सामाजार्थिक जातिगणना का अस्सीसाला अंतराल
सन 1931 में भारतीय जनगणना जातियों उपजातियों उनके व्यवसायों के आधार पर हुई थी। केन्द्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार गांधीवादी मोरारजी रणछोड़ जी देसाई के नेतृत्व में मार्च 1977 में सत्तारूढ़ हुई। मोरारजी सरकार ने भारत के पिछड़े वर्गों के हित साधन के लिये वी.पी. मंडल की अध्यक्षता में 1931 की जनणनानुसार पिछड़े समाज को अगड़े समाज की बराबरी में लाने के उद्देश्य से पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया। जनता पार्टी के सत्ताच्युत होने के पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी के दुबारा सत्तासीन होने पर मंडल कमीशन की संस्तुतियां सरकार को मिलीं। इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व के पूरे नौ वर्ष मंडल कमीशन की संस्तुतियां धूल फांकती रहीं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व के जनता दल के सत्तासीन होते ही उन्होंने मंडल कमीशन की संस्तुतियां स्वीकार कर भारत के पिछड़े वर्गोें में अपनी साख और धाक जमा ली। विश्वनाथ प्रताप सिंह स्वयं पिछड़े वर्ग से नहीं थे किन्तु उन्होंने भारत की राजनीति में पिछड़े वर्गों को सत्ता की डोर सौंप दी। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, देवगौड़ा पिछड़़े वर्ग को मानता था जिसे मंडल कमीशन ने भी स्वीकार किया कि भारत में 1931 की जनगणना के समय 54 प्रतिशत पिछड़ा था। संविधान लागू होने पर 15 प्रतिशत अनुसूचित जातियां तथा साढ़े सात प्रतिशत आदिवासी समाज जिसे शेड्यूल ट्राइब भी कहते हैं दस वर्ष के लिये आरक्षण सुविधा मुहैया की गयी थी जो हर वर्ष बाद अवधि बढ़ती रही। 1931 के पश्चात 1984 में आठ दशकों के अंतराल में आरक्षण सुविधा साढ़े उनचास प्रतिशत लोगों को मिलने लगी। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पचास प्रतिशत से आगे बढ़ाने के प्रस्ताव पर कानूनी रोक लगा दी। पिछले 15 वर्ष से पिछड़़ा वर्ग अनुसूचित जनजाति व अनुसूचित जाति के लोगों के समानांतर आरक्षण लाभार्जन करता आरहा है। भारत में अगड़ा पिछड़ा विवाद अंग्रेजी राजकरण की प्रमुख देन है। अब अगड़ा पिछड़ा विवाद ने सत्ता संघर्ष का आकार ग्रहण कर लिया है। इंदिरा गांधी के राजनीतिक सत्ता के पंद्रह वर्षों में भारत की राजनीति क्षत्रप सुप्रीमो मूलक होगयी है। राजनीतिक सुप्रीमो वर्ग में जम्मू कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक जम्मू कश्मीर में दो सुप्रीमो परिवार पंजाब में एक सुप्रीमो परिवार उत्तर प्रदेश में दो सुप्रीमो परिवार बिहार में एक सुप्रीमो पश्चिम बंग में एक उड़ीसा में एक महाराष्ट्र मंे दो कर्नाटक में एक तथा तमिलनाडु में दो सुप्रीमो परिवार हैं। कर्णाटक के देवगौड़ा जिन्हें लालू प्रसाद पहला पिछड़ा प्रधानमंत्री मानते हैं वे भी सुप्रीमो हैं। सुप्रीमो शैली में दिल्ली में 67 विधायक जीत पाने वाली आआपा के एकछत्र नेता अरविन्द केजरीवाल भी सुप्रीमो शैली वाले नेता हैं। 130 वर्ष उम्र वाली अ.भा. राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व भी सुप्रीमो के परिवार राज का प्रतीक है। कुल मिला कर इस समय पूरे भारत में सात सुप्रीमो सत्तासीन हैं। आठ सुप्रीमो प्रतीक्षारत हैं अपने तकदीर के अच्छे दिनों की बाट जोह रहे हैं।
