संत विनोबा भी आधुनिक भारत के निर्माताओं में बीसवें पुष्प
मेकर्स आफ माडर्न इंडिया बंगलुरू में रहने वाले रामचन्द्र गुह ने आधुनिक भारत - माडर्न इंडिया के बीस में एक कम एकोनविंशति निर्माताओं की भूमिकाओं का इतिहासमूलक ब्यौरा प्रस्तुत किया है। उन्होंने जयप्रकाश नारायण - सोलहवें भारत निर्माता के बारे में लिखा - He has become inversely attached to the programs of Gandhian Vinoba Bhave who was campaigning rich Land lords to donate to the poor excess land (Bhudan) and where positive entire village (Gramdan) Narayan was inspired to do a Jeevandan namely to offer his own like to the revise of social moment.। महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी को आधुनिक भारत के निर्माताओं की पंगत में सातवें क्रम में रखते हैं, साथ ही उन्होंने अपनी पुस्तक के तेरहवें अध्याय में महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी के पुनर्नवीकृत उद्देश्यों का अहवाल दिया। महात्मा गांधी के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही विनोबा भावे थे जिन्हें महात्मा ने अपना पहला सत्याग्रही घोषित किया। जवाहरलाल दूसरे सत्याग्रही थे। महात्मा गांधी की पहली गुजराती भाषायी रचना हिन्द स्वराज है। हिन्द स्वराज वस्तुतः एक अद्वितीय संवाद है। महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी ने दो शब्दों का उपयोग किया है जिसका हिन्दी अनुवाद करते समय अमृतलाल नानावटी ने संपादक और पाठक कहा पर महात्मा गांधी के शब्द अधिपति को संपादक कहना तथा वाचक को पाठक कहना घोर भाषायी अनर्थ है। अधिपति गुजराती व संस्कृत भाषा में अधिष्ठाता का प्रतीक है। अधिपति वह है जो सर्वज्ञ है सुगत है तथा प्रबुद्ध है। अधिपति को नानावटी ने संपादक कहा तो रामचंद्र गुह उसे एडीटर कह रहे हैं व वाचक को रीडर कह रहे हैं। रामचंद्र गुह इतिहासकार हैं उन्हें अपना मत व्यक्त करने का पूरा अधिकार है पर आधुनिक भारत के निर्माताओं में संत विनोबा भावे के साथ उन्होंने पंक्तिभेद किया है। पहली महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि हिन्द स्वराज को भारतवासी समझ ही नहीं पाये हैं। गोपाल कृष्ण गोखले ने हिन्द स्वराज के बारे में राय व्यक्त करते हुए कहा था - यह पुस्तक मूर्ख रचना है। मोहनदास करमचंद गांधी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरू मानते थे। मोहनदास करमचंद गांधी ने गोखले जी की राय को मजाक में नहीं उड़ाया। यूरप के हजारों विचारक हिन्द स्वराज की प्रशंसा कर रहे थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू और संत विनोबा भावे ने हिन्द स्वराज की कोई आलोचना प्रत्यालोचना नहीं की पर गांधी विचार के गुजराती, हिन्दी, मराठी व्याख्याता काका साहेब कालेलकर ने व्यक्त किया कि नेहरू और विनोबा जी हिन्द स्वराज में व्यक्त विचारों के समर्थक नहीं हैं। आदि शंकर ने भारत में वेदांत के मुख्य तत्त्व अद्वैत की प्रतिष्ठापना की। अद्वैत पर उन्होंने मीमांसा पूर्ण टीेका लिखी। अद्वैत के समानांतर द्वैताद्वैत विशिष्टाद्वैत भी प्रतिपादित हुए पर आसेतु हिमाचल आदि शंकर का अद्वैत ही यत्र तत्र जाग्रत रहा। रामानुज का द्वैताद्वैत व माध्वाचार्य का विशिष्टाद्वैत केवल तमिलनाडु कर्णाटक तक ही सीमित रहे। आदि शंकर के अद्वैत पंथ स्वामी विवेकानंद और भक्तिवेदांत स्वामी ने