Saturday, 26 September 2015

हिमालय दिवस ९ सितम्बर २०१५
खोदखाद धरती सहे काटकूट वनराय कुटिल वचन साधु सहे

          पिछले पांच वर्षों से हिमालय की पर्यावरण संरक्षा उपायों के लिये हिमालय पर्यावरण विद डाक्टर अनिल जोशी और उनके सहयोगी चिंतन पोखर सितंबर महीने की नौवीं तारीख को पर्यावरण संरक्षण दिवस मना ही रहा था, उत्तराखंड राज्य के सातवेें मुख्यमंत्री जी ने हिमालय दिवस 9 सितंबर 2015 के दिन पर्यावरण संरक्षा में उत्तराखंड की देहरादून स्थित लोकप्रिय तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा भारतीय राष्ट्र के 28वें घटक राज्य की सार्वभौम सत्ता को भी पर्यावरण संरक्षा से जोड़ डाला। इस प्रकरण में उत्साहवर्धक बिन्दु यह है कि स्वयं मुख्यमंत्री महोदय भारत के अट्ठाईसवें घटक राज्य जिसके उत्तर में हिमालय के उत्तरी भाग में त्रिविष्टप-तिब्बत है। पूर्व में नैपाल का गणराज्य है। इस भारत भूमि की सीमारेखा पर अवस्थित विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र धारचूला(पिथौरागढ़ जिले की धारचुला व मुनस्यारी तहसीलें) का प्रतिनिधित्व करते हैं। पिथौरागढ़ जनपद का क्षेत्रफल 7169 वर्ग किलोमीटर है जिसका आधे से ज्यादा हिस्सा इन दो तहसीलों में है पर जनसंख्या घनत्व पिथौरागढ़ जिले की छः अन्य विकासखंडों के मुकाबले बहुत छितरी मिलती है। 
           हिमालय के वैज्ञानिक सोच और डाक्टर अनिल जोशी सरीखे शोधकर्ता महानुभावों के संज्ञान में हिमालय के बारे में कृष्ण ने अर्जुन से क्या कहा ? अपने जिगरी दोस्त जिसे कृष्ण कहते थे - त्वम् मे भृत्यः सुहृद सखा। कृष्ण उद्धव को बृहस्पति के समान नीति विशारद भी मानते थे। कृष्ण ने कुरूक्षेत्र के रणांगण में अर्जुन से कहा - स्थावरणाम् हिमालय। आगे कहा - स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी तथा मेरूः शिरवराणाम् अहम् कहा। माने स्थिरता वालों में हिमालय, जलस्त्रोतों में गंगा एवं पर्वत शिखर मेरू मैं ही हूँ। प्रभास पाटन जाने से पहले द्वारका में उद्धव गीता में कृष्ण ने उद्धव से कहा - तीर्थानाम् स्त्रोतसाम् गंगा घिष्णुयानाम् अहम मेरूः गहनानाम् हिमालयः कह कर गंगा, मेरू सुमेरू हेमाद्रि तथा हिमालय के संबंध में आध्यात्मिक तत्व बताये। प्रतिवर्ष कन्या संक्रांति को भारत के लोग विश्वकर्मा जयंती पूरे उत्साह से मनाते हैं। विश्वकर्मा सरीखा ही एक दूसरा वास्तुकार कश्यप दनु का पुत्र मय दानव था। मय की वास्तुकारिता किन्हीं मानों में विश्वकर्मा से उत्कृष्ट कोटि की थी। जब मौजूदा दिल्ली इन्द्रप्रस्थ था या शक्रप्रस्थ के पार्श्ववर्ती खाण्डव वन को कृष्ण अर्जुन जला रहे थे खाण्डव वन में मय को जलने से अर्जुन ने बचाया था। मय अर्जुन के उपकार से गद्गद् था। वह अर्जुन की सेवा करना चाहता था। कृष्ण ने हस्तक्षेप किया मय से कहा राजा युधिष्ठिर के लिये ऐसा सभागृृह बनाओ जिसमें जल स्थल भ्रम पैदा हो जाये। मय ने इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर राजगृह बनाया जिसमें राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस सभा भवन में दुर्योधन को जल स्थल भ्रम होगया। 
