Saturday, 26 September 2015

सिंधी पश्तो पंजाबी भाषियों पर भारत में उपजी उर्दू हावी

          पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू एक पहेली है। पाकिस्तान पंजाब अंतर्गत बलूचिस्तान तथा सिंध पाकिस्तान राष्ट्र राज्य के घटक हैं। पंजाबी जाट़ मुसलमान घर में पंजाबी बोलता है। बलूचों और सीमा प्रांत के लोग पश्तो बोलते हैं। सिंध के सिंधी मुसलमानों की मातृभाषा सिंधी है जिसे वे अरबी लिपि में लिखते हैं। उत्तर प्रदेश के वे मुसलमान जो अपनी मादरे जबान उर्दू बताते हैं उनका बाहुल्य केवल कराची में ही है। वे ही सही मानों में उर्दू बोलने वाले लोग हैं जो कराची शहर को उर्दू प्रदेश बनाना चाहते हैं। भाषा और भाषा विज्ञान एवं मातृभाषा व मातृभूमि में पारस्परिक संबंध क्या है ? क्या किसी एक जगह एक इलाके में दो मातृभाषायें ध्वनिशास्त्र के नजरिये से व्यावहारिक हैं ? क्या मजहबों के अलग अलग किसी एक जगह या इलाके में दो मातृभाषायें या मादरे जबान तर्कसंगत हैं ? वाणियों और भाषाओं की दृष्टि से भारत एक बहुभाषी देश है। आज भारत की मुख्य मुख्य भाषायें क्रमशः असमी बांग्ला गुरूमुखी गुजराती मराठी कन्नड़ मलयालम तमिल तेलुगु उड़िया कोंकणी मइती बोडो मैथिली भोजपुरी मगही अंगिका वज्जिका संस्कृत सिंधी उर्दू और हिन्दी भाषायें चलन व बोलचाल में हैं। कबीर की सधुक्कड़ी दकिनी खड़ी बोली और रेखता भारत भर में लिंग्वाफ्रांका के रूप में अंग्रेजों के भारत आने से पहले सधुक्कड़ी भिन्न भिन्न क्षेत्रीय भाषाओं को समझाने का साधन थी। इसके बोलने वाले फकीर व्यापारी और तीर्थयात्री होते थे। स्थानीय भाषाओं के महत्वपूर्ण शब्दों को सधुक्कड़ी से जोड़ देते थे। सधुक्कड़ी भारत भर में समझी जाती थी। कबीर ने सधुक्कड़ी में कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। भक्ति का उद्गम तमिल तेलुगु भाषायी क्षेत्र सप्त शैल है जिसे आज लोग तिरूपति के नाम से जानते हैं। 
          इस्लामी सल्तनत भारत आई मौजूदा जमाने के लोग जिसे हिन्दी बेल्ट या काउबेल्ट के नाम से संबोधित करते हैं उसे छोड़ शेष समूचे भारत में मुसलमान स्थानीय भाषा ही प्रयोग करते थे। कश्मीर में कश्मीरी पंजाब में पंजाबी सिंध में सिंधी असम में असमी बंगाल में बांग्ला गुजरात में गुजराती महाराष्ट्र में मराठी कर्णाटक में कन्नड़ त्रिर्वाकुर में मलयाली तमिलनाडु में तमिल तटीय आंध्र में तेलुगु पर हैदराबाद में दकिनी उड़ीसा में उड़िया स्थानीय मुसलमानों की भी मातृभाषायें थीं। महात्मा गांधी जब 1918 में चंपारण गये उन्हें पता चला कि स्थानीय मुसलमान अन्य भारतीयों की तरह वज्जिका भाषी हैं। अवध और ब्रज के गांवों के मुसलमान अवधी व ब्रजभाषा बोलते थे। गांवों में मुसलमानों के अब भी बोलने का ज्वलंत प्रमाण अवधी भाषा पर फारसी लिपि में मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित पद्मावत महाकाव्य है। ब्रज के मुसलमान