अमरीकी अंग्रेजी के माध्यम से विश्व के कोने कोने तक फैलाया। विनोबा भावे महात्मा गांधी के आध्यात्मिक स्वराज के, महात्मा गांधी के जो एकादश व्रत हैं, सत्य अहिंसा अस्तेय अभय अपरिग्रह अस्वाद शरीरश्रम अस्पृश्यता निवारण सर्व धर्म समभाव स्वदेशी और ब्रह्मचर्य इन ग्यारह व्रतों का पूर्णतः पालन करने वाला अकेला व्यक्तित्त्व संत विनोबा भावे का था। पहले सत्याग्रही होने संसार के सभी धर्मों के मर्म को समझने वाले व्यक्तित्त्व के रूप में विनोबा को गांधी के विचार श्रंखला का महत्त्वपूर्ण व्याख्याता कहा जा सकता है। रामचंद्र गुह कहते हैं विनोबा गांधियन थे। उनके भूदान ग्रामदान से प्रभावित हुए जयप्रकाश नारायण ने जीवनदान का संकल्प लिया। गांधी निधन के पश्चात विनोबा ने गांधी मार्ग का जो विश्लेषण किया गांव गांव घूम कर गरीब अमीर के बीच की खाई को पाटने का जो श्रम किया उसे प्रतिष्ठित इतिहासकार ने भारत निर्माताओं की पंगत में विनोबा को न जोड़ कर कहीं कोई भूल तो नहीं की। महाराष्ट्र, भारतीय भक्ति साहित्य भक्ति पंरपरा का वह बिन्दु है जिसे भारतीय सभ्यता पंचम द्रविड़ भी कहती है। भारतीय भक्ति पथ द्रविड़ भूमि से उत्पन्न हुआ व बचपन कर्णाटक में बीता। जब पुष्टि मार्ग के जरिये महाराष्ट्र पहुंची उसे दो बेटे भी होगये जिन्हें ज्ञान व वैराग्य नाम से जाना जाता है। पुष्टि मार्गी भक्ति ही भक्ति का चरम शिखर है। भक्ति वहीं फलती फूलती है जब मां और जुड़वां बेटे तरूणाई पर हों। भक्ति ज्ञान वैराग्य जब तीनों तरूणाई पर होते हैं तभी भक्ति का यथातथ्य रूप उत्पन्न होता है। महाराष्ट्र में एक से एक ऊँचे भक्त हुए हैं। पवनार धाम के लोग मानते थे कि विनोबा भावे ज्ञानेश्वर के अवतार हैं। कृष्णार्जुन संवाद भगवद्गीता कहलाता है। महाराष्ट्र के लोग संत ज्ञानेश्वर रचित ज्ञानेश्वरी का पाठ करते हैं। ज्ञानेश्वरी पाठ से प्रतीति होती है कि ज्ञानेश्वर ने भगवद्गीता का पुनीत संवाद भक्ति भणिति में उद्गान कर वह अलौकिक कृत्य किया जैसा गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा को स्वांतः सुखाय भाषा निबंधित किया। रामचरित मानस और ज्ञानेश्वरी भक्तिमार्ग की लोकभाषाओं में अजस्र धारा हैं। संत विनोबा ने भगवद्गीता-ज्ञानेश्वरी को सदा सर्वदा माता का स्थान दिया। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर के पश्चात मातृभाषा मराठी में गीताई का उद्गान आज के युग संदर्भ में किया। महात्मा गांधी के सर्वधर्म समभाव को विनोबा भावे ने नयी ऊँचाई दी। वे जब कुरआन शरीफ का पाठ करते वह पूर्णतया उतना ही शुद्ध होता जितना उनका वैदिक ऋचाओं का सस्वर पाठ। गांधी परम वैष्णव थे। वैष्णव मतावलंबियों की आकर्षक शक्ति भागवत महापुराण में है। भागवत के एकादश स्कंध के तीसरे अध्याय का छब्बीसवां श्लोक पूर्वार्ध को संत विनोबा ने सर्वधर्म समभाव का महत्त्वपूर्ण बिन्दु कहा है ‘श्रद्धा भागवते शास्त्रेऽनिन्दां अन्यत्र क्वापि हि’। वैष्णव जन कहता है - मेरी श्रद्धा भागवत धर्म में है साथ संसार के दूसरे धर्मशास्त्रों के लिये अनिंदा भाव है। याने संसार के तमाम धर्म ग्रंथों का मैं समादर करता हूँ। गांधी का अध्यात्म तथा गांधी की आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के दो धुर हैं - अध्यात्म धुर का शीर्षपुंज संत विनोबा भावे तथा गांधी राजनीतिक प्रकाशपुंज पंडित नेहरू हैं इसलिये गांधी के प्रकाशपुंज हैं। इतिहासकार रामचंद्र गुह ने गुजराती भाषी शिया मुसलमान मोहम्मद अली जिन्ना और गुजराती भाषी वैष्णव मोहनदास करमचंद गांधी दोनों वणिक समुदाय से आते थे दोनों बैरिस्टर थे मोहम्मद अली जिन्ना को मुंबई के नामचीन वकीलों में गिना जाता था वे अपना स्थान सफल वकीलों की पंगत में थे जबकि महात्मा गांधी वकालत के व्यवसाय को असत्य का हेतु मानते थे। मोहम्मद अली जिन्ना इम्पीरियल काऊंसिल के सदस्य भी थे।
