Monday, 21 September 2015

निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय

          महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने इंडियन एक्सप्रेस के 9 सितंबर 2015 के संस्करण के विचार पृष्ठ में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा - Why attacks on Gandhi are good.। राजमोहन गांधी अपने पितामह के बारे में आगे कहते हैं - They (attacks) offer an opportunity to recall what he stood for imperfect. Gandhi was more radical and progressive than contemporary compatriots.। महात्मा अपने समकालीन देशबंधुओं के सजग चिंतकों में सामाजिक परिवर्तन के सर्वोच्च क्रांतिकारी सुधारक थे। राजमोहन गांधी ने अपने पितामह को अंग्रेजी के RADICAL शब्द का प्रयोग किया है। एक शताब्दी पूर्व जब महात्मा (उन्हें महात्मा घोषित करने का मूल श्रेय गुजराती वैष्णव ब्राह्मण डाक्टर जीवराज मेहता को जाता है जिन्होंने अपने अफ्रीका प्रवास के दौरान मोहनदास करमचंद गांधी को अपनी अंग्रेजी पुस्तक में महात्मा कहा) आत्मा जीवात्मा परमात्मा विश्वात्मा और महात्मा ये आत्मामूलक पांचोें शब्दों में जीवात्मा और परमात्मा या विश्वात्मा में सेतु का काम करने वाला व्यक्तित्त्व महात्मा कहलाता है। ‘मनुष्य मात्र बन्धु है यही बड़ा विवेक है’ संभवतः जब महात्मा माता पुतलीबाई के मोनिया थे उनमें माता के स्तनपान के साथ ही प्राणिमात्र के लिये आत्मभाव का उदय होगया था। माता पुतलीबाई के पड़पोते महात्मा गांधी के पौत्र देवदास गांधी के पुत्र भारतीयता की मौलिक समझ रखने वाले चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य के दौहित्र राजमोहन गांधी ने गांधी को अंतर्मन से समझ बूझ कर ही कहा - Why attacks on Gandhi are good.। दुनियां के मजहबों को तराजू पर तोलते समय BLASHPHEMY जिसे हिन्दुस्तानी लोग ईशनिन्दा कहते हैं। देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर को शिशुपाल प्रकरण में कहा - यथा वैरानुबंधेन मत्र्यस्तन्मयता मिषत् न तथा भक्ति योगेन इति मे निश्चिता मतिः। देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से कहा था - ईशनिन्दा भी भक्ति का परम स्त्रोत है। इसे ही वैर भक्ति कहा जाता है। भारतीय वाङमय में नवधा, दशधा व वैर भाव सहित एकादशधा भक्ति का उल्लेख है। राजमोहन गांधी और माता पुतलीबाई के मोनिया जो कालांतर में विलायत तथा दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास करमचंद गांधी के रूप में प्रसिद्ध हुए, राजमोहन गांधी अपने पितामह के 1893 से 1914 पर्यन्त महात्मा गांधी ने समय समय पर जो अभिव्यक्तियां कीं - गांधी ने अफ्रीकी काले कलूटे लोगों के बारे में जो तिरस्कार अभिव्यक्ति प्रकट की तथा बर्तानी साम्राज्यवादी ताकत का समर्थन किया बगैर मनन चिंतन तथा गहन अध्ययन के राजमोहन गांधी ने प्रश्नगत विषय पर टिप्पणी नहीं करनी चाही। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी द्वारा व्यक्त किये गये विचारों को पीढि़यों के अंतराल से न देखते हुए तात्कालिक तौर पर उन्हें जो अनुभूतियां हुईं उन पर इकतरफा विचार करना तर्कसंगत नहीं है। राजमोहन गांधी जब कहते हैं कि महात्मा गांधी की आलोचना उनके विचारों व कृत्यों पर जब आक्रमण होगा उससे गांधी विचार पथ को एक नया मोड़ मिलेगा। 
          भारत की आजादी से पहले 1946 में जब मुस्लिम लीग की भारत विभाजन वाली मांग जोरशोर से चल रही थी महात्मा गांधी हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रहरी थे। वे हिन्दू मुस्लिम एकता चाहते थे पर कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को यह स्वीकार्य नहीं था। वे कहते थे हिन्दुस्तान का मुसलमान बनिया बामन की गुलामी नहीं सहेगा। गांधी का जीवन आदर्श अखंड भारत की आजादी था पर 1946 में परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल होगयी थीं कि भारत विभाजन अनिवार्य लगने लग गया था। राजमोहन गांधी ने 23 जुलाई 1946 के