अस्सी साला अंतराल के बाद संपन्न जातिगणना तथा सामाजार्थिक स्वरूप को 2011 की सामाजार्थिक गणना ने जाट नेता चौधरी चरण सिंह के शब्दों में देहाती हिन्दुस्तान ही असल हिन्दुस्तान है। उसके आंकड़े चौंकाने वाले प्रतीत होते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि आर्थिक हालात की गणना करते समय भारतवासी पूरी इमानदारी से अपनी आमदनी की असलियत बताने से कतराते हैं। चूंकि गणना हुई है लोगों ने गणनाकारों के सवालों के जवाब दिये हैं जो तथ्य सामने आये हैं वे चौंकाने वाले हैं। भारत गणराज्य के राष्ट्रीय हालात कैसे हैं ? बीस सूत्री सूचना चक्रव्यूह के मुताबिक सरकारी नौकरियों में हिमाचल प्रदेश जिसकी आबादी 2011 की जनगणनानुसार 68.58 लाख है वहां से 23 प्रतिशत व्यक्ति सरकारी अहलकार हैं। सरकारी नौकरियों में सबसे नीचा स्तर आंध्रप्रदेश का है जहां 1.9 प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं। प्राइवेट नौकरी करने वाले चंडीगढ़ में 45.6 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में 0.6 प्रतिशत हैं। माहवारी पांच हजार रूपये से कम आमदनी वाले कुटंब छत्तीसगढ़ में 90.7 प्रतिशत तथा राजस्थान में 29 प्रतिशत हैं। माहवारी आमदनी रू. दस हजार से ज्यादा आमदनी वाले कुटंब दिल्ली में 28.5 प्रतिशत तथा छत्तीसगढ़ में 3.2 प्रतिशत हैं। दुपहिया वाहन स्वामी पंजाब में 49.9 प्रतिशत तथा सिक्किम में 2.6 प्रतिशत हैं। रेफ्रिजरेटर वाले कुटंब सबसे ज्यादा गोआ में 69.0 प्रतिशत बिहार में 20.6 प्रतिशत हैं। मोबाइल फोन धारक चंडीगढ़ में 91 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में 28 प्रतिशत मशीनी उपकरण पंजाब में 16 प्रतिशत नगालैंड में 0.4 प्रतिशत हैं। 50 हजार रूपये से ज्यादा मूल्य के किसान क्रेडिट कार्ड हरयाणा में 9.6 प्रतिशत गोआ नगालैंड में 0.4 प्रतिशत सिंचित भूमिधर उत्तर प्रदेश में 50 प्रतिशत मेघालय में 2 प्रतिशत निरक्षरता राजस्थान में 47.5 प्रतिशत केरल में 4 प्रतिशत अविवाहित 56 प्रतिशत चंडीगढ़ में 23 प्रतिशत सिर पर मानव मल ढोना दमन दिवू में 14.9 प्रतिशत कई राज्यों में मानव मल मूत्र ढोना बिल्कुल बंद मुक्त बंधुवा मजूर त्रिपुरा 7 प्रतिशत हिमाचल हरयाणा गुजरात में 0 प्रतिशत कबाइली समूह त्रिपुरा में 12.8 प्रतिशत कई राज्यों में 0 प्रतिशत महिला कुटंब प्रमुख मेघालय में 5.2 प्रतिशत आंध्र में 3.8 प्रतिशत भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर तमिलनाडु में 55.8 प्रतिशत हिमाचल प्रदेश में 6.6 प्रतिशत करदाता लक्षद्वीप में 19.8 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में 1.6 प्रतिशत निराश्रित पश्चिम बंग में 1.2 प्रतिशत तमिलनाडु में 0.05 प्रतिशत।
अस्सी साला अंतराल के बाद संपन्न जातिगणना तथा सामाजार्थिक स्वरूप को 2011 की सामाजार्थिक गणना ने जाट नेता चौधरी चरण सिंह के शब्दों में देहाती हिन्दुस्तान ही असल हिन्दुस्तान है। उसके आंकड़े चौंकाने वाले प्रतीत होते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि आर्थिक हालात की गणना करते समय भारतवासी पूरी इमानदारी से अपनी आमदनी की असलियत बताने से कतराते हैं। चूंकि गणना हुई है लोगों ने गणनाकारों के सवालों के