Thursday, 18 June 2015

बाढ़ पीड़ितों को तुरन्त राहत देने के लिये ५० दिन की रोजगार गारंटी चर्खा कातने वाली महिलाओं व हथकरघा बुनकरों को दीजिये

  नीति आयोग के उपाध्यक्ष श्री अरविन्द पानगरिया महाशय ने बैमौसमी बाढ़ से फसलों को हुए नुकसान वाले इलाकों में देहात रोजगार आश्वासन योजना के तहत रोजगार आश्वस्ति 100 दिन के बजाय 150 दिन एक वर्ष में रोजगार उपलब्ध करने की सुखद घोषणा की हैै। इसी बीच शासक दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दल के महानुभावों से कहा है कि लोगों तक मानवीय सहानुभूतिपूर्वक पहंुचने के लिये अकेला रास्ता महात्मा गांधी ने हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में अपनाया था। महात्मा की दूरदृष्टि गरीब से गरीब कमजोर से कमजोर तक पहुंचती थी। उन्होंने अपने कोचरब आश्रम - साबरमती आश्रम सेवा ग्राम आश्रम के इर्दगिर्द हर इन्सान की वास्तविक जानकारी अपने जेहन में रखी। गरीब, रोगी, दुःखी उनके लिये परमात्मा की भक्ति की प्रतीक थी। उनकी आत्मा ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाणे रे’ से अत्यंत प्रभावित थी। नरसी मेहता की प्रार्थना तथा ‘परदुःखे उपकार करे तोय मन अभिमान न आणे रे’ को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भी हृदयंगम कर लिया है। वे भी गांधी की ही तरह आधुनिकता में भी जीवन जीने वाले योगी हैं। उत्तर भारत के कई राज्यों में बेमौसमी बरसात ने कहर ढाया है। कहीं कहीं ओलों से फसल को भारी नुकसान हुआ है। उनके आर्थिक विशेषज्ञ अरविन्द पानगरिया महाशय ने रोजगार गारंटी अवधि बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के लिये 100 दिन से 150 दिन करने का फैसला सुनाया है। यद्यपि मनरेगा में अनेक छेद हैं, मनरेगा में आवंटित धनराशि में से कितनी राशि रोजगार आश्वस्ति की मजदूरी के रूप में रोजगार चाहने वाले व्यक्ति को मिलती है इस पर सटीक आकलन अभी तक नहीं हो पाया है। गांवों में पार्श्वसज्जा सृजन की बात तो होती है, हृष्टपुष्ट शरीर वाला व्यक्ति मर्द या औरत अगर वर्ष में 100 दिन हाड़तोड़ परिश्रम कर मजदूरी पा भी ले गांवों का कमजोर वर्ग याने औरतें और विकलांग व्यक्ति टकटकी लगाये देखते रहते हैं। उन्हें रोजगार गारंटी का लाभार्जन नहीं हो पाता है। इसलिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी उनकी सरकार के नियंता समाज मृदुभाषी वित्त मंत्री अरूण जेटली महाशय से एक प्रार्थना है कि वे जो 50 दिन की रोजगार गारंटी अवधि बढ़ा रहे हैं वह गांव की चरखा कातने वाली औरतों गांव में हाथ कते सूत अथवा मिल कते सूत की बुनाई हथकरघा में करने वाले बुनकरों के लिये तथा साथ में हिमालयी इलाकों में हैंडनिटिंग यार्न कातने वाली महिलाओं तथा स्वेटर, पुलोवर आदि हाथ से बुनने वाली महिलाओं के लिये 100 दिन के शरीर श्रम के समानांतर रोजगार गारंटी के 50 दिन वाले पारिश्रमिक अर्जन के प्रसंग को 1. चरखे पर सूत, ऊन, रेशम कताई 2. हथकरघा पर हाथ कते सूत अथवा मिल कते सूत की बुनाई करने वाले हैंडलूम बुनकर 3. हैंडनिटिंग करके ऊन कातने वाली महिलाओं तथा हैंडनिटिंग करके स्वेटर, पुलोवर आदि बनाने वाली महिलाओं के श्रम को दक्षता प्राप्त श्रम का दर्जा देकर बाढ़पीड़ित क्षेत्रों में 50 दिन की अतिरिक्त रोजगार देने की सरकारी निर्णय का लाभ हाथ से काम करने के इन तीन कामों के लिये सुनिश्चित करें। