Friday, 17 July 2015


क्या उत्तराखंड की नशा-निरोध की कोई नीति है  ?
कुमांऊँ के पिथौरागढ़ जिले से प्रति व्यक्ति आबकारी राजस्व सालाना एक हजार रूपये से ज्यादा ? अल्मोड़ा में 1111.50 है।

         यह ब्लागर सन 1951-52 में पिथौरागढ़ में था। पिथौरागढ़ तब एक छोटी सी आबादी वाला टाउन एरियानुमा इलाका था। वहां कुमांऊँनी उद्योगपति ठाकुर दान सिंह बिष्ट के चाचा ठाकुर चंचल सिंह मालदार कहलाते थे। गरीबनेवाज होने से अपने भ्रातृज कोे कहते रहते थे - कंबल रख जाओ जो लोग जाड़ों में आयेंगे उन्हें ठंड से बचाने कंबल दुंगा। उनके दामाद किशन सिंह महरा अंग्रेजी शराब के ठेकेदार थे। सरकारी ठेका राशि सालाना चैदह हजार रूपये थी। देशी मदिरा के ठेकेदार बिजनौर के रहने वाले अशर्फीलाल थे। देेेशी मदिरा का ठेका वर्ष 51-52 के लिये रूपये 39000 हजार था। इस प्रकार दोनों प्रकार की मदिराओं का आर्थिक राजस्व रूपये 53 हजार हुआ करता था। तब वहां आबकारी महकमा अलग नहीं था। तत्कालीन सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट बदरी दत्त भंडारी की गिनती न्यायप्रिय अधिकारियों में हुआ करती थी। अल्मोड़ा से लोहाघाट व पिथौरागढ़ को स्थानांतरण एक सजा मानी जाती थी। लोग कहते थे - सोर पिथौरागढ़ और कुमूं लूघाट में नैपाल व तिब्बत का राजतंत्र है। शराब ठेकेदार लोग ठेके की राजस्व राशि निर्धारित समय पर नहीं दे पाते थे। आज के पिथौरागढ़ में तब पिथौरागढ़ तहसील कहलाती थी। शराब की केवल दो दुकानें थीं। इस ब्लागर ने जानना चाहा कि वहां शराब के कितने ठेकेेदार हैं जिन्हें अब अनुज्ञापी कहा जाता है। उत्तरकाशी के आबकारी अधिकारी ने सूचित किया कि वहां शराब की अठारह दुकानें हैं। पिथौरागढ़ के आबकारी अधिकारी ने शराब की दुकानों का हवाला नहीं दिया। पिथौरागढ़ जिले की सामाजिक कार्यकत्र्री ने 2006 में इस ब्लागर से कहा मेरे साथ गंगोलीहाट चलिये। वे सामाजिक कार्यकत्र्री के अलावा महिलानेत्र्री भी थीं। उन्होंने शराब की दुकान के खिलाफ धरना देरहे लोगों को संबोधित किया यह ब्लागर धरना में बैठी महिलाओं से मिला उनकी बातें सुनीं। उनकी निजी कठिनाइयों का निराकरण और शराब के अनुज्ञापी का शराब की दुकान बंद कराने के लिये तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नाराणण दत्त तिवारी से प्रार्थना की। मुख्यमंत्री जी ने गंगोलीहाट की शराब की दुकान बंद करने के आदेश जारी कर दिये। अगर पिथौरागढ़ के आबकारी अधिकारी ने उत्तरकाशी की तरह शराब ठेकों के स्थानों का भी उल्लेख किया होता तो पता चलता कि गंगोलीहाट में शराब की दुकानें हैं या नहीं। पिथौरागढ़ की जनता प्रति व्यक्ति रोजाना शराब राजस्व के रूप में तीन रूपये सरकारी खजाने में जमा कर रही है और उत्तरकाशी में प्रति व्यक्ति आबकारी राजस्व सालाना 605 रूपया और रोजाना आबकारी राजस्व 1.80 रूपया है। अल्मोड़ा जिले से प्रति व्यक्ति सालाना आबकारी राजस्व रूपये 1111 है याने अल्मोड़ा में रोजाना आबकारी राजस्व प्रति व्यक्ति रूपया 3.50 है। महात्मा गांधी की अनुयायिनी मिस कैथरीन हिलामन को महात्मा गांधी ने जमना लाल बजाज के साथ अल्मोड़ा भेजा। वे ज्यादातर कौसानी में रहती थीं। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने पिथौरागढ़ का धर्मघर इलाका अपनाया। उनके सत्प्रयासों से कुमांऊँ में शराब बंदी का रास्ता खुला पर जब लोहिया के जातपांत तोड़ो अभियान को अपना आदर्श मानने वाले धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव उ.