इतिहास विशेषज्ञ रामचंद्र गुह मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक भारत निर्माता का समुच्चय में गिनते हैं। उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना और उनसे पूर्व सर सैयद अहमद खां को राममोहन राय के पश्चात द्वितीय आधुनिक भारत निर्माता का श्रेय दिया है। सर सैयद अहमद खां ने हिन्दुस्तानी मुसलमानों के लिये आधुनिक शिक्षा के फाटक के रूप में अलीगढ़़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का सूत्रपात किया। मोहम्मद अली जिन्ना की पक्की धारणा बन गयी कि हिन्दू मुस्लिम एक राष्ट्र नहीं दो अलग अलग कौमें हैं। मोहम्मद अली जिन्ना का मत था कि हिन्दुस्तान का मुसलमान वामन बनिया राज में नहीं रह सकता। वामन बनिया राज से उनका तात्पर्य मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू के कांग्रेस नेतृत्त्व से था। अगर तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्त्व मोहनदास करमचंद गांधी व जवाहरलाल नेहरू (वामन बनिया) के हाथों न होकर अगर किसी वामन बनिये के अलावा किसी अन्य भारतीय कांग्रेस नेता के हाथ कांग्रेस की बागडोर होती तो क्या मोहम्मद अली जिन्ना का हृदय परिवर्तन होता ? सरदार पटेल गैर ब्राह्मण गैर बनिया कांग्रेस नेता थे। विपिन चंद्र पाल दूसरे गैर ब्राह्मण गैर बनिया नेता थे। यदि उनके हाथों कांग्रेस की बागडोर होती क्या भारत विभाजन रूक सकता था ? क्या मोहम्मद अली जिन्ना किसी ऐसे प्रस्ताव पर सहमत होते ? इस्लाम ने अरब से मध्य एशिया के सभी धर्मों को इस्लाम अनुयायी बना लिया। पारसीक धर्मावलंबी थोड़ी संख्या के बावजूद स्वतंत्रतापूर्वक रह रहे हैं। धर्म तो पारसीक है पर वे भारत को अपनी भूमि मानते हैं। ईरान के इस्लाम धर्मावलंबी शिया हैं। भारत में शिया मुसलमान अवध में ज्यादा हैं। मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं शिया थे लखनऊ के शिया मुसलमानों ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया। यह मानने में संदेह नहीं होना चाहिये कि उ.प्र. के शिया मुसलमान व मुंबई के मुसलमान पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत को पोषित करने वाले ऐसे समर्थक समूह थे जिनमें से सुशिक्षित और संपन्न मुसलमान समूह नये इस्लामी राष्ट्र के खेवनहार बने। उन्हें राजनीतिक तथा नौकरशाही तबकों में ऊँचा स्थान जरूर मिला पर उर्दू भाषी उ.प्र. और दिल्ली के मुस्लिम भारत में रह गये नव निर्मित इस्लामी राष्ट्र में नहीं जा पाये। उनकी सहानुभूति की बुनियाद पर पश्चिमी व पूर्वी पाकिस्तान दो हिन्दुस्तानी इस्लाम छवियों के इलाके बन तो गये पर मजहब से भाषा वाणी ने अपना बल दिखाया। सुहरावर्दी उर्दू भाषी बंगाली नेता थे पर शेष बंगाली मुसलमान उर्दू को अपनी मातृभाषा मानने को तैयार नहीं था। उर्दू वास्तव में पूर्वी या पश्चिमी पाकिस्तान के किसी भी जनपद या प्रांत की भाषा नहीं थी। बंगाली मुसलमान बांग्ला में बोलता था, सिन्धी बोलता तो सिन्धी में था व लिखता अरबी लिपि में। पंजाब का मुसलमान बोलता तो पंजाबी में था लेकिन खतो खिताबत व अखबार उर्दू के पढ़ता था। बलूचिस्तान के लोग पश्तो बोलते थे पर पश्चिमी पाक की संविधान की सम्मत राजकाज की भाषा उर्दू तय हुई जब कि उर्दू किसी भी सिन्धी पंजाबी मुल्तानी बलूच अथवा बंगाल के मुसलमानों की मादरे जबान नहीं थी। उर्दू भाषा को उ.