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र तथा अन्य राज्य जहां बेमौसमी बाढ़ ने कहर ढाया है वहां रोजगार गारंटी के अलावा 50 दिन दक्षता प्राप्त रोजगार चाहने वालों के लिये सुरक्षित किये जायें। इससे एक बड़ा फायदा यह होगा कि जहां जहां खादी के उत्पादन व बिक्री में ह्रास हुआ है, कत्तिन, बुनकरों को रोजगार गारंटी की राहत महात्मा गांधी की दरिद्र नारायण के प्रति करूणा एक नये अवतार में जाग उठेगी। जब हिमाचल प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री वीर भद्र सिंह यू.पी.ए. सरकार में एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के केबिनेट मंत्री थे उन्होंने जयपुर में अप्रेल 2012 में बयान दिया था कि वे चर्खा कताई बुनाई के दो दक्षता प्राप्त श्रम को रोजगार गारंटी से जोड़ने का प्रस्ताव केन्द्रीय मंत्रिमंडल में रखने वाले हैं। अब राज्य सरकार में एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के केबिनेट मंत्री श्रीमान कलराज मिश्र हैं। उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र में चर्खा कताई तथा हथकरघा पर बुनाई गांव गांव घर घर में होती है। उनके गृह राज्य उत्तर प्रदेश में इस वर्ष खादी उत्पादन और खादी बिक्री घट कर न्यूनतम स्तर पर पहुंच गयी है इसलिये प्रधानमंत्री महोदय नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पानगरिया तथा एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के केबिनेट मंत्री कलराज मिश्र वित्त मंत्री अरूण जेटली सहित नीति आयोग के नीति निर्माताओं को रोजगार गारंटी स्कीम से स्किल्ड लेबर वाले प्रसंग पर बहस मुबाहसा करें। स्थायी रूप से चर्खे पर सूत कताई करघे पर बुनाई हाथ बिनाई इन तीन कामों को रोजगार गारंटी से जोड़ने के लिये बाढ़पीड़ि़त राज्यों के मुख्यमंत्रियों से विचार विमर्श कर तात्कालिक रूप से 50 दिन की अतिरिक्त रोजगार उपलब्धि 1. सूत कताई 2. करघे पर सूत बुनाई से जोड़ कर गांवों की महिला श्रम शक्ति तथा पावरलूम के उत्कर्ष से पीड़ित हथकरघा बुनकरों को रोजगार गारंटी से तुरंत जोड़ा जाना चाहिये। 
  प्रधानमंत्री जी आपकी सरकार के पदारूढ़ होने के पश्चात यू.पी.ए. सरकार द्वारा तैनात खादी ग्रामोद्योग आयोग में गैर सरकारी सदस्य नहीं हैं केवल एक वित्त सलाहकार हैं। वह खादी आयोग जिसने रूर्बन सोसाइटी की अलख वैकुंठ ल. मेहता की अध्यक्षता में वर्ष 1933-1962 तक जगायी थी गांवों को शहरी किस्म की कम से कम सुविधा उपलब्ध करने का जो खाका खींचा था गांवों में खादी ग्रामोद्योग द्वारा रोजगार उपलब्धि का जो रोडमैप वैकुंठ ल. मेहता ने बनाया था वह 1963-64 के बाद धीरे धीरे लुप्त होता चला गया। अरूण जेटली वित्त मंत्री जी ने डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन का संकल्प लिया है। रूर्बन मिशन के आजादी व योजना अवधि के पहले दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले दशक में जो उपलब्धि हुई थी उसे फिर जाग्रत करने की जरूरत है। राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तथा भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री ने अपने गुजरात मुख्यमंत्रित्व काल में जो गांवों के आंशिक शहरीकरण गांव की आत्मा को बरकरार रखते हुए जो संकल्प लिया उसे रोजगार गारंटी से तुरंत