Thursday, 10 September 2015


गीताप्रेस गोरखपुर और हनुमान प्रसाद पोद्दार की उद्दाम भक्ति

महाशय अक्षय मुकल लिखित पुस्तक ‘गीताप्रेस एंड मेकिंग आफ हिन्दू इंडिया’ पृष्ठ 552 मूल्य 799 की समीक्षा सुश्री मंजुला नारायण ने दैनिक पत्र हिन्दुस्तान टाइम्स नयी दिल्ली के 5 सितंबर 2015 के अंक के तेरहवें पृष्ठ में की है। दूसरी ओर गीता प्रेस का संकट उसकी अपनी कमाई शीर्षक से हिन्दी पत्रकार श्री राजकिशोर ने गीता प्रेस की कानूनी आर्थिकी का विश्लेषण किया है। महाशय राजकिशोर का स्तंभ राष्ट्रीय सहारा के 6 सितंबर 2015 के अंक में छपा है। तुलसीदास ने जन भाषा में रामायण लिखने का भगीरथ प्रयास स्वांतः सुखाय किया। तुलसीदास गृहस्थ से सन्यस्त गेरूवाधारी थे। मांगबे खाइबो मजीद पै सोइबो का आदर्श लेकर चलने वाले ऐसे व्यक्तित्त्व थे जिन्होंने अपनी काव्य साधना में ‘वन्दऊँ सन्त असंतन चरना’ से शुरू की थी। सवाल उठता है कि क्या तुलसीदास के मन में ऐसी कोई मनोभावना थी जिसमें महाशय अक्षय मुकुल को ‘गीताप्रेस एंड मेकिंग आफ हिन्दू इंडिया’ पुस्तक लिपिबद्ध करने की कोई प्रेरणा मिली। सिंधु, सिंध हिन्दु हिन्द इण्डस इंडिया इन छः शब्दों का मूल शब्द सिंधु है। सिन्धु एक नदी है जो हिमालय से निकल कर अपनी सहायक नदियों से संगम कर हिन्द महासागर के अरब सागर नाम से जाने जाने वाले समुद्र से मिलाप करती है। संस्कृत भाषा के शब्द ‘स’ अक्षर का उच्चारण वर्तमान मध्यपूर्व याने ईरान तूरान अरब देशों में ‘ह’ से किया जाता है। संस्कृत के सुर शब्द को वहां ‘हुर’ असुर शब्द को अहुर तथा सिंध सिंधु को शब्दों को क्रमशः हिन्द और हिन्दू कह कर पुकारा जाता है। इसलिये यह भाषा विज्ञान की प्रमाणित विधि है हिन्द हिन्दी और हिन्दू शब्द और्वोपदिष्ट हैं। सवाल फिर उठता है कि और्व क्या है ? भारतीय वाङमय में और्वोपाख्यान और्वोपदिष्ट मार्ग तथा और्वोपदिष्ट योग भारत में अरब और अरब के लोगों की सभ्यता के बारे में प्रतीति कराता है। अक्षय मुकुल एवं उनके ग्रंथ की समीक्षिका कहती हैं कि इस प्रश्न पर पर्याप्त अनुसंधान किया जा चुका है। अक्षय मुकुल कहते हैं उन्होंने गोरखपुर लखनऊ और बनारस का भ्रमण किया। इन जगहों में उत्कृष्ट पुस्तकालय हैं। उन्होंने पुराने कार्मिकों को भी टटोला जाना भी समस्या थी। वे तीन मूर्ति नेहरू संग्रहालय में भी गये लक्ष्य विविध बिन्दुओं को देखना था। अक्षय मुकुल यह भूल गये कि हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं यहां तक कि मुसलमानों द्वारा अपनी भाषा कही जाने वाली उर्दू में भी भक्ति साहित्य का दर्शन होता है। यद्यपि भक्ति साहित्य का आरंभ तो संस्कृत वाङमय से ही हुआ पर जब भारत में इस्लामी सत्ता थी भक्ति साहित्य ने वर्तमान में दलित नाम से पुकारे जाने वाले समाज सहित भारतीय भाषाओं का भाक्ति ज्ञान व वैराग्य पोषण बिरानी सत्ता ने देश के लोगों में एक नयी शक्ति का संपात किया। ख्रिस्ती मजहब और इस्लाम मजहब एकेश्वर पैगंबर एक पुस्तक आधारित आधुनिक धर्म या मजहब हैं जिसे पश्चिमी संसार तथा अरब के लोग हिन्दू मजहब कहते हैं। वह मजहब की बारीक जांच पड़ताल करने पर मजहब नहीं एक जीवन शैली लगती है क्योंकि धरती में सनातन के सभी उपांगों का मानना है कि मजहब अथवा आस्था प्रक्रिया व्यक्ति प्रधान होती है समाज प्रधान नहीं। अक्षय मुकुल महाशय से सवाल हुआ ‘आप मारवाड़ी संदर्भ लेरहे हैं’। जब मारवाड़ी संदर्भ की बात आती है आज के पश्चिमाभिमुख मारवाड़ी नहीं। राजा