Friday, 16 October 2015

असल भक्त और पाखंडी भक्त का अंतर
भक्तियोग ही भारत को सृष्टि से अब तक सन्मार्ग दिखाता आरहा है। 
       
          अवधी भाषा में मलिक मोहम्मद जायसी नाम के कवि ने पद्मावत महाकाव्य रचते समय कहा - विधना के मारग हैं तेते, सरग नखत तन रोआं जेते। चेतन भगत महाशय हिन्दुस्तानी अंग्रेजीदां समूह के लोकप्रिय लेखक हैं। उनकी ख्याति अंग्रेजी में रचित उनके ‘थ्री इडियट्स’ और उनकी ताजा पुस्तक ‘हाफ गर्लफ्रेन्ड’ में अभिव्यक्त हुई है। चेतन भगत महाशय ने टाइम्स आइडियाज शनिवार जुलाई 11 सन 2015 के संस्करण में एनाटॉमी आफ एन इंटरनेट ट्राल शीर्षक से ‘भक्त’ शब्द की अपनी व्याख्या की है। इंटरनेट रूपी दैत्याकार सामर्थ्य वाली शरीर संरचना में वे कहते हैं - मीडिया ने भक्तों की एक अजीबोगरीब दास्तान रचने का नक्शा तैयार किया है। भारतीय योजना आयोग के प्रथम अभारतीय सलाहकार मिस्टर मून के साथ बसंत वल्लभ नाम के एक कुमइयां ज्योतिषी निजी स्टाफ के तौर पर जुड़े थे। बसंत वल्लभ का पूरा का पूरा खानदान ज्योतिषी था। दिल्ली के राजनीतिक तथा प्रशासनिक क्षेत्रों में बसंत वल्लभ की भविष्यवाणियां कई लोगों को भाती थीं। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री बलीराम भगत और उनके सहयोगी गनौरी बाबू बिहार राज्य के मुंगेर के स्वातंत्र्य वीर थे। दोनों बसंत वल्लभ के पास जाते रहते। बलीराम भगत को किसी व्यक्ति ने रत्न, नग आदि ज्योतिषी से परामर्श कर पहनने का रास्ता सुझाया तो उन्होंने बसंत वल्लभ से परामर्श किया। बसंत वल्लभ ने मंत्री जी व उनके साथी गनौरी साहू को कहा - मेरी बुआ का बेटा खादी वाला है। उसके कई ज्योतिषी मित्र भी हैं। आप उनसे संपर्क करें तो वह किसी विश्वसनीय ज्योतिषी से आपका संपर्क करा सकता है। बसंत वल्लभ ने अपने ग्राहक को कहा - मैं रत्नों नगों वगैरह का धंधा नहीं करता और न किसी को इस ओर जाने की राय ही दे सकता हूँ। गनौरी बाबू ने इस ब्लागर से पूछा - क्या वे पंडित बसंत वल्लभ को जानते हैं ? ब्लागर ने अपने अनन्य मित्र गनौरी बाबू को कहा - बसंत वल्लभ मेरे ममेरे भाई हैं व विख्यात ज्योतिषी हैं पर मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। गनौरी बाबू ने कहा - पंत जी क्या आप किसी अन्य अच्छे ज्योतिषी का नाम बता सकते हैं जो विभिन्न रत्नों जवाहरातों को अंगूठी में पहनने में परामर्श दे सकें। इस ब्लागर ने गनौरी बाबू को डिफेंस कालोनी में रहने वाले पंडित घनश्याम का नाम बता दिया। पंडित घनश्याम इस ब्लागर को भी जानते पहचानते थे। उनके पास बलीराम भगत व गनौरी बाबू को लेकर गये। घनश्याम ज्योतिषी ने उन दोनों को राय मशविरा देते हुए इस ब्लागर को भी गोमेध धारण करने का सुझाव दिया। इस ब्लागर ने पंडित घनश्याम जी से निवेदन किया कि अपने खानदान में बेटे पोते से लेकर अपनी आने वाली सात पीढ़ियों के सत्कर्म का फल अकेले लाभार्जित करना तथा अपनी आने वाली सात जिन्दगियों में जब तक मनुष्य योनि में आयेंगे उन सबका लाभार्जन करना ही मूंगे, गोमेध, नीलम आदि रत्नों के अपनी अंगूठी व अंगुलियों में पहन कर अपात्र को पात्रता दिलाना है। पंडित जी मैं इस पर यकीन नहीं करता। बलीराम भगत व गनौरी बाबू के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने इस ब्लागर को कहा कि आप तो वही कह रहे हैं जो पंडित बसंत वल्लभ कहते थे। भक्ति एक अनोखा मार्ग है। कबीर ने कहा - भगती उपजी द्रविड़ देश। भक्ति मार्ग का उदय द्रविड़ देश तमिलनाडु में हुआ। भक्ति ने अपना परिचय नारद को देते हुए कहा था - 