जवाब दिये हैं जो तथ्य सामने आये हैं वे चौंकाने वाले हैं। भारत गणराज्य के राष्ट्रीय हालात कैसे हैं ? बीस सूत्री सूचना चक्रव्यूह के मुताबिक सरकारी नौकरियों में हिमाचल प्रदेश जिसकी आबादी 2011 की जनगणनानुसार 68.58 लाख है वहां से 23 प्रतिशत व्यक्ति सरकारी अहलकार हैं। सरकारी नौकरियों में सबसे नीचा स्तर आंध्रप्रदेश का है जहां 1.9 प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं। प्राइवेट नौकरी करने वाले चंडीगढ़ में 45.6 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में 0.6 प्रतिशत हैं। माहवारी पांच हजार रूपये से कम आमदनी वाले कुटंब छत्तीसगढ़ में 90.7 प्रतिशत तथा राजस्थान में 29 प्रतिशत हैं। माहवारी आमदनी रू. दस हजार से ज्यादा आमदनी वाले कुटंब दिल्ली में 28.5 प्रतिशत तथा छत्तीसगढ़ में 3.2 प्रतिशत हैं। दुपहिया वाहन स्वामी पंजाब में 49.9 प्रतिशत तथा सिक्किम में 2.6 प्रतिशत हैं। रेफ्रिजरेटर वाले कुटंब सबसे ज्यादा गोआ में 69.0 प्रतिशत बिहार में 20.6 प्रतिशत हैं। मोबाइल फोन धारक चंडीगढ़ में 91 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में 28 प्रतिशत मशीनी उपकरण पंजाब में 16 प्रतिशत नगालैंड में 0.4 प्रतिशत हैं। 50 हजार रूपये से ज्यादा मूल्य के किसान क्रेडिट कार्ड हरयाणा में 9.6 प्रतिशत गोआ नगालैंड में 0.4 प्रतिशत सिंचित भूमिधर उत्तर प्रदेश में 50 प्रतिशत मेघालय में 2 प्रतिशत निरक्षरता राजस्थान में 47.5 प्रतिशत केरल में 4 प्रतिशत अविवाहित 56 प्रतिशत चंडीगढ़ में 23 प्रतिशत सिर पर मानव मल ढोना दमन दिवू में 14.9 प्रतिशत कई राज्यों में मानव मल मूत्र ढोना बिल्कुल बंद मुक्त बंधुवा मजूर त्रिपुरा 7 प्रतिशत हिमाचल हरयाणा गुजरात में 0 प्रतिशत कबाइली समूह त्रिपुरा में 12.8 प्रतिशत कई राज्यों में 0 प्रतिशत महिला कुटंब प्रमुख मेघालय में 5.2 प्रतिशत आंध्र में 3.8 प्रतिशत भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर तमिलनाडु में 55.8 प्रतिशत हिमाचल प्रदेश में 6.6 प्रतिशत करदाता लक्षद्वीप में 19.8 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में 1.6 प्रतिशत निराश्रित पश्चिम बंग में 1.2 प्रतिशत तमिलनाडु में 0.05 प्रतिशत।
देहाती कुटंब रोजाना दो सौ रूपये या उससे कम आमदनी पर गुजारा कर रहे हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 1790 लाख कुटंब के 59 प्रतिशत ग्रामीण आवास कच्चे मिट्टी के घर का छप्परनुमा थे। तब प्रत्येक कुटंब में औसतन 6 व्यक्ति माने जाते थे। 13.25 प्रतिशत कुटंब एक कमरे वाले मुंबई की भाषा में चालनुमा एक कमरे वाले एक दूसरे से जुड़़े मकान एक प्रकार से कामचलाऊ किस्म के थे। 2011 की सामाजार्थिक जाति गणनानुसार भारत में कुटंब संख्या 24 करोड़ थी। देहाती कुटंब संख्या 64 करोड़ 45 प्रतिशत घर कच्चे थे। कुटंब मात्रा औसतन 4.93 दस वर्ष पश्चात भी लगभग पूर्ववत ही रही थी। भारत के देहाती इलाकों में आठ प्रतिशत कुटंब माहवारी दस हजार रूपये से ज्यादा अर्जित कर रहे हैं। पांच प्रतिशत व्यक्ति करदाता श्रेणी में हैं। एक प्रतिशत निराश्रित भिखारी जीवन जी रहे हैं। 