Wednesday, 24 June 2015

वस्त्र उद्यमिता में नयी चमक खादी - हैंडलूम गलबहियां डालने से ही आयेगी


  यह ब्लागर 15 अगस्त 1947 से खादी पहनता आरहा है और अब वह वृद्ध है। उसे अपने को बूढ़ा कहे जाने पर कोई आपत्ति नहीं लगती। यह तो शरीर का धर्म ही है। पिछले अड़सठ वर्षों में खादी वस्त्र की गुणवत्ता तिरोहित होगयी है। खादी में वह ओज नहीं रहा जो आजादी से पहले था। प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत अल्मोड़ा के अध्यापक के नाते इस ब्लागर से महात्मा गांधी की अनुयायिनी आइरिश जर्मन माता पिता की संतान मिस कैथरीन हिलामन ने संकल्प लिवाया कि जब तक मैं जिन्दा रहूँगा खादी ही पहनूँगा और वह व्रत अभी तक चल रहा है। पर खादी की ठोक जिसे अंग्रेजी में Texture कहा जाता है बहुत ढीला पड़ गया है। गांधी आर्थिकी खादी पर फैशन का कब्जा होगया है। इंडियन ऐक्सप्रेस के 4 जून 2015 के दिल्ली संस्करण ने एक मजेदार सवाल को आगे किया है। हिन्दुस्तानी हथकरघा उद्यम अपनी पुरानी साख पाने के लिये है। होल्डिंग चाहता है। इस हैंड होल्डिंग को अगर अहमदाबाद  के मजूर-महाजन अभियान से जोड़ कर देखा जाये तो बात साफ होगी। सेठ अंबालाल के मिल प्रबंधकों ने मिल मालिक सेठ अंबालाल से शिकायत की। बेन (अनुसूया याने सेठ अंबालाल की अग्रजा दीदी गुलजारी लाल नंदा के साथ मजूर महाजन संगठन चलाती थी) मजदूरों को भड़का रही है। सेठ अंबालाल ने अपने मैनेजरों को कहा - अगर बेन लड़की नहीं लड़का होती तो सेठ साराभाई की जायदाद में उसका आधा हिस्सा होता। बेन को अपना काम करने दो। इस घटना को किसी प्रत्यक्षदर्शी ने जाकर साबरमती आश्रम में महात्मा जी को सुनाया। महात्मा जी ने सेठ अंबालाल को तलब किया। सेठ की पीठ ठोकी और कहा - अंबालाल तुम मानवता के ईश्वरत्व हो। यंग इंडिया में महात्मा ने इस घटना का रोचक ढंग से उल्लेख कर सेठ अंबालाल को अहमदाबाद से कहा। सारे भारत व यूरप में पुरूष स्त्री समानता प्रसिद्धि दिला दी। मजूर महाजन और मिल मालिक अंबालाल में जो नैतिक संबंध था उसे मुंबई स्थित तेरापंथी जैन मिल मालिक प्राणलाल सुन्दरजी कापड़िया ने कपड़ा मिलों और खादी के बीच एक पुल का काम किया। कापड़िया वैकुंठ ल. मेहता के साथ खादी ग्रामोद्योग आयोग के सदस्य सचिव भी थे। हैंडलूम व खादी के पक्षधर थे। भारत सरकार की टैक्सटाइल कमेटी प्राणलाल सुन्दरजी कापड़िया का लोहा मानती थी। 1966 में भारत के तत्कालीन योजना मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने पावरलूम की बढ़त का सामना करने के लिये खादी वालों को हथकरघा से गलबहियां करने का प्रस्ताव रखा। यह ब्लागर खादी पुरोधा विचित्र नारायण शर्मा से मिलने दिल्ली से लखनऊ गया। उनसे प्रार्थना की कि पावरलूम से हथकरघा व खादी को बचाने का एक ही उपाय है खादी-हथकरघा गलबहियां। विचित्र नारायण जी ने इस ब्लागर से कहा - तुम तो ग्रामोद्योगी हो। वही सोचो वही कहो। खादी के बारे में तुम्हें बोलना नहीं चाहिये। इस ब्लागर को तब शर्मा जी ने बुरी