          वास्तुकार मय दानव ने मेरू सुमेरू रत्नसानुः सुरालय में आदि देव महादेव के लिये तपस्थली तथा स्नान के लिये मानसरोवर बनाया जिसमें राजहंस को नीर क्षीर विवेक की क्षमता थी। हिमालय के उप हिमालयी क्षेत्र में मत्स्य कूर्म वाराह तीन अवतरण हुए। जिस जगह को आज लोग मासी कहते हैं उसका संस्कृत वाङमय में मत्स्य देश नाम है। यहीं मत्स्यावतार याने ब्राह्मीनिशा की समाप्ति पर पहली जीवात्मा सींग वाली मछली हुई। उत्तराखंड के केदारखंड और मानसखंड दो भू भाग मध्य हिमालयी क्षेत्र हैं। पश्चिम में जलन्धर खंड तथा पुनः उत्तर पश्चिम में कश्मीर खंड और जलंधर खंड से जुड़ा उपगंधर्व स्थान है जिसे आजकल अफगानिस्तान कहा जाता है। हिमालय और उसके निवासियों की यथातथ्य जिजिविषा समझने के लिये देव दानव गंधर्व यक्ष राक्षस किन्नर इन छः जमातों को भी समझना होगा तभी हिमालय की सटीक परिस्थितिकी का उद्घोष हो सकता है। देव दानव गंधर्व यक्ष राक्षस किन्नरों में यक्ष जिनके अधिपति निधिपति कुबेर हैं कुबेर विश्रवा के ज्येष्ठ पुत्र तथा लंकेश्वर थे। कुबेर के सौतेले भाई दशग्रीव रावण ने लंकेश कुबेर को हरा दिया वह लंकेश बन गया। कुमांऊँ व गढ़वाल कई गांवों के नाम जाख जाख गांव जाखिकी आदि यक्ष बोधी नाम से हैं। संस्कृत का यक्ष शब्द प्राकृत और तद्भव में जख जाख जखिणी होगया। अल्मोड़ा का जाखनदेवी मंदिर इसका जाग्रत प्रमाण है। मुख्यमंत्री महाशय ने वाराही मंदिर में महर फर्त्याल बग्वाल का इस वर्ष श्रावणी पूनम को उद्घाटन किया। केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद जब बैंकाक में थे उन्होंने समुद्र मंथन का चित्रांकन बैंकाक हवाई अड्डे में देख कर ऐसी कलाकारी भारत में भी संपन्न होने की वार्ता शुरू की। क्षीर सागर का समुद्र मंथन उत्तराखंड के कालि कुमांऊँ में हुआ था। इस ब्लागर ने हिमकर पोस्ट के जरिये उत्तराखंड सरकार एवं विधानसभा का ध्यानाकर्षण किया था कि भारत सरकार से रामायण और महाभारत सीरियलों में जो लोकआस्था दिखी उसे देखते हुए वर्तमान उत्तराखंड के रामायण कालीन और महाभारत कालीन राज्यों राजवंश साहित्य संस्कृति दण्डनीति एवं वनस्पति तथा जंगम जीव जगत की स्थितियों का आकलन किया जाकर रामायण व महाभारत युगीन सामाजिक सांस्कृतिक आस्थामूलक मान्यताओं का समन्वित लोकवृत्ति को उजागर किया जाये। महर्षि वेदव्यास ने विघ्नहर्ता गणपति से अनुरोध किया कि वह (व्यास) जो कहें उसे लिपिबद्ध कर दें। गणपति ने व्यास जी को एक शर्त लगाई कलम रूकेगी नहीं। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने गणपति से कहा विनायक जो लिखोगे वह समझना भी होगा। दोनों में मौखिक करारनामा होगया। व्यास जी ने गणपति को पंचम वेद महाभारत व अठारह पुराण धारचुला तहसील की व्यास पट्टी की गुफा में लिखाने महाभारत के अलावा जो अठारह पुराण रचे गये उनमें ब्राह्म, पद्म, वैष्णव, शिव, श्रीमद्भागवत, नारद, मार्कण्डेय, भविष्य, वराह, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, सौवर्ण, ब्रह्म इन सभी अठारह पुराणों में ब्रह्मवैवर्त पुराण व्यास जी की ऐसी रचना है जिसमें मत्स्य कूर्म व वाराह अवतारों सहित समूचे मानसखंड के गांव गाड़ गधेरे पर्वत शिखर विभिन्न देवी देवताओं के शक्तिस्थलों का एकीकृत वर्णन है। उत्तराखंड सरकार यदि मानसखंड व केदारखंड के उपहिमालयी इलाकों पर शासन का