कृष्ण भक्त ब्रजभाषी थे। आइये अब संयुक्त प्रांत अवध व आगरा के शहराती मुसलमानों द्वारा उर्दू को मादरे जबान का दर्जा दिये जाने बाबत विचार करें। हिन्दी वैयाकरण किशोरी दास वाजपेयी का मत था कि हिन्दुस्तान का मुसलमान मस्जिद में नमाज अता करे, इस्लाम धर्म भी पूरी ताकत से मनाये पर अपने लोगों के नाम अल्लाह बक्श के बजाय ईश्वरी प्रसाद और आफताब हुसैन के बजाय सूर्य प्रकाश रखे तो हिन्देशिया की तरह भारत में भी नाम सुकर्ण पर मजहब इस्लाम  नाम नोरोचम या नरोत्तम पर मजहबी इस्लाम धर्म साढ़े सात सौ वर्ष के इस्लामी राज के बावजूद इस्लाम धर्मावलंबी ईरान, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान की तरह पूरे राष्ट्र राज्य को खलीफाई से नहीं जोड़ पाये। धर्मान्तरण की बाढ़ आने के बावजूद आज भी भारत में एक अरब हिन्दू जनसंख्या है। ख्रिस्ती इस्लाम के पश्चात धर्माचरण में आस्था रखने वाला सनातन धर्म उसकी शाखायें अनेक संप्रदायों का नाम विश्व जनसंख्या में तीसरा क्रम है। 
          अब मातृभाषा मातृभूमि पर ध्यान देते हैं। मनुष्य मात्र को वाणी की सौगात नटराज शंकर के डमरू की चौदह ध्वनियों ने दी। ग्रीक व रोमन में अक्षर को अल्फा कहते हैं। ग्रीक में चौबीस हरूफ रोमन में छब्बीस हरूफ और नटराज के नृत्यावसान में डमरू ने चौदह ध्यनियों से 51 हरूफ उपलब्ध कराये। भारतीय भाषाओं का प्रथम अक्षर अ ग्रीक और रोमन हरूफों का पहला अक्षर ए तथा अरबी फारसी की वर्णमाला का पहला हरूफ अलिफ ये सभी अ से शुरू हैं। इसलिये वे ध्वनि विज्ञान धरती का धरती धरती में रहने वाले जंगम स्थावर दोनों पर पृथ्वी का प्रभाव ध्वनि अथवा वाणी का प्रभाव भूमि पुत्रों पर भी पड़ता है। सधुक्कड़ी दकिनी खड़ी बोली रेखता तथा रोमन उर्दू नाम से अंग्रेजों द्वारा भारत की वाणियों के समझने और व्यापार में उनका उपयोग तब शुरू हुआ जब मुगल सल्तनत ने कंपनी बहादुर को सूरत में व्यापार की राजाज्ञा जारी की। दिल्ली की मुगल सल्तनत मुगलों से पहले के इस्लामी बादशाहों ने भी राजकाज की भाषा फारसी ही रखी। 
          वैश्विक वाणी विशेषज्ञों के मत में हिन्दुस्तान की तीन भाषायें हिन्दी हिन्दुस्तानी और उर्दू का भाषायी कुनबा एक ही है। हिन्दी व उर्दू वाक्य संरचना व्याकरण एवं उच्चारण एक तरीके का है। नागरी लिपि में लिखी जाने वाली तथा अपना शब्द स्त्रोत संस्कृत प्राकृत पालि तथा तद्भव भाषाओं से प्राप्त करने वाली हिन्दी हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में एक जानदार भाषा के रूप में पनपी। बर्तानी राज में संयुक्त प्रांत आगरा व अवध की अदालती भाषा उर्दू थी। पुलिस वगैरह उर्दू का ही प्रयोग करते हिन्दी केवल घरू रामायण पढ़ने वालों की भाषा थी। डाक्टर संपूर्णानंद हिन्दी लेखक होने के साथ साथ उ.प्र. में रातों रात हिन्दी को सरकारी भाषा का आवरण देने वाले हैं। हिन्दी के दूसरे महत्वपूर्ण पैरोकार प्रोफेसर वासुदेव सिंह थे जिन्होंने हिन्दी के जरिये उ.