Friday, 11 September 2015

गीताप्रेस - जाति एवं सेकुलरिज्म रणांगण


अक्षय मुकुल और राजकिशोर द्वारा गीताप्रेस संबंधी पुस्तक Geeta Press – Making Hindu India तथा अध्यात्म व कानूनी घालमेल स्तंभ के बारे में अंग्रेजी अखबार हिन्दू के स्तंभकार महाशय जी. संपत ने अपने 9 सितंबर 2015 के संपादकीय स्तंभ में लिखा - Scrutiny of Hindutwa – among several achievements of Akshay Mukul’s New Book must significant in its below the hood scrutiny of Hindutwa.। जी. संपत महाशय ने अक्षय मुकुल महाशय को उद्धृत करते हुए कहा - मारवाड़ियों ने संपन्न क्षत्रिय-ब्राह्मणों के समुच्चय को ‘वामन बनिया’ चेहरा बना डाला। लगता है अक्षय मुकुल महाशय तथा जी. संपत महाशय को जामदग्न्य राम जिन्हें फरसा वाले राम अथवा परशुराम भी कहा जाता है, उन्होंने भारत की धरती को इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन कर डाला। आप आज भी उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों में जाइये - ब्राह्मण क्षत्रिय द्वेष आपको साफ साफ दिखायी देगा। अक्षय मुकुल महाशय ने कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के उस मंत्र को अपना लिया जिसमें कायदे आजम ने कहा था कि हिन्दुस्तान का मुसलमान वामन बनिया की गुलामी नहीं सहेगा। कांग्रेस के उच्च नेता तब मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें भारत वासी महात्मा गांधी संबोधन से पुकारते हैं वैष्णव बनिया थे और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी पंडित जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण थे, यद्यपि कुछ लोग यह प्रचारित करते रहे हैं कि पंडित नेहरू के पितामह गंगाधर नेहरू मूलतः इस्लाम धर्मावलंबी थे। पश्चिमी भारत में आज भी परशुराम जयंती अक्खा तीज अक्षय तृतीया के रूप में मनायी जाती है। इसलिये अक्षय मुकुल सहित गीताप्रेस की आलोचना मजहबी आधार पर करने वाले चिंतकों और विचारकों को चाहिये कि वे सनातन धर्म को अंग्रेजी चश्मे से पढ़ने के बजाय हिन्दुस्तानी वाणियों के मार्फत समझें बूझें ताकि वे अपने अधीत विद्या के साथ पंक्तिभेद के दोष भागी न बनें। सेकुलरिज्म का डंका पीटने वालों को यह समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान का मजहबी चिंतन व्यक्ति व परिवार मूलक है। ख्रिस्ती धर्म इस्लाम धर्म की तरह सामूहिक मजहबी आस्था नहीं। जिसको दुनियां के लोग हिन्दू धर्म और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा हिन्दू महासभा सरीखे संगठनों ने हिन्दुत्व नाम दिया है वह भी भारत मूलक नहीं। भारत के लोगों को अरब के लोगों ने सिंधु नदी के संदर्भ में हिन्दू संज्ञा दी तथा यूरप विशेष तौर पर इंग्लिस्तान ने सिंधु को इंडस व सिंधु नदी के परिवेश में रहने वाले लोगों के देश को इंडिया तथा भारत के जन जन को इंडियन कहा। इसलिये हिन्दू व इंडियन हिन्द और इंडिया पर्यायवाची शब्द हैं। संपत महाशय फरमाते हैं कि भगवद्गीता की सवा सात करोड़ प्रतियां गीता पढ़ने वाले लोगों में पहुंच चुकी है। तुलसी के रामचरित मानस की सात करोड़ प्रतियां पाठकों तक पहुंच चुकी हैं। शायद जी. संपत महाशय और अक्षय मुकुल महाशय को पता हो कि जब तुलसी रामचरित मानस भाषा में निबंधित कर रहे थे काशी के ब्राह्मणों ने तुलसीदास को अनेक कष्ट दिये। तुलसी ने रामकथा जन जन तक पहुंचाने के लिये ही रामचरित मानस को भाषा में निबंधित किया था। इसलिये अक्षय मुकुल महाशय के इस तर्क में किंचित मात्र भी संबल नहीं कि तुलसी के रामचरित मानस को दलित व पिछड़े वर्ग के वे लोग जो संस्कृत नहीं जानते उनके लिये रामचरित मानस वरदान है। महाराष्ट्र में हर घर में ज्ञानेश्वरी का पाठ होता है। संत ज्ञानेश्वर ने भगवद्गीता को मराठी भाषियों के नित्यपाठ का लाभ दिलाया। ज्ञानेश्वरी को महाराष्ट्र का दलित भी पढ़ता है। बौद्ध धर्म अपनाने के बावजूद भी एकनाथी भागवत के अभंग तथा ज्ञानेश्वरी पाठ महाराष्ट्र के दलित समाज को शक्ति देता है। 