बलदेव दास बिड़ला के समकालीन मारवाड़ी जिनमें साठ की उम्र पहुँचने पर पारलौकिक जीवन का विचार उठता है। हनुमान प्रसाद पोद्दार में यही प्रवृत्ति महत्वपूर्ण थी। वे कालबादेवी मुंबई में दुकान बढ़ाने के बाद नियमित रूप से एक घंटा चौपाटी में बिताते थे। चौपाटी में हनुमान प्रसाद पोद्दार को सामने की पत्थर कुर्सी में बैठे एक पारसी सज्जन रोज दिखायी देते थे। एक दिन उत्सुकता से हनुमान प्रसाद ने उस पारसी वृद्ध से सवाल कर ही दिया - शाह जी आप रोज इसी पत्थर की कुर्सी पर बैठते हैं। पारसी वृद्ध बोला - हनुमान प्रसाद जी मैं एक प्रेत हूँ। आपसे बतियाने इस कुर्सी पर बैठा रहता हूँ। ईश्वर ने मेरी सुन ली आपने बात शुरू की। आप के घर में रसोइया मारवाड़ी बामन है। आप उससे मेरा क्रियाकर्म गया में संपन्न करा दो तो प्रेत योनि से मेरी मुक्ति संभव हो जायेगी। भाई जी का खयाल था कि केवल हिन्दू ही प्रेत होते हैं। प्रेत योनि प्राप्त उस पारसी वृद्ध ने हनुमान प्रसाद से कहा - हनुमान प्रसाद जी हर आदमी और औरत मरने पर प्रेत होते हैं हिन्दू आस्था शैली में प्रेत योनि से निवृत्ति का प्रावधान है। मृत्यु के उपरांत मृत व्यक्ति की आत्मा प्रेत योनि को प्राप्त होती है। दस दिन लगातार अंजलि देने से प्रेत मुक्ति हो सकती है। मंत्र सुनाता हूँ - अनादि निधनो देवः शंखचक्र गदाधरः अव्ययः पुण्डरीकाक्षः प्रेत मोक्ष प्रदो भवः। प्रेत ने हनुमान प्रसाद जी को उनका व उनके रसोइये मारवाड़ी वामन का रेलभाड़ा सहित गया में प्रेत मुक्ति के लिये एक अच्छी खासी रकम रिजर्व बैंक आफ इंडिया के नये नये नोटों को देकर लक्ष्य साधन किया। हनुमान प्रसाद जी पारसी वृद्ध की प्रेत योनि मुक्ति के लिये स्वयं भी गया श्राद्ध संपन्न करने हेतु अपने रसोइया व पुरोहित वामन को लेकर गये। पूरे बारह दिन विधिपूर्वक प्रेतमोक्ष अनुष्ठान संपन्न किया गया। अपने नित्य नैमित्तिक कृत्यों में हनुमान प्रसाद जी का चौपाटी में बैठना नित्य का कर्म था। गया से लौटने के पश्चात उन्हें प्रेत दिखा नहीं केवल वाणी सुनायी दी। पारसी व्यक्ति ने कहा - हनुमान प्रसाद जी आपकी कृपा से मेरी प्रेत योनि से मुक्ति हो गयी है अतः आपका धन्यवाद ज्ञाप करता हूँ। मारवाड़ में रहने वाले अनेक मुसलमान एकादशी का व्रत रखते थे यह प्रसंग भी हनुमान प्रसाद जी ने लिखा है। हिन्दू मुस्लिम एकता अस्पृश्यता निवारण की तरह महात्मा गांधी का जीवन उद्देश्य था। हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिये अपना सुनिश्चित मत व्यक्त किया है। अक्षय मुकुल महाशय ने हनुमान प्रसाद पोद्दार को दक्षिणपंथी हिन्दूवादी व्यक्तित्त्व करार देना चाहा है। विचार स्वातंत्र्य की दृष्टि से अक्षय मुकुल को अपना मत प्रस्तुत करने उसे लोकमत बनाने की पूरी आजादी है। वे फर्माते हैं कि मासिक पत्रिका कल्याण ने महामना मदन मोहन मालवीय के दिवंगत होने पर 1946 में कल्याण विशेषांक प्रकाशित किया जिसे बर्तानी राज ने जब्त कर लिया। जब्ती के कारणों का विश्लेषण करते हुए अनुसंधानशील अक्षय लिखते हैं कि गीताप्रेस का वह प्रकाशन जो मालवीय जी की स्मृति में प्रकाशित हुआ वह अत्यंत उग्र क्रोधाग्निवर्धक था। कल्याण मासिक ने अक्षय मुकुल के अनुसंधानानुसार मुसलमानों को मार भगाने का एलान किया। अक्षय की राय में कल्याण हिन्दू महासभा के विचार का प्रचारक था। 