प्र. का राजकाज विधानमंडल में प्रयुक्त भाषा सहित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की हिन्दी को उ.प्र. में राज्याश्रय मिला। हिन्दुस्तानी स्वतंत्रता संग्राम में यद्यपि हिन्दी भाषा का महत्वपूर्ण योगदान था पर भारत संघ की राजकाज की भाषा संविधान में हिन्दी सुनिश्चित होगई पर जो राजभाषान्तरण 26 जनवरी 1950 को होना चाहिये था वह 66 वर्ष उपरांत भी केवल संविधान में दर्ज है। जब अब फेडरल घटक राज्यों की सामूहिक सहमति के बिना भारत भाषायी उहापोह के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की स्थिति में नहीें है। भारत का मैकोलाइट भद्रलोक अंग्रेजी भाषा के व्यामोह में फंसा हुआ है। देश का बारह प्रतिशत जनसमाज अंग्रेजी से प्रभावित और लाभान्वित है नौजवानों को अंग्रेजी नब्बे दिन में बोलने की घुट्टी पिलाई जारही है पर देश की अठासी प्रतिशत आबादी का सहारा केवल क्षेत्रीय भाषायें व क्षेत्रीय भाषाओं की लिपियां हैं। लोकशासन को जनाभिमुख बनाने के लिये हिन्दीतर भाषाभाषी राज्य केन्द्र सरकार से अपनी अपनी क्षेत्रीय राजभाषा में शुरू करें तभी भारत को भाषायी आजादी मिल सकती है। रोमन लिपि में ट्विटर करने रोमन लिपि को विचारों के आदानप्रदान का जरिया जारी रखने तक भारत की अठासी फीसदी अंग्रेजी न जानने वाली जनसंख्या अपने ही देश में नागरिकता के दूसरे तीसरे और चौथे पाये में अटक गये हैं। 
          उर्दू भाषा की जन्मभूमि उ.प्र. के शहराती मुसलमानों की बस्तियां हैं। देश में दस लाख से ज्यादा आबादी वा 53 शहरों में सात शहर उ.प्र. के हैं। 2021 की जनगणना तक देश में दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहर वर्तमान संख्या से दुगुने हो जाने की पूरी संभावना है। कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, आगरा, गाजियाबाद, मेरठ के मुसलमान उर्दू को अपनी मादरे जबान कहते हैं। दस लाख की जनसंख्या को पार करने वाले उ.प्र. के शेष शहरों में गोरखपुर बरेली मुरादाबाद नौइडा आदि के जुड़न की संभावनाओं का नकारा नहीं जा सकता है। उ.प्र. सरकार ने फारसी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू को उ.प्र. की द्वितीय राजभाषा वर्षों पहले घोषित कर दिया है पर मदरसों को छोड़ शेष विद्यालयों में उर्दू पढ़ाई के लिये आकलन का अभाव है। उर्दू पाकिस्तान की देशज भाषा नहीं है। जनाब खालिद जावेद के मुताबिक पाक उच्चतम न्यायालय के न्यायिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करने वाले न्यायाधीश न्यायमूर्ति जावेद ख्वाजा ने निर्णय दिया है कि पाक सरकार के मंत्रालय उर्दू का प्रयोग करें। जनाब खालेद अहमद की राय में हिन्दुस्तान के बंटवारे से पहले मुस्लिम लीग में व्यग्रता व्याप्त थी। ए हिस्ट्री आफ इंडियन मुस्लिम लीग 1906-1947 पर्यन्त के लेखक जनाब रफीक अफजल के अनुसार वार्धा स्कीम से व्यग्रतापूर्वक