Tuesday, 21 July 2015

नकल के मकड़जाल से छुटकारा केवल गुरु शिष्य परम्परा में ही है।
गुरु शिष्य प्रयोजन -  मातृ देवो भ, पितृ देवो भचार्य देवो भव।


          टाइम्स आइडियाज सोमवार 29 जून 2015 के अंक में विश्लेषक जाॅन कुरियन शैक्षिक जगत के अनुसंधानक ने सवाल पूछा कि हम अब ठगी पर क्यों उतर आये हैं ? अंग्रेजी में Why we cheet today? शीर्षक दिया अपने सवाल को। मुगल सल्तनत की तबाही जमाने में भारत में ठगों व पिंडारियों का जाल फैल गया था कुरियन महाशय यत्र तत्र सर्वत्र ठगी देख रहे हैं। अमरीकी लेखक इलिच इवान ने साठ वर्ष पहले शिक्षा के संबंध में डिस्कूलिंग शीर्षक की पुस्तक में दुनिया को आगाह किया था। पढ़ाई लिखाई का जो तरीका अमरीका सहित दुनिया भर ने अपनाया है गुरू शिष्य में तादाम्य बैठे। उन्होंने हिन्दुस्तानी प्राचीनकालीन गुरूकुल परम्परा को दुनियां के लिये शिक्षा दीक्षा के लिये आदर्श स्त्रोत माना तथा अमरीकी समाज से अपेक्षा की कि पढ़ाई लिखाई का मौजूदा तरीका बदल दिया जाये। विद्यार्थी को सही मायनों में इंसान बनाया जाये। शिक्षा क्षेत्र में जो द्यूतक्रीड़ा का छल, प्रपंच पूर्ण पाखंड का रास्ता अपनाया जारहा है डिस्कूलिंग - स्कूल नहीं, गुरू शिष्य के बीच ज्ञान पथ का निर्माण करना। वह तभी संभव है जब गुरू अपने शिष्य को ज्ञान गंगा में स्नान कराये। इलिच इवान ने जो चेतावनी अमरीकी समाज को पचास वर्ष पहले दी वह ठंडी पड़ गयी है। शिक्षा के क्षेत्र में अफरातफरी दुनियां भर में है। हिन्दुस्तान में इसका असर कुछ ज्यादा इसलिये है हिन्दुस्तानी पारम्परिक मानसिकता को तिलांजलि देकर हिन्दुस्तान का आम आदमी मैकोलाइट मानसिकता का बंधवा मजदूर बन गया है। महाशय जान कुरियन ने सही समय पर सही सवाल उठाया है। माता पिता तथा आचार्य तीनों प्रचण्ड प्रपंच वाले शैक्षिक पाखंड में रम गये हैं। माता पिता भी अपने बालक बालिका को प्रिस्कूलिंग की शुरूआत से ही स्वयं अपने आप को ठग रहे हैं। अपने बच्चों में मानवीय शिष्टाचार के बदले चोरी का रास्ता बता रहे हैं। अमरीकी लोग अपने बेटे बेटी को पाल्य प्रक्रिया को पेरेटिंग कहते हैें। जिस तरह पशु पक्षी थलचर-नभचर जीवों में जनक की भूमिका केवल निषेक प्रजनन प्रक्रिया होती है, जननी का नाता पशु पक्षी समूहों में तभी तक रहता है जब तक पशु पक्षी जननी का स्तन पान करते हैं। सामर्थ्य आते ही माता-पुत्र पिता-पुत्री केवल मिथुन रह जाते हैं। भारतीय वाङमय में मिथुन नर मादा का एक जोड़ा है, यह पिता-पुत्री पुत्र-माता भाई-बहन के अलावा दम्पति का भी प्रतीक है। माता पिता अपनी संतान को तभी पारिवारिक नैतिक मर्यादाओं के अन्दर अनुशासित रख सकते हैं जब वे स्वयं अपने लिये मर्यादाओं का चौखट अपनी जरूरतों व आकांक्षाओं पर अंकुश रखें। उतनी उड़ान (सपने देखें) संकल्पित करें जिन्हें वे मर्यादाओं के चौखट पर रह कर उपलब्ध कर सकें। वह पारम्परिक हिन्दुस्तान जिसमें कुंठा तनाव रहित जीवन शैली का विकास वैकुंठ तत्व से हुआ जहां लोग अपने बेटे का नाम वैकुंठ इसलिये रखते थे कि उनके जीवन में कुंठा और तनाव न घुस पायें। कुंठा रहित जीवन यापन करने का राही पारम्परिक हिन्दुस्तान के लोगों का मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग में सपनों की ऊँची उड़ान भरने की तमन्ना इतनी तीव्र होगयी है कि यह मध्यम वर्ग आज अकल नहीं नकल के मकड़जाल में बुरी तरह उलझ गया है। रातोंरात धन्ना सेठ बनने की चाहत नकल के मकड़जाल में अपने बेटे व बेटी को नकल करने में प्रोत्साहन देने वाले माता पिता के अलावा शिक्षकों का भी एक ऐसा संजाल आसेतु हिमांचल बन गया है कि हमारे देश के हर मध्यम वर्गीय परिवारों के लोग अपने बेटे व बेटी को नकल के जरियों से डाक्टर इंजीनियर तथा भारत सरकार के ऊँची नौकरशाही के पदों पर काबिज देखना चाहते हैं। संस्कृत का परीक्षा शब्द अपने मायने खो चुका है। परीक्षा का वास्तविक अर्थ तो योग्यता की जांच की जाये दूसरों की आंखों से। आज उत्कर्ष की आपाधापी ने कानून नियम मर्यादा शिष्टाचार सभ्यता तथा परोपकार के मानवीय उच्च गुणों पर ग्रहण लग गया है। सूरज और चंद्रमा पर अमावस व पूनम को ग्रहण लगते हैं। वे आकस्मिक घटनायें घट कर अपना असर छोड़ जाती हैं पर हिन्दुस्तान के मध्यम वर्ग पर आज ऐसा ग्रहण लग गया है जो उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। कानून का राज सिस्टम फेलियर के कारण घिस पिट गया है। इस ब्लागर की मान्यता है कि जीवात्माओं की श्रंखला में अष्टमांश जीवात्मा सात्विक मार्गी हुआ करते हैं। दूसरा अष्टमांश तामस मार्गी होते हैं। शेष तीन चैथाई जीवों में ‘जहां देखी थाली परात वहीं बिताई सारी रात’। तात्पर्य सात्विक पथ के अनुयायियों की ओर धरती की सृष्टि का सिद्धांत तथा मर्यादाहीन तीन चैथाई का बहुमत अगर सात्विकता से जुड़े तो समाज में सौमनस्यता आयेगी। दुर्जनता दुबक कर रहेगी। तामस पंथी लोगों की बढ़त होगी तो मनुष्य के द्वारा बनाये सारे कानून व नीतियां पोथी के बैगन की तरह रह जायेंगी। महात्मा गांधी ने जब वे केवल मोहनदास करमचन्द गांधी के तौर पर अफ्रीका में रहते थे उन्होंने आजीवन पहली बात अपनी मातृभाषा गुजराती में इंडियन ओपीनियन के जरिये प्रस्तुत विचार की श्रंखला रखी। इंडियन ओपीनियन के आठ सौ करीब ग्राहक थे। महात्मा जी की 22.11.1909 को लिखित प्रस्तावना में उन्होंने व्यक्त किया। इंडियन ओपीनियन को ग्राहकों के अलावा एक एक ग्राहक के साथ दस और लोग भी पढ़ते थे। जिन्हें गुजराती नहीं आती थी वे हिन्दुस्तानी भी इंडियन ओपीनियन दूसरों से पढ़ा कर समझते। महात्मा जी से सवालात करते। उनका पक्का विचार बना कि वे जो लिख रहे हैं वह मनुष्यता की सेवा है। यही विचार हिन्द स्वराज की 20 अध्याय की पुस्तक का मूल स्त्रोत है। किलग्रेसन कैसल में यह प्रस्तावना महात्मा गांधी ने 22 नवंबर 1909 को लिखी। डाक्टर जीवतराम मेहता जो ऐलोपैथी के डाक्टर थे साउथ अफ्रीका में चिकित्सक थे उन्होंने अपनी पुस्तक में हिन्द स्वराज पढ़ने के बाद लिखा - मोहनदास करमचंद गांधी यथार्थतः महात्मा हैं। हिन्दुस्तान के लोगों में धारणा थी कि मोहनदास करमचंद गांधी को कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कोलकाता में महात्मा संबोधित किया। इतिहासकार श्रीराम मल्होत्रा के अनुसार मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा विशेषण डाक्टर जीवराज मेहता ने दिया जो स्वयं भी गुजराती भाषी थे और हिन्द स्वराज की कहानी से आत्ममुग्ध भी