नवति प्राप्त कल्याण मासिक की भारतीय वाङमय उपलब्धियां और गीताप्रेस
गीताप्रेस का श्रीगणेश विक्रम संवत 1980 शालिवाहन शक संवत 1845 भारत में अंग्रेजी राज की मुख्य देन ग्रेगेरियन कैलेंडर के ईस्वी सन 1923 में हुआ। जनवरी सन 1926 में कल्याण मासिक का पहला विशेषांक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार की सौष्ठव संपादन कला के माध्यम से छपना शुरू हुआ। गीताप्रेस और मासिक कल्याण ने भारत की मौलिक आस्था के ग्रंथ भगवद्गीता-कृष्णार्जुन संवाद तथा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा स्वांतः सुखाय लोकभाषा में निबंधित रामचरित मानस को जन जन तक पहुंचाने का भगीरथ प्रयास भक्त शिरोमणि भक्ति ज्ञान वैराग्य त्रयी का सांगोपांग वाङमयी विश्लेषण करने वाले व्यक्तित्त्व के धनी यति धर्माचरण करने वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार ने किया। पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने आधुनिक भारत के पचास निर्माताओं में हनुमान प्रसाद जी को गरिमामय स्थान दिया। भारत सरकार ने हनुमान प्रसाद जी की जीवनी प्रकाशित की। हनुमान प्रसाद पोद्दार सरीखे उदात्त मानव मात्र सहित जीवदया - जीवात्मा व परमात्मा में भोक्ता व दृष्टा मतानुयायी व्यक्ति को गीताप्रेस ऐंड मेकिंग आफ हिन्दू इंडिया के विद्वान लेखक की प्रशंसा करते हुए जी. संपत कहते हैं - Is the Secular Indian Nationalism a viable
project? वे अपने सवाल का जवाब स्वयं ही देते हुए कहते हैं - Gitapress that their ideological affiliates are
in power, this answer merits serious attention since it denies the
constitutional realty .
ऐसा प्रतीत होता है कि हनुमान प्रसाद पोद्दार ने गोस्वामी तुलसीदास की तरह स्वांतः सुखाय जो उपक्रम अपने जीवन में किया उससे अक्षय मुकुल महाशय सहित जी. संपत महाशय सरीखे सेकुलरिज्म के पहरेदारों को उसी तरह मार्मिक पीड़ा हुई जिस तरह काशी के ब्राह्मण लोग तुलसी द्वारा लोकभाषा में रामचरित मानस लिखने से हुई थी। यह ब्लागर कल्याण मासिक सन 1948 से निरंतर पढ़ रहा है। हनुमान प्रसाद पोद्दार की भावनात्मक शैली विष्णुसहस्त्रनाम में परमभागवत शान्तनु भीष्म द्वारा अजातशत्रु युधिष्ठिर को धर्म की व्याख्या करते हुए - ध्यायन् स्तुवन् नममस्पंश्च यजमानस्तयेवच ध्यान जप मनुष्यों में आस्था की सर्वोच्च श्रेणी है। ध्यान मग्न व्यक्ति ख्रिस्ती, मुसलिम, हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी, ताओ यहां तक कि जो लोग अपने आपको धर्म में बंधा हुआ नहीं मानते जिन्हें अंग्रेजी में Athiest कहा जाता है वे भी ध्यान मग्न हो सकते हैं। ध्यान धारणा वाला व्यक्ति समस्त जगत को ईश्वरमय मानता है तथा उसकी दृष्टि में सभी समान हैं। जिस तरह महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज और हिन्द वासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज की बात की। हनुमान प्रसाद पोद्दार का वैयक्तिक लक्ष्य भक्ति ज्ञान वैराग्य की त्रिवेणी था। उनका सामाजिक लक्ष्य मानव मात्र