भारत की मजहबी मौलिकता को समझने के लिये भगवद्गीता व रामचरित मानस मददगार तो हो सकते हैं ये दोनों ग्रंथ (भगवद्गीता- महाभारत का एक छोटा सा ज्ञानवर्धक संवाद है) कुरआन शरीफ व होली बाइबिल की तरह मजहबी पुस्तकें सिख धर्म के गुरू ग्रंथ साहेब को कुरआन शरीफ व होली बाइबिल के समानांतर एकमेव मजहबी ग्रंथ के रूप में पेश किया जा सकता है। यहां तक कि वेद निन्दा के सूत्र जैन धर्मावलंबियों व बौद्ध धर्मावलंबियों की भी श्रमणात्मक अथवा बोधात्मक प्रविधियां हैं पर ये दोनों मजहब हिन्दुस्तान की उपज हैं। वेदविहित धार्मिकता के साथ यदा कदा संघर्ष के बावजूद सिख धर्म सहित बौद्ध जैन धर्म हिन्दुस्तानी सनातनता से आचार विचार में जुड़े हुए मजहब हैं। इन तीनों मजहबों के प्रथम पुरूष क्रमशः गुरूनानक देव गौतम बुद्ध तथा महावीर स्वामी थे परन्तु भारत का सनातन धर्म किसने शुरू किया इसका आधारिक प्रमाण नहीं है। आदि शंकर सहित अनेकानेक संतों ने सनातन धर्म रूपी पीपल को सींचा पर किसी संत ने यह दावा नहीं किया कि वह सनातन - स्मार्त - शैव - शाक्त - वैष्णव मत सहित इस्लामी सल्तनत के दौरान जितने भी संत महात्मा हुए उन्होंने अपनी बातें कहीं संप्रदाय भी चलाये पर किसी ने यह दावा नहीं किया कि वह भारत के विभिन्न संप्रदायों द्वारा अपनायी जाने वाली प्रक्रियाओं का कर्ता है। इस्लामी सल्तनत के दौरान भारत भर में सभी भाषाओं में भक्ति काव्य की रचना हुई यहां तक कि भक्ति साहित्य से इस्लाम धर्मावलंबी भी राम भक्ति कृष्ण भक्ति देवी भक्ति शिव भक्ति की ओर अग्रसर हुए। मलिक मोहम्मद जायसी रसखान कबीर अमीर खुसरो रहीम खानखाना आदि मुसलमान कवि इसके प्रतीक हैं। 
संपत महाशय आगे कहते हैं कि गीताप्रेस ओबीसी दलित समाज को जो भारत की जनसंख्या में सर्वाधिक संख्या वाले समाज हैं उन्हें हिन्दू छतरी के अंदर रखा है ताकि इतर धर्मावलंबी जो धर्मान्तरण में आस्था रखने के समानांतर आस्था परिवर्तन के लिये प्रोत्साहन भी देते रहते हैं उनसे अन्य पिछड़े हुओं और दलितों को दूरी बनाये रखने का सघन प्रयास गीताप्रेस के द्वारा प्रच्छन्न रूप में होता रहा है। अक्षय मुकुल के लक्ष्य और उद्देश्यों की सटीक व्याख्या करने वाले जी. संपत महाशय ने लेखक को उद्धृत करते हुए कहा - उन्नीसवीं शताब्दी से ही बनिये छापेखाने अखबार मारवाड़ियों को संगठित करने चलाने वाले 1889 में राजस्थान समाचार 1890 में मारवाड़ी 1921 में मारवाड़ी सुधार 1923 में मारवाड़ी गुरू हुए थे। इसी तरह गीताप्रेस व कल्याण भी शुरू किये गये। गीताप्रेस स्थापना 1923 में कल्याण का पहला अंक 1926 में प्रकाशित हुआ। गीताप्रेस के मालिक जयदयाल गोयन्दका और उनके वंशज पुत्र पौत्र प्रपौत्र दौहित्र आदि गीताप्रेस से जुड़े होंगे पर हनुमान प्रसाद पोद्दार तो भक्ति ज्ञान वैराग्य की त्रिवेणी थे। इस ब्लागर की प्रथमा कन्या अंग्रेजी हिन्दी संस्कृत तथा तमिल भाषाओं में उच्चतम योग्यता धारक थी। दिल्ली में अपने अनुज के साथ इस ब्लागर के साथ रहती थी उसने एक दिन इस ब्लागर को कहा - पिताजी भगवद्गीता के राजविद्या-राजगुह्ययोग के बत्तीसवें श्लोक के उत्तरार्ध में कहा गया है -
स्त्रियो वैश्या तथा शूद्रा तेऽपि यांति पराम् गतिम्।
