Sunday, 6 September 2015

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थम् प्राहुख्ययम्
छन्दांसि यस्य पर्णानि
श्रीमद्भगवदगीता अध्याय 15 श्लोक 1

ब्लागर हिमकर ने पिता पुत्र नारायण मूर्ति तथा रोहन मूर्ति द्वय के मैकोलाइट अंग्रेजी के जरिये हिन्दुस्तान के परंपरागत ध्वन्यालोक उक्ति ‘भिन्न रूचिर्हि लोकः’ का किसी पूर्ववर्ती ब्लाग में हिन्दुस्तान के लिये रोमन लिपि का सहारा लेने के उत्सुक हिन्दुस्तानी मैकोलाइट अंग्रेजी के द्वारा ज्ञानार्जन करने की वकालत करने वाले हिन्दुस्तानी लेखक चेतन भगत की संकल्पना के साथ रोहन मूर्ति के संकल्प को जोड़ कर देखने का प्रयास किया था। लगता है कि हिन्दुस्तान के अस्सी करोड़ अप्रौढ़ नौजवानों में जो पैंतीस वर्ष से कम उम्र के हैं उनके संदर्भ में इंडियन एक्सप्रेस के आइडिया - पृष्ठ 31 अगस्त 2015 के अंक में What Poetry has to do with Maths? शीर्षक से रोहन  ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए प्रस्तुतीकरण का लक्ष्य घोषित करते हुए कहा - We stand to gain much from developing an understanding of ancient India, its deep & diverse ideas. रेखांकित भाग गंभीर और विलोम विचार जिसे आधुनिक हिन्दी विविधता अथवा वैविध्य करती है उससे समझबूझ वाला मानसिक वातावरण चिंतन किया। भगवद्गीता ने पंद्रहवें अध्याय पुरूषोत्तम योग के पहले श्लोक के उत्तरार्ध में ‘छंदांसि यस्य पर्णानि’ याने छन्द अथवा कवित्त की ऊपर के जड़ वाले तथा शाखायें नीचे की ओर बढ़े अश्वत्थ को विद्वानों ने अव्यय अक्षर ईश्वर तथा अनादि अनंत कहा - वैदिक गणित का पहला सूत्र ही छंद है। वेद का मूल ही ज्ञान है और ज्ञान सांख्य भी है शाश्वत सत्य भी है। 
रोहन मूर्ति कहते हैं अफगानिस्तान (संस्कृत वाङमय का उपगंधर्व स्थल आज की दुनिया में अफगानिस्तान के नाम से जाना जाता है) भारतीय वाङमय गंधर्व को उपदेव भी मानता है। उपगंधर्व स्थान - अफगानिस्तान देश में वर्तमान में कंदहार नाम से जाना जाने वाला नगर पूर्व काल में गांधार कहलाता था। गांधारी महाभारत महाकाव्य की दिव्य नायिका हैै जो गांधार नरेश सुबल की कन्या थी उसका एक नाम सौबली भी है याने सुबल कन्या। उसका विवाह हस्तिनापुर नरेश कुरूवंशी राजा धृतराष्ट्र के साथ हुआ था जो जन्मांध थे। गांधारी के पातिव्रत्य ने उसे आंखों में पट्टी बांधने का रास्ता बताया। भारतीय वाङमय में दो हाथ, दो पैर वाले मानवाकृति के पूर्ववर्ती सक्षम शक्ति स्त्रोत में ‘देव दानव गंधर्वः यक्ष राक्षस किन्नरः’ इन छः समूहों उपरांत ‘मनुते इति मनुष्यः’ का स्थान रखा है। देव दानव गंधर्व यक्ष राक्षस किन्नर’ मनुष्य से ज्यादा सामर्थ्य शक्ति संपन्न होते हैं। अफगान या उपगंधर्व अथवा उपदेव उपरोक्त छः शक्ति संपातों में से एक है। रोहन मूर्ति अफगानिस्तान से वर्मा (मौजूदा म्यांमार जिसे भारतीय वाङमय ब्रह्मदेश कहता है) उसके बारे में स्यात्वाद का सहारा लेरहे हैं। रोहन मूर्ति की तरह मंजुल भार्गव भी भारतीयता को समझबूझ कर उसकी व्याख्या मैकोलाइट अंग्रेजी के मार्फत करने के अभ्यासी हैं। संभवतः नारायण मूर्ति एवं उनके पुत्र रोहन मूर्ति माध्व संप्रदाय के विशिष्टाद्वैत वादी हैं जो आदि शंकर के अद्वैत रामानुजाचार्य के