अहम् भक्तिरिति ख्याता इमौ मे तनयो उभौ ज्ञान वैराग्य नामानो। 
द्रविड़े साहम् समुत्पन्ना वृद्धिम् कर्णाटके गता क्वचिन् क्वचिन् महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता।।
भक्ति ने नारद से कहा - जन्मी तो मैं द्रविड़ देश में पर बचपन बीता कर्णाटक में, महाराष्ट्र में भक्ति पुष्टिमार्गीय हुई और यहीं उसे दो बेटे ज्ञान व वैराग्य भी हुए। गुजरात गयी तो बूढ़ी होगयी। वृद्ध माता बलप्रदा। ज्ञान वैराग्य अपनी बूढ़ी माता भक्ति को गंगा नहाने हरिद्वार ले जाने लगे। रास्ते में मथुरा वृन्दावन था। वृन्दावन में भक्ति पुनः जवान होगयी किन्तु ज्ञान वैराग्य बुढ़ा गये। यह है भक्ति की असल कहानी। चेतन भगत आधुनिक भारत के भक्तों की बात कर रहे हैं। गनौरी बाबू बाबा साहेब अंबेडकर के अनन्य भक्त थे इतने कि बाबा साहेब की मूर्ति अपने गले में लाकेट में पहनते थे। गनौरी बाबू की बाबा साहेब अंबेडकर भक्ति वैसी ही थी जिस तरह मीराबाई योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण गिरिधर गोपाल की भक्ति करती थी। बिहार के गांवों में गनौरी बाबू के साथ घूमने, साथ ही भगवद्गीता व विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ भी करते रहने के बारे में एक बार गनौरी बाबू ने कहा - आप तो ब्राह्मण हो ईश्वर भक्ति करते हो। मैं तो तेली तमोली हूँ मेरे भगवान तो बाबा साहेब अंबेडकर हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के अनन्य भक्त गनौरी बाबू इस ब्लागर की राय में प्रह्लादनुमा नवधा भक्ति तथा नरसी मेहतानुमा दशधा भक्ति के प्रतीक थे। इस ब्लागर को गनौरी बाबू की बाबा साहेब अंबेडकर की भक्ति पर कभी भी जरा सा भी आश्चर्य नहीं हुआ बल्कि भक्ति मार्ग का एक नया रास्ता गनौरी बाबू ने अंबेडकर भक्ति के जरिये प्रदर्शित किया। भक्ति मार्ग को सही सही समझना हो तो अंबरीष, प्रह्लाद, नरसी मेहता, रामकृष्ण परमहंस, पूरन भगत, सूर और तुलसी, कबीर, रैदास, मीराबाई, शबरी भीलनी, आनंदीमाई, यज्ञ पत्नियां गोपियां आत्यंतिकी भक्ति के हजारों उदाहरण हैं। बहुत से ऐसे भी भक्त हैं जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं है पर वे पहुंचे हुए सद्भक्त हैं। 
          चेतन भगत महाशय का उपनाम भी भगत ही है उसी तरह जिस तरह बलीराम भगत का उपनाम भी भगत ही है। बिहार में ग्वालबाल को आमतौर पर गोप कहा जाता है। सहरसा में कहावत है - रोम में पोप और सहरसा में गोप। गोपों में बहुत से लोग अपने कुलनाम में भगत लिखते हैं और कुछ लोग मंडल लिखते हैं। कृष्ण काव्य में अक्रूर नाम के व्यक्ति का उल्लेख है। अक्रूर स्वयं को यादव कहने के बजाय शूद्र कहते थे। मथुरा के राष्ट्रपति कंस के विश्वसनीय