योग मार्ग हिन्दू बपौती नहीं मानव हितैषी है
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु
और्वोपदिष्ट योगेन हरिमात्ममीश्वरम् - श्रीमदभागवत महापुराण
तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु
और्वोपदिष्ट योगेन हरिमात्ममीश्वरम् - श्रीमदभागवत महापुराण
शुक्राचार्य के कई नामों में एक नाम और्व भी है। आजकल दुनियां जिस देश को अरब या अरेबिया नामों से पुकारती है उसी को संस्कृत वाङमय में और्व कहा जाता है। इस्लाम धर्मावलंबी हठासन में नमाज अता करते हैं। विष्णुसहस्त्रनाम में ईश्वराधना में ध्यान, स्तुति, नमस्या तथा यजमान धर्म चार प्रकार की आस्थायें कही गयी हैं। नमस्या को हिन्दी वैयाकरण किशोर दास वाजपेयी ने नमाज कहा। नमाज अता करने का हठासन हठयोग की प्रविधि है। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने राजा सगर जिनके पुत्रों ने सागर निर्मित किया उनका उद्धरण देते हुए भागवत महापुराण में कहा गया है - ‘और्वोपदिष्ट योगेन’ पारब्रह्म परमात्मा जिसे ईश्वर का निर्गुण स्वरूप भी माना जाता है अल्लाह की इबादत का महत्वपूर्ण अंग है। गहराई से मनन पूर्वक विचार किया जाये तो कुरआन शरीफ की जिन मुख्य आयतों का सस्वर उच्चारण नमाज के अता करते समय होता है वह हठयोग की एक महत्वपूर्ण विधा है। इसलिये इस्लाम धर्मावलंबियों को यदि सूर्य नमस्कार स्वीकार न हो कोई बात नहीं उनकी नमाज की आयतें अपने आप में और्वोपदिष्ट योग हैं। योग को हिन्दू जीवन शैली से जोड़ना योग के उत्कृष्ट महत्व को नकारना है। रूस और जर्मनी के संस्कृत नाम क्रमशः ऋषि देश व शर्मणी हैं। इन दोनों देशों की भाषा याने पुरानी रसियन भाषा तथा पुरानी जर्मन भाषा में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा शब्द संस्कृत के हैं। भारत सहित विश्व के कई देश 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रहे हैं। भगवद्गीता के अनुसार कर्मकौशल ही योग है। रूसी भारतीय अमरीकी आप्रवासी ने योग मार्ग को पश्चिम में फैलाने में जो परिश्रम किया, रूसी मूल की उस भद्र महिला जिसे पश्चिमी दुनियां में योग दूत विशेषण दिया 102 वर्षीया योग महिषी इन्द्रा देवी की जीवनी जिनके निधनाख्यान सन् 2002 में 102 वर्ष की आयु में दिवंगत जिन्हें अति गोपनीय स्त्री वानप्रस्थ मूर्ति का स्वरूप मिला, उनके अनुसार योग मार्ग केवल भारत की ही उपलब्धि नहीं है, पतंजलि ऋषि ने अथातो योग जिज्ञासा का उद्गान किया उससे पहले भी ऋषि देश शर्मणी देशों में योगाभ्यास सामान्य जीवन क्रिया हुई करती थी। धर्म के चार पड़ावों में पहला पड़ाव ध्यान धर्म है इसे ध्यान-जप योग भी कहा जाता है। सिख धर्मावलंबी जपुजी का जाप करते हैं। कृष्ण ने अर्जुन से कहा था - यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ। भीष्माचार्य ने धारणा धर्म की जो प्रविधि युधिष्ठिर को विष्णुसहस्त्रनाम के प्रारंभ में बताई उसमें भारतवासी जिस प्रविधि का अनुसरण करते हैं उसे यजमान धर्म कहा जाता है। यजमान धर्म माने हवन करना, हवन करने से