प्र. दिल्ली व बिहार के शहरी मुसलमान अपनी मादरे जबान कहते। महात्मा गांधी जब 1918 में चंपारण के बलिया व मोतिहारी इलाकों में घूम रहे थे वहां नील की खेती से जो कुप्रभाव पड़ रहा था उसका जायजा लेते समय महात्मा गांधी ने अनुभव किया कि चंपारण के हिंदू व मुसलमान दोनों समूह वज्जिका उपभाषा बोलते हैं। उ.प्र. में भी देहातों में रहने वाला मुसलमान अपने गांव के हिन्दुओं की तरह पूरब में भोजपुरी व अवध में अवधी ब्रज भूमि में ब्रजभाषा तथा हिन्दी में खड़ी बोली व रेखता के इलाकों में रेखता व खड़ी बोली का प्रयोग करता था। अवध का मुसलमान अवध के गांवों में अवधी बोलता है इसका सबसे बड़ा प्रमाण मलिक मोहम्मद जायसी का काव्य पद्मावत है।पद्मावत की भाषा अवधी व कवि ने फारसी लिपि का प्रयोग किया। पद्मावत अवधी का महत्त्वपूर्ण महाकाव्य है जिसका कवि मलिक मोहम्मद जायसी का कहना है कि ‘जायस नगर (जिला रायबरेली) धरम अस्थानू जहां जाय कवि कीन्ह बखानू’। इसलिये भारतीय उपमहाद्वीप जिसमें राजनीतिक रूप से इंडिया दैट इज भारत पाकिस्तान बांग्ला देश नेपाल भूटान भारत का निकटस्थ पड़ौसी श्रीलंका मालदीव यहां तक कि वर्तमान म्यांमार ब्रह्मदेश जिसे अंग्रेजी में वर्मा कहा जाता रहा है यह समूचा वृहत्तर भारत जिसे संयुक्त राष्ट्र अमरीका व ग्रेट ब्रिटेन सहित यूरप के देश दक्षिण एशिया के नाम से पुकारते हैं विकासमान देशों में ऐतिहासिक नजरिये से महत्त्वपूर्ण इलाके हैं। इन देशों का सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकार सुर व असुर संस्कृति का साझा सांस्कृतिक महत्त्व है। वर्तमान ईरान का पुराना नाम पारसीक व आर्यन है। वर्तमान अफगानिस्तान को भारतीय वाङमय उपगंधर्व स्थान मानता है। बांगला देश के अस्तित्त्व में आने के पश्चात पाकिस्तान के शासकों को भय सता रहा है कि कहीं बलूच उनसे अलग न हो जायें। सिन्ध का सिन्धी मराठी मुसलमान भी पंजाबी मुसलमान अथवा उर्दू भाषी मुस्लिम की अगुआई का पक्षधर नहीं लगता।पाकिस्तान संरचना के पच्चीस वर्ष में पूर्वी पाकिस्तान बांग्ला देश बन गया। 1942 से पहले जो हिन्दुस्तानी इलाका सिन्ध पश्चिमी पंजाब मुल्तान बलूचिस्तान सिंध सीमाप्रांत का इलाका मुस्लिम बहुल पश्चिमी पंजाब का वह इलाका जो भारत विभाजन से पूर्व पंजाब प्रांत कहलाता था जिसमें वर्तमान हरयाणा भारतीय संघ का पूर्वी पंजाब तथा वर्तमान हिमाचल प्रदेश का दक्षिणी भाग पाकिस्तान का पंजाब प्रांत सीमाप्रांत नार्थ वेस्ट फ्रंटियर तथा बलूचों का इलाका बलूचिस्तान इन सभी इलाकों पर स्थानीय भाषाओं के स्थान पर उ.