ध्यान केन्द्रित करना चाहती है तो उन्हें वर्तमान उत्तराखंड को इस केदारखंड के 1. उत्तरकाशी, रूद्रप्रयाग तथा चमोली इन तीन जिलों 2. मानसखंड के पिथौरागढ़ चंपावत बागेश्वर के तीन जनपदों 3. समूचा टेहरी जिला और पौढ़ी जिले का पूर्ण रूप से पर्वतीय भाग 4. अल्मोड़ा जनपद तथा नैनीताल जनपदों के पूर्ण पर्वतीय इलाके 5. दून घाटी का हरद्वार तथा ऊधम सिंह नगर जिलों का विकास नियोजन स्थानीय स्थितियों को देखते हुए निर्धारित करना होगा। उत्तराखंड राज्य के इन आठों इलाकों की स्थानीय समस्यायें तथा पूर्ववर्ती शासकों की प्राथमिकता नीतियों ने मौजूदा उत्तराखंड को पिछले पंद्रह वर्षों में तथाकथित विकास एवं आसन्न विनाश जिसे सरकारी भाषा में आपदा कहा जाता है, विकास निर्माण की चक्की में निरंतर पिसते रहने को बाध्य कर डाला है। इसलिये सबसे पहली जरूरत तो यह है कि भारतीय संविधान के 73वें व 74वें में संशोधन के परिप्रेक्ष्य में राज्य सरकार उत्तराखंड के 86 या उससे अधिक शहराती क्षेत्रों तथा तेरह जिला पंचायतों को कम से कम उतने अधिकार तो दें जो म्यूनिसपैलिटियों व जिला बोर्डों को 26 जनवरी 1950 से पहले उपलब्ध थीं। उत्तराखंड राज्य ने उ.प्र. पंचायती राज अधिनियम के अनुसार पंचायत व्यवस्था संचालित की है। जरूरत इस बात की है कि 1. ग्राम सभा 2. क्षेत्र पंचायत 3. नगर निकाय 4. जिला पंचायतों के अधिकार और कर्तव्य संविधान संशोधन 73 व 74 के अनुरूप निर्धारित किये जायें उत्तराखंड का समूचा राजतंत्र व प्रशासनिक व्यवस्था तदर्थमूलक है। इसलिये उत्तराखंड की पहली जरूरत नगर निकाय कानून क्या जिला पंचायत कानून के समानांतर ग्रामसभा तथा क्षेत्र पंचायत कानूनों की संविधान संशोधन 73 व 74 के अनुसार ढाल कर ग्रामसभा से लेकर नगर निकाय व जिला पंचायतों के अधिकार कर्तव्यों का तात्कालिक कानून सम्मत निर्धारण आवश्यक है। 
उत्तराखंड सरकार दावा कर रही है कि वह उद्योगों को पहाड़ चढ़ाना चाह रही है। 1948 तके रानीखेत ड्रग फैक्ट्री कर कायाकल्प कर भारत रत्न पंडित गोविन्द वल्लभ पंत ने आयुर्वेदिक औषध निर्माण शाला को सहकारी आवरण में रख कर अल्मोड़ा के प्रजापति जोशी को जिम्मेदारी सौंपी। 1948 से लेकर 1968 तक यह उद्यम सफलतापूर्वक चलता रहा रानीखेत का च्यवनप्राश मुंबई अहमदाबाद बंगलुरू चेेन्नै सर्वत्र उपलब्ध था। रानीखेत सहकारी आयुर्वेदिक निर्माण शाला पच्चीस वर्ष प्रजापति जोशी के नेतृत्व में सफलतापूर्वक चली। पहाड़ के सारे वैद्य इस उद्यम से जुड़ गये। 1970-71 के पश्चात यह उद्यम बर्बादी की तरफ बढ़ा। रानीखेत में जब तक डाक्टर शंभुशरण मिश्र जड़ीबूटी संस्थान के मुखिया थे सहकारी औषध निर्माण शाला उ.प्र. सरकार के सहकारी विभाग की उदासी के बावजूद चलती रही थी। इस ब्लागर ने 1998 में पचास वर्ष के अंतराल के पश्चात फैक्टरी देखी। उ.प्र. सरकार को चाहिये कि एच.एम.टी. बोक्साईट कारखाना काफलीगैर बागेश्वर बोक्साईट कारखाना चण्डाक आयुर्वेदिक औषध निर्माण शाला रानीखेत सहित 1936-37 से 1957 तक सफलतापूर्वक गोपाल दत्त जोशी द्वारा संचालित हिल ऊल स्कीम के लिये खादी ग्रामोद्योग आयोग ने मई 1957 में तीन करोड़ रूपये स्वीकृत किये। यह उद्यम भी 1967 तक सफलतापूर्वक चलता रहा। आज हिल ऊल स्कीम आखिरी सांसें लेरहा है। 