भारत सरकार ने भारत के पचास निर्माताओं की जो जीवनी प्रकाशित की है उनके एक व्यक्ति हनुमान प्रसाद पोद्दार जी भी हैं। हनुमान प्रसाद सनातनी वैष्णव बनिया थे। जब महात्मा गांधी ने छुआछूत निवारण की मुहिम चलायी हिन्दू धर्म शास्त्र के ज्ञाता सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी कहा - वे भी छुआछूत मानते हैं परंपरा से। महात्मा गांधी का एक ही सवाल था वह कि क्या धर्मशास्त्र में छुआछूत मानने की कोई शास्त्रीय व्यवस्था है ? सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने महात्मा गांधी को कहा - वेद पुराण श्रुति स्मृति तथा उपनिषदों एवं ब्राह्मण ग्रंथों में छुआछूत मानने की कोई विधा नहीं है। जब वैदिक धर्माचरण के निष्णात सर्वपल्ली ने महात्मा को छुआछूत शास्त्र सम्मत न होने की पुष्टि की तो महात्मा का अस्पृश्यता निवारण का उत्साहवर्धन और भी ज्यादा होगया। अब अक्षय मुकुल महाशय के उस प्रसंग पर आयें जिसमें वे कहते हैं - पंडित नेहरू अकेले व्यक्तित्त्व थे जिन्होंने कल्याण के लिये कभी कुछ नहीं लिखा। वे कहते हैं - कल्याण के लोग - संभवतः उनका संकेत हनुमान प्रसाद जी के लिये हो - कल्याण के लिये संदेश देने हेतु पंडित नेहरू को लिखते रहे। अक्षय मुकुल तीन मूर्ति नेहरू संग्रहालय गये उन्हें यह पढ़ना चाहिये था कि क्या हनुमान प्रसाद जी की कोई मुलाकात 15 अगस्त 1947 से पहले और आजादी के बाद पंडित नेहरू से हुई थी ? क्या वे पंडित नेहरू से मिलने के लिये कभी तीन मूर्ति भवन गये थे ? क्या अक्षय महाशय को यह जानकारी है कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद व प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के बीच भारत के प्रथम भारत रत्न हनुमान प्रसाद पोद्दार को घोषित किये जाने बाबत चर्चा अथवा पत्र व्यवहार हुआ था ? क्या वर्ष 1954 में जब भारत रत्न उपाधि का श्रीगणेश होने की चर्चा चल रही थी तब हनुमान प्रसाद जी माननीय राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मिले थे और उन्होंने माननीय राष्ट्रपति तथा माननीय प्रधानमंत्री महोदय का वह प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए निवेदन किया था कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होकर गीता प्रेस के जरिये गीता एवं रामायण का जो साहित्य जन जन तक पहुंचाया वह किसी ईनाम अथवा उपाधि से विभूषित होने के लिये नहीं वरन् वह तो उनका स्वांतः सुखाय उपक्रम था। पंडित नेहरू ने अपनी वसीयत में लिखा कि वे अपनी धर्मचारिणी पत्नी कमला नेहरू की अस्थियां व राख चांदी के डिब्बे में भगवद्गीता के साथ अपने सिरहाने रखा करते थे। पंडित नेहरू नित्य गीता पाठी भी थे इसलिये अक्षय मुकुल को अपने अनुसंधान पर पुनः अनुसंधान करना चाहिये कि हनुमान प्रसाद जी व पंडित नेहरू के पारंपरिक संबंध कैसे थे ? वे यह भी फरमाते हैं कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद जिन पच्चीस हजार लोगों को बन्दी बनाया गया उनमें हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे। अक्षय मुकुल महाशय सेठ रामनाथ गोयनका द्वारा सेठ घनश्याम दास बिड़ला को संबोधित पत्र का उल्लेख कर रहे हैं। अक्षय के अनुसार सेठ घनश्याम दास बिड़ला ने रामनाथ गोयनका के सुझाव को खारिज कर दिया और कहा - वे सनातन धर्माचरण नहीं कर रहे अपितु शैतान धर्माचरण कर रहे हैं। हनुमान प्रसाद जी ने सेठ घनश्यम दास बिड़ला को साक्षात ईश्वर दर्शन कराये थे अतः अक्षय मुकुल जो बात कह रहे हैं वह गहराई से जांच पड़ताल की जाने लायक है। ज्योंही अक्षय मुकुल की पुस्तक का संपूर्ण पारायण कर इस