उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में सर सैयद अहमद खां (1817-1898) उत्तरार्ध में महामना मदन मोहन मालवीय (1861-1946) दो शिक्षा समाज सुधारक हुए। इसी शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय राजनीति व समाज रचना के क्षेत्र में मोहनदास करमंचद गांधी (1869-1948) मोहम्मद अली जिन्ना (1876-1948) तथा बाबा साहेब अंबेडकर (1891-1956) तीन विलोम धर्मा राजनीतिक व्यक्तित्त्वों ने आधुनिक भारत को रूपायित किया है। इन तीनों राजनीतिक हस्तियों में महात्मा गांधी उम्र में जिन्ना से सात वर्ष तथा बाबा साहेब अंबेडकर से 22 वर्ष बड़े थे। महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों गुजराती भाषी थे। महात्मा गांधी वैष्णव बनिया हिन्दू थे व जिन्ना इस्लाम धर्म के शिया मुसलमान थे। उम्र में फर्क दस वर्ष से कम था इसलिये महात्मा गांधी और जिन्ना को समकालीन राजनीतिक व्यक्तित्त्व कहा जा सकता है। महात्मा गांधी और बाबा साहेब में पीढ़ी अंतराल था। इन तीनों राजनीतिक व्यक्तित्त्वों की अपनी अपनी स्थापित धारणायें थीं। इतिहासकार रामचन्द्र गुह ने सर सैयद अहमद खां मोहम्मद अली जिन्ना और बाबा साहेब अंबेडकर को आधुनिक भारत के उन्नीस निर्माताओं में गिना है। इतिहासकार गुह ने आधुनिक भारत के निर्माताओं में उपरोक्त तीन विभूतियों के अलावा समाज सुधारक राजा राम मोहन राय जयप्रकाश नारायण तथा राम मनोहर लोहिया को भी आधुनिक भारत के निर्माता समूह में गिना है। भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम के वक्त भारत के पचास व्यक्तित्त्वों को आधुनिक भारत का निर्माता गिना गया। भारत सरकार ने उन पचास महानुभावों की जीवनी प्रकाशित की। उन पचास व्यक्तित्त्वों में एक स्वांतत्र्य वीर हनुमान प्रसाद पोद्दार थे जिन्होंने गीता प्रेस के माध्यम से भारत के आध्यात्मिक साहित्य सहित पंचम वेद महाभारत तथा गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस को जन जन तक पहुंचाया। इस ब्लागर को इस बात पर को आपत्ति नहीं कि रामचंद्र गुह ने सर सैयद अहमद खां और मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक भारत का निर्माता क्यों घोषित किया ? अंततः दोनों इस्लाम धर्मावलंबबी हिन्दुस्तान की धरती के लाल थे। भारत तो वह भूभाग है जहां विचार भिन्नता ‘एतो मतो हमारो’ तुलसी के इस कथन पर आधारित है। पौराणोतिहासिक विश्वामित्र और वशिष्ठ की दुश्मनी जग जाहिर थी। वशिष्ठ की सामाजिक मान्यता विश्वामित्र से ऊँचे स्तर पर थी पर शत्रुभाव सातवें आसमान तक पहुंच चुका था। विश्वामित्र ने वशिष्ठ पुत्र शक्ति का वध कर डाला। शक्ति की तेरहवीं त्रयोदशाह में सम्मिलित होने के लिये वशिष्ठ ने दुश्मन विश्वामित्र के अलावा वैचारिक विलोम धर्मा आचार्य चार्वाक को भी न्यौता। चार्वाक मरणोत्तर जीवन के विश्वासी नहीं थे। उन्होंने वशिष्ठ के निमंत्रण पत्र को वापस करते हुए कहा - बुझा हुआ दीपक तेल का उपभोग नहीं कर सकता इसी तरह मृत व्यक्ति तक श्राद्ध़ का कव्य नहीं पहुंच सकता। वशिष्ठ ने चार्वाक को कहला भेजा - मृत व्यक्ति तो निमित्त मात्र है। भोजन तो आपने और मैंने करना है। चार्वाक को बात जंच गयी और वे शक्ति की तेरहवीं में सम्मिलित हुए। भारतीय वाङमय यर्थाथ में विश्वास करता है। यहां तीन राम हैं। पहले जामदग्न्य राम या फरसा वाले राम दूसरे दाशरथि राम तीसरे वासुदेव राम या बलराम। तीनों समकालीन भी नहीं थे पर इन तीनों रामों की भारतीय समाज में विशिष्ट भूमिका थी। बाबा साहेब अंबेडकर के व्यक्तित्त्व और विचार के बारे में चेन्नई से प्रकाशित दैनिक हिन्दू में अनन्या वाजपेयी का दृष्टिकोण पत्र छपा। 