प्रभाते बद्रिकाश्चैव मध्यान्हे मणिकर्णिका
भोजने तु जगन्नाथ शयने कृष्ण द्वारका
भोजने तु जगन्नाथ शयने कृष्ण द्वारका
संदेश पहुंचाने के विशेषज्ञ किस्म के संस्करण संदेशिता ऊर्ध्व शक्ति का भी सृजन हुआ है। ‘व्हट्स अप’ को अगर हम हिन्दुस्तानी तौर तरीकों से ‘वत्स अपसरण’ मान कर चलें तो दो व्यक्तियों की बातचीत में अनौपचारिकता के साथ साथ परूष वाक्य भी यदा कदा संदेश देने के मामले में बोलने की जल्दबाजी तथा मनन न कर बात करने से जो व्यावहारिक दोष उपजता है उससे नयी नयी वीभत्सताओं को जन्म मिलता है। संदेश देने संदेश का माध्यम बनने में जल्दबाजी तथा संदेश भेजने वाले के पास फुर्सत न होने की दशा में संदेश नयी समस्यायें भी उत्पन्न करता है। सांख्याचार्य कपिल ने इसे ज्ञान यज्ञ कहा है। ज्ञान प्राप्त करना, विषयवस्तु की पूरी पूरी व सही सही स्थिति मालूम करने पर ही व्यक्ति छिन्न संशय होता है। विज्ञापन, संदेश, उपदेश व ज्ञान शलाका का उत्कर्ष ही जिज्ञासु को ज्ञान पथ दिखाता है। जब संदेश भेजने व संदेश प्राप्त करने में समयाभाव के कारण संदेश दाता और संदेश प्राप्तकर्त्ता संदेशित विषय पर मनन चिंतन नहीं करते हैं। संशय ग्रस्तता के कारण संशयात्मा विनस्यति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इसलिये संदेश भेजने वाले व्यक्ति व संदेश प्राप्त करने वाले व्यक्ति में कर्तव्य बोध नितांत आवश्यक प्रक्रिया है। इसलिये इकानामिस्ट ने इंटरनेट वार्ता का जो प्रसंग उठाया है फेसबुक अथवा ट्विटर ने जो संदेश दिया है उसकी प्रतिक्रिया संदेश प्राप्तकर्त्ता के दिमाग में किस तरह हुई संदेश भेजने वाले का मंतव्य क्या था ? उसे योक्ता ने किस संदर्भ किस माध्यम से किस प्रकार लिया यही इंटरनेट वार्ता का मूल है। यदि वार्ताकार आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम न समाचरेत का आचरण करेगा तो संदेशदाता व प्राप्तकर्त्ता में मानवीय सद्भाव बना रहेगा। इंटरनेट वार्ता में छोटी सी चूक दोनों के बीच व्यावहारिकता व वास्तविकता के बजाय संशयग्रस्तता की विषबेल बढ़ा देगी जो सन्मार्ग के बजाय कुमार्ग का ही अनुसरण है।
इंटरनेट में अंग्रेजी के अलावा स्पेनी, पुर्तगाली, जर्मन, रूसी, फ्रेंच इन सात भाषाओं की लिपि रोमन है पर दुनिया के बहुत ज्यादा लोगों की मातृभाषा मंदारिन, अरब की भाषा अरबी तथा मलय भाषा ये सब मिल कर दुनियां की दस भाषायें इंटरनेट पर जागरूक हैं। हिन्दुस्तान की तीन भाषायें - हिन्दी बांग्ला व पंजाबी दुनियां के एकाधिक देशों की भाषायें हैं जिनकी ललक है कि उन्हें भी इंटरनेट संदेश भाषा का दर्जा मिले परन्तु अभी तक हिन्दुस्तान के कम्प्यूटर से जुड़े लोग रोमन लिपि व अंग्रेजी भाषा के जरिये इंटरनेट में अपनी हाजिरी दिखा रहे हैं। इकानामिस्ट साप्ताहिकी ने शशिमणि देवि का विधवाख्यान जिसे अंग्रेजी में ओबिट्युरी कहते हैं विवाह स्वर्ग में रचे जाते हैं इस शीर्षक से भगवान जगन्नाथ प्रणयिनी शशिमाई का जागतिक जातक मृतक वृत्तांत लिखा। शशिमणि तीन वर्ष की छोटी उम्र में ही देवदासी द्वारा संवर्धित हुई। वाराह पुराण में जातहारिणी वृत्तांत आता है। जातहारिणी वह स्त्री