Wednesday, 24 June 2015

मोदी का पहला वत्सर गुडि पड़वा चमकदार वर्ष है
भारत फिर कौटिल्यीय अर्थ पर प्रवेश कर चुका है
गुण न हेरानो गुण ग्राहक हेरानो

हेनरी किसिंजर ने अपनी ताजा पुस्तक में हिन्दुस्तान की भगवद्गीता - ज्योत्सर कुरूक्षेत्र में संपन्न कृष्णार्जुन संवाद और कौटिलीय अर्थशास्त्र पर अपनी बेबाक टिप्पणी के द्वारा आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति खुद सही तरीके से समझ कर गीता अर्थशास्त्र पर जो विचार व्यक्त किये हैं वे आज भारत की आत्मा के प्रतीक हैं। भारत द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत तथा विशिष्ट द्वैताद्वैत की भूमि रही है। शिकागो विश्वविद्यालय की मनस्विनी अध्येता वैंडी डोनेगर ने ‘हिंदू-एक आल्टरनेटिव हिस्ट्री’ नामक पुस्तक लिख कर दुनियां को बताना चाहा है कि हिन्दू धर्म के ऐतिहासिक प्रवाह की वे अकेली मनीषी हैं। दीनानाथ बत्रा ने वैंडी डोनेगर के चिंतन पथ में हिमालय सरीखा हिमखंड खड़ा कर डोनेगर की ऐतिहासिकता को अनेक सवालों के घेरे में उलझा कर भारत में विद्या विनोदिनी वैंडी डोनेगर की रचना को अनुपयोगी तथा अविश्लेषित ग्रंथ साबित कर हिन्दू-एक आल्टरनेेटिव हिस्ट्री को भारत में बांटने के काम पर रोक लगा दी। इस ब्लागर ने डोनेगर की पुस्तक को तीन बार पढ़ा और पाया कि डोनेगर छिछोलेपन पर हैं। मैकोलाइट अंग्रेजी को अपनी वाग्वाणी सरस्वती मानने वाले हिन्दुस्तानियों में प्रताप भानु मेहता, रामनाथ गोयनका सरीखे राष्ट्रवादी हिन्दुस्तानियों द्वारा तिरासी वर्ष पूर्व शुरू किये गये अंग्रेजी अखबार इंडियन ऐक्सप्रेस जिसे पूर्णतः भारतीय राष्ट्रीय अखबार की विशेषताओं वाला दैनिक पत्र कहा जारहा है यह अखबार एक उत्तर भारतीय माारवाड़ी बनिये द्वारा शुरू किया गया था। पिछले 80-82 वर्षों से यह अखबार चेन्नई के हिन्दू और दिल्ली के हिन्दुस्तान टाइम्स की राष्ट्रवादिता को अंग्रेजी अखबार नवीसी को नया आवरण देने वाला अखबार है। यह ब्लागर अंग्रेजी अखबार नवीसी की खिलाफत नहीं करता केवल इतना ही कहना चाहता है कि हिन्दुस्तान के अंग्रेजी अखबार नवीस हिन्दुस्तानी जबानों बोलियों के हीरे जवाहरात की विशेषता भी अपने अखबारी तंत्र से जोड़ें। केवल विलायती और अमरीकी अखबारों की नकल करने से भारत की लोकतांत्रिक नींव मजबूत नहीं हो पायेगी। प्रताप भानु मेहता के अनुसार नरेन्द्र दामोदरदास मोदी इलूसिव हैं। अंग्रेजी कोशकारों के अनुसार पकड़ और गिरफ्त में न आने वाली मछली की तरह फिर जल में तैरने लगते हैं। अगर प्रताप भानु मेहता महाशय विलायती फिरंगी जबान में अपनी मातृभाषा का पुट जोड़ते तो शायद उन्हें फ्रेंक मोरेस बी.के. तिवारी अरूण शौरी ने जिस तरह रामनाथ गोयनका के संकल्प को आगे बढ़ाते थे नजीरों व उदाहरणों का भारतीयकरण संपन्न कर अंग्रेजी अखबार नवीसी की ओर पाठकों को आकर्षित करते रहते थे। हिन्दी अखबार नवीसी में बाबूराव पराडकर कमलापति त्रिपाठी डाक्टर राममनोहर लोहिया ने जो छाप हिन्दी पत्रकारिता पर डाली थी उसका शतांश हिन्दुस्तान दैनिक के संपादक शशि शेखर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। दैनिक जागरण को जो नवचेतना पूर्ण चन्द्र गुप्त ने दी वह