थे। महात्मा गांधी की तरह ही वे भी गुजराती वैष्णव थे। यूरप के लोगों ने हिन्द स्वराज के अंग्रेजी व दूसरी यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद पढ़ने के पश्चात राय बनायी कि यूरप का रहन सहन, वहां की सभ्यता तथा सामाजिकता ने जो रूख अख्तियार किया है उसके बारे में महात्मा गांधी जी ने 105 वर्ष पहले कहा था - ‘जो विचार मैं पाठकों के सामने रख रहा हूँ वे हिन्दुस्तान में जिन पर पश्चिमी सभ्यता की धुन सवार नहीं हुई है ऐसे बहुत से हिन्दुस्तानियों के हैं लेकिन यही विचार यूरप के हजारों लोगों के हैं, यह मैं अपने पाठकों के मन में अपने सबूतों से ही जांचना चाहता हूँ।’ जब महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज लिखा था तब हिन्दुस्तान में पश्चिम की सभ्यता से प्रभावित थोड़े ही लोग थे। आज भारत की आबादी एक अरब सत्ताईस करोड़ में से बारह करोड़ लोग मैकोलाइट बुद्धिवाद के समर्थक हैं। उन्होंने वैचारिक तौर पर अपने आपको, अपने परिजनों को मैकोलाइट मानसिकता को समर्पित कर दिया है। महात्मा गांधी ने अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज और अपने देशवासी समाज के लिये पार्लमेंटरी स्वराज की बात हिन्द स्वराज में स्वीकार की। पिछले एक सौ छः वर्षों में आजादी मिलने से पूर्व के अढ़तीस वर्षों में शहर व गांव का संबंध सहनशील था। आजादी के शुरूआती वर्षों में शहर बढ़त तो हुई पर शहर झुग्गी झोपड़ी व स्लम नहीं बन पाये थे। भारत में शहरों की बढ़त झुग्गी झोंपड़ी व स्लम का फैलाव इंदिरा नेहरू गांधी शासनकाल 1966 से शुरू हुआ पिछले पंद्रह वर्षों में दिल्ली सहित भारत के चार बड़े शहरों को झुग्गी झोंपड़ी आगोश में घेर लिया है। नरेन्द्र मोदी की सरकार सन 2022 तक प्रत्येक बेघर व्यक्ति को जो झुग्गी झोंपड़ी व स्लम में अपने दिन बिता रहा है उन सबको आवास उपलब्ध कराने हेतु संकल्पबद्ध है। देश में इस समय दो प्रवृत्तियां साथ साथ चल रही हैं। पहली प्रवृत्ति की कर्णधार सोनिया गांधी हैं जो गरीबों को अपने से अलग समझती हैं और गरीबी निवारण का ढोल जोर शोर से बजा रही हैं। दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद व महात्मा गांधी की दरिद्रनारायण के रूप में गरीब को देखना, उसमें उत्साहवर्धन करना और गरीब में साहस जुटाने की ओर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का संकल्प वाला नेतृत्व है। मोरारजी रणछोड़ जी पंडित नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्य थे। कामराज प्लान ने मोरारजी को मंत्रिमंडल छोड़ने को कहा। उन्हें कोई संगठनात्मक काम भी नहीं दिया। इंदिरा जी सत्ता में आयीं चारों तरफ मोरार जी के मिल मालिक होने का ढिंढोरा पीटा गया। मिल मालिक की सुमति मुरार जी जो राजनीतिक प्रचार मोरार जी रणछोड़ जी देसाई के खिलाफ 1966 से 1975 तक निरंतर होता रहा आज वही हालात दुबारा कांग्रेस द्वारा अपनाये जारहे हैं। मीडिया में भी एक बहुत बड़ा समूह ऐसा है जो कांग्रेस के ह्रास से पीड़ित है। शिक्षा तथा परीक्षा क्षेत्र में भी मुखर होकर सरेआम नकल करना, उ.प्र. लोक सेवा आयोग के सदर अनिल यादव पर आरोप है कि वे एक खास जाति के उम्मीदवारों को उ.