22 अगस्त 2015 के अंक में उन्होंने शीर्षक दिया Owning Ambedakar Sans his views दलित विद्वान सी.ए. परमार रचित राष्ट्रीय महापुरूष भारत रत्न डाक्टर भीमराव अंबेडकर शीर्षक की गुजराती पाठ्य पुस्तक दर्जा 6 से 8 तक के छात्रों के लिये सुनिश्चित हुई। स्तंभकार अनन्या वाजपेयी व्यक्त करती हैं कि बाबा साहेब को अपनाना पर उनके विचार से परहेज करना। अनन्या वाजपेयी के उपनाम से लगता है कि वे दलित नहीें हैं। उनकी सोच का सार है कि गुजरात सरकार बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की विचार वीथि तथा उनकी वैचारिक संपदा को अनुकूलता के दायरे चित भी मेरी पट भी मेरी दृष्टि से नहीं निपटा सकती। पाठ्य पुस्तकों के बारे प्राथमिक तथा पूर्व माध्यमिक कक्षाओं के लिये जब राष्ट्रीय घटक राज्यीय अथवा सांस्कृतिक क्षेत्रता के आधार पर किसी नामी गिरामी व्यक्ति का जीवन वृत राष्ट्रीय हितवर्धन के लिये संयोजित किया जारहा हो तो उसमें संबंधित व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्त्व का विश्लेषित पाठ्यक्रम में जोड़ा जाना चाहिये। आज भारत में दलित समाज में जो चिंतन धारा व्याप्त है वह दलित समाज को तथाकथित सवर्ण हिन्दू कहे जाने वाले लोगों के लिये एक आक्रोश पूर्ण क्रोधाग्नि है। छुआछूत क्या वेदांत शास्त्र सम्मत है ? यह सवाल महात्मा गांधी ने वसंत पंचमी 15 फरवरी 1916 के दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थापना समारोह के वक्त अपने बड़ील महामना मदन मोहन मालवीय के समक्ष प्रस्तुत की। महामना ने महात्मा से कहा - मैं तो परंपरा से अस्पृश्यता मानता रहा हूँ। अस्पृश्यता शास्त्र सम्मत है अथवा नहीं मुझे पता नहीं पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सर्वपल्ली राधाकृष्णन इस विषय में प्रकाश डाल सकते हैं। समारोह के पश्चात दोनों महानुभाव महामना और महात्मा सर्वपल्ली राधाकृष्णन के डेरे में पहुंचे। राधाकृष्णन वैदिक परंपराओं के निष्णात विद्वान थे। उन्होंने अपने आपको अनुग्रहीत समझा कि दो महापुरूषों ने उनके डेरे के दरवाजे आकर उन्हें कृतार्थ किया है। राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी की बात सुन कर कहा - छुआछूत तो मैं भी परंपरा से मानता हूँ पर यह शास्त्रोक्त है या नहीं यह देखने के लिये मुझे एक पखवाड़ा समय चाहिये। पंद्रह दिन बाद सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी को कहा - वेद, स्मृतियों, श्रुतियों से छुआछूत शास्त्र सम्मत सिद्ध नहीं होती। मैं दृढ़ मत का हूँ कि छुआछूत एक सामाजिक दोष है। इसका निवारण होना चाहिये। मीराबाई ने गिरिधर गोपाल से पूछा - गिरिधर गोपाल मैं किसे अपना गुरू बनाऊँ, किससे दीक्षा लूँ। मीराबाई को गिरिधर गोपाल ने काशी के रैदास का नाम सुझाया। रैदास एकांतिक भक्त थे। मीरा ने उनसे दीक्षा लेनी चाही। रैदास बोले - महारानी आप क्षत्रियाणी हैं। किसी ब्राह्मण या राजर्षि को गुरू बनाइये। मैं आपको दीक्षा देने की पात्रता नहीं रखता क्योंकि जात से चर्मकार हूँ। मीरा ने अपने प्रभु गिरिधर गोपाल का पीछा किया। गिरिधर ने कहा - केवल रैदास ही सच्चा भगवद्भक्त है। उसे मनाओ और गुरू दीक्षा लो। मीरा ने सारी बात रैदास के सामने रखी। रैदास से दीक्षा लेकर मीरा साध्वी होगयी। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा - विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि शुनि चैव श्वपाके च पंडितः समदर्शिनः। इसलिये अस्पृश्यता दोष समाज में छुपी हुई महाव्याधि है। महात्मा गांधी ने कोचरब आश्रम में एक सौ वर्ष पूर्व दूधाभाई हरिजन परिवार को आश्रम का हिस्सा बनाया था। तेरापंथी जैन धर्मावलंबी सेठ अंबालाल ने कोचरब आश्रम के लिये तेरह हजार रूपये महात्मा जी को सौंपे। वैष्णव गुजराती समाज को अपनी त्रुटि महसूस हुई पर एक सौ वर्ष पश्चात भी भारत में अस्पृश्यता के नजारे यत्र तत्र सर्वत्र दिखायी देते हैं जिससे यह प्रतीति होती है कि महात्मा गांधी का रास्ता कानूनी रास्ते से ज्यादा सटीक और सामयिक था।
गुजरात सरकार ने दर्जा 6 से 8 तक तीन दर्जों के लिये दलित विद्वान सी.ए. परमार लिखित ‘राष्ट्रीय महापुरूष भारतरत्न डाक्टर भीमराव रामराव अंबेडकर’ शीर्षक वाली पुस्तक राज्य सरकार के सामाजिक न्याय तथा सामर्थ्य संवर्धन विभाग ने उक्त पुस्तक की चार लाख प्रतियां वापस ले लीं। पाठ्य पुस्तक के लेखक प्रकाशक में अहम् पूर्वम् अहम् पूर्वम् भगदड़ मची। व्रत तो महात्मा गांधी के भी थे पर उन व्रतों का अनुसरण करने वाला केवल एक व्यक्ति था - विनोबा भावे। गांधी व्रत वैयक्तिक ज्यादा थे उन्हें जीवन में उतारना उतना सरल नहीं था पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के व्रत लौकिक व स्वहितवर्धक थे महात्मा गांधी की तरह निरपेक्ष अथवा अनपेक्ष नहीं इसलिये मनुष्यता के सकल ऐतिहासिक चिंतन पोखर में कायदे आजम जिन्ना एवं बाबा साहेब अंबेडकर के व्रत लोकोत्तर नहीं लोकाकांक्षी हैैं। कालिदास ने लिखा - मूढ़ कविः यशः प्रार्थीः। यह उक्ति प्रत्येक उस व्यक्ति पर लागू होती है जो यश सम्मान तथा अनुयायियों द्वारा व्यक्ति को उच्चासन की आकांक्षा वर्धन कराता है। हिन्दुस्तानी कहावत ‘हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ’। विवस्वान मनु से लेकर बाबा साहेब अंबेडकर तक राजधर्म चिंतन पोखर में एक नहीं अनेक उदात्त व्यक्तित्त्व भारत में उभरे हैं। भारत के अंबेडकर पंथी विचार पोखर का चौदह मन्वन्तरों एवं वाराह कल्प सहित सभी कल्पों में मन्वन्तर के जो प्रमुख मनु यथार्थतः अथवा कल्पना जगत में विद्यमान रहे हैं ‘मनुते इति मनुष्यः’। मनन चिंतन सोच विचार के पश्चात जो जीवात्मा कर्मयोग की तरफ बढ़ता है वही मनुष्य है, मनु का उत्तराधिकारी है। मनुष्य के अलावा जीव जगत में पशुलोक भी है। ‘पश्यते इति पशुः’ पशु देखते ही प्रतिक्रिया करता है इसलिये मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ दर्जा हासिल है। चिंतनशील मानवों में सबका चिंतन एक सा नहीं होना विचार भेद रहने ही वाला है इसलिये व्यापक सामाजिक स्तर पर ‘भिन्न रूचिर्हि लोकः’ ध्वन्यालोक के इस निष्कर्ष को स्वीकार करना ही होगा। जब समस्यायें उपजती हैं उनके समाधान का मार्ग भी समानांतर चलता रहता है।