उनकी तीसरी चौथी पीढ़ी में भौंडी अनुवादी हिन्दी होगयी लगती है पर उनके अखबार नाम जिसे पूर्ण चंद्र गुप्त ने जागरण नाम दिया आज भी जागरण का काम तो जाने अनजाने कर ही रहा है, सबसे ज्यादा लोग उनके अखबार को पढ़ रहे हैं। हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं के अखबार नवीसों नकल और भौंडे अनुवाद से रूखसत लेकर अखबारी चिंतन पोखर बनना होगा। सही मानों में नारद का अवतार बन कर आगे आना होगा तभी वे हिन्दुस्तान की राजनीति को वह स्वरूप दे सकते हैं जिसकी कल्पना नरेन्द्र मोदी के अंतर्मन में है। इंडिया टुडे के संपादक अरूण पुरी ने गत वर्ष दिल्ली दरबार की जुगत की थी। उनकी राय में सत्ता के गलियारों में दलाली करने वाले लोग अभी नरेन्द्र मोदी पर हाथ नहीं डाल पारहे हैं। उन्हें नरेन्द्र मोदी की वैयक्तिक कमजोरियों पर पकड़ नहीं हो पायी है। प्रताप भानु की राय में मोदी के गुण अवगुण अभी तक उनके धुर विरोधी भी समझ नहीं पाये हैं। इस ब्लागर ने दिल्ली दरबार का पहला किस्सा पाण्डव युधिष्ठिर के द्वारा दिल्ली में संपन्न राजसूय यज्ञ में लाखों लोगों का सम्मिलित होना था जिसमें योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के मौसेरे भाई चेदिराज शिशुपाल भी उपस्थित थे। वे निन्दा पुराण के व्याख्याता थे। श्रीकृष्ण ने अपनी मौसी को वादा किया था कि शिशुपाल के सौ अपराध तो मैं माफ कर दूँगा पर वह आगे बढ़ता गया तो उसे निर्जीव कर दूँगा। परूष वाक्य निंदा तथा अपकीर्ति का रास्ता अपनाने वाले शिशुपाल को भरी राजसभा में श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से निर्जीव कर डाला। तुरंत शिशुपाल के पुत्र को चेदिराज घोषित कर शिशुपाल की अंत्येष्टि करवा दी। शिशुपाल निंदक आज भी राजनीतिक गलियारों में यत्र तत्र सर्वत्र फैले हुए हैं। लोकतंत्र और राजतंत्र में फर्क ही यही है कि लोकतंत्र में दैहिक वध नहीं किया जा सकता। यहां राजनीतिक हतोत्साहिता बढ़ाई जाती है। अपने राजनीतिक चिंतन आकलन में प्रताप भानु मेहता पंडित नेहरू व अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व गुणों अथवा अवगुणों की गिनती करते हुए उनकी नेतृत्व विशिष्टताओं का उल्लेख कर रहे हैं। पंडित नेहरू के सामने विभाजित भारत को संगठित रूप में एक गणराज्य का आकार देने की आकांक्षा थी, अटल बिहारी वाजपेयी के सामने साझी सरकार चलाने और सभी सहयोगियों की बात पर ध्यान देने की प्राथमिकता थी। नेहरू युग तथा अटल बिहारी वाजपेयी के साझाा सरकार युग में जो राजनीतिक अथवा नेतृत्व कुंठा थी वह नरेन्द्र मोदी के सामने उस उग्र रूप में नहीं है परंतु उधारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के समानांतर शासन संचालन में सिस्टम फेलियर का तड़का आज की भारतीय लोकतांत्रिक व प्रशासन तांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी दुखती रग है। प्रताप भानु मेहता की सम्मति में मोदी विरोधाभासों के प्रतीक हैं। वे सोचते हैं कि नरेन्द्र मोदी उनकी राय में सभी सद्गुणों को अपने व्यक्तित्त्व में समाहित कर एक ऐसे उपक्रम की परिकल्पना करते हैं जो प्रताप भानु मेहता की विचार शैली के अनुसार एक उपलब्ध न की जा सकने