वातावरण वायु शुद्धि होती है। इसलिये आज दुनियां जिसे हिन्दू धर्म कहती है वह सोऽहम् श्वास प्रक्रिया वाली जीवन शैली है जिसका उद्देश्य वातावरण को विषाक्त होने से बचाना है। ख्रिस्ती मजहब की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया बपतिस्मा है। ईसा मसीह ने सेंट जान की सहायता से बपतिस्मा संपन्न कराने की शुरूआत की थी। बपतिस्मा किसी भी व्यक्ति पुरूष या स्त्री का ख्रिस्ती धर्मानुसरण करने से पूर्व बपतिस्मा आवश्यक प्रविधि है। यह बपतिस्मा पवित्र जल से व्यक्ति को पवित्र कर ख्रिस्ती धर्मावलंबी श्रेणी में जोड़ा जाता है। भारतीय वाङमय का जह्नु शब्द यात्रा करते करते जब यूरप पहुंचा व सेंट जान होगया। जह्नु ने गंगाजल को पी डाला वैसे ही जैसे आदिदेव महादेव ने लोक कल्याण के लिये समुद्र मंथन में मिले विष का पान कर लिया था। सेंट जान ने सर्वप्रथम अपने हाथ मे पवित्र जल से ईसा मसीह का अभिषेक किया। जलाभिषेक की यह प्रक्रिया ही ख्रिस्ती धर्म का प्रथम अनुपान है। यह जलाभिषेक एक योग पथ है। इसलिये इस्लाम धर्मावलंबी व ख्रिस्ती धर्मावलंबी समाज में जो भ्रम फैला हुआ है कि योग हिन्दू धर्म का हिस्सा है, योग तो वस्तुतः मानवी जिजीविषा का वह महापथ है जो संसार का प्रत्येक धर्मावलंबी अपना सकता है। योग मार्ग का पहला कदम ध्यान योग है। व्यक्ति पुरूष या स्त्री तभी ध्यान योगाभ्यास करने में सफल हो सकते हैं जब वे सांसारिक राग द्वेष से अपने आपको मुक्त करें। सभी जीवधारियों को अपनी आत्मा के समान महत्व दे। उनका मनोभाव ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्’ का उपनिषत् वाक्य हो। भगवद्गीता के पुरूषोत्तम योग के दूसरे श्लोक का उत्तरार्ध कर्मानुबन्धीनि मनुष्य लोके गीता सार है। स्थित प्रज्ञता तथा छिन्न संशय होना ध्यान योग की पहली शर्त्त है। योग को बाजार में उतारने से व्यापार में जितनी विसंगतियां विद्यमान होती हैं वह योग के मौजूदा मार्केटिंग तंत्र में घुस गयी हैं। योग वस्तुतः गुरू-शिष्य परम्परा का उदात्त संयोग है। उसे व्यापारिक लाभ मुनाफाखोरी तथा परपीड़न का हथियार बनाये जाने से योगाभ्यास करने वाले योगी उसे आप ध्यानयोगी कहें कर्मयोगी कहें या भक्तियोगी कहें भगवद्गीता में विषाद योग से लेकर मोक्ष सन्यास योग तक अठारह योग कृष्ण ने अर्जुन से कहे थे। कृष्णार्जुन संवाद में ज्योत्सर में उस समय अठारह अक्षौहिणी सेना याने करीब बावन लाख व्यक्ति युद्ध के लिये तत्पर थे। अर्जुन के सवाल कृष्ण के जवाब भीष्माचार्य, कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्य सरीखे त्रिकालज्ञ नीतिमंत आचार्यों ने भी नहीं सुना जब कि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की अध्यात्म शक्ति ने राजा धृतराष्ट्र के सचिव संजय को दूर श्रवण विधि से हस्तिनापुर में कृष्णार्जुन संवाद सुनाया तथा संजय ने आंखों देखा हाल धृतराष्ट्र से कहा। इस विशिष्ट योग संवाद को सुनने व समझने वाले दो ही व्यक्ति थे - अर्जुन व संजय। यहां तक कि राजा धृतराष्ट्र को संजय ने समूचा