का हितवर्धन था। उन्होंने वेदोें ब्राह्मण ग्रंथों सहित उपनिषद सार तत्व अपने लेखन द्वारा भारतीय समाज के दुर्बल से दुर्बल वर्ग के लिये एक रास्ता बताने का काम किया। गीताप्रेस कल्याण तथा इन दोनों की आत्मा हनुमान प्रसाद पोद्दार को गीताप्रेस ऐंड मेकिंग हिन्दू इंडिया कहना और उस व्यक्ति को जिसने अपनी समूची जिन्दगी अध्यात्म मार्ग को समर्पित कर दी जिसकी कोई ऐसी भावना नहीं थी कि उसके परिश्रम का फल उसे मिले। आज हनुमान प्रसाद पोद्दार इस मृत्युमंडल में अक्षय मुकुल और जी. संपत सरीखे महानुभावों के आक्षेप आरोप तथा हनुमान प्रसाद पोद्दार को हिन्दुत्व वादी सिद्ध करने की जो होड़ लगी है उसका सटीक जवाब कल्याण के वर्तमान संपादक महाशय श्री राधेश्याम खेमका को संकल्पित करना चाहिये। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भगवद्गीता का अंग्रेजी अनुवाद के प्रस्तुतीकरण के समय यह स्वीकार किया कि अंग्रेजी के जरिये भगवद्गीता का तत्व ब्रह्म विद्या तथा उपनिषदों में जो तत्व विवेचन हुआ है भगवद्गीता के अठारहों अध्यायों विषादयोग से लेकर कर्म सन्यास योग तक विवेचित तत्व को समझना बड़ा दुष्कर कर्म है। जर्मन भाषी मैक्समूलर अपने आपको मोक्षमूलः कहना पसंद करते थे। वे कभी भारत नहीं आये पर भारत उनकी आत्मा में बसता था। मोक्षमूलः ने वेदाध्ययन का जो सिलसिला जर्मनी सहित पूरे यूरप में फैलाया उससे भारतीय वाङमय की प्रतिष्ठा बढ़ी।
बात सन 1951 की है पिथौरागढ़ की रई गुफा में स्वामी विज्ञानानंद ठहरे हुए थे। वे बंगलुरू के गोविन्द स्वामी महाराज के दीक्षित शिष्य थे। 1931 से लगातार हिमालय भ्रमण कर रहे थे। पिथौरागढ़ तब आज की तरह शहराती बस्ती नहीं थी। वहां के सब पोस्ट मास्टर नंदकिशोर पंत ने इस ब्लागर को कहा - चलो स्वामी विज्ञानानंद के दर्शन कर आयें। गुफा में गये तो स्वामी जी समाधिस्थ थे। अढ़ाई घंटे तक इंतजार करने के बाद शाम होने लगी। हम गुफा से बाहर आगये। कनागत श्राद्ध आये इस ब्लागर को अपने दिवंगत पिताश्री का पहला पार्वण श्राद्ध करने गांव जाना था। यह ब्लागर बेरीनाग पहुंचा तो वहां एक ग्राम बंधु नंदावल्लभ पंत ने बताया कि स्वामी विज्ञानानंद ने उन्हें कहा कि रमेश चंद्र अपने पिता का पार्वण श्राद्ध करने गांव आरहा है उसे कहो कि श्राद्ध करने के पश्चात स्वामी जी से मिले। श्राद्ध का भोज सन्यासी को नहीं दिया जा सकता। सन्यासी श्राद्ध में सम्मिलित भी नहीं होते। गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति पंडित गंगा दत्त पंत के आंगन की चौपाल में महात्मा बैठे थे। उन्होंने इस ब्लागर को कहा - मुझे छिड़केश्वर ले चलो। गांव के दो अंग्रेजी पढ़े लिखे युवक कौस्तुभानंद पंत व पीतांबर पंत अंग्रेजी में बतिया रहे थे। कह रहे थे नंदावल्लभ जोगियों के पीछे दौड़ता है। उनकी बात सुन कर महात्मा हंस पड़े। युवक समझते थे कि महात्मा अंग्रेजी नहीं जानता। गांव के बुजुर्ग भी अंग्रेजी नहीं जानते। महात्मा जी के हंसने पर गांव के बुजुर्ग पंडित गंगा दत्त पंत जी ने इस ब्लागर से पूछा - तुम जानते हो ये सन्यासी