वाली क्षमता है। मेहता महाशय ने अंग्रेजी के ‘क्विक्सोटिक इन्टरप्राइज’ शब्द का प्रयोग किया है। उनकी राय में भारतीय राजनीति की लोकतांत्रिकता की गठरी कुंठा इस सरकार में तीव्रतम रूप में सक्रिय है। उनकी राय में एक विरोधाभास तो पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाला है और दूसरा विरोधाभास उनकी नजर में सद्गुण वाली सोच तथा लोकतांत्रिक संगठनों के प्रति सरकार व नेतृत्व के मनोभाव से संबंधित बताते हैं। दूसरे मैकोलाइट भारतीय चिंतकों की भांति प्रताप भानु मेहता महाशय भी पश्चिम मुख्य तौर से बर्तानी सोच और आधुनिक अमरीकी अंग्रेजी सोच से प्रभावित व्यक्तित्त्व हैं। वे यह भूल रहे हैं कि वे पूरे हिन्दुस्तानी हैं, उनकी नसों में हिन्दुस्तान ममता का मातृत्व विद्यमान है जिस सांस्कृतिक और सामाजिक परिवेश में वे पोषित हुए हैं वह भी हिन्दुस्तानी है। इसलिये दूसरे मैकोलाइट भारतीयों की तरह प्रताप भानु मेहता महाशय भी उधारी लोकतंत्र व शासनतंत्र के मोहपाश में बंधे हुए प्रतीत होते हैं। प्रताप भानु मेहता महाश्य के नाम से लगता है वे गुजराती वैष्णव समाज से आते हैं। जब देश ने नरेन्द्र मोदी को नेतृत्व के लिये चुना लोकभावना दो लालसाओं पर केन्द्रित थी। पहली देश को दृढ़ निश्चयी नेता उपलब्ध कराना दूसरी सांगठनिक जिसे भारतीय नैगम कहता है उस वैचारिक नैगम संस्थान को मजबूत करना उनकी राय में नरेन्द्र मोदी ने अपना समूचा व्यक्तित्त्व संबल दृढ़ निश्चयी नेता के रूप में उभार कर स्वयं को प्रस्तुत किया है। उनके नेतृत्व संभालने के पश्चात भारत की षोडषी लोकसभा सत्र विधि व विधान के नजरिये से प्रताप भानु मेहता उपयोगी तो मानते हैं साथ ही वे सोचते हैं कि यह सरकार उस सांस्थानिक तंत्र को दुरूस्त करने की मानसिकता से कहीं परहेज तो नहीं कर रही। मेहता महाशय की आशंका लोकहित साधने वाले निजी व्यक्तित्त्व को सुरक्षा न्याय पद्धति संरक्षण पुलिस नौकरशाही सी बी आई सी वी सी और आर टी आई संगठनों के प्रति प्रतिबद्धता के बजाय सांस्थानिक स्तूप के अस्तित्व को कमजोर करने की नीति तो नहीं अपनायी जारही। मेहता महाशय ने अंग्रेजी भाषा के डिसरिपेयर शब्द का प्रयोग किया हिन्दुस्तानी लहजे में इसे व्यवस्था उदासी कहा जाता है। जिस घर में रहते हैं उसकी देखरेख मरम्मत न करना व्यवस्थित न रखना उदासीनता कहा जा सकता है। जिन महत्वपूर्ण संस्थानों में शीर्ष नियुक्तियों को लेकर मेहता महाशय ने आशंका व्यक्त की उनमें कुछ पर तो सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगायी थी जो अब हटा ली गयी है। जहां तक सूचना की दरकार वाला कानून है पिछले दस वर्ष से यह कानून लागू है। जरूरत इस बात की है कि यह पड़ताल की जाये कि कहीं सूचना कानून के अस्तित्व में आने के बाद नौकरशाही के विभिन्न स्तरों में आसन्न कर्तव्यपूर्ति में रूकावटें तो नहीं आयी हैं ? नरेन्द्र मोदी की सरकार ऐसे कानूनों को लोप करने की पक्षधर है जिनसे लोकव्यवस्था में बाधायें उपस्थित होरही हैं। देश का राजनीतिक आचरण परिवार अथवा एकाधिकार वादी मार्ग की ओर अग्रसर होरहा है। स्वातंत्र्योत्तर पौने सात दशकों में भारत में एक दर्जन से ज्यादा सुप्रीमो शैली के राजनीतिक