वह स्त्रीवादी युवा थी उसने पूछा - स्त्रियों को वैश्य शूद्र पंक्ति में महर्षि वेदव्यास ने क्यों रखा ? इस ब्लागर ने अपनी पुत्री को पाप योनियों बाबत बताना चाहा पर स्त्री स्वातंत्र्य तथा स्त्री स्वाधिकार के लिये समर्पित इस ब्लागर की कन्या को अपने पिता द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण अस्वीकार्य था। अक्षय मुकुल महाशय भी भक्ति ज्ञान वैराग्य की चर्चा तो कहीं कहीं हनुमान प्रसाद पोद्दार के संदर्भ में कर रहे हैं परंतु उन्हें हनुमान प्रसाद जी में हिन्दुत्व के उत्कर्ष की प्रबलता ही ज्यादा दिखी। हनुमान प्रसाद जी के कृत्य को तुलसीदास के स्वान्तः सुखाय भावना से देखने पर ही 1926 से मृत्युपर्यन्त उन्होंने जो कार्य किया वह मानव तथा प्राणी हितैषी ज्यादा था। हिन्दू महासभा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दुत्व दर्शन में भी व्यापक विभेद हैं दोनों को जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। हिन्दू महासभा का उत्कर्ष उतना नहीं हुआ जितना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने डाक्टर हेडगेवार तथा गुरूजी संबोधन से जाने जाने वाले माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नैतिक मजबूती दी परंतु कल्याण मासिक तथा गीताप्रेस की रामचरित मानस व भगवद्गीता प्रसार को हिन्दू महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उद्देश्यों से जोड़ना न्यायसंगत बौद्धिकता नहीं है। संपत महाशय डेमोक्रेसी की चर्चा करते हैं कि प्राचीन भारत में विष्णुपुराण में खस गणतंत्र का उल्लेख आता है यहां तक कि लिच्छिवियों के खस गणतंत्र के मुखिया शुद्धोदन के घर में गौतम बुद्ध जन्मे। प्राचीन भारतीय समाज में वैचारिक स्वातंत्र्य के समानांतर व्यावहारिक मतभिन्नता को गर्हित नहीं माना जाता था। मारवाड़ी बनिया समाज द्वारा तथाकथित हिन्दुत्व को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाये जाने का जो आरोप अक्षय मुकुल व जी संपत महाशय अपने चिंतन में पूरे वेग के साथ जड़ रहे हैं वे हनुमान प्रसाद जी की सन्यस्त वृत्ति की अनदेखी कर रहे हैं। अगर अक्षय मुकुल व जी संपत महाशय ने धर्म के मूल तत्व को हृदयंगम करने बाबत विचार किया होता तो वे हनुमान प्रसाद जी की पंथ निरपेक्षता पर आक्रमण नहीं करते। धर्म को एक चौपाया - चार पहिये वाला वाहन माना गया है। इसका पहला पहिया ध्यान जप धर्म है जो हिन्दू मुसलमान ईसाई सिख आदि सभी धर्मों से ऊपर है। धर्म का दूसरा चरण प्रार्थना धर्म है जिसे ख्रिस्ती समाज गिरजाघरों में प्रार्थना द्वारा व्यक्त करता है। धर्म का तीसरा पहिया नमस्या या नमाज है जिसका इस्लाम धर्मावलंबी अनुसरण करते हैं। धर्म का चौथा पहिया यजमान धर्म है, यजमान माने यज्ञ करना व यज्ञ कराना जो पर्यावरण संवर्धक है। कृष्ण तिल व गाय के घी से हवन करने से वायु शुद्ध होती है। हिन्दुस्तान की सरकार के प्रथम राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री ने भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान भारत रत्न का प्रथम अधिष्ठाता हनुमान प्रसाद पोद्दार को बनाना चाहा पर हनुमान प्रसाद जी ने डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद व पंडित नेहरू के आग्रह को नम्रतापूर्वक ठुकराते हुए भारत रत्न की पहली उपाधि को स्वीकार नहीं किया। अक्षय मुकुल महाशय तथा स्तंभकार जी संपत को प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के वैयक्तिक व सरकारी दस्तावेजों व नेहरू संग्रहालय में बैठ कर यह तहकीकात करना चाहिये कि क्या 1954 में भारत रत्न उपाधि हनुमान प्रसाद पोद्दार को देने के लिये कोई हलचल हुई थी ? गीताप्रेस को हिन्दुत्व से जोड़ना उदात्त भारतीय अध्यात्मवाद को राजनीतिक छिछोरापन ही कहा जा सकता है। जिस मजहबी आस्था को लोग हिन्दू धर्म कहते हैं उसमें इतर धर्मावलंबियों को सनातन धर्म की चौखट में फिट करने का कोई प्रावधान धर्मशास्त्र में नहीं है। जिन धर्मावलंबियों में धर्मान्तरण एक लक्ष्य है उनसे गीताप्रेस द्वारा प्रसारित भारतीय आध्यात्मिता को नहीं जोड़ा जा सकता। 
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