तरह झिड़का था। विचित्र नारायण शर्मा पंडित नेहरू के विश्वासपात्र सहयोगी थे। उन्होंने पंडित नेहरू से कह कर गुलजारी लाल नंदा के पावरलूम का सामना करने अद्वितीय प्रस्ताव को गौहाटी कांग्रेस के वक्त खाारिज कर दिया पर जब उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ वे इस ब्लागर से बोले - तुमने सही राय दी थी। पावरलूम का सामना खादी अकेले नहीं कर सकती। तब बहुत विलंब हो चुका था। उनके साले साहब सोमदत्त वेदालंकार को प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने खादी ग्रामोद्योग आयोग का अध्यक्ष विचित्र नारायण शर्मा जी की सिफारिश पर बनाया था। सोमदत्त वेदालंकार ने डासना में धीरूभाई अंबानी द्वारा पोलियेस्टर कारखाने के उत्पाद 70 प्रतिशत कपास 30 प्रतिशत मानव निर्मित रेशे के मिश्रण पोलियेस्टर स्लाइबर निर्माण कर सूती खादी के समानांतर पोली खादी की संरचना का जाल बिछाया। विचित्र नारायण शर्मा खादी पोलियेस्टर मिलावट के पक्षधर न होकर खादी की शुद्धता की बात करते रहते थे पर उनकी पकड़ खादी वालों में नहीं रह गयी थी। उन्होंने इस ब्लागर को कहा - बनाना चाहता था गणेश बन गया बन्दर। उनकी आकांक्षा केवल इतनी थी कि उनकी श्वास चलते रहने तक खादी का खात्मा न हो। इस ब्लागर से उन्होंने अपनी मृत्यु से एक सप्ताह पहले कहा - मुझसे वादा करो जब तक जिन्दा रहोगे खादी की बात करते रहोगे। इस ब्लागर ने कहा - बाबा जी आपकी बात शिरोधार्य है। उन्होंने पंडित नेहरू के असीम सहयोग से जो संस्था - गांधी आश्रम 1929 से लगातार मृत्युपर्यंत 1998 तक संचालित की उसका सूती खादी उत्पादन स्तर बहुत गिर गया है।
  2. रामनाथ गोयनका ने जो अखबार तिरासी वर्ष पूर्व शुरू किया वह एक राष्ट्रवादी अखबार है। उसकी अपनी मर्यादायें एवं लक्ष्मण रेखायें हैं। यद्यपि रामनाथ गोयनका के दिवंगत होने के पश्चात अखबार की वह गरिमा घटी है जो रामनाथ गोयनका की देन थी। फिर भी भारत के अंग्रेजी अखबारों में इंडियन ऐक्सप्रेस का अपना वजूद है। परिधान श्रंखला पर अखबार का मानना है कि गुलजारी लाल नंदा ने जो शंका 1961 में व्यक्त की थी पावरलूम देश की वस्त्र उत्पादकता के क्षेत्र में आधे से नब्बे फीसदी ज्यादा पर काबिज है। अखबार कहता है हथकरघा का हिस्सा केवल 11 प्रतिशत, निटवियर यार्न हौजरी का 26 प्रतिशत खादी रेशम व ऊन  एक प्रतिशत मिलों में बुनाई 4 प्रतिशत है। राज्यवार हथकरघा इकाईयां कारीगरों तथा करघों की संख्या आंध्रप्रदेश तेलंगाना सहित क्रमशः 1.5 लाख 3.6 लाख 1.25 लाख असम में 12.4 लाख 16.4 लाख 4.1 लाख तमिलनाडु में 1.9 लाख 3.5 लाख 1.5 लाख बिहार में इकाईयां 25 हजार कामगार 43 हजार करघे 15 हजार पश्चिम बंगाल में 4.1 लाख इकाईयां कारीगर 7.6 लाख करघे 3.1 लाख मणिपुर में इकाईयां 1.8 लाख कारीगर 2.2 लाख करघे 1.9 लाख कुल मिला कर उन्नीस लाख हथकरघों का 6 राज्यों में कार्यरत होना बताया गया है। रपट इकट्ठा करने वाले संगठन को जम्मू कश्मीर पंजाब हरियाणा राजस्थान मध्यप्रदेश गुजरात