Monday, 21 September 2015

कूर्म मगध खस गणैः
वज्जिका, अंगिका, मैथिली, भोजपुरी और मगही
कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे का जन्म जब वसंत पंचमी संवत् 1938 के दिन कनखल-हरिद्वार में हुआ था तब ग्रेगेरियन कैलेंडर की 15 फरवरी 1882 की तारीख थी। जब वे पंद्रह वर्ष के थे तो अल्मोड़ा में उन्होंने स्वामी विवेकानंद, महामना मदन मोहन मालवीय तथा श्रीमती एनीबेसेन्ट का ध्यानाकर्षण रामजे हाईस्कूल अल्मोड़ा पहले हाईस्कूल बैच के विद्यार्थी उपराड़ा गंगोलीहाट निवासी तारा दत्त पंत का बपतिस्मा न करने का प्रसंग के संज्ञान में प्रस्तुत किया था। एनीबेसेन्ट कांग्रेस अध्यक्षा होने के समानांतर थियोसोफिकल सोसाइटी आफ इंडिया की कर्णधार भी थीं। तारा दत्त पंत की पत्नी ख्रिस्ती धर्मावलंबी थी। तारा दत्त पंत को ईसाई बनना स्वीकार नहीं था। वह नियमित रूप से अपने मातापिता का श्राद्ध कुमइयां तौरतरीकों से संपन्न करता था। अपनी पत्नी के रंगढंग से बने भोजन को नहीं करता था दूसरे शब्दों में स्वयंपाकी था। वह गृहस्थ धर्म के सभी कार्यक्रमों में स्वयंपाकी होते हुए भी भाग लेता था। उसका बेटा डैनियल पंत अल्मोड़ा गिरजाघर का प्रमुख पादरी था। एनीबेसेन्ट व महामना मदन मोहन मालवीय ने काशी विद्वत् परिषद से यह निर्णय लिवा लिया कि परिवार के शेष सदस्यों के ख्रिस्ती होने के बावजूद तारा दत्त पंत सनातन धर्मावलंबी कहा जा सकता है। बदरी दत्त पांडे के किशोर जीवन की यह महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। कूर्मांचल केसरी ने इलाहाबाद में लीडर अखबार के संपादन विभाग में अपना संयोग कर लिया था। सन 1918 में जब वे छत्तीस वर्ष के नौजवान थे उन्हें पता चला कि महात्मा गांधी नवंबर 1918 में कोलकाता आरहे हैं वे महात्मा से मिलने कोलकाता गये। कुमांऊँ में बर्तानी हुक्मरानों के द्वारा जो जबरन मजदूरी करायी जाती थी उसे कुमांऊँ में कुली बरदाइश कहा जाता था। कुली बरदाइश का पूरा खाका कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे ने महात्मा को बताया। तब महात्मा चंपारण जारहे थे। आज चंपारण के दो जिले होगये हैं। मुख्यालय बेतिया और मोतिहारी हैं। 2011 की जनगणनानुसार पूर्वी व पश्चिमी चंपारण जिलों का संयुक्त क्षेत्रफल 9196 वर्ग किलोमीटर तथा आबादी नब्बे लाख से अधिक है। क्षेत्रफल और आबादी की दृष्टि से दोनों चंपारण बेतिया और मोतिहारी पटना या पाटलिपुत्र से आगे हैं। पटना जिले का क्षेत्रफल 3202 वर्ग किलोमीटर और आबादी 5772804 है। 
भारतीय अंग्रेजी अखबार नवीसी करने वाले सांसद एम.