डिक्टेशन दे रहे थे। धाराप्रवाह अंग्रेजी के माहिर पंडित पंत अपनी मातृभाषा कुमांऊँनी में पाणि लाओ कहा। सरदार स्वर्ण सिंह की मातृभाषा में भी पानी को पाणि ही कहा जाता है। उन्होंने पानी मंगाया तब तक पंडित पंत मूर्छित होगये। उनकी वह मूर्छा 21 दिन तक बनी रही, दिवंगत होगये। विदेशी भाषा का असीमित ज्ञान जीजिविषा के अंतराल में लुप्त भी हो जाया करता है इसलिये भारत की तात्कालिक जरूरत अपने नागरिकों को स्वभाषाओं की ओर प्रेरित कर आने वाली पीढ़ियों को भारतीय राष्ट्रवाद से जोड़ने की पहली जरूरत है इसलिये हर भारतीय भाषा जिसे संविधान ने सूचीबद्ध किया है तथा तिब्बती व भूटानी भाषायें जो सांस्कृतिक व आस्थामूलकता के कारण भारतीय भाषाओं के ज्यादा नजदीक हैं प्रत्येक भाषा के कम से कम दो राष्ट्रबोधक काव्यात्मकता तथा जिन ग्यारह राज्यों की राजभाषायें उर्दू, पंजाबी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला व असमी आदि हैं जिनमें राष्ट्रबोधी प्राधान्यता है उनमें से प्रत्येक से कम से कम आठ काव्य तथा हिन्दी के 22 प्रसंग तय किये जाने हेतु प्रधानमंत्री पहल करें। अक्टूबर 2019 तक भारत के 150 काव्य रचनाकारों की कृतियां जन जन को उपलब्ध करने के लिये कविताओं के मूल पाठ हर भारतीय लिपि में उपलब्ध कराया जाये। हिन्दी सहित भारतीय घटक राज्यों की राजभाषाओं बीस उन भाषाओं जिनका उल्लेख ऊपर हुआ है उनका सरकार शब्दकोष निर्मित करने की दिशा में तात्कालिक कदम उठाये ताकि भारतीय भाषाओं में पर्यायवाची कोश रचना से एक भाषा से दूसरी भाषा में भाषान्तर एक सरल प्रक्रिया हो जाये। प्रधानमंत्री ने रामधारी सिंह दिनकर के काव्यात्मक व्यक्तित्त्व को शीर्ष में स्थापित कर भारतीय वाङमय के लिये अस्तित्त्व कायम करने वाला अनुपम अवसर उपलब्ध किया है। राजनैतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, आर्थिक जाग्रति का स्थायित्त्व तभी मिल सकता है जब भारतीय वाङमय को प्रधानमंत्री देश के लोगों के पारस्परिक वार्त्तालाप-व्यवहार तथा अनुश्रवण का पुख्ता आधार स्थापित करें।
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