2 सितंबर 2014 के दिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जी ने अपनी 758वीं घोषणा में बोरारौ घाटी की उद्यमिता को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। एक वर्ष बीत चुका गांधी आश्रम चनौदा को मुख्यमंत्री जी द्वारा घोषित सहायता उत्तराखंड सचिवालय में अटक गयी। उस पर गांधी हैरिटेज का बिल्ला जड़ने की कोशिश हुई शायद प्रदेश के आला हुक्मरान मुख्यमंत्री जी तथा उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों की नीति वार्ता समझ नहीं पारहे हैं। लगता है कि उत्तराखंड की उद्यमिता अटक गई है ठिठक गई है। उद्यमिता को गति दिलाने के लिये मुख्यमंत्री महोदय को चाहिये कि पिछले पंद्रह वर्षों की उपलब्धियों और कमजोरियों पर उच्चसत्ताक इनक्वायरी कमीशन बैठाया जाये ताकि 2017 में जो नई सरकार आये उसके सामने उत्तराखंड का आद्योगिक खाका स्पष्ट हो। सत्रह वर्ष पश्चात ही सही उत्तराखंड की उद्यमिता रोजगार तथा शासन व्यवस्था को पटरी पर लौटा ला सकें। 
          खेतीबाड़ी बागवानी और औषध गुण वाली वनस्पतियों की खेती से उत्तराखंड के पूर्णतः पर्वतीय प्रकृति के गांवों में गांव वासी खेती करना छोड़ चुके हैं। कारण एक नहीं बहुत हैं। हरेक गांव से नित्य पलायन होरहा है। फौज सिविल नौकरी पेशा वालों में पहाड़ के गांवों से क्यों और कैसे मोहभंग हुआ ? लोग दो कारण बताते हैं। पहला बच्चों की मानक स्तर की पढ़ाई लिखाई दूसरा पहाड़ों में स्वास्थ्य सुरक्षा तथा जरूरतमंदों को इलाज न मिल पाना। अपनी अपनी माली हैसियत के मुताबिक लोग भाबर या तराई में बस रहे हैं। जो गरीब और बेसहारा लोग पहाड़ों के गांवों में बचे हुए हैं परिस्थितियां प्रतिकूल हैं बाहर जाकर अच्छी जिन्दगी की कल्पना नहीं कर पारहे हैं उन्हें गांव में आर्थिक लाभ का कोई मौका देने के लिये सत्ताधीशों के पास फुर्सत नहीं है। केवल पांच बिन्दुओं पर भी यदि उत्तराखंड सरकार का नियोजन विभाग ध्यान दे 1. केश्मोलीन स्वेटर पुलोवरों के बजाय उत्तराखंड के सरकारी सहायता प्राप्त तथा अंग्रेजी माध्यम से छात्रों को ज्ञान देने वाले पब्लिक स्कूलों/कान्वेंट स्कूलों में जाड़ों में ठंड से बचने के लिये शुद्ध ऊनी निटिंग यार्न से हाथ बुने स्वेटर पुलोवर तैयार करने का संकल्प लिया जाये। स्कूलों से कहा जाये कि हाथ बुने स्वेटर तथा पुलोवर ही स्कूलों की ऊनी ड्रेस का हिस्सा होंगे। इसके लिये उत्तराखंड सरकार को 1936-37 से लेकर 1967 तक तीस वर्ष सफलतापूर्वक चलते रहे हिल ऊल स्कीम को पुनर्जीवित कर कस्बों व गांवों की महिला श्रम शक्ति के हाथ बुनाई मेहनत को मनरेगा से जोड़ा जाये ताकि पहाड़ों की हर हाथ बुनाई करने वाली महिला आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो सके। 2. मौन पालन कुमांऊँ व गढ़वाल के पर्वतीय गांवों का एपिस इंडिका मौन प्रजाति को नकार कर उत्तराखंड सरकार एपिस मेलिफेरा मौन वंश को दून घाटी पौढ़ी की भाबर घाटी नैनीताल के भाबर व ऊधम सिंह नगर एवं हरिद्वार की तराई में बढ़ावा दे रही है पर एपिस इंडिका जिसका शहद अत्यंत शक्तिवर्धक है गढ़वाल व कुमांऊँ के पर्वतीय जिलों में मौन पालन के प्रति सरकारी उदासीनता समाप्त की जाये। एपिस इंडिका मौन वंश को उत्तराखंड सरकार की उद्यान