जोड़े जाने की जरूरत है। कहावत भी है - नया नौ दिन पुराना सौ दिन। हिन्दुस्तान की बढ़ती आबादी को दृष्टिपथ में रखते हुए तकनालाजी के फैलाव के बावजूद आज भी गांधी का चर्खा और हथकरघा ज्यादा से ज्यादा लोगों को पूर्ण अथवा आंशिक रोजगार मुहैया कराने का एकमात्र साधन बना हुआ है। मेक इन इंडिया का संकल्प भी हाथ की दस्तकारी, घर के रोजाना वाले घरेलू काम के समानांतर जब कभी गृहिणी को मौका मिले वह चर्खा कताई कर, हाथ बिनाई कर अपने परिवार की आमदनी में इजाफा कर सकती है। शहर व देहात दोनों जगह लोगों का रहन सहन का स्तर स्वातंत्र्योत्तर सतसठ वर्ष में बदल चुका है। हर हिन्दुस्तानी अपने लियेे रोजमर्रा की सहूलियतें चाहता है इसलिये ही महात्मा गांधी ने एक सौ वर्ष पहले चर्खा कताई व करघे पर बुनाई का जो सिलसिला चलाया वह आज भी परिवार की आमदनी बढ़ाने का सटीक जरिया है। इसलिये रोजगार गारंटी स्कीम को गांव के हर वर्ग के अनुकूल बनाने के लिये तात्कालिक तौर पर बाढ़ राहत दिलाने के लिये बाढ़ पीड़ित इलाकों में 50 दिन की रोजगार गारंटी का लाभार्जन गांवों की महिला आबादी, विकलांग तथा जुलाहों और बुनकरों को लाभान्वित करने के लिये उपयोग किया जाये। प्रत्येक गांव में महिला स्वयं सहायता समूह के जरिये चर्खा कताई व हिमालयी राज्यों में हैंडनिटिंग को रोजगार गारंटी से जोड़ कर रोजगार गारंटी से महिलाओं और गांवों के विकलांग व्यक्तियों को भी रोजगार गारंटी का लाभग्राही बनाया जाये। प्रधानमंत्री जी  के खादी के लिये लोगों मंे रूचि जगाने के पश्चात दिल्ली स्थित खादी ग्रामोद्योग भवन ने विज्ञापित जारी किया कि खादी की बिक्री इतनी घट गयी है कि खादी संस्थाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ता दिख रहा है इसलिये भी प्रधानमंत्री जी व नीति आयोग के उपाध्यक्ष पानगरिया जी को एम.एस.एम.ई. मंत्री महोदय से पता लगाना चाहिये कि 2013-14 के मुकाबले 2014-15 में समूचे भारत में खादी बिक्री ग्राफ क्या है ? बिक्री बढ़ी है या घट गयी है। जहां जहां बिक्री घट गयी है बाढ़ के प्रकोप के कारण किसान व गांव में रहने वाले ग्रामीण उद्यमों के कारीगरों को राहत देने के उपायों में अव्वल उपाय उनसे चर्खा कतवाना व उन्हें सूत कताई पारिश्रमिक मानक स्तर से दिलाना हाथ कते सूत व हथकरघा में बुने कपड़ों को मानक स्तर उपलब्ध कराया जाये। स्वतंत्रता प्राप्त करने के सोलह वर्ष जब तक वैकुंठ ल. मेहता खादी आयोग के सदर रहे उनके सहयोगी मुंबई के स्वनामधन्य मिल मालिक तथा खादी व हैंडलूम के हार्दिक समर्थक व हथकरघा व खादी कपड़ों को इंडियन टैक्सटाइल कमेटी में जगह दिलाने वाले प्राणलाल सुन्दरजी कापड़िया ही थे। उनका आदर्श सेठ अंबालाल थे जिनकी अग्रजा अनुसूया बेन महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम व सेवाग्राम आश्रम के रसौढ़े का इंतजाम देखती थीं। बाल विधवा पुत्री को सेठ साराभाई ने महात्मा गांधी जी के आश्रम में लाकर बापू व बा को सौंप दिया। गुलजारी लाल नंदा व अनुसूया बेन ने मजूर महाजन के जरिये मिल स्वामी व मिल मजदूरों में एक स्वाभाविक सहानुभूति वाला पुल बनाया। अहमदाबाद के कपड़ा मिलों की जायदाद जब सेठ अंबालाल के हाथ आयी सेठ जी के मैनेजरों ने सेठ अंबालाल से कहा था - बेन मजदूरों को भड़का रही है। सेठ अंबालाल ने अपने मैनेजरों को कहा - अगर बेन लड़की के बजाय