प्र. सरकार में बैठाने का काम कर रहे हैं। वैसे भी इस वास्तविकता से इन्कार नहीं किया जा सकता कि धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव एक ऐसे सुप्रीमो हैं जिसके अपने परिवार के ही पांच सांसद हैं। लखनऊ की राज्य सरकार उनके सुपुत्र अखिलेश यादव संचालित कर रहे हैं। परिवारी राजकर्ताओं में पूर्व मुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर ओमर अब्दुल्ला महाशय, मुफ्ती मोहम्मद सईद महाशय, सरदार प्रकाश सिंह बादल उनके पुत्र सरदार सुखबीर सिंह में ओमर अब्दुल्ला महाशय को छोड़ शेष तीन परिवारी राज सत्ता में काबिज हैं। मौजूदा अव्यवस्था के पीछे परिवार का भी बहुत बड़ा प्रभावोत्पादक असर यत्र तत्र सर्वत्र पाखंडपूर्ण ठगी जिसे भारतीय वाङमय दस्युधर्मा कहता है। हिरण्यकश्यप वेन और दशग्रीव रावण को भारतीय मानसिकता दस्यु कहती है। 
          कुरियन महाशय ने अपने आलेख में नकल करने का वातावरण विश्वव्यापी होने की बात कही है। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा - विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा में नकल न करने देने के लिये परीक्षा निरीक्षकों द्वारा सख्ती बरतने मोबाइल और सूचना प्राप्त करने के पेंसिलकोर नुमा उपकरणों पर रोक लगायी तो दो हजार लोगों की भीड़ जिसमें नकलची व उनके माता पिता भी सम्मिलित थे निरीक्षकों पर हमला बोलते हुए नारे लगाये कि - हमें न्याय चाहिये। आप हमें नकल करने से रोक कर हमारे हितों पर हमला कर रहे हैं। इलाज तो हर बीमारी का होता है हर समस्या का भी समाधानकारी सरोकार संभव है। हिन्दुस्तान के संदर्भ में विचारणीय बिन्दु यह है कि परीक्षाओं में प्राप्तांक संबंधी जो उधेड़बुन है पूर्णांक में से शत प्रतिशत अंक उपलब्धि अपने अभिभावितों को पूर्णांक में पूरे शत प्रतिशत अंक न भी मिल सके एक दो या चार प्रतिशत अंक कम भी आयें उसके लिये विद्यार्थी और अभिभावक व शिक्षक की त्रिगुटी ने प्राप्तांकों एक बड़ा ही विस्मयकारी जाल बिछाया है। क्यों न परीक्षाओं प्रतिशत प्राप्तांक के बजाये अति उत्तम, उत्तम, उत्तम के करीब मध्यम मध्यम के पाश्र्ववर्ती तथा नगण्यांक सात श्रेणी तय की जायें ताकि शत प्रतिशत प्राप्तांक वाला मकड़जाल सफाया किया जा सके। सबसे बड़ी जरूरत तो योग्यता का सटीक आकलन है। वस्तुतः भारत के संदर्भ में इलिच इवान की डिस्कूलिंग ऐसी प्रविधि है जिसका सहारा अगर आज लिया जाना शुरू हुआ उसकी फल प्राप्ति दो या तीन पीढ़ियों के बाद दृष्टिगोचर हो सकती है। परीक्षित अग्नि परीक्षा का मुहूर्त्त  भारत के सामने है। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें जिन पर शिक्षा का उत्तरदायित्व है वे शिक्षा - परीक्षा और विभिन्न चयन पद्धतियों पर नीति आयोग में विचार विमर्श करें। फेडरल सिस्टम के तहत शिक्षा - परीक्षा - चयन नीति का निर्धारण हो। प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री प्राथमिक शिक्षा से लेकर सर्वोच्च स्तर पर शिक्षा नीति मिल बैठ कर तय करें। हर तीसरे साल शिक्षा परीक्षा तथा चयन पद्धति का पुनरीक्षण किया जाये। नीति निर्धारण करते समय विभिन्न आरक्षित वर्गों के लिये भी मानक स्तर संकल्पित हों।
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