दलों का क्षेत्र विस्तार हुआ है। राजनैतिक आकांक्षा के क्षेत्र में एक दर्जन से कम ऐसे राजनीतिक दल रह गये हैं जिनमें क्षत्रप शैली और एकाधिकार राजनीतिक वैचारिक सत्ता का गहरा आरोपण हुआ है। तमिलनाडु के दोनों राजनीतिक खेमे सुप्रीमोमूलक हैं। दोनों का प्रभाव क्षेत्र समूचा तमिल लोकमत है। कर्णाटक के सुप्रीमो देवगौड़ा उनके पुत्र कुमार स्वामी सामर्थ्य रहित सुप्रीमो हैं। महाराष्ट्र के शिवसेना सुप्रीमो का प्रभाव क्षेत्र यद्यपि बाल ठाकरे के निधन के पश्चात ढीला पड़ा है पर उद्धव ठाकरे अपने पिता की कुशाग्र बुद्धि का लाभार्जन तो कर ही रहे हैं। शरद पवार की राजनीति को पूर्णतया सुप्रीमो नहीं कहा जा सकता, तमिलनाडु की तरह जम्मू कश्मीर में भी दो सुप्रीमो हैं वर्तमान में जिनकी कमान क्रमशः उमर अब्दुल्ला व मुफ्ती मोहम्मद कन्या के हाथ हैै। पंजाब की सुप्रीमो शैली पर प्रकाश सिंह बादल व उनके पुत्र का एकाधिकार है, उत्तर प्रदेश में दो सुप्रीमो हैं मुलायम सिंह यादव व मायावती। बिहार के सुप्रीमो लालू यादव निस्तेज होगये हैं पर ऐंठन अभी बाकी है। नवीन पटनायक और ममता बनर्जी भी सुप्रीमो हैं जिनमें अभी शक्ति है। अरविन्द केजरीवाल नये सुप्रीमो हैं जो राजनैतिक महावरे को विरोध मान कर अपने अलावा दूसरे को घेरे में नहीं आने देते हैं। आज राज्यों में सत्तासीन 6 सुप्रीमो हैं। सोनिया गांधी भी सुप्रीमो शैली की राजनीति करती हैं। इसलिये सबसे पहली जरूरत यह है कि सत्तासीन पांच सुप्रीमो महानुभावों से मुख्य चुनाव आयुक्त विचार विमर्श कर उन्हें प्रेरित करें कि वे सुप्रीमो सत्ताधिष्ठान में अपने अलावा कम से कम सात ऐसे व्यक्तियों को भी जोड़ें जो सुप्रीमो के एकाधिकार को सुप्रीमो मंडल के सात महत्वपूर्ण व्यक्ति चुनें उन्हें बारी बारी शीर्षाधिकार सौंपें। उत्तर प्रदेश में सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने अपने पुत्र अखिलेश यादव को सत्ता सौंपी है। पांच वर्ष के अनुभव के पश्चात अखिलेश यादव अपने पिता से अलग राह पकड़ सकते हैं। यहीं पर योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण की आन्वीक्षिकी राजनीति प्रभावकारी होती है। आगामी चुनाव 2017 में अखिलेश यादव अपने पिता को दरकिनार कर सकते हैं। ठीक उसी तरीके से जिस तरह औरंगजेब ने शाहजहां को कैदी बना डाला था। इसलिये वर्तमान में ममता बनर्जी नवीन पटनायक जयललिता अरविन्द केजरीवाल प्रकाश सिंह बादल और मुफ्ती सईद के विचार उनकी कार्यशैली तथा उनके विश्वस्त सात सहयोगियों की वे घोषणा करें। राजनीतिक दल प्रमुख पद पर अकेले काबिज न हो कर विश्वस्त सहयोगी मंडल को देश के सामने लायें। सत्ताधिकार व दल का एकाधिकार एक ही व्यक्ति में निहित न हो। प्रधानमंत्री मोदी को अपने वाक् चातुर्य तथा सत्ता के निर्लोभी व्यक्तित्त्व के प्रभावित कर सत्ता सुख और राजनीतिक सुप्रीमो क्षत्रप जयललिता, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, प्रकाश सिंह बादल मुफ्ती सईद और अरविन्द केेजरीवाल से पहले राजनीतिक वार्ता फिर संवैधानिक वार्ता द्वारा उन्हें क्षत्रप रहते हुए अपने सात ऐसे विश्वस्त सहयोगियों की सूची बनाना चाहिये जो उनके विचार तथा निर्णयों