लड़का होती तो उसका हिस्सा सेठ साराभाई की जायदाद का आधा होता। बेन जो कर रही है ठीक ही कर रही है। बेन के कामों में दखल मत दो। यह घटना महात्मा गांधी तक भी पहुंची। महात्मा ने सेठ अंबालाल को बुलाया और पीठ थपथपाई व कहा - अंबालाल तुम्हारी सोच बिल्कुल सही है। महात्मा गांधी ने इस घटना का उल्लेख यंग इंडिया के संपादकीय में किया। सेठ अंबालाल को अहमदाबाद के लोग तो उनकी भलमनसाहत के लिये जानते थे। महात्मा गांधी की अखबार नवीसी ने सेठ अंबालाल को दुनियां में प्रसिद्धि दिलवा दी। भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री ने सत्तारूढ़ दल की कार्यकारिणी के माध्यम से बंगलुरू में यही संदेशा गांव गांव घर घर तक पहुंचाने का गुरूमंत्र दिया। उन्होंने अपने राजनैतिक दल को महात्मा गांधी की वैयक्तिक जिन्दगी से सीखने की हिदायत दी। राष्ट्रीय स्वयं सेेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार जो स्वयं भारतीय स्वातंत्र्य संघर्ष के हिस्सा थे 1934 में महात्मा गांधी को संघ शाखा में आमंत्रित किया। महात्मा गांधी का जीवन का सबसे ऊँचा उद्देश्य भारतीयों में अस्पृश्यता निवारण की लहर दौड़ाना था। संघ की शाखा में जातपांत छुआछूत की दुर्गंध महात्मा को नहीं दिखी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की छुआछूत न मानने वाल प्रवृत्ति की प्रशंसा की और दूसरे संगठनों से अपेक्षा की कि वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा छुआछूत का परित्याग का अनुसरण करें। हरिजनों के बीच सवर्ण माने जाने वाले लोगों के लिये वह एक महान लक्ष्य था। गांधी के ग्यारह व्रतों में एक अद्भुत शक्ति है। राजनीति की चौखट में काम करने वाले राजनीति के माध्यम से लोकसेवा करने वाले व्यक्तियों के लिये महात्मा गांधी द्वारा निर्धारित मर्यादायें निर्वाह करने वाला व्यक्ति सामाजिक समरसता का कारक तत्व है। हिन्दुस्तान की 130 वर्ष उम्रदराज राजनीतिक जमात इंडियन नेशनल कांग्रेस ने अपने राजनीतिक कर्तत्त्व को गांधी आर्थिकी से अलग कर डाला। इंडियन नेशनल के सदस्यों के लिये खादी-बाना जरूरी था। इन्दिरा गांधी ने अपने कांग्रेस अध्यक्षता काल में कांग्रेस जनों को खादी-बाने से मुक्त कर डाला। कांग्रेस के जरिये राजनीति करने के इच्छुक व्यक्तियों को बिना खादी वर्दी का कांग्रेसमैन बनना अनुकूल लगा। खादी-बाने सेे हटवाने के पश्चात उत्तर प्रदेश और बिहार जहां खादी काम सबसे ज्यादा था एक जबर्दस्त धक्का लगा और इन दोनों राज्यों से कांग्रेस लुप्त होगयी। कांग्रेस के मार्फत लोक नेतृत्व करने वाले लोगों का नाता आम आदमी से टूट गया। गांधी की खादी को अपनाना, जब तक मनपसंद रोजगार न मिले चर्खा चला कर (चर्खा चलाना एक यौगिक क्रिया भी है) चर्खा कातने वाले को तंदुरूस्त रखती हैै। बुनाई व हाथ बिनाई भी अंगुलियों के पोर की योगविधि है। चर्खा कताई करना, करघे में बुनना, हाथ बिनाई करना ये तीनों काम योग मार्ग हैं यह परमहंस योगानंद महाराज ने 1935 में वार्धा जाकर महात्मा गांधी के संज्ञान में एक परमहंस योगी ने अपने अनुभवों के आधार पर कही। इसलिये बाढ़ पीड़ित राहत वाले 50 दिन वाली रोजगार गारंटी को सूत कताई, सूत की बुनाई व हाथ बिनाई के इन तीन कामों को मनरेगा के स्किल्ड लेबर प्रसंग से जोड़ा जाये। 
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