है जो सूतिका गृह में नवजात बच्चे चुरा ले जाती है। नवजात बच्चे को किसी मां की गोद में रख आये बच्चे को उड़ा ले जाती है। जातहारिणी का नवजात बच्चे का हरण एक सामान्य क्रिया है। जातहारिणी के लिये एक प्रसूता स्त्री के बच्चे को शिशुजननी और प्रसूता परिवार की अन्य स्त्रियों को चकमा देकर उसकी गोद में अपहृत शिशु रख उसके शिशु को उठा लेजाना जातहारिणी का स्वाभाविक कर्म है। वाराह पुराण में ही ऐसे शिशु से किशोर हुए एक बालक ने प्रश्न किया कि किस जननी का नमन करूँ जिसने जन्म दिया या जिसने धात्री के रूप में पोषण किया उसका ? यह अनोखा अवसर था। बात खुल गयी जिसे लोग आज प्राइवेसी कहते हैं वह लुप्त होगयी। विवाहो उद्वाहश्च यह कोशकार अमर सिंह का कहना है। शशिमणि का जगन्नाथपुरी में (जहां कृष्ण सुभद्रा और बलराम त्रिमूर्ति हैं दो भाई एक बहन) जगन्नाथ का जन्म कंस थार मथुरा में कारागार में हुआ। जननी देवकी थी पर पालनपोषण यशोदा ने किया। कृष्ण ने जननी और माता (पालन पोषण करने वाली स्त्री) यशोदा को समान सम्मान दिया। यशोदा का विश्वरूप का दर्शन भी कराया। बालकृष्ण भक्ति की सूत्रधारिका यशोदा ही तो है वह गोपमाता है ब्रजेश्वरी जननी है। भक्तिकालीन भक्त कवियित्री मीरा गिरिधर गोपाल को पति रूप में भजती थी। संत सभा में मीरा ने कहा - पुरूष तो केवल गिरिधर गोपाल ही है बाकी सब तो स्त्रियां हैं। आज विश्व में समलिंगी विवाहों पर बहस छिड़ी हुई है। भक्त मीरा तो सैकड़ों वर्ष पहले भक्तिमार्ग के साधु संतों को सीख दे गयी कि कृष्ण ही पुरूष हैं बाकी सब तो गोपियों की तरह कृष्णानुरक्त हैं। शशिमणि अपने जीवन के 89 वर्ष कृष्णानुरक्त रही। जगन्नाथपुरी में कृष्णवधू के रूप में जीवन बिताया। नारद के कहने पर पंगु मुनि पराशर मत्स्यगंधा सत्यवती कुमार कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने स्वांतः सुखाय कृष्णलीला का भागवत महापुराण तैयार किया। बेटे शुकदेव को पढ़ाया। वेदव्यास कहते थे - अहम् बोधि शुकोवेत्ति संजयो वेत्ति मानवाः। व्यास शुकदेव तो जानते ही थे संजय भी ज्ञाता थे। गीता के परम संवाद के दो ही ज्ञाता हैं - अर्जुन और संजय। संजय की ज्ञान गरिमा थी वे जो सुन रहे थे धृतराष्ट्र को सुना रहे थे पर धृतराष्ट्र पुत्र मोहांध थे। वे गीता के संदेश को समझ ही नहीं पाये।
आज जो संदेश आदान प्रदान फेसबुक व ट्विटर के जरिये इंटरनेट पर होरहा है उसे महाभारतकालीन संवाद शैली के संदेश से जोड़ कर मनन कीजिये। हिन्दुस्तान के कृष्णानुरक्त समूह भक्तिवेदांत स्वामी की तरह यह मान्यता रखता है कि कृष्ण ही परम शक्ति हैं। उनकी अद्भुत सत्ता बदरिकाश्रम के तप्तकुंड स्नान तथा अलकनंदा के हिम शीतल जल स्नान के पश्चात मध्याह्न में काशी के मणिकर्णिका का गंगा स्नान जन्म मृत्यु के बंधन को नजदीक से देखना मध्याह्न स्नान के पश्चात अपराह्न भोजन जगन्नाथपुरी में करना व रात्रि शयन हेतु द्वारका पहुंचना यह कृष्ण जीवन दर्शन का श्रेष्ठतम आदर्श है। संदेश और माध्यम में जो धुंधली संशय रेखा है उसे दूर करने के लिये भगवद्गीता का सहारा जरूरी है।
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