द्वैताद्वैत के पश्चात कर्णाटक में विशिष्टाद्वैत के रूप में उभरा। आदि शंकर का उद्भव भारतीय विचारकों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, डा. संपूर्णानंद तथा डा. भगवान सिंह के मत में ईसा से चार सौ वर्ष पूर्व वैशाख शुक्ल पंचमी को कालड़ी त्रिर्वांकुर में जन्मे थे। रोमिला थापर  सहित आधुनिक भारतीय इतिहासकारों की मान्यता है कि आदि शंकर ईसा से पहले नहीं ईसा के उपरांत आठवीं सदी में जन्मे थे। जरूरत इस बात की लगती है कि हिन्दुस्तान के लोग आदि शंकर का काल निर्धारण करने के बारे में गहन विचार विमर्श करें। वर्तमान में दो विचारधारायें आदि शंकर के काल निर्धारण पर चल रही हैं। अगर मैकोलाइट अंग्रेजी के दो भारतीय इतिहासकार पूर्वाग्रह को विचार करें विशुद्ध भारतीय विद्वानों की राय भी अपने चिंतन का जरिया बनायें तो आधुनिक भारत के सांस्कृतिक निर्माता आदि शंकर के काल निर्धारण पर भारत वासी गहन मनन चिंतन तथा शंकर के द्वारा संपन्न कार्यों का अनुशीलन कर किसी निश्चय पर पहुंचें वह भारतीयता के लिये अभूतपूर्व पर्व होगा। 
जर्मनभाषी मैक्समूलर ने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ऋग्वेद के प्रकाशन का भगीरथ प्रयास किया। उन्होंने ऋग्वेद जो श्रौत विद्या का साधन था उसे लिपिबद्ध कराया। स्वयं को मैक्समूलर कहने के बजाय संस्कृत शब्द मोक्ष मूलः कहा। साथ ही आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का उल्लेख ऋग्वेद में अक्षपत्तन के तौर पर किया। मोक्षमूलर संपादित तथा आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रकाशित ऋग्वेद भारतीय वाङमय की धरोहर है। नारायण मूर्ति तथा उनके सुपुत्र नौजवान रोहन मूर्ति भारत के अस्सी करोड़ युवाओं में से एक महत्वपूर्ण ध्वनिबोध है। संभवतः पिता पुत्र चिंतनकर्ता द्वारा कर्णाटक राज्य के हव्यवाहों में से हों तथा हवन प्रक्रिया पर मौरूसी तौर पर यकीन भी करते हों। मातृभाषा तो उनकी कन्नड़ ही होनी चाहिये। कन्नड़ भाषा में संस्कृत शब्द बाहुल्य है। संस्कृत प्राकृत पाली और कन्नड़ ‘शब्दः खे पौरूषम् नृषु’ शब्द में सृजन शक्ति है। कर्णाटक राज्य में एक गांव तो ऐसा भी है जहां के लोग आज भी संस्कृत को अपनी मातृभाषा कहते हैं। संस्कृत में बोलते हैं। इसलिये पिता पुत्र द्वारा जो भारतीय वाङमय सेवा का व्रत लिया गया है उसे प्राकृत पाली और कन्नड़ शब्द पर्याय से भी जोड़ने की तात्कालिक जरूरत है। रोहन मूर्ति महाशय मूर्ति लाइब्रेरी का संकल्प लिये हैं। भारत में डाक्टर ग्रियर्सन के मतानुसार 276 वाणियां हैं। उनमें अनेक लोप होने की दिशा में अग्रसर हैं। जिन वाणियों को भारत वासी आज भी बोलते हैं उनका योगक्षेम नारायण मूर्ति लाइब्रेरी के द्वारा संभव है। भारत की तात्कालिक जरूरत विभिन्न भारतीय भाषाओं के साझाकोश की है क्योंकि अंग्रेजी का प्रयोग करने वाले आज भारत में बारह करोड़ के करीब लोग हैं। इसलिये भारतीय भाषा कोश में संस्कृत प्राकृत पालि सहित वर्तमान में लिखी व बोली जाने वाली भाषाओं के पर्याय कोश की संरचना करने से एक भारतीय भाषा का जानने वाला अन्य भाषाओं की जानकारी भी हासिल कर सकता है। भाषा शास्त्र अथवा शब्द सृष्टि के मूल को खोज कर संस्कृत व आधुनिक भारतीय भाषाओं का पर्याय कोश रचित करने के बारे में संकल्प लिया जाना चाहिये। 