महाराष्ट्र कर्णाटक केरल उड़ीसा छत्तीसगढ़ झारखंड उत्तर प्रदेश सरीखे राज्यों के ब्यौरे नहीं प्राप्त हैं। वर्ष 1995-96 में हथकरघा सहित टैक्सटाइल क्षेत्र में 65.51 लाख लोग रोजगार पारहे थे। यह आंकड़ा गिर कर 2009-10 में 43.32 लाख रह गया। पावरलूम में काम करने वाला बुनकर या कारीगर कबीर का प्रतिनिधि जुलाहा न रह कर एक मजदूर रह गया है। जहां जहां पावरलूमों की संख्या ज्यादा है उनके बुनकरों की पारिवारिक तथा उद्यमिता स्थिति स्वतंत्र हथकरघा जुलाहों से बदतर है। जरूरत इस बात की है कि पावरलूम जो वस्त्र उत्पादन का 60 प्रतिशत उपलब्ध कराते हैं उनकी हालत सुधारने के उपाय किये जायें साथ ही हथकरघा बुनकरों को गांवों में रोजगार गारंटी से जोड़ा जाये और जो बुनकर शहरी इलाकों में हथकरघे पर बुनाई करते हैं उनके बुनाई कौशल को घर घर बनाये जाने की जरूरत है। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले बुनकरों तथा चर्खे पर कताई कर परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिये शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू मनरेगा के समानांतर शहरों में रहने वाली हाथ बुनाई, चर्खा कताई करने वाली महिलाओं जूता बनाने वाले कारीगरों, महाराष्ट्र में कोलापुरी चप्पल बनाने वाले कारीगरों बिहार के दरभंगा उ.प्र. के कानपुर व आगरा के जूता बनाने वाले कारीगरों को शहरी इलाकों में रोजगार गारंटी के लिये तैयारी करने के उपायों से हाथ की दस्तकारी करने वाली महिला श्रम शक्ति को शहरों के लिये अनुकूल रोजगार गारंटी प्रावधान लागू करने के बारे में सरकार समुचित निर्णय ले। अंबेडकर जयंती वर्ष में जुलाहों हाथ बिनाई करने वाली मां बहनों हैंड निटिंग यार्न की कताई करने वाली मां बहनों जूता बनाने वाले कारीगरों शहरी रोजगार गारंटी प्रावधान से जोड़ा जाये। प्रकारांतर से मनरेगा कानून को महात्मा गांधी नेशनल इम्प्लायमेंट गारंटी का आकार दिया जाये। शहरी आबादी को भी रोजगार गारंटी की जरूरत है इसलिये दक्ष कारीगरियों को योजना से जोड़ा जाये ताकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र के बुनकरों को जो आश्वासन दिया है हथकरघा बुनाई के काम को रोजगार गारंटी का प्रमुख अंग बनाया जाये। 
3. अक्टूबर 2014 में यह खबर पढ़ी थी कि खादी ग्रामोद्योग भवन की बिक्री 180 प्रतिशत बढ़ गयी है। परिधान क्षेत्र में जो आपाधापी है पावरलूम उत्पाद हथकरघा व खादी के नाम पर बेचे जारहे हैं। पावरलूम ऐसोसिएशन चाहता है कि हथकरघा व खादी दोनों निहत्थे हो जायें। अभी खादी ग्रामोद्योग भवन नयी दिल्ली में खादी उत्पाद कनसाइनमेंट पद्धति से लिये जारहे हैं। ज्यादातर खादी भंडारों व हथकरघा कपड़े की दुकानों में पावरलूम कपड़ा खादी और हथकरघा के नाम पर बिक रहा है। शाइनी वर्गीज का कहना है - पावरलूम वस्त्र सेक्टर में साठ फीसदी पर कब्जा किया है। वे बताती हैं कि हथकरघा कपड़े से पावरलूम पर बुना गया कपड़ा उनकी दृष्टि में ज्यादा तेज व पावरलूम बुने कपड़े हथकरघा बुने कपड़े से