हरिजन को उद्धृत करते हुए भारतीय वाङमय के उस मूल सिद्धांत अनादि-अनंत को विचारित किया जो महात्मा को बालक मोनिया माता पुतलीबाई से मातृत्व के भाव में मिला था। माता पुतलीबाई अपने कनिष्ठतम प्रिय पुत्र मोनिया की जननी होने के पूर्व बयालीस वर्षीय दीवान करमचंद कबा गांधी की चैथी पत्नी थीं। जिस वैष्णव समाज से महात्मा गांधी धरती पर आये भारत के विभिन्न संप्रदायों में पुरूष स्त्री दाम्पत्य संबंधों में धर्मचारिणी स्त्री के लिये दो विशेषण लगाये जाते थे। पहला विशेषण था ‘सुंदरि’ करमचंद कबा गांधी की पहली पत्नी सुंदरि थी शेष तीन पत्नियों को ‘मंजरी’ कहा जाता था। पुतलीबाई और उनके पति के बीच उम्र का फासला 22 वर्ष का था। दीवान करमचंद कबा गांधी ने जब पुतलीबाई के साथ सात फेरे लगाये उस समय दीवान बयालीस वर्ष के प्रौढ़ थे और पुतलीबाई अठारह वर्षीया नवोढ़ा थीं। करमचंद कबा गांधी की गृहस्थ जिंदगी में पुतलीबाई ने नवजीवन का संचार किया तथा अपनी चैथी संतान के रूप में भारत भूमि को अपने मोनिया के रूप में एक ऐसी सौगात दी कि भारत की धरती में नया चमकीला नक्षत्र उदय होगया। 
          महात्मा के पौत्र राजमोहन गांधी ने महात्मा गांधी के द्वारा भारत के तत्कालीन अस्पृश्यों को ‘हरिजन’ की संज्ञा दी। महात्मा का मानसिक संकल्प था कि वे जिस समाज की देन हैं उसमें मनुष्य मनुष्य के बीच अस्पृश्यता का दंश मानवता को कलंकित कर रहा है। कोचरब आश्रम में उनके द्वारा दूधाभाई नामक तत्कालीन अस्पृश्य को आश्रम का अविभाज्य अंग बनाना गुजराती वैष्णव बनिया बामनों को मंजूर नहीं था। वे लोग गांधी के साधना पथ को श्रेयस तो मानते थे लेकिन अस्पृश्य को आश्रम का हिस्सा बनाना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। गांधी ने अपने एकादश व्रतों का पालन करने में कोताही स्वीकार नहीें की। गांधी के समूचे अनुयायियों में विनोबा भावे ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें गांधी के एकादश व्रत प्यारे थे। उनका अनुसरण करना विनोबा का स्वधर्म था। विनोबा उनके अकेले आचार्य थे जिन्हें गांधी में ईश्वरत्व की सत्ता दिखती थी। गांधी के दो अन्य आचार्य - दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर और जीवतराम भगवानदास कृपलानी थे। वे गांधी नीति के व्याख्याकार तो उच्चतम कोटि के थे पर गांधी जिजीविषा उन्हें वैयक्तिक रूप से अनुकूल नहीं पड़ती थी पर गांधी ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ का अनुपालन करने के बजाय दूसरे के गुणों को देखते थे। दोषदर्शन उनका मार्ग नहीं था। पीढि़यों के अंतराल वाले महात्मा गांधी पर अपनी तूलिका का प्रयोग करने वाले राजमोहन गांधी पर गुजरात में व्याप्त वैष्णव धर्मावलंबिता पर उतना असर नहीं था जो माता पुतलीबाई और उनके कनिष्ठतम पुत्र मोहनदास करमचंद गांधी पर था। माता पुतलीबाई पूर्णतः श्रौत परंपरा की उपज थीं और उन्हें स्त्री धर्म का पूर्ण ज्ञान था। यद्यपि वो अक्षराभ्यास वाली नहीं थीं पर उनके स्वधर्म ज्ञान को चुनौती देना संभव नहीं है। उन पर विलायती शिष्टाचार हावी नहीं था। राजमोहन गांधी उनकी चैथी पीढ़ी के उत्पाद हैं। राजमोहन गांधी, उनकी माता श्रीलक्ष्मी, पिता देवदास गांधी मातामह राजगोपालाचारी तथा पितामह मोहनदास करमचंद गांधी पर हिन्दुस्तानी सामाजिक शिष्टाचार और विलायती राजनीति का थोड़ा बहुत असर था पर अंतरात्मा पूर्णतः हिन्दुस्तानियत वाली थी जबकि राजमोहन गांधी के पिता श्री देवदास गांधी पर भारतीय स्वातंत्र्य आंदोलन का असर था इसलिये जब राजमोहन गांधी ‘हरिजन’ शब्द के बजाय दलित शब्द का प्रयोग करते हैं उनमें मस्तिष्क में अंबेडकर वादी मानसिकता का भी असर पड़ा है। महात्मा भारत के तत्कालीन अछूतोें को सनातनता से सशक्त बनाने के पक्षधर थे। घृणा उनका व्यापार नहीं था। दलित साहित्य तथा दलित मनोभावना से प्रभावित भारत के मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक वैचारिक संघर्ष तथा सामाजिक व्यवहार में अवहेलना भाव से संतप्त हैं। यही