रोहन मूर्ति कहते हैं कि यह दावा करना कि पूर्वकालीन मनीषि कम्प्यूटर भाषा जानते थे अथवा बेतार संभाषण ज्ञाता थे एक मूर्खतापूर्ण विवेकहीन सोच है। रोहन मूर्ति ने यदि भगवद्गीता का ही चिंतन किया होता तो योगेश्वर श्रीकृष्ण व अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ उसे ज्योत्सर कुरूक्षेत्र के रणांगण में उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने न सुना न बूझा पर कुरूक्षेत्र से एक सौ मील दूर हस्तिनापुर में कृष्णार्जुन संवाद को महर्षि वेदव्यास की अनुकंपा से संजय ने यथातथ्य सुना और अपने स्वामी राजा धृतराष्ट्र को कुरूक्षेत्र के मैदान में रणांगण में घटी हर घटना का आंखों देखा हाल सुनाया। यह दूरदर्शन तथा दूरश्रवण प्रक्रिया है। रोहन मूर्ति युवा चिंतक हैं वे भारतीय वाङमय को अंग्रेजी भाषा के जरिये समझने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। अगर उन्होंने अपनी मातृभाषा कन्नड़ के तद्भव शब्दों को वैदिक और उत्तर वैदिक पौराणिक संस्कृत वाङमय से जोड़ कर समझने की कोशिश की होती तो वे संस्कृत प्राकृत पाली और कन्नड़ शब्दावली में तादाम्य बैठाने का प्रयोग कर सकते थे पर उन्हें बर्तानिया और संयुक्त राज्य अमरीका की आधुनिक अंग्रेजी के जरिये समझ का अभ्यास होगया जो भारत के नौजवानों में एक भ्रामक संशयात्मक ग्रंथि को उकसा रहा है। 
महाशय रोहन मूर्ति जो हिन्दुस्तान के अस्सी करोड़ पैंतीस वर्ष पार न किये युवाओं की अगुआई कर रहे हैं वे फरमाते हैं अपने विद्यार्थी जीवन में प्लूटो, अरस्तू, पाइथागोरस, कोपरनिकस, न्यूटन, लेनिनियन पास्कल, गैलांइश, मेलर आदि के संबंध में साथ ही उन विचारकों ने जो परिभागिता मानवता के संदर्भ में संपन्न की उसका अध्ययन विवेचन हमारे संज्ञान में है। वे आगे फरमाते हैं पर हमें आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, पिंगल, कालिदास, हेमचंद्र, नहवाचार्य, न्यायसूत्र, मीमांसा सूत्रों तथा त्रिगथ विषयक ज्ञान नहीं है। रोहन मूर्ति यह तो स्वीकार करते हैं कि भारतीय वाङमय संबंधी उनकी मर्यादायें आड़े आरही हैं। वे मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी आफ इंडिया के संस्थापक हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्येता महानुभावों में कनिष्ठ प्रतिभागी हैं। उनको शायद यह ज्ञात होगा कि इंटरनेट के क्षेत्र में मंदारिन, अरबी और मलय ने अपना स्थान सुनिश्चित एवं सुस्थापित किया हुआ है। मंदारिन अरबी व मलय भाषियों को रोमन लिपि का सहारा नहीं लेना पड़ता। अल्फा - अक्षराणाम् अकारोस्म् िके क्षेत्र मंे लैटिन में 24 रोमन में 26 तथा भारतीय वाङमय में नारायण मूर्ति रोहन मूर्ति पिता पुत्र द्वय की मातृभाषा कन्नड़ सहित सभी भारतीय लिपियों में 51 अक्षर हैें। दुनिया में मंदारिन बोलने वाले डेढ़ अरब लोग हैं। मंदारिन के नाम दुनियां की भाषायी जमीन में अंग्रेजी बोलने वाले लोग दूसरे स्थान पर हैं। हिन्दुस्तान की भाषाओं में हिन्दी बांग्ला पंजाबी बोलने वाले लोग क्रमशः चौथे सातवें व ग्यारहवें स्थान में हैं पर हिन्दुस्तान की किसी भाषा ने इंटरनेट पर अपनी छाप नहीं छोड़ी है। नारायण