90 प्रतिशत लोग गांवों में अपने रोजगार करते हैं अथवा असंगठित रोजगार से जुड़े हैं। माहवारी पगार वाली नौकरी से केवल दस फीसदी लोग जुड़े हैं जिनमें से आधे याने पांच प्रतिशत सरकारी मुलाजिम हैं। शैक्षिक दरिद्रता के घेरे में 26 प्रतिशत लोग निरे अनपढ़ हैं। अठारह प्रतिशत ने मिडिल या जूनियर हाइस्कूल दर्जा आठ तक की भी पढ़ाई नहीं कर सकी है। केवल 30.4 प्रतिशत व्यक्ति स्नातक परास्नातक एवं उससे आगे पढ़े हैं। असमानता का कहर इतना जबरदस्त है कि गांवों के दस करोड़ कुटंब सरकारी दस्तावेजों में निहंग श्रेणी में दर्ज हैं। 75 प्रतिशत कुटंबों माहवारी आमदनी पांच हजार रूपये तक है जब कि माहवारी 5 हजार से दस हजार रूपये माहवारी आमदनी वाले कुटंब आठ प्रतिशत हैं। भीख सदावर्त तथा यतीमखानों की जिन्दगी जीने वाले कुटंब 0.29 प्रतिशत गैर खेतिहर उद्यमिता से जुड़े कुटंब 1.61 प्रतिशत बाजार में कूड़ा बीनने वाले लोगों की कुटंब 0.23 प्रतिशत है। खेतीबाड़ी में गुजारा करने वाले कुटंब 30.1 प्रतिशत शरीर श्रम करने वाले मजदूरी पर जीने वाले कुटंब संख्या 51.14 प्रतिशत घरेलू नौकरी वाले 2.5 प्रतिशत इतर व्यवसायों से जुड़े लोग कुटंब 14.01 प्रतिशत विवेचन कर्ता अखबार इंडिया टुडे के अनुसार राष्ट्रीय शर्मिंदगी का भयावह नजारा जमीनी वास्तविकता 593 विपन्न समूहों के उत्कर्ष नीति निर्धारण कैसे हो ? 0.59 प्रतिशत आबादी आदिम तरीकों से जीवनयापन करने वाले लोगों बंधुआ मजदूरी से बाहर आये लोगों दासता श्रेणी का जीवनयापन करने वाले मानव मल अपने सिर पर ढोने वाले व्यक्तियों सहित चौदह लाख से ज्यादा लोग विपन्नता के संकट से जूझ रहे हैं। इनके लिये जिन्दगी में सुधार लाने के उपायों पर विचार करने वाले नीति नियन्ता समाज को महात्मा गांधी द्वारा 1909 में लिखी हिन्द स्वराज व 1929 में लिखी अनासक्ति योग इन दो गुजराती भाषा में सुसंपादित कर गुजराती भाषा बोलने समझने वाले नीति नियन्ताओं को उपलब्ध कराना पहली राष्ट्रीय जरूरत हिन्दुस्तान की विपन्नता से निवारण पाने के लिये जरूरी है। गांधी के इन दो गुजराती भाषा में व्यक्त विचारों के अलावा हिन्दुस्तान की गरीब निवारण की राजनीति करने वाले लोगों तथा गरीबी हटाओ का मंत्रजाप करने वाले विचारकों के हाथ में कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी दीजिये ताकि भारत के नीति नियन्ता चाणक्य के सुझाये मार्ग पर चलने का मानस बना सकें। मैकोलाइट भारतीय भद्रलोक यूरप और मुख्यतया ग्रेट ब्रिटेन को अपना आदर्श मानने वाले हिन्दुस्तानी नीति नियन्ता भारत के देहाती की दुर्दशा से राहत पाने का तरीका चाणक्य और गांधी के तौर तरीके अपना कर ही भारत की 75 प्रतिशत देहाती जनसंख्या के लिये अच्छे दिनों का संकल्प ले सकती है।
20 जनवरी 1950 से 26 जनवरी 2015 तक के पिछले पेंसठ वर्षों में भारतीय संविधान से छेड़छाड़ कर श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता को बरकरार रखने के लिये आपातकाल का सहारा लिया। आपातकाल की ज्यादतियों का खुलासा पत्रकार तथा भारतीय जनता पार्टी के 2004 और 2009 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवानी को लगता है। आपात कालीन बादल फिर फट सकते हैं। उन्हें संदेह है कि नरेन्द्र मोदी एकाधिकारवादी नेतृत्व की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्हें इस बात पर यकीन नहीं होरहा कि नरेन्द्र मोदी दूसरे लोगों को सुनेंगे। उनका भय सांकेतिक