प्रसंग पर यह ब्लागर भारत वासियों के सामने असलियत व सच्चाई प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा। दलितों के मंदिर प्रवेश संबंधी अक्षय मुकुल महाशय के हनुमान प्रसाद जी के विचार एकपक्षीय प्रतीत होते हैं। वह व्यक्ति जो इस धारणा का धारक है - विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गविहस्तिनी शुनि चैवश्वपाके च पंडितः समदर्शिनः। ईश्वर तो कण कण में है और प्रत्येक जीवात्मा में परमात्मा का वास है इस सिद्धांत के प्रतिपालक हनुमान प्रसाद जी को दलित विरोधी करार देना तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता। 
गीताप्रेस द्वारा कल्याण प्रकाशन के पिछले नवासी वर्षों में गीताप्रेस के शुरूआती अधिष्ठाता रहे जयदयाल गोयन्दका और हनुमान प्रसाद पोद्दार में जो लगन थी कुछ करने की लालसा थी जननी जन्मभूमि के लिये न्यौछावर होने का जो शिवसंकल्प था पिछले चार पीढ़ियों के अंतराल में उसमें कुछ परिवर्तन आना स्वाभाविक है। ज्यों ज्यों संपन्नता आती है त्यों त्यों अहंकार भी बढ़़ता ही है। पिछले पच्चीस वर्ष से गीताप्रेस अनेकानेक समस्यायें झेल रहा है । जयदयाल गोयन्दका व हनुमान प्रसाद जी जात बिरादरी से मारवाड़ी बनिया थे पर उपराम की कल्पना भी उनका लक्ष्य था। राजकिशोर महाशय का कहना है - या तो धार्मिक स्वैच्छिक विधि से चलिये या कानूनी आर्थिकी से संगठन का आकार बढ़ गया है। गीताप्रेस में मौजूदा सर्वाधिकार संपन्न व्यक्तित्त्व को व्यापारिक चहारदिवारी से बाहर निकलना होगा। कर्मचारियों को रखोगे तो उन पर सभी कानूनी बाध्यतायें भी स्वीकार करनी ही होंगी। न्यूनतम वेतन भी देना ही होगा। दूसरा पक्ष है गुरू शिष्य परंपरा वाला। इलिच ईवान ने साठ वर्ष पूर्व अमरीकी समाज को चेताया था कि स्कूल सिस्टम खत्म कर हिन्दुस्तान की गुरू शिष्य परंपरा की तरफ बढ़ो पर आज सवाल गुरू शिष्य परंपरा के समानांतर स्त्रीपुङ समानता तथा नारी स्वातंत्र्य विचार भी बढ़ रहा है इसलिये शहर के बीच में चलने वाले स्वयंसेवी कार्यों के लिये भी मर्यादायें तय करनी होंगी। पच्चीस वर्षों से चलते आरहे गीताप्रेस के संकट से उसे छुटकारा देने के लिये पुरूषों व स्त्रियों के ऐसे समूह बनाने होंगे जो परिवार के बंधन में बंधने को तैयार नहीं हैं। आध्यात्मिकता का जोश जिनमें हो जो यति योगी संन्यासी जीवन व्यतीत करने के पक्षधर हों। गीताप्रेस के लोग मिल बैठ कर विचार विमर्श करें कि भारत की सभी भाषाओं में अध्यात्म सहित्य को पहुंचाने के लिये गीताप्रेस को अपना कलेवर बदलना होगा जिस तरह सांप अपनी केंचुल बदलता है। संगठनात्मक काया इसे धारण करना होगा। गौतम का मध्यमार्ग व श्रीकृष्ण की षडविधा राजनीति तथा राम की मर्यादा प्रियता को अपनाना होगा। गोरखपुर के गाीताप्रेस को प्रत्येक भाषायी क्षेत्र में भी अपनी पहुंच बनानी होगी। गोरखपुर के समानांर प्रत्येक राज्य में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संकल्पित स्मार्टसिटी में लघु गीताप्रेस गोरखपुर सृजित करने होंगे। गीताप्रेस ने भक्ति ज्ञान व वैराग्य की तरूणाई के लिये जो परिश्रम गत बयासी वर्षों तक लगातार किया है नागरी लिपि के समानांतर भारत की लिपियां उर्दू पंजाबी गुजराती तमिल कन्नड़ मलयाली तेलुगु उड़िया बांग्ला मइती असमी और अंग्रेजी बारह लिपियों तिब्बती व नैपाली भाषाओं सहित सभी भाषाओं में गीताप्रेस के प्रकाशन मिलें यह प्रयत्न हो। 
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