ज्यादा तेजी से बंधा याने पक्के टेक्स्चर वाला होता है। शायद लेखिका ने हथकरघा बुने कपड़े और पावरलूम बुने कपड़े पर अपनी किताबी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। वस्तुतः हथकरघा बुना कपड़ा डिजाइन और टेक्स्चर की दृष्टि से ज्यादा अनुकूल हुआ करता है। उसमें बुनकर के अंगुलियों के स्पर्श योग से परिधान की चमक बढ़ती है। भारत सरकार को चाहिये कि मजूर महाजन प्रविधि के सामजिक अर्थज्ञ गुलजारी लाल नंदा ने पावरलूम के बारे में जो अभिव्यक्ति 1961 में की थी उसे खोजा जाये। वस्त्र उद्योग में पावरलूम ने मिलों में बुने कपड़े होजरी उपकरणों से बुने कपड़े हथकरघा बुने कपड़े और हाथ कते सूत से हथकरघों में बुने कपड़े याने खादी को पछाड़ डाला है। यह संकट गुलजारी लाल नंदा ने समझा था इसीलिये अखिल भारतीय कांग्रेस सम्मेलन गुवाहाटी में 1961 में खादी सेक्टर के अग्रणी पंडित नेहरू के विश्वस्त साथी विचित्र नारायण शर्मा जिन्हें पंडित नेहरू व आचार्य कृपलानी ने गांधी आश्रम मेरठ की कमान सौंपी थी उन्होंने खादी और हैंडलूम के साहचर्य का घोर विरोध किया। ठीक दस वर्ष पश्चात विचित्र नारायण शर्मा जी को लगा कि उन्होंने गुलजारी लाल नंदा के सुझाव को ठुकरा कर खादी की कुसेवा की। उन्हें जब अपनी गलती का भान हुआ उन्होंने खुल कर व्यक्त भी किया पर तब बहुत देर हो चुकी थी। पंडित नेहरू खादी के जितने पक्षधर थे इंदिरा जी खादी के उतनी ही प्रतिकूल थीं। उन्होंने अपने शासन काल में कांग्रेसजनों को खादी पहनने की शर्त्त से मुक्त कर दिया। खादी सूत कातने वाली महिला श्रम शक्ति तथा हथकरघा बुनकरों के लिये एक नयी विपदा के रूप में पावरलूम बढ़ता पाता गया। जो हथकरघा बुनकर अपने हथकरघे पर बुनाई कर कबीर का रास्ता अपनाते थे वे पावरलूम के मजदूरों के रूप में झुग्गी झोंपड़ी स्लम एरिया जीवन बिताने के लिये बाध्य होगये। वस्त्र उद्योग के निहित स्वार्थ केन्द्रों ने खेतीबाड़ी में आजीविका के पश्चात जो बहुत बड़ी क्षमता वस्त्र उद्योग सूत कताई मिलों कपड़ा बुनाई मिलों हथकरघा तथा चर्खे में सूत कात कर परिवार की आमदनी बढ़ाने के साथ साथ परमहंस योगानंद महाराज ने 1935 में वार्धा में महात्मा गांधी से कहा था कि चर्खे पर सूत कातना विशुद्ध योग है। हाथ कताई हाथ बुनाई चर्खे पर सूत कताई करघे पर बुनकर द्वारा ठोक बुनाई अंगुलियों के पोरों का महत्वपूर्ण योग है। 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जारहा हैै, उसमें परमहंस योगानंद महाराज व महात्मा गांधी के बीच हुआ लिखित संवाद अंगुलियों के पोर स्पर्श का उत्कृष्ट योग मार्ग है, इस तथ्य को योग मार्ग के संज्ञान में लाने की आवश्यकता है। केन्द्रीय कपड़ा मंत्री संतोष गंगवार महाशय को पावरलूमों को हथकरघा व खादी को बर्बाद करने के समुचित कदम उठाने चाहिये ताकि हथकरघा बुनकरों की कारीगरी के साथ साथ बुनकरों को अपने घर में ही रोजगार साधन मिले। उसे मिरंडी, हापुड़, मऊ, रानीपुर जहां जहां पावरलूम ज्यादा संख्या में लगे हैं