संवाद सुनाया पर धृतराष्ट्र के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। उसका पुत्र मोह अर्जुन विषाद योग के पहले श्लोक ‘मामका पाण्डवाश्चैव किम कुर्वत संजय’ इसमें व्यक्त होता है। बहुत से लोग यह मान कर चलते हैं कि गीता हिन्दू धर्म का ग्रंथ है। वास्तव में गीता में वर्णित सुउपनित्सु ब्रह्म विद्यायां योग शास्त्रों में प्रत्येक अध्याय के अंत में कहा गया है। मुसलमान फकीर इसाई मोंक बौद्ध श्रमण जैन धर्मावलंबी संधारणा करने वाले वे सभी फकीर महात्मा जो गृहस्थी नहीं हैं जिनका परिवार नहीं है उन्हें किसी एक मजहब से जोड़ना सन्यास मार्ग का कुतर्क है। सन्यास लेने से पहले फकीर बनने से पहले वह व्यक्ति हिन्दू मुसलमान इसाई बौद्ध जैन सिख धर्मावलंबी था ज्योंही उसने गृहस्थ छोड़ा वह सन्यासी या सन्यासिनी का आवरण पहन चुका उसका धर्म सन्यास धर्म है। भारतवर्ष में परम्परागत हिन्दू परम्परा मानने वाले व्यक्ति जब गृहस्थ छोड़ सन्यासी बन चुके हैं उन्हें विश्व के वर्तमान धर्मों के चौखट से ऊँचा स्थान दिया जाये तथा जन्म के कारण उन्हें हिन्दू मुसलमान इसाई बौद्ध मानने के बजाय केवल फकीर के रूप में देखा जाये। माइकेल गोल्ड वर्ग ने योगिनी इन्द्रा देवी के 102 वर्षीय जीवन लीला से जो तत्व ग्रहण किया योगिनी का यह कथन कि चार्ल मार्क्स के आर्थिकी विचार रूस (जिसे भारतीय वाङमय ऋषि देश कहता है) से पहले ईसा के ख्रिस्ती धर्माचरण से पूर्व रूस के लोग सामाजिक तथा वैयक्तिक आस्था किस किस्म की थी यह खोज करने की जरूरत है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने वोल्गा से गंगा तक अपने महाकाव्य में ऋषि देश की सभ्यता का आकलन किया है। भारतीय वाङमय में ऋषि का भाष्य करते हुए वैदिक ऋचाओं का अनुशीलन करने वाला ऋषि है। वशिष्ठ-विश्वामित्र विवाद विश्वामित्र जन्म से राजकुमार थे पर उन्होंने तामसी जीवन बिताया ऋषित्व पद पाया। नयी सृष्टि भी संपन्न की व महर्षि राजर्षि के प्राप्त कर चुके थे परंतु उनकी आकांक्षा थी कि वशिष्ठ उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित करें। वशिष्ठ को झुकाने के लिये विश्वामित्र ने श्रमसाध्य तपस्याओं के अलावा वशिष्ठ को युद्ध में पराजित करने का भी मन बनाया। वशिष्ठ पुत्रों का वध भी कर डाला पर वशिष्ठ ने विश्वामित्र को ब्रह्मर्षि तब तक नहीं माना जब तक विश्वामित्र ने अपना रास्ता बदला नहीं। वशिष्ठ विश्वामित्र की योग्यता के कायल थे। त्रिशंकु को शरीर सहित स्वर्गलोक पहुंचाना उनका उद्देश्य था जिसके लिये वशिष्ठ अपने यजमान त्रिशंकु को मना कर चुके थे। वशिष्ठ विश्वामित्र में पक्षियुद्ध वर्षों तक सत्य हरिश्चन्द्र के संदर्भ मं चलता रहा। सत्य हरिश्चन्द्र के पक्षधर वशिष्ठ थे। विश्वामित्र ने सत्य हरिश्चन्द्र को अनेकानेक उत्पीड़न किये जिनका समर्थन वशिष्ठ ने कभी नहीं किया। जब विश्वामित्र ने अपना हठ छोड़ा तो वे वशिष्ठ के आश्रम जाकर अपनी बात वशिष्ठ के सामने रखते हुए बोले - आया तो था आपका वध करने पर आप अपनी पत्नी अरूंधती से कह रहे थे कि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि तो हैं ही। विश्वामित्र ने कहा कि अब मेरा हृदय परिवर्तन होगया है अतएव अपना मानसिक अपराध आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। वशिष्ठ ने घोषणा की कि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हैं।