प्र. के मुख्यमंत्री बने उन्होंने कुमांऊँ में शराब की गंगाधारा बहा दी। पिछले पच्चीस वर्षों में कुमांऊँ में शराब खपत की बढ़त मुलायम सिंह की देन है। मुलायम राज के पश्चात दस वर्ष उ.प्र. में सत्तासीन राजनेताओं के कान में कुमांऊँ में शराब की अनाप शनाप खपत पर जूं नहीं रेंगी। नवंबर 2009 से उत्तराखंड राज्य बन गया। सात मुख्यमंत्री पदासीन हो चुके हैं किसी ने भी मदिरा मदांधता पर विचार ही नहीं किया क्योंकि उनके राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा मदिरा राजस्व से ही मिलता है। मौजूदा सातवें मुख्यमंत्री महाशय पिथौरागढ़ जिले की धारचूला मुनस्यारी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से राज्य विधानसभा में जनप्रतिनिधि हैं। उन्होंने 2 सितंबर 2014 को घोषणा की कि वे बोरारौ घाटी में कार्यरत श्री गांधी आश्रम चनौदा जिला अल्मोड़ा के जरिये रोजगार संवर्धन के सार्थक उपाय कर रहे हैं। इस ब्लागर ने उत्तराखंड के सातवें मुख्यमंत्री जी का ध्यानाकर्षण बोरारौ घाटी की महत्वशीलता के संबंध में विस्तारपूर्वक उदाहरणों सहित विवरण प्रस्तुत किये। उनसे अर्ज किया कि वे बोरारौ घाटी संबंधी विवरण विस्तार में मेरे ब्लाग हिमकर में अवलोकन कर वहां की उद्यमिता की नीतियां तय करें। बोरारौ घाटी मदिरा संत्रास से उसी तरह संत्रस्त है जैसे पिथौरागढ़ तथा सम्पूर्ण उत्तराखंड के वे सभी जिले जहां जहां मदिरालय उपस्थित हैं। शराबखोरी के कारण परिवार टूट रहे हैं तथा मदिरा पीकर मरने वाले व्यक्तियों के परिजनों को सामथ्र्य देने का उपक्रम पिछले बीस वर्षों से श्रीमती प्रेमा जोशी कर रही हैं। इस ब्लागर ने मुख्यमंत्री जी का ध्यानाकर्षण करते हुए होरहे सामाजिक ह्रास तथा प्रेमा जोशी जो अद्भुत कार्य कर रही हैं उसे संज्ञान में लेने की प्रार्थना की। संभव है कि कार्य व्यस्तता के कारण मुख्यमंत्री जी व उनका प्रशासन ऐसी मामूली लगने वाली घटनाओं पर ध्यान देना उचित नहीं समझता हो। मुख्यमंत्री जी की 758वीं घोषणा के बारे में प्राधिकृत सूचनाधिकारी ने कहा - मुख्यमंत्री कार्यालय में संबंधित सूचना धारित नहीं रहतीं। सूचना देने में टालमटोल करना, वह सूचना देना जिसे मांगकर्ता ने मांगा ही नहीं। जब यह घटना मुख्यमंत्री कार्यालय के स्तर पर ही हो तो उत्तराखंड के योगक्षेम का मालिक केवल भगवान ही लगता है। 
           राजनीतिक स्तर के नेतृत्त्व व प्रशासनिक स्तर के अधिकारियों को विवेक देना परमात्मा के हाथ की बात है। सूचना आयुक्त अनिल शर्मा ने अपनी व्यथा व्यक्त की है। उत्तराखंड सरकार सटीक पड़ताल करने की पक्षधर नहीं है क्योंकि शासक वर्ग में शायद दो या तीन प्रतिशत अफसर व स्टाफ नानअल्कोहलिक हैं। लोग ड्यूटी पीरियड में भी शराब सेवन करने से नहीं चूकते। उत्तराखंड सरकार दावा करती है कि उसका प्रबंध तंत्र गुजरात से श्रेष्ठ है पर वे भूल जाते हैं कि गुजरात राज्य जबसे निर्मित हुआ मुंबई प्रेसीडेंसी के दो हिस्से महाराष्ट्र व गुजरात होते ही तभी से गुजरात में मद्यनिषेध लागू है। शराब राजस्व का एक धेला भी गुजरात के खजाने में जमा नहीं होता। जबकि उत्तराखंड के लोक राजस्व में सर्वाधिक योगदान आबकारी कर का ही है। 