उनके मजदूर बुनकरों की रहन सहन की स्थितियां सुधारने की दिशा में कदम उठाते हुए पावरलूम उद्यमिता को आर्थिक पटरी पर लाने के उपाय करने चाहिये। क्या ही अच्छा होता यदि भारतीय वस्त्र उद्यमिता एवं पहनावे में नित नवीनता तथा फैशन संबंधी समूचे वस्त्र भूषा उद्यमिता की पड़ताल की जाती और हिन्दुस्तानी हथकरघा उद्यमिता को उसका वह आसन भारत सरकार दिला पाती जो इस्लामी सल्तनत के बावजूद जुलाहे को धंधा कर आजीविका चलाने वाले भक्त कबीर दास ने हथकरघा पर अपनी अंगुलियों का पोरव चला कर जुलाहा, बुनकर, तांती, कोरी नाम से जाने जाने वाले बुनकरों को हिन्दुस्तान की आर्थिकी में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। 
4. गुलजारी लाल नंदा ने हथकरघा और हाथ कती करघा बुनी खादी को तब त्वरित वेग से बढ़ रहे पावरलूम वस्त्र उद्यमिता से आगाह किया था। मिलों व पावरलूमों में बुना जाने वाला कपड़ा संगठित वस्त्र उद्यमिता का स्त्रोत है। अब भारत में मिल मालिक अंबालाल और प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया सरीखे सज्जन नहीं रहे जो खादी पहनते थे। खादी के लिये महात्मा गांधी के प्रयासों को मिल मालिक की हैसियत रख कर बढ़ावा देते थे। हैंडलूम ऐक्ट 1983 के अनुसार हैंडलूम वस्त्र उद्यमिता के लिये आरक्षित निर्मितियों की संख्या घटा कर 11 कर दी गयी है। पावरलूम संचालन करने वाले वस्त्र उद्यमियों का संगठन पिछले साठ वर्षों में सर्वशक्तिमान होगया है। ऐसोसिएशन ने कपड़ा मंत्रालय से मांग की है कि साड़ी उत्पादन को हैंडलूम में जो संरक्षण दिया गया है साड़ी हथकरघा से बाहर कर दी जाये। हिन्दुस्तान में महात्मा गांधी ने कदमकुआं पटना में 24.9.1924 के दिन (तब चर्खा द्वादशी सितंबर महीने में 24वीं तारीख को थी) अपनी अध्यक्षता में आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसिएशन हिन्दी में उसे चर्खा संघ कह कर संगठित किया। चर्खा संघ में महात्मा के अलावा मौलाना शौकत अली, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, सतीश चन्द्र गुप्ता, मगनलाल गांधी उसके सदस्य तथा जमनालाल बजाज खजांची और पंडित नेहरू, शंकरलाल बैंकर व शोएब कुरैशी सेक्रेटरी तैनात हुए थे। यह आई.एस.ए.(चर्खा संघ) गांधी निर्वाण 1948 के पश्चात तिरोहित होगया पर इंडियन मिल ऐसोसिएशन व इंडियन स्पिनर्स ऐसोसिएशन अब भी कार्यशील हैं और वस्त्र उद्यमिता में मूर्छित मरणासन्न हथकरघा व खादी को अपना एकमात्र दुश्मन मान रहे हैं। जब इस संगठित उद्यमिता को मौका मिलता है सरकार में ऐसे महानुभाव प्रतिष्ठित होते हैं जो हथकरघा व खादी के खिलाफ हैं। आई.एस.