विचलित होगये थे। बेसिक ऐजुकेशन के प्रति हिन्दुस्तानी मुसलमानों की सोच अहिंसा तथा राष्ट्रीय एकता के तौर तरीकों और हिन्दी से घबड़ाये हुए थे। जब भारत विभाजन हुआ बंगाल में मुस्लिम लीग नेतृत्व उर्दू भाषी हुसैन मोहम्मद सोहरावर्दी के हाथ था। बंगाल के बांग्लाभाषी मुस्लिम बहुल इलाकों को मोहम्मद अली जिन्ना सुहरावर्दी के दमखम पर पूर्वी पाकिस्तान बना सके। जो मजहब से जुवान बजाय असर करने वाली है। बांग्लाभाषी पूर्वी पाकिस्तान पचीस वर्ष से कम समय में पाकिस्तान से बांग्ला देश में बदल गया। पाकिस्तान में मूलतः उर्दू भाषी केवल वे लोग हैं जो उ.प्र. से पाकिस्तान निर्माण के पश्चात कराची गये। वैसे उर्दू कश्मीर की भी राजभाषा है। जब कि कश्मीर के लोग काश्मीरी बोलते हैं। जम्मू के लोग डोंगरी में बोलते हैं कश्मीरी व डोंगरी दोनों समृद्ध भाषायें हैं पर उन्हें जम्मू कश्मीर में अपेेक्षित राज्याश्रय नहीं मिल पाया है। भाषा के रूप में उर्दू का इस्लाम मजहब से भाषायी रिश्ता नहीं है। कुरआन शरीफ की भाषा अरबी है। फारसी तो हिन्दुस्तान में इस्लामी सल्तनत के बदौलत फली फूली और उर्दू भाषा में फारसी शब्द बाहुल्य मजहबी आकर्षण होने के बजाय सल्तनत का राजभाषा होना है। मौजूदा पश्चिमी पंजाब मुल्तान पेशावर बलूचिस्तान अफगान पाक के बीच कबाइली इलाके और सिंध भी लंबे अरसे तक भारत में उपजी उर्दू भाषा को नहीं झेल पायेंगे। उन्हें पंजाबी पश्तो तथा सिंधी का ही अवलंबन लेना पड़ेगा। 
          दुनिया में मंदारिन बोलने वाले डेढ़ अरब लोग हैं जिनकी मातृभाषा मंदारिन है। मंदारिन के बाद अंग्रेजी बोलने वाले वे लोग जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी है उनकी संख्या तो कम है पर बर्तानी उपनिवेश रहे देशों में अंग्रेजी का बोलबाला आज भी चरम पर है। दुनिया के भाषा नक्शे में तीसरा स्थान स्पेनिश भाषा का है। चौथे स्थान पर विश्व भाषिक विश्लेषक हिन्दी हिन्दुस्तानी उर्दू को गिनते हैं। हिन्दी उर्दू हिन्दुस्तानी के अलावा पंजाबी बांग्ला दो हिन्दुस्तानी भाषायें भी क्रमशः सातवें और ग्यारहवें स्थान पर हैं। पर दक्षिण एशिया की इन तीन भाषाओं को पैठ इंटरनेट में करने के लिये उर्दू सहित भारतीय भाषाओं को एका करना होगा तभी मंदारिन अरबी तथा मलय भाषाओं को जो रूतबा इंटरनेट में मिला हुआ है वह भारतीय भाषाओं यथा असमी बांग्ला गुरूमुखी गुजराती मराठी कन्नड़ मलयालम तमिल तेलुगु उड़िया कोंकणी मइती बोडो मैथिली भोजपुरी मगही अंगिका वज्जिका संस्कृत सिंधी उर्दू तथा बौद्ध भाषाओं यथा तिब्बती व भूटानी भाषाओं को भी इंटरनेट में वाजिब स्थान दिलाने का उत्तरदायित्व भारतीय राष्ट्र राज्य को निर्वाह करना समय की पुकार है। भारतीय भाषाओं की इंटरनेट से दरकार है। भारतीय भाषाओं पर भी इंटरनेट सवा अरब भारतीयों को अपने से जोड़े यही योग कर्मसु कौशलम् कहलाता है।
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