काशी हिन्दू विश्वविद्यालय शताब्दी वसंत पंचमी १३ फरवरी २०१६
कौटिल्यीय अर्थशास्त्र आन्वीक्षिकी षडविद्या राजनीति तथा महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज
ब्लागर हिमकर ने अपनी पूर्ववर्ती पोस्टों में उद्घोषित किया था कि विश्वकर्मा जयंती सत्रह सितंबर 2015 से निरंतर अर्थशास्त्र आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति पर रोजाना एक एक पोस्ट हिमकर द्वारा जारी की जायेगी। हेनरी किसिंजर ने भारत के दो ग्रंथों भारतीय राजनीतिक पृष्ठभूमि महान कत्र्तत्वशील विचारक आचार्य चाणक्य द्वारा कौटिल्यीय अर्थशास्त्र का निरूपण किया गया था। जिस तरह प्राचेतस वाल्मीकि ने रामायण जैसा लिखा ठीक उसी तरह घटनाक्रम घटा। दाशरथि राम का मर्यादा पुरूषोत्तम राम होना आदि कवि वाल्मीकि की कल्पना थी। ठीक वाल्मीकि की तरह आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र जैसा लिखा वैसा उसे राजकाज में हूबहू उतारने का कार्य मामूली से लगने वाले ग्वाल बाल को मगध सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। भारतीय इतिहास के पन्नों के अनुसार मौर्य साम्राज्य की स्थापना का श्रेय आचार्य चाणक्य की राजनीतिक कल्पना को जाता है। इसी मौर्य वंश में सम्राट अशोक नाम के प्रतिभा संपन्न राजराजेश्वर हुए जिनका यशोवितान भारत भर में मौर्य साम्राज्य के रूप में सांस्कृतिक भारत ने राजनीतिक भारत के रूप में आकार ग्रहण किया। चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन काल ईसा से पूर्ववर्ती था। पिछले अढ़ाई हजार वर्षों का जो भारतीय इतिहास है उसमें मौर्य वंश के दस राजाओं का व्यापक कथानक है। चाणक्य ने भारत की राजनीतिक मर्यादाओं को अत्यंत दृढ़ता के साथ स्थापित किया है। भारत सांस्कृतिक रूप से तो प्रागैतिहासिक काल से सांस्कृतिक राष्ट्र है। राजकत्र्ताओं के राजनीतिक कृत्यों ने भारत की राष्ट्रीयता का सांस्कृतिक स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सका इसका एक कारण आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र भी है। चाणक्य हिन्दुस्तानी मानसिकता के विज्ञ थे, राजनीतिक दांवपेच समझने वाले विद्वान व्यक्ति थे। उनमें वैचारिक संघर्ष करने की अतुलनीय क्षमता थी पर घृणा व्यापार नहीं था। महानंद के महामात्य राक्षस ने जब देखा कि चाणक्य के पैर में कुश चुभने से उसे कष्ट हुआ था तब कुश को समूल नष्ट करने के लिये चाणक्य कुश की जड़ों में मट्ठा डाल रहे थे। महानंद के आमात्य राक्षस ने जब तेजस्वी ब्राह्मण चाणक्य के इस कृत्य को देखा तो उसे आत्मविश्वास जगा कि वह नंद के कुल को समूल नष्ट करने की विधि समझ गया है। चाणक्य उसके मददगार हो सकते हैं। आमात्य ने महाराज नंद की ओर से नंद के पिता के श्राद्ध भोज हेतु चाणक्य को न्यौता। चाणक्य राजमहल पहुंचे तो उन्हें काला कलूटा देख कर महाराज नंद ने उनका अपमान कर डाला। इसी अपमान का बदला लेने के लिये चाणक्य ने तय किया कि वह तब तक शिखा बंधन नहीं करेंगे जब तक नंद का समूल नाश नहीं कर देते। आमात्य राक्षस की चिर महत्त्वाकांक्षा तो पूरी हुई ही किन्तु साथ ही लक्ष्य की पूर्णता को स्मरण रखने के लिये शिखा खुली रख कर सांस्कृतिक भारत को अर्थशास्त्र की अनमोल सौगात भी प्रस्तुत कर दी। इस ब्लागर ने भी हेनरी किसिंजर की पुस्तक का अवलोकन किया। आज भारत की जो राजनैतिक आर्थिकी तथा सामाजिक असमानता एवं विवेक के प्रयोग न होने की जो स्थितियां स्वातंत्र्योत्तर भारत में हैं उन्हें सटीक दिशाबोध देने में अर्थशास्त्र एक सक्षम ग्रंथ है। कौटिल्यीय अर्थशास्त्र के सूत्रों के साथ कृष्णार्जुन संवाद के सात सौ श्लोक अठारह अध्याय तथा विषादयोग से लेकर कर्मसन्यास योग की षडविधा राजनीति आज के संशयग्रस्त मानव समाज के लिये रामबाण औषधि का कार्य कर सकती है। इन दोनों के अलावा महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज प्रथम शब्द संचय है जिसे महात्मा ने वाचक और अधिपति संवाद का आकार दिया है। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में जो अभिव्यक्ति प्रस्तुत की उससे पहले वे भारत के उन नवयुवा क्रांतिकारियों की बातें भी सुन चुके थे जो शस्त्र क्रांति द्वारा भारत को आजाद कराने के पक्षधर थे इसलिये महात्मा जब केवल अपनी माता पुतलीबाई के मोनिया थे शेष दुनियां उन्हें मोहनदास करमचंद गांधी के रूप में पहचानती थी। महात्मा के पौत्र राजमोहन गांधी ने पीढि़यों के अंतराल वाले नजरिये से मोहनदास करमचंद गांधी का विचार विश्लेषण करने का प्रयास किया है। उन्होंने यह भी कहा कि गांधी जी की आलोचना उनका अपूर्ण होना भी एक विचारणीय बिन्दु है। महात्मा गांधी ने मदन मोहन मालवीय के आग्रह पर वसंत पंचमी 16 फरवरी 1915 के दिन काशी विश्वविद्यालय का शुभारंभ किया। महात्मा के अंतर्मन में अस्पृश्यता एक ऐसा आस्थामूलक कष्ट था जिसे वे समाज से अस्पृश्यता निवारण के लिये अपनी सर्वप्रथम जरूरत मानते थे इसीलिये भारत आने पर 1915 में उन्होंने कोचरब आश्रम में दूधाभाई के परिवार को अपने आश्रम को अंग बनाया पर गुजरात का वैष्णव समाज जो महात्मा गांधी को तो मानता था किन्तु उनके अस्पृश्यता निवारण से वैचारिक मतांतर रखता था उस वैष्णव गुजराती समाज ने महात्मा को सहयोग देना बंद कर दिया। महात्मा के सहायक बने तेरापंथी जैन धर्मावलंबी सेठ अंबालाल। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का शुभारंभ करते समय भी महात्मा का पहला सवाल था कि क्या अस्पृश्यता शास्त्रसम्मत है ? इसका सटीक निर्णय महात्मा को सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने दिया और कहा - महात्मा जी छुआछूत तो मैं भी परंपरा से मानता हूँ पर छुआछूत सनातन धर्म का अंग नहीं है। यह तो बाहर से घुस आया आस्था दोष है। सर्वपल्ली के कथन से महात्मा ने अस्पृश्यता निवारण को भारत की पहली जरूरत माना तथा जी जान से उसके निवारण में लग गये। आगामी वसंत पंचमी कुंभ संक्रांति 13 फरवरी 2016 के दिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अपनी शताब्दी मनायेगा। चाणक्य, श्रीकृष्ण, भीष्म तथा महात्मा गांधी ने भारत को सांस्कृतिक वाङमय, राजधर्म व मानवता का जो संदेश दिया है उसे ब्लागर हिमकर नियमित रूप से अर्थशास्त्र, आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति एवं गांधी आर्थिकी पर हेनरी किसिंजर ने जो उद्घोष अपने विचारों में किया है उसके सहित भारत विश्व का एक महत्वपूर्ण आदर्श राष्ट्र राज्य हो इस उद्देश्य से अर्थशास्त्र आधारित बिन्दुओं पर प्रतिदिन एक पोस्ट जारी करेगा। पूर्व में ब्लागर ने 17 सितंबर 2016 से यह उपक्रम शुरू करने का प्रयत्न किया था पर शुरूआती जरूरतें पूरी न होने के कारण वह तुरंत शुरू नहीं किया जा सका। आगामी चार महीनों में अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि, भारतीय संविधान के अनुसार भारत में राजधर्म की वर्तमान स्थिति, राजधर्म का आचरण करने वाले राजनीतिक दलों के चिंतन पोखरों को सटीक व सामयिक राजनीति करने के लिये भारत की सभी भाषाओं में शांतिपर्व, कौटिल्य अर्थशास्त्र, गांधी रचित हिन्द स्वराज एवं भारत के वर्तमान राजनीतिक दलों का राजनीतिक योगक्षेम भी समीक्षित करने का प्रयत्न किया जायेगा। उद्देश्य न निंदति न स्तौति है याने निंदा भी नहीं करनी है और स्तुति भी नहीं करनी है। वर्तमान राजनीति का द्वेषरहित अध्ययन तथा विभिन्न राजनीतिक दलों की जो विशेषतायें हैं उनका विश्लेषण एवं राजनीतिक चिंतन पोखरों में जो दोष समा गये हैं उन्हें किस तरह दूर किया जाये ताकि भारत अपने नाम को सार्थक कर सके। भरत शब्द के दो अर्थ होते हैं - ‘भरस्व’ अर्थात भरण पोषण करो। कोई भी भूखा प्यासा न रहे यही भरत शब्द का तात्पर्य है। संविधान निर्माताओं ने INDIA THAT IS BHARAT कहा - वे INDIA THAT IS HIND भी कह सकते थे पर उन्होंने ऋषभ पुत्र भरत को महत्व दिया जिसका उद्देश्य भरण पोषण ही रहा। हिमकर ब्लाग को पढ़ने वाले सज्जनों से अर्थशास्त्र की शुरूआत में चार महीने के विलंब के लिये यह ब्लागर सानुनय क्षमायाचना करता है। आने वाले चार महीनों में अर्थशास्त्र संबंधी पूर्व आवश्यकतायें चर्चित होंगी।
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