इसलिये भारत के लोगों को खुली आवाज में कहना चाहिये कि योग मार्ग हिन्दुओं की बपौती नहीं है। यह तो मानव मात्र के व्यापक हित का राजयोग है, राजमार्ग है। इसलिये विश्व मानवता के व्यापक हितार्थ योगधर्मा योग मार्ग को अपनाना युग की आवश्यकता है। पाश्चात्य जीवन शैली से योगासन इन्सान की सेहत के लिये जरूरी होगया है। आवश्यकता इस बात की है कि योग जिज्ञासा के लिये योगाभ्यासियों को उनकी मातृभाषा के जरिये योग को फैक्टरी उत्पाद की तरह न संचालित कर व्यक्तित्त्व विकास का हेतु बनाया जाये। जब तक योग की अमरीकी किस्म की मार्केटिंग होती रहेगी योग मार्ग विकास मात्र ही बना रहेगा, हर योगाचार्य चौराहे में बिकता रहेगा। इसलिये योग मार्ग से व्यक्ति के माध्यम से समष्टि प्रभावित हो, भारत का संयुक्त राष्ट्र संघ सहित विश्व के जो राष्ट्र मानव हितकारी योग मार्ग अपनाना चाहते हैं उसके लिये भारत को एक योग विश्वायतन सृजित करना चाहिये जिसमें संसार के सभी देशों की संस्कृतियों, सभ्यताओं व परम्पराओं की विशिष्टतायें हैं उन पर समीक्षित अध्ययन कर योग मार्ग को मानव हितैषी कार्यक्रम के रूप में विश्व मानवता का उच्च स्तर तथा वसुधैव कुटुम्बकम की भारतीय अवधारणा, अहिंसा परमोधर्मः का शांति पथ वैश्विक मानव समाज को प्रशस्त राजपथ-राजयोग प्रतिस्थापना करा सके। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 21 जून 2015 को विश्व योग दिवस के तौर पर मनाये जाने का संकल्प लिया है। यह पहला विश्वभारीय योग दिवस उत्तर भारत में कीलक संवत्सर तथा नर्मदा से दक्षिण में संवत्सर का पुरूषोत्तम मास मिथुन संक्रांति ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार 15 जून 15 की रात्रि 47 घड़ी छः पला यूरप की नजर से 16 जून 2015 भारतीय पंचांग के अनुसार भौमवती अमावस्या सौर आषाढ़ का पहला दिन है। कालिदास ने मेघदूत में आषाढ़स्य प्रथम दिवसे मेघाछन्न आकाश का चित्रण किया है। योग जिसका मुहूर्त्त पुरूषोत्तम मास आषाढ़ अधिमास शुक्ल पक्ष पंचमी रविवार आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य नरेन्द्र दामोदरदास मोदी नीत केन्द्रीय सरकार वैश्विक योग दिवस भारत राष्ट्र राज्य के प्रगति पथ का गंता बनाये यही विश्व योग दिवस का शिव संकल्प है। योग मानव मात्र के लिये कल्याणकारी हो, मानवता का उत्कर्ष हो यही विश्व योग दिवस का तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु। हिन्दुस्तानी नजरिये सेे योग का सर्वोत्कृष्ट पथ - प्राणापान समोकृत्वा नासाभ्यन्तर चरिणौ ताकि जीवात्मा कुंठा मुक्त हो। सोऽहम् को अपनाये। वही सोऽहम् अल्लाह या गॉड भी है।
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