आमात्य थे। कंस भी यह जानते थे कि अक्रूर वसुदेव के मित्रमंडली के खास व्यक्ति हैं पर अक्रूर की राजनीति इतनी समर्थ थी कि वे कंस के विश्वासपात्र आमात्यों में गिने जाते थे। देवकी, यशोदा अक्रूर और उद्धव को कृष्ण ने अपना विश्वरूप दिखाया था। कृष्ण के सोलह कलाओं के अवतार होने के अक्रूर प्रत्यक्षदर्शी भी थे। अक्रूर को योगेश्वर वासुदेव कृष्ण का अत्यंत विश्वसनीय भक्त माना जाता था वैसे ही जैसे उद्धव व अर्जुन को। असल भक्त की पहचान ही यही है कि उद्धव को कृष्ण ने कहा था - त्वम् मे भृत्यः सुहृद सखा। तुम मेरे चाकर हो, हितैषी हो, लंगोटिया यार हो ये स्थितियां जहां हों समझिये भक्ति वहां विद्यमान है। ये सभी नंद आभीर के वंशज हैं जिन्हें आजकल अहीर भी कहा जाता है। यह ब्लागर एक बार नौकरी के काम से सिक्किम गया। वहां कृष्ण वल्लभ भगत नाम के व्यक्ति ने अपने घर में गोबर गैस प्लांट लगाया था। उस प्लांट को देखने जाना था। यह गोबर गैस प्लांट पर्याप्त ऊँचाई पर स्थित गांव में था इसलिये इसका खास आकर्षण भी था। इस ब्लागर के सहयोगी बाबू कृष्णानंद सिंह काशी निवासी थे। उन्होंने कहा - कृष्ण वल्लभ भगत हिन्दी में बात नहीं करते। तब उनसे अंग्रेजी में ही बात शुरू हुई। इस ब्लागर से मौन पालन कर्मी देवदासन ने कहा था - कुमांईं को गुसांईं छेत्री को जाल प्रधान को लेखा औरन को काल। देवदासन भी साथ में थे। कृष्ण वल्लभ भगत का घर पूरी तरह कुमांऊँनी ब्राह्मणों के घर सरीखा था। तुलसी स्थान, जांती, ऐपण सब कुछ कुमांऊँ सरीखा ही था। इस ब्लागर ने कृष्ण वल्लभ भगत को पूछा - क्या आपके पूर्वज भवाली के भगत ब्राह्मणों में हैं ? कृष्ण वल्लभ भगत ने कुमांऊँनी भाषा में इस ब्लागर को बताया कि वे कुमइयां में बात कर सकते हैं पर हिन्दी से उन्हें परहेज है। बिहार में भगत उपनाम वाले गोप अहीर हैं। कुमांऊँ में ये लोग अपने को ब्राह्मण कहते हैं। अंग्रेजी लेखक चेतन भगत ने भगत कहने के बजाये भक्ति मार्गी शाखा के भक्त शब्द का उपयोग किया है पर वे जिन्हें भक्त कह रहे हैं वे असली भक्त नहीं अपितु नकली हैं। असली भक्ति तो पूर्णतया समर्पण है, अपने आपको पूर्णतया ईश्वर की शरण में पहुंचाना। महादेव शंकर का एक भक्त लंकेश्वर का राजा भी था जो शिवमहिम्न स्तोत्र गाया करता था। उसने रावण संहिता नामक ज्योतिष ग्रंथ रचा। ठीक वैसे ही जैसे उशना भार्गव की भृगु संहिता है। चेतन भगत महाशय ने भक्तियोग का राजनीतिकरण कर दिया लगता है। वे शायद यह भूल गये जिस हिन्दी भाषा को वे कोस रहे हैं उसे दरिद्रता का आगार बता रहे हैं यदि भारत में हिन्दी व दूसरी तद्भव भारतीय भाषाओं में भक्ति साहित्य का आगमन नहीं होता ईरान अफगानिस्तान हिन्देशिया की तरह भारत से हिन्दू शब्द लुप्त होगया होता। हिन्दी भाषा के भक्ति साहित्य ने भारत में इस्लाम के फैलाव पर कारगर रोक लगायी। यहां तक कि भारत में इस्लाम में एक नयी अवधारणा सूफी मत ने अपने लिये जगह बनायी। इस ब्लागर को अपने हाकिम डाक्टर जी. रामचंद्रन की याद आती है। वे इस ब्लागर को हिन्दी फेनेटिक कहते थे पर जब उन्हें अपनी बात को हिन्दी भाषियों तक पहुंचाना