जे. अकबर अंग्रेजी के जरिये अखबार नवीसी का नारद मार्ग अपनाने वाले भारतीय जनमानस के नाड़ी वैद्य हैं। वे इंडियन एक्सप्रेस के चिंतन मनन पन्ने के जरिये कौटिल्य के अर्थशास्त्र की निर्मिति - पाटलिपुत्र को चंद्रगुप्त मौर्य की स्मार्ट सिटी कह रहे हैं। वे यह भी कहते हैं कि हर एक बिहारी अपनी फुर्सत की घड़ी में समाजी इतिहासकार की भूमिका निर्वाह करता है। जिसे आजकल भारतवासी बिहार के नाम से पुकारते हैं, महाभारत काल में उसे अंग(वर्तमान में भागलपुर व सीमावर्ती इलाका) मिथिला, मगध, भोजपुर नामों से जाना जाता था। महाराज कुमार धार्तृराष्ट्र सुयोधन ने अंग देश के वृषसेन और राधा द्वारा पालित कर्ण को अंग नरेश की मान्यता घोषित कर कुंती की पहली संतान जो कुंती  के पांडु से विवाह होने से पहले पैदा हुई थी उसे महाराज कुमार सुयोधन ने हस्तिनापुर का महत्वपूर्ण योद्धा निश्चित कर दिया। मगध साम्राज्य चंद्रगुप्त मौर्य के उत्कर्ष से पहले राजगृह से महाबली जरासंध द्वारा संचालित होता था। कृष्ण और जरासंध में मथुरा में सत्रह बार भीषण युद्ध हुआ। श्रीकृष्ण रणछोड़ द्वारका निर्मित करा कर द्वारका चले गये। गुजरात में श्रीकृष्ण को रणछोड़ जी महाराज के नाम से संबोधित किया जाता है। जरासंध मथुरा पर इसलिये हमला किया राष्ट्रपाल कंस जरासंध का दामाद था। जरासंध ने अनेक राजाओं को हरा कर बन्दी बना कर कारागार में डाल दिया था। जरासंध प्रतापी राजा था। मगध में अनेक गणतंत्रीय राजप्रमुख थे। जरासंध उनमें सर्वश्रेष्ठ थे। युद्ध भी एक कला है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के लिये अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव चारों भाई दिग्विजय हेतु निकले। उद्धव ने श्रीकृष्ण को सलाह दी कि जरासंध को जीतने के लिये युद्ध भिक्षा मांगनी पड़ेगी। श्रीकृष्ण को बात जंच गयी। श्रीकृष्ण भीम और अर्जुन ब्राह्मण वेश में राजगृह पहंुचे। उन्होंने मगध नरेश जरासंध से युद्ध भिक्षा मांगी। जरासंध ने श्रीकृष्ण और अर्जुन को योद्धा नहीं माना और कहा - भीम से लड़ सकता हूँ। श्रीकृष्ण की युद्धनीति अत्यंत चतुरतापूर्ण थी। भीम ने श्रीकृष्ण की सम्मति पाकर जरासंध का वध कर डाला। श्रीकृष्ण ने बंदी राजाओं को मुक्त कर दिया तथा जरासंध के पुत्र को राजसिंहासन पर बैठा कर सैकड़ों को यातना मुक्त कर डाला। 
महाभारत काल में मिथिला नरेश बहुलाश्व थे। उनके राज्य में योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण की घनिष्ठ मित्रता श्रुतकीर्ति से थी। श्रुतकीर्ति से मिलने श्रीकृष्ण द्वारका से मिथिला गये थे। मिथिला नरेशों में विधि परंपरा में सीरध्वज जनक नाम के विदेह नरेश सीता के पिता थे। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण की आठ पटरानियों में सत्यभामा भी एक थी जिसके लिये श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के महल में पारिजात वृक्ष का आरोपण किया था। सत्यभामा के पिता शतधन्वा की वृथा हत्या से दुःखी होकर श्रीकृष्ण द्वारका से मिथिला अपने अनन्य मित्र से मिलने और अपकीर्ति से छुटकारा पाने के लिये मिथिला में महीनों रहे। पाटलिपुत्र जिसे आजकल लोग पटना के नाम से जानते हैं गंगा के दक्षिण छोर पर बसा हुआ अद्भुत शहर है। मौर्य साम्राज्य का आकर्षण पाटलिपुत्र जहां यूनान से भी लोग इस शहर को देखने आते थे उस शहर को चणकनंदन विष्णुशर्मा ने गंगा तट का अद्वितीय शहर बनाया। चाणक्य स्वयं गंगा