स्तंभकार अनन्या वाजपेयी आगे कहती हैं कि गुजरात सरकार में अनुसूचित जाति कल्याण विभागाध्यक्ष के.डी. कापड़िया को उद्धृत करते हुए पाठ्य पुस्तक के लेखक और प्रकाशक के अहं ने मसले को दुरूह बना दिया। समाचार पत्रों में कुछ समय पूर्व एक रपट छपी थी आसाराम बापू की जीवनी राजस्थान के विद्यालयों का पाठ्यक्रम है। भारत में राजनीतिक चिंतन क्षेत्र को कई विचारक तीन कक्षों में विभक्त करते हैं। वाम, मध्य तथा दक्षिण। वाम पंथ अथवा कार्लमार्क्स की राजकरण एवं समाज निर्माण संबंधी सोच, मध्यम मार्ग बीच का रास्ता तथा दक्षिण पंथ। भारत में वाम पंथ के समानांतर हिन्दुस्तानी तौर तरीकों में मजहबी अनुष्ठानों में वाम मार्ग को अनेक विद्वानों ने पाखंड पथ माना है। वाम पंथ संभवतः पूंजीवाद के आगे नतमस्तक हो चुका है। राजनय, राजनीति तथा सामाजिक सरोकारों में किसी पक्ष को हेय दृष्टि से देखने से समस्यायें उग्रतम होजाती हैं इसलिये इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिये कि समस्याओं का समाधान खोजने के लिये सहमति वाले प्रसंगों को पहल दी जाये। जहां असहमति तथा विमत है उन बिन्दुओं पर कारगर बहस जारी रखी जाये। इसी को राष्ट्रीय रणनीति निश्चित किया जाये। अंबेडकर वादी विचारक महात्मा गांधी के चिंतन पथ को मनुवादी मानते हैं क्योंकि महात्मा और बाबा साहेब की चिंतनधारायें अस्पृश्यता निवारण के बारे में दो पृथक पृथक ध्रुवों में बंटी हुई हैं। इसलिये सटीक राजधर्म निर्वाह करने के लिये भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति लोकसभाध्यक्ष प्रधानमंत्री राज्यों के मुख्यमंत्री भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा मुख्य न्यायाधीश की संस्तुति वाले सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रमुखों हिन्दू मुसलमान इसाई जैन बौद्ध सिख पारसी यहूदी धर्मावलंबियों के प्रतिष्ठित धर्मसंघों के प्रमुखों से अखिल भारतीय एवं घटक राज्य स्तरों पर विचार विमर्श कर भारत महापुरूषों की जीवनियों को नयी पीढ़ी के संज्ञान में राष्ट्रीय एकता को व्यापक दृष्टिकोण से निर्धारित करने के लिये 1.क्षेत्रीय सांस्कृतिक 2. विभिन्न मजहबों के सार तत्व 3. क्षेत्रीय अथवा भाषायी सांस्कृतिक हस्तियां 4. विभिन्न भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय महत्व वाले कवि और लेखक 5. रामकृष्ण मिशन सहित सभी भारतीय धर्मों के प्रेरक व्यक्तित्त्वों का संक्षिप्त जीवन चरित 6. विश्वबंधुत्व के समानांतर भारतीय राष्ट्रीय महत्व के व्यक्तित्त्वों का जीवन चरित 7. राजनैतिक सामाजिक मजहबी सांस्कृतिक साहित्यिक आर्थिकी बिन्दुओं पर अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारत विचार की भूमिका निर्धारण करने के लिये प्रति वर्ष या हर दूसरे या तीसरे वर्ष राजगोष्ठी संपन्न करने के लिये सरकारी तंत्र के समानांतर असरदार अंबुदसमान Ombudsman तरीके का गांव से लेकर लोकसभा स्तर असरकारी स्वार्थ निर्लिप्त राष्ट्रीय मानक स्तूप का संकल्प।
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