कौन है ? इन लड़कों की अंग्रेजी वार्ता पर क्यों हंस रहा है। इस ब्लागर ने वयोवृद्ध पंडित जी को कहा - ताऊ जी अगली बार पूरी बात पता कर आपको बताऊँगा। उन्हें शक था कि कहीं साधु उनके पुत्र कौस्तुभानंद को अभिशप्त न कर डाले। साधु ने इस ब्लागर को कहा - रमेश चंद्र वृद्ध महाशय को आश्वस्त कर दो कि महात्मा उनके बेटे को शाप नहीं देेंगे। स्वामी विज्ञानानंद जी एक सप्ताह छिड़केश्वर में गुफा में ठहरे। एक सप्ताह बाद उन्होंने गणेश गुफा में रहना शुरू किया। पिथौरागढ़ से दुबारा गांव आने पर महात्मा विज्ञानानंद संबंधी ब्यौरे जो इस ब्लागर को पिथौरागढ़ के मशहूर सन्यासी देवी भक्त मौनी बाबा से ज्ञात हुआ, वह सारा वृत्तांत पंडित गंगा दत्त जी को सुना दिया। मौनी बाबा के अनुसार स्वामी विज्ञानानंद गीताप्रेस के संस्थापक जयदयाल गोयन्दका के अनुज थे। 1930 में आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने गोविन्द स्वामी से दीक्षा ली। 1931 में हिमालय आये और तबसे हिमालय के गाड़ गधेरों व गुफाओं में रहते हैं। गांवों के लोगों को निरोग रहने के उपाय बताते रहते हैं। हिमालय में साधना करने वाले साधु विज्ञानानंद 1931 से 1955 तक उप हिमालय में जगह जगह रहे। वे भोजन में केवल सिनकोना के दानों को उबाल कर पीते थे, अनाज नहीं खाते थे। किसी गृहस्थ के घर में प्रवेश भी नहीं करते थे। इस ब्लागर के पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, मुनस्यारी रहने के दौरान गांव जाने पर साधु विज्ञानानंद जहां भी होते उनके दर्शनार्थ जाते रहना एक जीवन नियम था। जब यह ब्लागर दिल्ली में रहता था गांव आने पर पता चला कि स्वामी विज्ञानानंद ने गंगोलीहाट के पास शैल पर्वत की गुफा में जलसमाधि ले ली है। स्वामी विज्ञानानंद का प्रकरण इस ब्लागर ने इसलिये प्रस्तुत किया कि वह परम सिद्ध मानव हितैषी प्रत्याहार करने वाले समाधि में रमने वाले ऐसे व्यक्तित्त्व थे जिन्होंने अंग्रेज सरकार की आई.सी.एस. की नौकरी के बजाय सन्यास मार्ग ज्यादा उपयोगी माना।
महामना मदन मोहन मालवीय के दिवंगत होने पर कल्याण ने विशेषांक जारी किया। 1946 में भारत में हिन्दू मुस्लिम विभेद चरम पर था। पाकिस्तान संबंधी कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के आह्वान पर भारत की मुसलमान जनसंख्या में समर्थ वर्ग विशेष तौर पर संयुक्त प्रांत अवध आगरा का मुसलमान मोहम्मद अली जिन्ना के संकल्प का हमराही था। अक्षय मुकुल महाशय ने इकतरफा अनुसंधान कर वैराग्य राग के रसिक हनुमान प्रसाद पोद्दार को मेकिंग हिन्दू इंडिया आरोप पूरे वेग से लगाया। उनका यह भी कहना है कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद जिन पच्चीस हजार लोगों को निरूद्ध किया गया अक्षय मुकुल के अनुसार हनुमान प्रसाद पोद्दार भी उनमें से एक थे। महामना मदन मोहन मालवीय के दिवंगत होने पर कल्याण का जो विशेषांक 1946 में प्रकाशित हुआ उसे बर्तानी सरकार ने जब्त कर लिया। तात्कालिक राष्ट्रीय महत्त्व की जरूरत इस बात की है कि कल्याण के वर्तमान संपादक महोदय को चाहिये कि