तट में कुटिया में रहते। पाटलिपुत्र राजभवन में उन्होंने अपने चयनित नृप को मगध सम्राट घोषित किया। वर्तमान बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश जहां खस क्षत्रियों के गणराज्य थे कहां से कहां तक था। क्या वर्तमान गया और मगहर मगध राज्य के हिस्से थे ? क्या कपिलवस्तु लिच्छिवि गणतंत्र की भूमि विष्णुपुराण वर्णित कूर्म मगध खस गणैः का हिस्सा था ? कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे पत्रकार होने के साथ साथ राजनीतिक इतिहासकार भी थे। उन्होंने कुमांऊँ के इतिहास में जो प्रश्न उठाये हैं उन पर ऐतिहासिक समीक्षा आवश्यक लगती है। 
महात्मा गांधी कोलकाता से मुजफ्फरपुर होते हुए चंपारण जारहे थे। प्रोफेसर जीवतराम भगवानदास कृपलानी कोलकाता विश्वविद्यालय से संबद्ध मुजफ्फरपुर कालेज में प्राध्यापक थे। उन्हें जब पता चला कि मोहनदास करमचंद गांधी मुजफ्फरपुर आरहे हैं तो रेलवे स्टेशन जाकर कृपलानी ने अपने शिष्यों सहित मोहनदास करमचंद गांधी का स्वागत किया और उन्हें लेकर वे कालेज से अपने आवास पर लेगये। कालेज के विलायती पीठाधीश्वर ने कृपलानी को अनुशासनहीनता के नाम पर कालेज से निलंबित कर दिया। यही था गांधी कृपलानी मिलन जिसे प्रोफेसर गिडवाजी ने संजोया था। महात्मा गांधी जब चंपारण पहुंचे उन्होंने वहां की दयनीय हालत देख कर तय कर लिया कि वे स्वयं उतने ही कपड़े का उपयोग करेंगे जो हिन्दुस्तान के गरीब से गरीब को नसीब होरहा है। नील खेतिहरी प्रसंग ने मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें डाक्टर जीवराज मेहता ने दक्षिण अफ्रीका में महात्मा कहा कविन्द्र रवीन्द्र नाथ टैगोर ने महात्मा की कोलकाता यात्रा पर उन्हें महात्मा कहा पर दरिद्रनारायण के सच्चे हितैषी मोहनदास करमचंद गांधी को चंपारण के लोगों की गरीबी से छुटकारा पाने के उपायों में पहला उपाय केवल बारह गज कपड़ा अपने लिये उपयोग करना तथा गरीबी ओढ़ने का जीवन मंत्र अपनाना। चंपारण के दौरे पर महात्मा गांधी ने अनुभव किया कि वे हिन्दुस्तान विशेष तौर पर दिल्ली और अवध की नवाबी वाले संयुक्त प्रांत में शहराती मुसलमान उर्दू को मादरे जबान बताता है जबकि चंपारण का देहाती मुसलमान वहां के बहुसंख्यक सनातनधर्मी लोगों की तरह वज्जिका बोलते हैं। वज्जिका उत्तर पश्चिमी बिहार की लोकभाषा है। अवध में भी मुसलमान गांवों में अवधी बोलते हैं। शहरों में रहने वाले मुसलमान उर्दू को मादरे जबान बताते थे। अवधी के रामकथा - रामचरित मानस के अलावा अवध के गंवई गांव जायस के रहने वाले मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत महाकाव्य लिखा जिसकी भाषा तो अवधी थी पर लिपि फारसी थी। कवि ने अपनी कर्मभूमि का ब्यौरा देते हुए कहा - जायस नगर धरम अस्थानू जहां जाय कवि कीन्ह बखानू। 