ए. व पावरलूम ऐसोसिएशन अपना ऐजेंडा आगे बढ़ाते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बनारस के बुनकरों की तकलीफ देख सुन ली है। भारत के वस्त्र उद्योग में नया मोड़ लाकर प्रधानमंत्री हथकरघा व खादी को न्यूनतम संरक्षण देकर अपने ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम को गतिवान बना सकते हैं। वस्त्र उद्यमिता के क्षेत्र में उन्हें मजूर महाजन शैली के उद्गाता गुलजारी लाल नंदा की चिंतन शैली का पुनर्वाचन करना ही होगा तभी वे हथकरघा बुनकरों व चर्खे पर कताई कर परिवार की आमदनी में इजाफा करने वाली हिन्दुस्तानी मां बहनों का योगक्षेम सुनिश्चित कर सकते हैं। वे इजरायल जाने वाले हैं। पंडित नेहरू ने इजरायल शैली से भारत के गांवों का रूर्बनाइजेशन विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा सहकारिता के प्राण वैकुंठ ल. मेहता को समर्थन दिया था कि वे भारत में रूर्बन सोसाइटी का सूत्रपात करें। रूर्बन सोसाइटी वाला प्रकरण 1953-54 से 1963 तक ग्रामीण अर्थवेता झबेरभाई पी. पटेल के नेतृत्व सघन क्षेत्र योजना के रूप में सफलातपूर्वक चला। वैकुंठ ल. मेहता द्वारा खादी आयोग अध्यक्षता से उपराम लेने उछंगराय नवलकिशोर ढेबर द्वारा खादी की कमान संभालते ही रूर्बन सोसाइटी का संकल्प तिरोहित होगया। 
5. शाइना वर्गीज ने वस्त्र उद्यमिता क्षेत्र के पांच विशेषज्ञों की राय अपने आंकलन में प्रस्तुत की वह निम्न प्रकार है।
1. सुश्री ऋतु सेठ अध्यक्षा दस्तकारी उत्थान ट्रस्ट का कहना है - पावरलूम व हथकरघा के लिये अलग अलग नीति निर्धारण की जाये। हथकरघा रोजगार देने वाला कृषि के बाद दूसरा बड़ा कार्य है अतः हथकरघा को भी संरक्षण मिले। 
2. मकबूल हसन जो नामी बुनकर हैं उनकी राय हैंडलूम ट्रेडमार्क तय करे वैसे ही जैसे सोना व्यापार के लिये तय है। आर्थिक विशेषज्ञ जयति घोष की राय हथकरघा वस्त्र विज्ञानियों की मदद चाहिये। फैशन डिजाइनर दीपिका गोविन्द की राय में स्कूलों में बुनाई शिक्षा दी जाये। लैला तैयब जी का विचार है कि केवल डिजाइन पर ही न सोचें हथकरघा सेक्टर की समस्याओं पर सामयिक कार्यवाही हो। 
पावरलूम इस वक्त देश का सबसे बड़ा वस्त्र उत्पादक है। पावरलूम हथकरघा और खादी दोनों को मरणासन्न कर चुका है पर हथकरघा और खादी की अपनी विशेषतायें हैं इसलिये कपड़ा मंत्रालय के हथकरघा आयुक्त और खादी ग्रामोद्योग आयोग के जो अब आयुक्त खादी ग्रामोद्योग के अधीन है उससे खादी सूती खादी पोली खादी ऊनी खादी तथा रेशमी खादी और ऊनी रेशमी सूत ऊन किन्हीं दो के संयोग से तैयार खादी वस्त्र की खादी की खादी की परिभाषा में बदलाव लाया जाये। हाथ कते हथकरघा बुने सूती, ऊनी रेशमी कपड़ों के साथ साथ मिल कते सूत ताने व हाथ कते सूत बाने को खादी का दर्जा दिया जाये। चर्खा कताई व करघा बुनाई के समूचे हथकरघा कार्यक्रम को खादी ग्रामोद्योग आयोग से जोड़ कर खादी सेक्टर का जो स्वरूप है उसे हथकरघा बुनकरों के योगक्षेम में प्रयुक्त किया जाये ताकि हथकरघा और खादी दोनों फिर जीवित होकर वस्त्र उद्यमिता में अपना स्थान निश्चित कर सकें। मजूर महाजन चिंतन शैली ही वस्त्र उद्यमिता में नयी चमक ला सकती है इसलिये बिना विलंब किये हथकरघा आयुक्त और खादी ग्रामोद्योग आयोग का विलय कर दिया जाये। खादी की परिभाषा में हथकरघा बुना कपड़ा भी जोड़ा जाये।
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