भी हो सकता है क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी की दृष्टि में नरेन्द्र मोदी से ज्यादा कर्मठ मुख्यमंत्री शिवराज चौहान रहे हैं। अब चूंकि भारतीय जनता पार्टी के लालकृष्ण आडवानी सहित शिवराज चौहान श्रीमती सुषमा स्वराज डा. रमण सिंह श्रीमती वसुंधरा राजे सिंधिया जो प्रधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार भी रहे हैं राजनीतिक काजल की कोठरी में फंस गये हैं। उन पर कोई न कोई धब्बा लगने ही वाला है। इन सभी के मुकाबले नरेन्द्र मोदी अन्दरूनी और बाहरी विरोध के बावजूद लक्ष्यभेद के लिये पूरी तैयारी में हैं। सामाजार्थिक जातिगणना के पुरोधा मांग कर रहे हैं कि जातियों के आंकड़े पेश हों पर गांवों की जो दुर्दशा सर्वेक्षण ने पेश की है उसमें अगड़ा पिछड़ा विवाद अर्थहीन होगया है इसलिये तात्कालिक जरूरत स्वामी विवकानंद और महात्मा गांधी के दरिद्रनारायण तत्व को हृदयंगम करना राजनीति करने वाले महानुभावों के लिये तात्कालिक आवश्यकता होगयी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को चाहिये कि वे महात्मा गांधी की दो गुजराती पुस्तकें 1. हिन्द स्वराज 2. अनासक्ति योग को वर्तमान समृद्ध गुजराती भाषा में संपादित करा कर गुजराती जानने वाले भारतीय नीति नियन्ताओं को पढ़ने के लिये दें। गांधी जी की इन दो पुस्तकों का भाषान्तरण हिन्दी अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं में भी तत्काल किया जाये ताकि हिन्दुस्तान की गरीबी से छुटकारा पाने का गांधी आर्थिकी तरीकों को भी नीति नियन्ता समझें और गांधी आर्थिकी की अनदेखी न करने पायें। दूसरा महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल - भारत के राजनीतिज्ञों और लोकसेवकों को कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ाने की जरूरत है। बर्तानी और अमरीकी नुस्खे हिन्दुस्तान के लिये अनुकूल नहीं हैं। बर्तानी राजतंत्र का सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है। उसके बदले नया सिस्टम शुरू करना भी टेढ़ी खीर है। हर उस हिन्दुस्तानी के हाथ में कौटिल्य का अर्थशास्त्र रखने की जरूरत है जो राजनीतिक दलों व सरकार की नीतियां तय करते हैं। चाणक्य का महान आदर्श यह था कि वे सरकारी दीपक का प्रयोग निजी हित में नहीं करते थे। उनके निजी दीपक का तेल वे अपनी कमाई में से खर्च करते थे और यही आदर्श चाणक्य की रजनीतिक तथा प्रशासनिक योग्यता का मानदण्ड था। हेनरी किसिंजर ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र की भूरिभूरि प्रशंसा की है। भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुकूल गांव सभा से लेकर संसद तक वे सभी राजनीतिक व प्रशासनिक स्तरों पर निर्णय लेते समय निर्णयकर्ता के सामने आचार्य चाणक्य तथा महात्मा गांधी की नैतिकता को ही राष्ट्रीय आदर्श मानना चाहिये।