होता तो वे इस ब्लागर को ही कहते - Fanatic, only you can translate me in Hindi. उनका मानना था कि वे हिन्दी भाषा अच्छी तरह जानते और समझते हैं पर हिन्दी भाषा में डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी डाक्टर राममनोहर लोहिया या जयप्रकाश नारायण तथा अटल बिहारी वाजपेयी की तरह धाराप्रवाह हिन्दी भाषण नहीं कर सकते। डाक्टर जी. रामचंद्रन गांधीवाद के प्रखर अंग्रेजी व्याख्याता थे। वे मानते थे कि डाक्टर राममनोहर लोहिया का गांधीवाद का गहरा अध्ययन है। डाक्टर रामचंद्रन हिन्दी भाषी नहीं थे उनकी मातृभाषा मलयाली थी किन्तु वे तमिल भाषा के भी ज्ञाता थे। भक्तिरस को उन्होंने तमिल में ही हृदयंगम किया था। चेतन भगत कहते हैं कि अपशब्द और गालीगलौच को सहना हरेक के बस की बात नहीं है। वे ट्विटर की भी बात करते हैं। भारतीय वाङमय में एक शब्द तित्तिर है। संस्कृत भाषा के तित्तिर शब्द को प्राकृत व तद्भव भाषाओं में तीतर कहा जाता है। तित्तिरजनित तैत्तरीय उपनिषद तीतर की सामर्थ्य का उद्गाता है। हिन्दी में एक कहावत है - तीतर बटेर। अगर हम अंग्रेजी भाषा के ट्विटर शब्द को भारतीय वाङमय के तित्तिर शब्द से जोड़ कर देखें तो समस्या का समाधान खोजा जा सकता है। भारत की तात्कालिक जरूरत इस बात की है कि ट्विटर का भारतीय भाषाओं की लिपियों में प्रयोग कर देखा जाये। गौतम बुद्ध ने अपशब्द व गालीगलौच के बारे में अपने साथी आनंद से कहा - यदि कोई भिखारी तुमसे भीख का पैसा लेने से इन्कार कर दे तब तुम उस पैसे का क्या करोगे ? आनंद ने उत्तर दिया कि जेब में रख लूँगा। बुद्ध ने आनंद को समझाया - गालीगलौच व अपशब्द यदि सुनने वाले ने स्वीकार नहीं किये तो वह गाली देने वाले के पास ही वापस आ जाती है इसलिये चेेतन भगत महाशय को चाहिये कि वे गालीगलौच अपशब्दों से दुःखी न हों। उन्हें टाल दें और उन पर ध्यान ही न दें। यदि चेतन भगत गालीगलौच स्वीकार करना छोड़ देंगे तो उनकी अंग्रेजी भक्ति महात्मा बुद्ध की तरह वेगवान हो जायेगी। वे अंग्रेजी तो नहीं हिंग्लिश के जरिये अपने पाठकों को हंसाने रूलाने के दोनों काम सफलतापूर्वक कर सकते हैं। अगर कहीं हाफ गर्लफ्रेन्ड वाल मामला उनके गले की हड्डी बन गया तो उनके सारे किये कराये पर पानी फिर जायेगा। नरेन्द्र मोदी का अपनी भाषा पर सारस्वत अधिकार है और उनका जीवन खुली पुस्तक है। कांग्रेस के मौजूदा कर्णधारों ने मोदी पर गालीगलौच वाले हमले निरंतर चौदह वर्ष तक किये। मोदी को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा पर आचरणवान व्यक्तित्त्व के धनी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भारत को ही कांग्रेस मुक्त कर डाला। भगत उपनाम होने के बावजूद संभवतः चेतन भगत गहरी भक्तिमार्ग के राही नहीं हैं जब कि नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्त्व में भक्ति कूट कूट कर भरी हुई है। जिन लोगों को चेतन भगत मोदी भक्त कह रहे हैं वस्तुतः तो वे भक्ति विशेषण के अधिकारी ही नहीं हैं। भारतीय वाङमय में एक शब्द शाप है। शाप का विलोमार्थी शब्द वरदान है। दुनियां में चित्रकेतु सौरसेन सार्वभौम राजा