अक्षय मुकुल महाशय ने अपनी पुस्तक 552 पृष्ठीय गीताप्रेस ऐंड दि मेकिंग आफ हिन्दू इंडिया में जो खोजें दर्ज की गयी हैं कल्याण मासिक के 1926 से 2015 तक के सभी अंकों में उन प्रसंगों को पुनर्वाचित किया जाये जो दलितों के मंदिर प्रवेश छुआछूत से मुक्ति पाने का महात्मा गांधी का संकल्प सनातन धर्म से इतर धर्मावलंबियों की धार्मिक आस्था पर यदि कल्याण उसके भक्ति ज्ञान वैराग्य मार्ग के राही संपादक रहे हनुमान प्रसाद पोद्दार ने जब जब अपनी लेखनी से तथाकथित हिन्दुत्व को बढ़ावा दिया है उसका पुनर्वाचन कर हनुमान प्रसाद पोद्दार की व्यक्तिगत नैष्ठिक जीजिविषा के समानांतर यदि कभी उनके किसी लेख किसी पत्र या किसी वक्तव्य ने भारत में रहने वाले स्मार्त, शाक्त, शैव, वैष्णव, रैदास, दादू, नाथ, गोरख, वल्लभ संप्रदायों के विशिष्टाद्वैत के पक्ष में यदि कभी कोई बयान दिया हो कोई स्तंभ प्रकाशित किया हो संपादकीय लिख कर अन्य धर्मावलंबी भारतवासियों के मन को ठेस पहुंचाने का कोई प्रसंग आया हो अक्षय मुकुल तथा जी. संपत महाशय ने जो आरोप दिवंगत हनुमान प्रसाद पोद्दार के जीजिविषा पर जड़े हैं गीता व रामायण के प्रसार यज्ञ में हनुमान प्रसाद पोद्दार ने जो आहुतियां अपने जीवन काल में अर्पित कीं उन पर सिलसिलेवार बहस भारतीय राष्ट्रीयता के संरक्षण के लिये नितांत आवश्यक है। सबसे बड़ा सवाल जो अक्षय मुकुल महाशय ने उठाया है भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जो अवध के किसानों के सर्वमान्य नेता थे इलाहाबाद लखनऊ वाराणसी तथा गोरखपुर में गीताप्रेस के बारे में लोकमत क्या था ? क्या गोरखपुर जहां गीताप्रेस स्थापित हुआ वहां की मुसलमान बस्ती गीताप्रेस के खिलाफ थी ? इस सारे प्रसंग में रामचरित मानस के समानांतर अवधी भाषा में रचित मलिक मोहम्मद जायसी का काव्य पद्मावत का अनुशीलन भी सामाजिक प्रक्रिया है। मलिक मोहम्मद जायसी का कहना था - विधना के मारग हैं तेते सरग नखत तन रोआं जेते। कल्याण के मौजूदा संपादक राधेश्याम खेमका अपने पूर्वाधिकारी कल्याण संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार के व्यक्तित्त्व को उजागर करने वाले प्रत्येक बिन्दु पर - विनोबा के उस प्रसंग पर ध्यान देगें जहां वे कहते हैं - श्रद्धा भागवते शास्त्रे अनिन्दा अन्यत्र क्वापि हि भारतीय स्वातंत्र्य मुहिम में विनोबा भावे और हनुमान प्रसाद पोद्दार धार्मिक सहिष्णुता के उदात्त व्यक्तित्त्व थे। वे इतर धर्मशास्त्रों की अनिंदा - दूसरे शब्दों में उपयुक्त समादर के प्रवर्तक थे। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने 1946 से लेकर 1950 तक अपने संपादकीयों व अभिव्यक्तियों के इतर स्थलों में जो कुछ कहा जिसे लेकर अक्षय मुकुल व जी. संपत महाशय को सेकुलरिज्म संबंधी बेचैनी हुई उसका निराकरण कल्याण के वर्तमान संपादक श्री राधेश्याम खेमका महोदय को कल्याण की भक्ति ज्ञान वैराग्य की त्रिवेणी को दोष मुक्त तथा आरोप मुक्त करने के लिये तात्कालिक उपाय खोजे जाने चाहिये।
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