कारण है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उत्साही दलित स्वाभिमानी बीफ महोत्सव तथा महिषासुर अभिनंदन के प्रसंगों पर अति उत्साह से भरे रहते हैं। गांधी के अस्पृश्यता निवारण में घृणा के लिये कोई स्थान नहीं था पर वर्तमान दलित स्वाभिमान तथाकथित सवर्णों पर आरोप व आक्षेपों की झड़ी लगाते रहते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि ‘द्विज’ संज्ञा अब केवल पक्षियों तक ही सीमित है क्योंकि पक्षी दो बार जन्मता है, पहले अंडे के रूप में दूसरी बार चूजे के रूप में जिसे लोग वर्णाश्रम व्यवस्था कहते हैं। भारत की आजादी के बाद मनुष्यों में ‘द्विज’ रह ही नहीं गये हैं जब जनेऊ संस्कार तथा गुरूकुल समाप्त होगया है, जनेऊ या यज्ञसूत्र की कोई आवश्यकता ही नहीं रह गयी है - सनातन कहता था - ‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते’ तब अब जब संस्कार ही नहीं दीक्षा पद्धति ही नहीें कोई भारतवासी अपने आपको द्विज होने का उद्घोष नहीं कर सकता। महात्मा गांधी ने भी वर्णाश्रम व्यवस्था को स्वीकारा था पर आज भारत में वर्णाश्रम व्यवस्था समाप्त है। राजमोहन गांधी लिखते हैं - अंततोगत्वा गांधी भी तो अपूर्ण मानव ही थे। संस्कृत वाङमय कहता है - ‘\पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्युते, पूर्णस्य पूर्णमादाय् पूर्णमेवावशिष्यते’। महात्मा गांधी की मानवीयता पूरी तरह व्यावहारिक एवं पूर्ण थी। राजमोहन जब यह कहते हैं कि गांधी भी अपूर्ण थे तो उनका कथन प्रतीकात्मक ही है। साथ ही राजमोहन गांधी अपने पितामह मोहनदास करमचंद गांधी को उनके अपने समकालीन नामधारी व्यक्तित्त्वों से ज्यादा क्रांतिदर्शी तथा परिवर्तनाकांक्षी व्यक्तित्त्व मानते हैं। सबसे अहम महत्व का बिन्दु यह था कि महात्मा गांधी के समकालीनों में मोहम्मद अली जिन्ना में जो घृणा व महात्मा गांधी के उदात्त व्यक्तित्त्व के प्रति अरूचि थी वह लेशमात्र भी महात्मा गांधी में विद्यमान नहीं थी। गांधी व जिन्ना दोनों ही गुजराती भाषी थे तथा जिन्ना महात्मा से सात वर्ष छोटे भी थे। जहां तक बाबा साहेब अंबेडकर व गांधी की समकालीनता का सवाल उठता है उन दोनों में पीढ़ी का अंतराल था। दलित उत्थान बाबा साहेब का मौलिक लक्ष्य था जबकि महात्मा गांधी दलितों को जिन्हें वे हरिजन कहते थे तथाकथित तत्कालीन सवर्णों के मध्य बैठाना, उन्हें सनातन छतरी का पूरा पूरा लाभार्जन कराना एवं मनुष्य मनुष्य में भेदकारी व्यवहार को समाप्त करना था। बाबा साहेब व महात्मा गांधी का लक्ष्य एक था पर रास्ते जुदा जुदा थे। अब जब भारत के लोग बाबा साहेब की सवा सौवीं जयंती मना रहे हैं चार वर्ष उपरांत हिन्दुस्तान महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती मनायेगा। इन चार वर्षों में दलित एवं तथाकथित सवर्ण भारतवासियों के बीच एक संवाद स्थापित करने की जरूरत है। आधुनिक सभ्यता शहराती जिन्दगी वैश्विक बाजारीकरण ने हिन्दुस्तान में वे लोग जो अपने को द्विज कहलाना पसंद करते हैं उनका द्विजत्व समाप्त हो चुका है। अब सृष्टि में द्विजत्व व ब्राह्मणत्व केवल पक्षियों में ही रह गया है। हिन्दुस्तान के सारे वर्णाश्रमवादी अब बाजारू संस्कारों के जरिये ‘सेवाधर्म परम गहनो’ वाले शूद्र और व्यापार करने वाले वणिक मात्र रह गये हैं। आधुनिकता ने भारत के नस्लवाद की समाप्ति व ऊँच नीच का भेदभाव कम से कम बाजार में तो कम कर ही दिया है। बाजार में न तो कोई द्विज या सवर्ण ब्राह्मण है न ही दलित सब एक ही कतार में खड़े हैं अतः नयी सुध लेने के अवसर पर भारत के लोगों को गांधी-दर्शन पर तथा गांधी की सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह एवं समदर्शिता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये। प्रयास यही होना चाहिये कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःखभागभवेत्’ का आदर्श बना रहे। न निंदति न स्तौति अर्थात निंदा व स्तुति से परहेज।
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