नीति के तहत कीटनाशक द्रवों के छिड़काव से बचाना तात्कालिक जरूरत है। उत्तराखंड सरकार ने मौन वंश को उद्यान विभाग के रासायनिक छिड़काव का बन्दी बना डाला है। नतीजा साफ है मौन वंश तितली व जलवायु पर अनुकूल प्रभाव डालने वाले छोटे छोटे जीव जंतुओं सहित पक्षियों पर भी रासायनिक छिड़़काव का असर पड़ा है। इसलिये मौन पालन उद्यमिता को उद्यान उद्यमिता से अलग किया जाये एपिस इंडिका शहद का रासायनिक परीक्षण करा कर एपिस मेलिफेरा व एपिस इंडिका शहदों की गुणवत्ता में क्या फर्क है यह पता किया जाये। मौन पालन केदारखंड व मानसखंड के पहाड़ी गांवों के लिये आर्थिकी वरदान के अवसर ला सकता है। जरूरत इस बात की है कि मौन पालन उद्यमिता को प्राथमिकता दी जाये। 3. श्वेत क्रांति जरसी गायों व संकर गायों के सहारे जरसी व संकर गाय दूध ज्यादा देती है। देसी गाय विशेष तौर पर पहाड़ी गाय दूध कम देती है पर उनके दूध की गुणवत्ता जरसी व संकर गाय के मुकाबले एक हजार गुना ज्यादा है। दून घाटी हरिद्वार व ऊधम सिंह नगर इन तीन जिलों की आबादी उत्तराखंड की जनसंख्या चौवन लाख है जो उत्तराखंड की पूरी आबादी के आधे से ज्यादा है। हरिद्वार तथा ऊधम सिंह नगर जिलों में जरसी व संकर गायों के मुकाबले देसी नस्ल की गायों को भी श्वेत क्रांति से जोड़ा जाये। केदारखंड व मानसखंड की गढ़वाल हिमालयी गायें व कुमांऊँ की देसी गायों की कौन कौन किस्में कहां कहां पाई जाती हैं। पर्वतीय क्षेत्र के गांवों की गायों का नस्ल सर्वेक्षण तात्कालिक जरूरत है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार जब भारत आजाद हुआ देश में साठ नस्लों की देसी गायें थीं। पिछले उनहत्तर वर्षों में देश की तीस गाय नस्लें लुप्त होगयी हैं। उत्तराखंड को अगर कर्कव्याधि डेंगू सरीखे रोगों से अगर मुक्ति दिलानी है तो देेसी गायें विशेष तौर पर कुमांऊँ व गढ़वाल की पहाड़ी नस्ल की गायों की संरक्षा करनी ही होगी। पहाड़ी गाय दूध भले ही एक या डेढ़ लीटर से ज्यादा दूध एक बार न दे पायें रोजाना तीन चार लीटर दूध पर संतोष कर पहाड़ की गाय को सुरक्षा देकर ही स्वास्थ्य रक्षा कवच पहना जा सकता है। इसलिये पहाड़ के गांवों के तैलफाट व सैलफाट स्थावर जंगम सृष्टि का रासायनिक परीक्षण उत्तराखंड सरकार की राह सुरूह बना सकता है। 
          हिमालय दिवस अवश्य मनाइये पर हिमालयी गांवों में जो लोग अस्सी वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं उनकी भी सुनिये। डाक्टर अनिल जोशी सहित हिमालयन ऐक्टिविस्टों को मिला कर मिलम निवासी पंडित नैन सिंह ने जो अध्ययन मसाला एडवर्ड एटकिंसन को कुमांऊँ गजेटियर तैयार करने के लिये दिया एटकिंसन ने जो अभिव्यक्ति दी उसके समानांतर महर्षि वेदव्यास रचित ब्रह्मवैवर्त पुराण में मानसखंड व केदारखंड के हिमालयी गांवों का जो वर्णन किया है उत्तराखंड की सरकार सहित हिमालय बचाओ अभियान के पथ प्रदर्शकों बर्तानी वैज्ञानिक शैली के समानांतर योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारा गहनानाम् हिमालयः का अनुशीलन करने से ही उत्तराखंड के विकास के समानांतर आपदा रूपी विनाश का सामना करने के लिये स्थानिक राजनीति की संकल्पना करनी होगी।
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