प्र. में जन्मी फली फूली उर्दू भाषा को विभाजन के बाद पाकिस्तान पर थोप दिया गया। चौथाई शताब्दी पूरी होते होते बांग्ला भाषी बंगाली मुसलमान जाग गये उन्हें स्वभाषा बांग्ला की ममता ने पाकिस्तान से जुदा कर डाला। पूर्वी पाक के नाम से जाना जाने वाला बंगाली मुस्लिम बहुल इलाका पश्चिमी पाकिस्तान से दूरी पर था उसकी हानि पाकिस्तान को उतनी मंहगी नहीं पड़ी जितनी सिन्धी भाषी पश्तो भाषी सिन्धी व बलूच लोगों को भाषायी पहचान तथा इलाकाई सांस्कृतिक पहचान मजहब से ऊपर उठ कर क्षेत्रीयता पर अपना अस्तित्त्व टिकाऊ बनाना चाहेंगी इसलिये गुजराती भाषी मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल तथा मेरठ निवासी लियाकत अली खान प्रथम प्रधानमंत्री दोनों पाकिस्तान की धरती के लाड़ले नहीं थे। नये मुस्लिम राष्ट्र की लगाम इन दो व्यक्तियों पर निर्भर करती थी। यद्यपि कराची में उर्दू भाषा मुसलमानों की संख्या अच्छी है पर कराची का उर्दू भाषी मुसलमान पाकिस्तान के अन्दर उर्दू प्रदेश उर्दू स्थान निर्माण का आकांक्षी है परन्तु सिंध के बहुसंख्यक सिंधी भाषी मुसलमानों के साथ उर्दू भाषी गंगा जमना के दो आब से पाकिस्तान की धरती को मादरे वतन बना कर पाकिस्तान पहुंचा मुसलमान आज भी स्वयं को असुरक्षित तथा सिंध व पंजाब के मुसलमानों के मुकाबले अपने आपको शरणार्थी रूप से ऊपर नहीं उठा पाया है। इतिहासकार रामचंद्र गुह गुजराती भाषी शिया मुसलमान कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को आधुनिक भारत के निर्माताओं में मानते हैं। भारत सरकार ने भी आधुनिक भारत के निर्माताओं की श्रंखला स्थापित की किन्तु पचास महत्त्वपूर्ण व्यक्ति में कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना को नहीं जोड़ा। रामचंद्र गुह की एक बात में तो कुछ महत्वशीलता है कि भारतीय वाङमय व भारतीय समाज के विभिन्न संप्रदाय ईश्वर से वैरभाव को भी वैरभक्ति मानते हैं। हिरण्यकश्यप वेन और रावण को संस्कृत वाङमय वैरभक्ति मानता है। राष्ट्रपाल कंस भी कृष्ण वैरभक्ति कारक थे जबकि ख्रिस्ती व इस्लाम धर्म में ईशनिन्दा घोर मजहबी अपराध है। अगर मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की रट न लगायी होती व ब्रिटेन ने उन्हें हौसला न दिया होता तो भारत आजाद तो होता पर भारत ने जो प्रगति पिछले अड़सठ साल में की है उसका रूप दूसरा ही होता। जिसे लोग आज हिन्दी बेल्ट कहते हैं वह उर्दू बेल्ट होता। हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य को निस्तेज करना महात्मा गांधी का छुआछूत निवारण के पश्चात दूसरा महत्त्वपूर्ण जीवन उद्देश्य था। महात्मा गांधी स्वयं प्रखर वैष्णव थे उनकी सोच थी कि चूंकि हिन्द में मुसलमानों से चौगुना हिन्दू है इसलिये हिन्दू मुस्लिम एकता में हिन्दू समाज को प्रमुख भूमिका निर्वाह करना आवश्यक है। रामचंद्र गुह की तरह अनेक इतिहासकार तथा राजनीतिक चिंतन पोखर के पारखी लेखक व कवि लोग आज के भारतीय सामाजिक वातावरण को असहिष्णुता ग्रस्त मान रहे हैं। इसलिये सबका विकास सबका साथ सिद्धांत मानने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रीय उत्तरदायित्त्व बन गया है उन्हें ख्रिस्ती व इस्लाम धर्मावलंबियों को यह आश्वासन देना जरूरी है कि शुद्धि आंदोलन अथवा मुसलमान वक्ताओं का सामूहिक धर्म परिवर्तन या घर वापसी देश के बहुसंख्यक समाज के मजहब के धर्मशास्त्र अनुकूल नहीं है।