महात्मा गांधी जमनालाल बजाज को अपना मानस पुत्र मानते थे। एक दिन सेवाग्राम आकर जमनालाल बजाज ने महात्मा गांधी से कहा - बापू सात पीढ़ियों के लिये धनार्जन कर चुका हूँ। महात्मा ने हंस कर जमनालाल बजाज से कहा - जमनालाल सेवाग्राम से जो सड़क आगे जाती है उसके किनारे यहां से करीब एक मील दूर एक बुढ़िया बैठती है उसे जाकर एक सेर आटा दे आओ। सेठ जमनालाल बजाज ने महात्मा जी के कहे मुताबिक बुढ़िया को एक सेर आटा देना चाहा। बुढ़िया ने आटा लेने से इन्कार करते हुए कहा - सेठ आज की जरूरत का आटा मेरे पास अभी है और मैंने ज्यादा आटा अपने पास नहीं रखना है। आप यह आटा किसी दूसरे जरूरतमंद को दें। जमनालाल बजाज वापस सेवाग्राम आये उन्होंने बुढ़िया की बात महात्मा जी को सुनायी। महात्मा ने अपने मानसपुत्र जमनालाल बजाज को गरीब भिखारिन बुढ़िया के अपरिग्रह से अवगत कराया। महात्मा गांधी के दरिद्रनारायण को हाथों का काम दिलाइये सब्सिडी अथवा डोल सदावर्त देने से गरीबी निवारण नहीं होगा। गांधी ओढ़ी गयी गरीबी के पक्षधर थे। उनके हिन्द स्वराज को फिर से पढ़िये। गांधीवाद के महाभाष्यकार मराठी गुजराती हिन्दी तथा अंग्रेजी में अपनी बात अधिकारपूर्वक प्रस्तुत करने वाले दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर जिन्हें भारत के लोग प्रेम से काका साहेब कालेलकर कहते हैं उन्होंने हिन्द स्वराज पर अपनी 1.8.1959 की टिप्पणी में लिखा - नये भारत में अंग्रेजी भाषा का ही बोलबाला रहे। अमरीका ही नहीं रूस जर्मनी चेकोस्लोवाकिया जापान आदि विज्ञान परायण राष्ट्रों की मदद से भारत यंत्र संस्कृति में जोरों से आगे बढ़ रहा है और उसकी आन्तरिक निष्ठा मानती है कि यही सच्चा मार्ग है। गांधी जी के विचार जैसे हैं वैसे नहीं चल सकते। आचार्य कालेलकर ने आगे लिखा - विनोबा भावे गांधी जी के आत्मवाद सर्वोदय और अहिंसक शोषणविहीन समाज रचना का जोरों से पुरस्कार कर रहे हैं। उन्होंने भी देख लिया है कि पश्चिम के यंत्र कौशल और विज्ञान के बिना सर्वोदय अधूरा रहेगा। काका साहेब कालेलकर ने हिन्द स्वराज पर अपनी राय पुस्तक लिखे जाने के पचास वर्ष बाद व्यक्त की पर महात्मा गांधी ने अपने 55वें जन्मदिन 24 सितंबर 1924 चरखा द्वादशी को जो संकल्प लिया वह आज भी कारगर तरीका हो सकता है। गरीबी निवारण में केवल गांधी व चाणक्य के रास्ते पर चलने से ही हिन्दुस्तान प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ सकता है। इसलिये हिन्दुस्तानी गांवों की गरीबी हटाने के लिये चाणक्य मार्ग गांधी भाग ही कारगर उपाय है। अगर देश के तीन चौथाई ग्रामीण इलाकों की सुध समय रहते न ली गयी तो रहीम खानखाना की कहावत - मुई खाल की स्वांस सों सार भसम हो जाये चरितार्थ होगी। भारत के व्यापक शहरीकरण संकल्प के साथ साथ भारत के लाखों गांवों का ग्रामोद्योगीकरण जरूरी है। प्रधानमंत्री जी निकट भविष्य में इजरायल जाने वाले हैं। इजरायल का अनुसरण भारत के पहले प्रधानमंत्री ने रूर्बन सोसाइटी के संकल्प पूर्ति हेतु किया। सघन क्षेत्र विकास परियोजना 1953-54 से 1963 तक सहकारी विशेषज्ञ विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा वैकुंठ ललू मेहता के नेतृत्व में सफलतापूर्वक चली। भारत सरकार रूर्बन मिशन डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्य स्मृति में लागू करने का संकल्प लेना भी है। भारत के गांवों का चौखंभा उत्कर्ष केवल गांवों के ग्रामोद्योगीकरण से ही संभव है। नीति आयोग के पुस्तकालय में रूर्बन सोसाइटी का खाका जिसे झबेर भाई पी पटेल और विश्वनाथ टेकुमल्ला ने 1956-57 में प्रस्तुत किया उसे देखने की तात्कालिक जरूरत है।
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