          उत्तराखंड सरकार के अल्मोड़ा पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जिलों के आबकारी अधिकारियों ने सूचित किया है कि अठारह वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों को शराब नहीं बेची जाती पर स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे नशाखोरी की गिरफ्त में पाये जारहे हैं। कुमांऊँ को शराब के नशे से मुक्त करने का गुरूत्व भार प्रवासी कुमांऊँनी श्रीमानों पर आ पड़ा है। उन्हें उत्तराखंड सरकार को चेताना ही होगा कि कुमांऊँनी संस्कृति, सभ्यता तथा मानवोचित सहानुभूति को बनाये रखने के लिये नशाखोरी रोकने के उपाय क्या क्या हो सकते हैं। भारतीय वाङमय में कहावत है - ‘मद्यपा किं न जल्पंति, किं न खादंति वयसः’। भारत के तिब्बत व नैपाल सीमा से जुड़ा हुआ क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिये से अत्यंत नाजुक क्षेत्र है। इस इलाके के राजकर्मियों में नशाखोरी की आदत कभी कभी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये आफत भी बन सकती है। उत्तराखंड राज्य की भौगोलिक क्षेत्रीयता में देहरादून, हरिद्वार तथा ऊधम सिंह नगर जिलो का मैदानी भाग तथा पौड़ी व नैनीताल जिलों का भाबर इलाका लगभग बारह हजार वर्ग किलामीटर क्षेत्रफल वाला है। क्षेत्रफल के नजरिये से मैदानी व पहाड़ी क्षेत्र का अनुपात 2:9  का है जबकि आबादी के नजरिये से देखने पर यह अनुपात 2:3 है। कुमांऊँ के नजरिये से देखा जाये तो कुमांऊँ के बारह परगनों का क्षेत्रफल सोलह हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा है। आबादी नैनीताल के भाबर इलाके को छोड़ कर मात्र बीस लाख है जिस आबादी में लगभग छः लाख लोग गैर कुमांऊँनी हैं। गैर कुमांऊँनी आबादी राजनीतिक कुमांऊँ याने नैनीताल का भाबर और ऊधम सिंह नगर को मिला कर कुमांऊँनी मूल की आबादी का पर्वतीय कुमांऊँ की आबादी का डेढ़ गुना है। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के दो जिलों में अत्यधिक शराबखोरी के कारण जो सामाजिक, आर्थिक व पारिवारिक कष्ट बढ़ रहे हैं उनकी ओर प्रेमा जोशी का अभियान प्रशंसनीय है पर उत्तराखंड की सरकार को इस बात की चिंता नहीं लगती कि शराब बर्बादी का हेतु है इसलिये शराबखोरी पर क्रमिक नियंत्रण तथा नौजवानों को शराबखोरी से दूर रखने के उपाय सांस्कृतिक, आस्थामूलक विश्वास तथा पियक्कड़ परिवार के मुखिया का भरी जवानी में चले जाना के साथ ही शराब के कारण गृह कलह रोकने के लिये भी प्रवासी कुमांऊँ श्री समाज को ही पहल करनी होगी। मदिरा सेवन की बढ़त भी उत्तराखंड सरकार की आबकारी नीति, पर्यटन नीति तथा यातायात नीति से जुड़े प्रश्न हैं। सरकारी अहलकारों जनप्रतिनिधियों में मदिरा सेवन को नियंत्रित करने के लिये उत्तराखंडी महिला श्रम शक्ति को जागृत करना होगा। महिला शक्ति को भगवती दुर्गा का वह गुरूमंत्र लेना होगा जो शुंभ-निशुंभ की दानवधानी शुंभगढ़ में माता दुर्गा ने कहा था - ‘यो माम् जयति संग्रामे यो मे दर्पम् व्यपोहति यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति’। हर विवाहिता स्त्री को अपने मद्यप पति के साथ वही रवैया अपनाना होगा जो शुंभ दानव को भगवती दुर्गा ने कहा था। मद्यप पति, पिता, पुत्र अथवा पौत्र को गृहिणियां घर में प्रवेश करने से रोकें तो नशाखोरी कम हो सकती है। कुमांऊँ की तात्कालिक जरूरत नशे से मुक्ति पाना है। प्रवासी कुमांऊँ श्री समाज को उत्तराखंड सरकार को पूरे नैतिक मनोयोग से कहना ही होगा - आबकारी नीति पर पुनर्विचार करो।
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