पिछले साढ़े छः दशकों से भारतीय शासन व्यवस्था 26 जनवरी 1950 को लागू भारतीय संविधान के अनुकूल है। देश में वामपंथी कम्यूनिस्ट विचार पोषक राजनीति तथा दक्षिण पंथी राष्ट्रीय स्वयं सेेवक संघ पोषित भारतीय जनसंघ तथा कालांतर में भारतीय जनता पार्टी में संवर्ग आधारित चिंतन है जब कि मध्यवर्ती राजनीतिक दल या तो घोर अतिवादी अखाड़े वाले संगठन हैं अथावा पारिवारिक राजनीति के पुरोधा हैं। इसलिये जब रामचंद्र गुह महाशय बताते हैं कि कायदे आजम जिन्ना को आधुनिक भारत का निर्माता मानते हैं भारत की आज जो प्रगति है जो रास्ता देश अपना रहा है यदि 1947 में भारत विभाजन न होकर अखंड भारत ही रहता तब देश को जो संविधान आज मिला है वह अलविदा भी हो सकता था। जिन जिन रियासतों के शासक मुसलमान थे उन्हें अपना मार्ग चुनने का रास्ता मिलता। महात्मा गांधी जो कायदे आजम जिन्ना की तरह गुजराती भाषी थे पर गांधी चिंतन गांधी का रहन सहन कायदे आजम जिन्ना की मानसिकता से सर्वथा भिन्न था। डा. जाकिर हुसैन, मौलाना अबुल कलाम आजाद, रफी अहमद किदवई, सीमांत गांधी अब्दुल गफ्फार खां उनके सहोदर भ्राता डा. खान महात्मा गांधी से प्रभावित थे। कायदे आजम जिन्ना के चिंतन ने भारत अथवा भारतीय संविधान में प्रयुक्त ‘इंडिया दैट इज’ भारत को परोक्ष रूप से दुश्मनी के जरिये आधुनिक भारत के निर्माता की भूमिका का निर्वाह किया। इसलिये इस ब्लागर को रामचंद्र गुह द्वारा आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में स्थापित किये जाने के लक्ष्यभेद को संविधान मानना उचित नहीं पर सवाल यह उठता है कि रामचंद्र गुह सरीखे इतिहासकार ने महात्मा के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही आचार्य विनोबा के गांधी विचार पोषण को महत्वपूर्ण अंश गांधी के अध्यात्म वादी उत्तराधिकार पात्रता पर विचार न करना अत्यंत कष्ट देने वाली उपेक्षा है।
इतिवेत्ता से विनम्र प्रार्थना
रामचंद्र गुह यह तो मानते हैं कि महात्मा गांधी उनके मुखर राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वी गुजराती भाषी शिया मुसलमान लब्धप्रतिष्ठ वकील कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना आधुनिक भारत के निर्माताओं में हैं डाक्टर भीमराव रामराव अंबेडकर भी पीढ़ियों के अंतराल के बावजूद महात्मा गांधी के विचार पोखर के समानांतर एक दलित विचार पोखर के सूत्रधार रहे हैं वे भी आधुनिक भारत के निर्माताओं में गिने गये हैं। संत विनोबा भावे आध्यात्मिक स्वराज तथा भूदान ग्रामदान व जीवनदान से प्रभावित बाबू जयप्रकाश नारायण तथा चौखंभा राज के विचारक डाक्टर राममनोहर लोहिया को रामचंद्र गुह भारत निर्माताओं की श्रेणी में रखते हैं। पंडित नेहरू महात्मा गांधी के राजनीतिक विचार पोषक उत्तराधिकारी थे। वे भी उन्नीस भारत निर्माताओं की पंगत में खडे़ हैं पर महात्मा गांधी की आध्यात्मिक स्वराज गांधी आर्थिकी की आध्यात्मिक व्याख्या करने वाले संत विनोबा जो 1947 के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही थे जिन्होंने भारत की भूमि व्यवस्था को सुधार कर एक अद्वितीय तरीका भूमिदान निकाला ऐसे चिंतक को जिसके बिना गांधी चिंतन अधूरा है उन्हें भी आधुनिक भारत निर्माता पंक्ति में खड़ा करना चाहिये था। इतिहासकार को जब कभी अपनी पुस्तक Makers of Modern India में कोई संशोधन, परिवर्तन, परिवर्धन करने की गुंजाइश लगे वे विनोबा का भारत निर्माण सिद्धांत अवश्य खंगालें तथा विनोबा अध्यात्म - आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति पर सहृदयतापूर्वक सोचें। विनोबा ही एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने कहा - श्रद्धा भागवते शास्त्रे अन्यत्र अनिंदा क्वापि हि। उन्हें भागवत शास्त्र में श्रद्धा है साथ विश्व की जो अन्य समस्यायें हैं उनके लिये श्रद्धा भक्ति है।
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