से सहमति रखते हों एवं राजपद अथवा राजनीतिक क्षत्रप प्रभामंडल का शीर्ष पद एक व्यक्ति क्रमशः दस वर्ष राजपद व चार वर्ष सुप्रीमो राजनीतिक दल पद पर अधिपति रहना स्वीकार करना चाहिये। आज जो पन्द्रह राजनीतिक सुप्रीमो देश में विद्यमान हैं उन्हें एकतांत्रिक के बजाय लोकतांत्रिक बनाने का पहला कदम ही यह है कि सुप्रीमो व्यक्ति नहीं सुप्रीमो मंडली सप्तर्षियों सरीखा कार्य करें। भ्रष्टाचार रोकने राज्य करने के पश्चात जीवन के उत्तर काल में जेल में जीने की भावना को तिरस्कृत करने की तात्कालिक जरूरत है। 
भारत के वे मैकोलाइट बुद्धिवादी जिन्हें हिन्दुस्तानी परम्परावाद व हिन्दुस्तानी लोक साहित्य सहित लोक भावना से परहेज है उन्हें यदि उनकी मातृभाषा अंग्रेजी न होकर कोई हिन्दुस्तानी भाषा हो उसके लोक साहित्य का अनुशीलन कर अंग्रेजी पत्रकारिता में नजीरें हिन्दुस्तानी देनी चाहिये न कि यूरप व अमरीका की। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चाहिये कि वे हिन्दुस्तान की राजनीति को पटरी पर लाने के लिये कौटिलीय अर्थशास्त्र शुक्रनीति, विदुरनीति, भीष्माचार्य तथा अजातशत्रु युधिष्ठिर संवाद जिसे शांतिपर्व कहा जाता है आचार्य चणकनंदन विष्णुशर्मा रचित कौटिलीय अर्थशास्त्र के साथ साथ गोरखनाथ का भर्तृहरि संवाद भर्तृहरि सरीखे राज के द्वारा वैराग्यपथ का अनुसरण यह कह के करना - ‘याम् चिंतयमि सततः मयि सा विरक्ताः’। यूरप और अमरीका के अंग्रेजी मीडिया की हिन्दुस्तानी अखबार नवीसों पर सशक्त पकड़ पर भारत वाणियों का असर कारी राजनीतिक प्रभाव सतह पर लाने की जरूरत है। इसलिये ब्लागर हिमकर कौटिल्य अर्थशास्त्र के नुस्खे इंगित कर वशिष्ठ के योग वाशिष्ठ, तुलसीदास के रामचरितमानस और आधुनिक भारतीय राष्ट्रभाषाओं के कवियों की वाणी का मिलाजुला डाक्टर राममनोहर लोहिया संकल्पित चौखंभा राज भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जो कभी कभी स्वयं को संतरी भी कहते हैं। राजा बलि के भृगुकच्छ में संपन्न भूमिदान के पश्चात महाविष्णु ने कहा - नवधा भक्ति के स्त्रोत प्रह््लाद, जाओ मैं हाथ में गदा लेकर तुम्हारा योगक्षेम देखता रहूँगा। नरेन्द्र मोदी ने हिन्दुस्तान को नयी राह दी है उनसे पहले पंडित नेेहरू व अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दुस्तान की राजनीति को अपने अपने तरीके से दिशाबोध कराया था। आगामी विश्वकर्मा जयंती 17 सितंबर 2015 से कौटिल्य अर्थशास्त्र आधारित भारतीय राजनीतिक दिशाबोध, शांतिपर्व, भारत के नवोदित मैकोलाइट अखबार नवीसों की विवेचनाओं के शान्तिपर्व के राजनीतिक संवादों पर रोजाना एक पोस्ट - नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व कौशल, प्रतिपन्न मति विरोधी अनुरोधी से बेझिझक विचार वाला चतुर्चक्र नया राजनीतिक चक्रव्यूह भारत शब्द की मूल व्याख्या - भरस्व इति भारत हो जाय। मौका मिले रूचिकर लगे जरूर पढें नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के राजनीतिक तत्वाधान की अग्नि परीक्षा होरही हैै। गुण तो यत्र तत्र सर्वत्र है गुणों की कमी नहीं गुण पहचानने वाले पारखी की जरूरत है।
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