एम.जे. अकबर की राय में बिहार की वास्तविक त्रासदी लोकमत का बदशकल होना भी है। ऐसा क्यों हुआ ? जब आदि शंकर ने मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ किया मण्डन मिश्र की धर्मचारिणी पत्नी को जो स्वयं विदुषी महिला थी आदि शंकर ने निर्णायक नियत किया। विदुषी महिला ने निर्णय सन्यासी के पक्ष में दिया साथ ही यह भी कहा - सन्यासी आपने अभी तो आधी लड़ाई ही जीती है मुझे परास्त करो तो ही आप मण्डन दम्पति पर विजय प्राप्त करेंगे। आदि शंकर स्त्रीपुंङ संबंधों में महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेव की तरह नारी में केवल मातृत्व देखते थे। भारती ने कहा - मैं तो औरत हूँ केवल कामशास्त्र पर ही शास्त्रार्थ करने की क्षमतावान हूँं। आदि शंकर ने भारती से कहा - मां एक सप्ताह का मौका दो। भारती मान गयी। आदि शंकर ने महिष्मती नरेश के रूग्ण शरीर में प्रवेश कर सप्ताह भर परकाय प्रवेश द्वारा काममार्ग में माता भारती को पराजित कर दिया। माता भारती ने शंकर से पूछा - बिना स्त्री सहवास के कामशास्त्र आपने कहां सीखा ? शंकर ने कहा - मां मैंने इस शरीर से स्त्री सहवास नहीं किया। मण्डन भारती दंपति बौद्ध धर्म छोड़ शंकर प्रवर्तित स्मार्त धर्म के वेदांतिक अद्वैत मार्ग पर लौट आये। भोजपुरी यानी गिरमिटिया मजदूरों को बर्तानी राज ने अमरीकी, लैटिन अमरीकी उपनिवेशों में भेजा। आज भोजपुरी भाषी बिहारी समाज मारिशस में राजकर्ता समूह हैं। अनेकानेक लातिन अमरीकी देशों में बिहार के गिरमिटिया मजदूरों में शासक पद पर पहुंच कर बिहार ही नहीं भारत का मस्तक विश्व में ऊँचा किया है। आचार्य चाणक्य के शिक्षा केन्द्र पूर्व में राजगृह जिसे आजकल राजगीर कहते हैं पश्चिम में तक्षशिला के महत्वपूर्ण विद्या केन्द्रों के अलावा पाटलिपुत्र के भागीरथी तट में सन्यासी की तरह रहने वाले आचार्य विष्णुशर्मा अथवा विष्णुगुप्त जिन्हें दुनिया चाणक्य के नाम से पहचानती है। उनके अर्थशास्त्र ने भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्र को मगध साम्राज्य के सम्राट चंद्रगुप्त के रूप में मगध का महत्वशील सम्राट निर्मित किया। अगर हम मगध नरेश जरासंध तथा रामायणकालीन सीरध्वज जनक प्रकरणों को प्रागैतिहासिक मान कर किनारे भी कर दें तब भी बिहार को जो नयी शक्ल चाणक्य ने दी गौतम बुद्ध ने बोधगया में जो चमत्कार किया उसे तो वर्तमान मैकोलाइट अंग्रेजीदां इतिहासकार भी स्वीकारते हैं। गणतंत्र भारत के लिये नया चोला नहीं है। गणतंत्र का चोला तो मगध में लिच्छिवियों में तथा वर्तमान कुमांऊँ के खस राज्यों में प्रागैतिहासिक युग से चलता आरहा है। बिहार के सहरसा के गोप समाज में एक कहावत है - रोम में पोप है सहरसा में गोप है। लालू प्रसाद यादव उत्पाद तो जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के हैं उन्होंने संपूर्ण क्रांति की केंचुली उतार डाली और राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के मण्डल में अपनी धाक जमा कर बिहार के पिछड़ों का नेतृत्व संभाला पर दुनियां तो परिवर्तनशील है। परिवर्तिनि संसारे मृतको वा न जायते। स जातो येन जातेन राष्ट्र याति समुन्नतिम्। 
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