मूर्ति तो भारतीयता के दृष्टिकोण से नेहरू युग के उत्पाद हैं। जवाहरलाल नेहरू की शिक्षादीक्षा पूर्णतः विलायती परिवेश में ही हुई। पूर्ण स्वराज के उद्घोष के साथ जब वे 1929 में महात्मा गांधी के संपर्क में आये उनके विचार बदले। उन्होंने डिस्कवरी आफ इंडिया अंग्रेजी में लिखी अवध के गांवों में घर घर जाकर उन्होंने किसानों के हालात देखे। अजमेर निवासी दिल्ली में सस्ता साहित्य मंडल का संचालन करने वाले हरिभाऊ उपाध्याय से कहा - हरिभाऊ मेरी किताब हिन्दी में उल्था कर दो। हरिभाऊ ने पंडित नेहरू को कहा - यह मेरा सौभाग्य है कि आपकी लिखी किताब को मैं हिन्दी में प्रस्तुत करूँ पर पंडित जी मेरी एक शर्त्त है कि आपको मेरा किया अनुवाद पढ़ना होगा और अपनी कलम से उसका प्राक्कथन भी लिखना होगा। पंडित जी ने शर्त्त मंजूर कर ली और उन्होंने हरिभाऊ के अनुवाद को पढ़ कर लिखा कि हरिभाऊ ने गजब का अनुवाद किया है। हिन्दी भाषियों ने अपने नेता की किताब का अनुवाद पढ़ा। जवाहरलाल जन जन के नेता थे। उन्हें हिंदी कविता सुनने का शौक था। बालकृष्ण शर्मा नवीन मैथिली शरण गुप्त सुमित्रा नंदन पंत अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध सूर्यकांत त्रिपाठी निराला रामधारी सिंह दिनकर हरिवंशराय बच्चन फिराक गोरखपुरी की कविता शायरी मनोयोगपूर्वक सुनते। हिन्दी में धाराप्रवाह भाषण करने वाले डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जयप्रकाश नारायण डा. राममनोहर लोहिया अटल बिहारी वाजपेयी को पंडित नेहरू ध्यानपूर्वक सुनते थे। भारतीय भाषाओं के कवियों लेखकों से उनकी आत्मीयता थी। 
आज भारत मैकोलाइट अंग्रेजी के मोहपाश में बुरी तरह उलझ गया है। नारायण मूर्ति रोहन मूर्ति की मातृभाषा कन्नड़ सहित तमिल मलयाली तेलुगु मराठी उड़िया बांग्ला असमी मइती कोंकणी गुजराती पंजाबी उर्दू दस लिपियों वाली घटक राज्य भाषायें तथा मराठी कोंकणी व नैपाली सहित नागरी लिपि का प्रयोग करने वाले 10 हिन्दी भाषी राज्यों की तात्कालिक जरूरत इंटरनेट में इन लिपियों व भाषाओं की उपस्थिति दर्ज कराना है। नारायण मूर्ति व उनके उत्साही पुत्र रोहन मूर्ति साढ़े तीन करोड़ भारतीय कन्नड़ भाषियों व विश्व भर में फैले कुल साढे़ चार करोड़ कन्नड़ भाषियों का इंटरनेट योगक्षेम सुनिश्चित करने के लिये आगे आने और कर्णाटक के घर घर गांव गांव में कन्नड़ लिपि के जरिये कन्नड़ भाषियों की तात्कालिक शिल्प निपुणता का योगक्षेम सुनिश्चित करें। जननी जन्मभूमि की सेवा मूर्ति लाइब्रेरी से ज्यादा महत्वशील है। कर्णाटक प्रदेश 1,91,791 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ भारत संघ का घटक राज्य है। आबादी जनवरी 2011 में 6,11,30,704 थी समूचे देश में पिछले पांच वर्षों में 26 करोड़ आबादी बढ़ी है। मानना चाहिये कि कर्णाटक की आबादी भी राष्ट्रीय अनुपात में छह करोड़ पंद्रह लाख तो पहुंच ही गयी होगी। कर्णाटक में पुरूष साक्षरता लगभग 83 प्रतिशत महिला साक्षरता 68 प्रतिशत है। साक्षरता के नजरिये से कर्णाटक भारत के विकसित राज्यों की श्रंखला में है फिर भी कर्णाटक के 22431 गांवों और 270 शहराती इलाकों में कन्नड़ इंटरनेट समय की जरूरत है।
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