की मनःस्थिति वाले भी होते हैं जिनके लिये मान सम्मान अपमान एक सरीखा है। चित्रकेतु वैकुंठ में भगवान विष्णु के पार्षद नियुक्त हुए। वैकुंठ के लिये कुबेर के यान पुष्पक में बैठ कर जारहे थे। बोलने में त्रुटि होगयी तो माता पार्वती नाराज होगयीं। उन्होंने भगवान शंकर से कहा - यह व्यक्ति मेरी व्यक्तिगत जीवन में ताकझांक कर रहा है इसे वैकुंठ नहीं दानव होना चाहिये। चित्रकेतु ने पार्वती के शाप को खुशी खुशी स्वीकार कर लिया। उसकी दृष्टि में शाप और वरदान दोनों एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। चेतन भगत की राय में भारत पर साठ वर्ष राज कर चुकी 130 वर्ष बूढ़ी हो चुकी इंडियन नेशनल कांग्रेस दुबारा कब्जा कर सकने की पात्रताधारक है। चेतन भगत भूल रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के जिन नेताओं की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर गड़ी हुई थी उनमें वयोवृद्ध लालकृष्ण आडवानी के अलावा पंगत में खड़े शिवराज सिंह चौहान, डाक्टर रमन सिंह, सुषमा स्वराज तथा वसुंधरा राजे सिंधिया घिर चुकी हैं। उन्हें आज नहीं तो कल राज्य प्राप्ति होनी ही है। इसलिये मोदी भक्तों की जो बात चेतन भगत उठा रहे हैं वह न तो भक्ति है न ही आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति का हिस्सा। जरूरत इस बात की लगती है कि चेतन भगत हेनरी किसिंजर की ताजा पुस्तक एक बार पढ़ कर कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा अगर मराठी भाषा जानते हों तो ज्ञानेश्वरी पारायण करें। डाक्टर राधाकृष्णन के भगवद्गीता के अंग्रेजी अनुवाद का पारायण करें। भक्तिवेदांत स्वामी के चैतन्य महाप्रभु की कृपा से भगवद्गीता का जो अंग्रेजी रूपातंरण किया है उसे भी पढ़ कर हिन्दुस्तान की राजनीतिक बारहखड़ी कौटिल्यीय अर्थशास्त्र के जरिये पुनर्वाचन करें क्योंकि भारतीय राजनीति में तटस्थ व निर्द्वन्द रह कर जो भूमिका पंडित नेहरू ने निर्वाह की, पिछले एक वर्ष से नरेन्द्र मोदी अहर्निश सेवामहे का जो तप संपन्न कर रहे हैं उसे अपने वाक्चातुर्य से नरेन्द्र मोदी भारत को श्रेय से संपन्न कर सकने की पात्रता रखते हैं। जिन्हें वे मोदी भक्त कह रहे हैं वास्तव में वे लोग भक्ति मार्ग के ज्ञाता ही नहीं हैं, भक्ति का पाखंड आचरण करने वाले ही हैं। वाल्मीकि ने अपने काव्य रामायण में पुरूष स्त्री प्रसंग का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। उन्होंने जो आदर्श महाकाव्य रचा उसमें एक नारी व्रती दाशरथि राम तथा एक पुरूष व्रती सीरध्वज जनक दुहिता सीता के पुरूष स्त्री प्रसंग को उच्च मानवीय आदर्श करार दिया है। अर्जुन से श्रीकृष्ण ने कहा था - भक्तोऽसि मे सखा चेति अर्थात तुम मेरे भक्त भी हो, सखा भी हो इसीलिये मैं तुम्हें वह सुना रहा हूँ जो मैंने पूर्व में मनु व इक्ष्वाकु को सुनाया था। कालगति से वह लुप्त होगया उसी का ब्यौरा मैं तुम्हें अब देरहा हूँ। चेतन भगत महाशय को चाहिये कि भक्ति गाथा पुनराभ्यास कर पाखंड पूर्ण भक्ति मार्ग को तजने का उपक्रम करें।
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