गांधी की खादी
राष्ट्रसंघ व विदेशी दूतावासों तक भी ले जायें।
परंपरागत खादी वालों को प्रधानमंत्री नया मंत्र दें।
यह ब्लागर पंद्रह अगस्त 1947 से नियमित रूप से लगातार आदतन खादी पहनने वाला व्यक्ति रहा है। प्रधानमंत्री जी ने देश के लोगों का ध्यान खादी की तरफ मोड़ कर महात्मा गांधी की एक सौ छियालीसवीं जयंती के अवसर पर खादी खरीदने की ओर खींचा है। इस ब्लागर के निजी कम्प्यूटर पर भी संदेश मिला। आज हिन्दुस्तान में गांधी आर्थिकी वाली खादी तथा एम.एस.एम.ई. मंत्रालय की खादी मार्क खादी - दो पड़ाव हैं। खादी के पहले पड़ाव का नेतृत्व संत विनोबा के विचार खादी मिशन को गति देने वाले व्यक्ति श्री बाल विजय हैं जो खादी मिशन के संयोजक हैं, खादी आर्थिक के गांधी पथ के अनुयायी हैं। दूसरी ओर एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री उत्तर प्रदेश से लोकसभा सदस्य श्र कलराज मिश्र हैं। श्री मिश्र पूर्वी उत्तर प्रदेश के चर्खा कातने वाली महिला श्रम शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें एम.एस.एम.ई. मंत्रालय का मेक इन इंडिया को सूत्रधार कर्तृत्व शक्ति का संबल मिला है पर खादी हाथ कते सूत हथकरघे पर बुने पारंपरिक खादी के बजाय एम.एस.एम.ई. एक्ट 2006 वाली खादी मार्क वाली फैशनपरस्त खादी को गांधी आर्थिकी की खादी को पछाड़ कर खादी मार्क वाली नयी खादी को बढ़ावा देना है। उनका कहना है खादी ग्रामोद्योग भवन रीगल बिल्डिंग कनाट प्लेस नयी दिल्ली की खादी बिक्री कई गुना बढ़ गयी है किन्तु विश्लेषकों का कहना है कि खादी भंडारों में अब पावरलूम बुना कपड़ा बिक रहा है। गांधी आर्थिकी खादी का सूत उत्पादन, खादी उत्पादन साल दर साल घटता जारहा है। पिछले छियासी वर्षों से चर्खा कताई, करघा बुनाई से खादी मुहैया करने वाली हिन्दुस्तान की एक लंबी उम्र वाली संस्था श्री गांधी आश्रम मेरठ व उसके 40 विकेन्द्रित इलाके खादी उत्पादन एक महीने से करते आरहे थे। उन्हें अब कपास, स्लाइबर खरीदने के लिये पूंजी को तरसना पड़ रहा है। कत्तिन, बुनकरों का पारिश्रमिक देने के लिये पूंजी न होने से उत्पादन लगभग शून्य के निकट पहुंच गया है पर खादी ग्रामोद्योग भवन की बिक्री 180 प्रतिशत बढ़ गयी बताई जारही है। प्रधानमंत्री जी ने पिछले साल भी खादी खरीदने का परामर्श दिया था। प्रधानमंत्री जी की डिजिटल इंडिया निर्माण आकांक्षा को भगवान मदद करे। हिन्दुस्तान के हर नौजवान व नवयुवती के हाथ में लैपटाप हो जिससे वह दुनिया को अपनी मादरे जबान या मातृभाषा में अनुभव कर सके। एक अरब सत्ताईस करोड़ हिन्दुस्तानियों में लगभग बारह करोड़ लोग ही अंग्रेजी हरूफों तक अपनी पहुंच बना पाये हैं शेष अठासी प्रतिशत लोगों के लिये उनकी मातृभाषा यथा - पंजाबी, गुजराती, मराठी, कोंकणी, कन्नड़, मलयाली, तमिल, तेलुगु, उड़िया, बांग्ला, असमी, मइती तथा नैपाली भाषाओं द्वारा ही इंटरनेट का लाभ पहुंचाया जा सकता है।
महात्मा गांधी ने चर्खा कताई का सवाल अपनी पचपनवीं वर्षगांठ - चर्खा जयंती 24 सितंबर 1924 याने आज से इक्यानवे वर्ष पूर्व कदमकुआं पटना में चर्खा संघ खड़ा करके की थी। चर्खा संघ के महात्मा के अपने अनुयायियों ने दुनियां से गांधी विदाई वर्ष 1948 में ही खत्म कर सर्व सेवा संघ खड़ा कर डाला। जब महात्मा ने चर्खा संघ खड़ा किया था भारतीय मिल मालिकों का आई.एस.ए. इंडियन स्पिनर्स ऐसोसियेशन भी कपड़ा उद्योग का सक्षम संगठन था। मिल मालिकों का आईएसए आज भी जिन्दा है पर गांधी का आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसियेशन - चर्खा संघ भरी जवानी की चौबीस वर्ष की उम्र में विदा होगया। गांधी आर्थिकी गांधी की खादी को गांधी के अनुयायियों ने ही चर्खा करघा पर हमला बोला। भारत सरकार ने 1954 में अखिल भारतीय खादी ग्रामोद्योग बोर्ड वैकुंठ ल. मेहता की सदारत में खड़ा किया। खादी के खेवनहार प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया मिलों व खादी के बीच एक पुल का काम करते थे। खादी और ग्रामीण उद्यमों के फैलाव के लिये वैकुंठ ल. मेहता दस वर्ष अहर्निश सेवा करते रहे। उन्होंने भारतीय गांवों को इजरायल पद्धति से विकसित करने का व्रत लिया। रूर्बन सोसाइटी का उद्भव हुआ। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के गांव जीरादेई से रूर्बन सोसाइटी का संकल्प जाग्रत हुआ। जीरादेई, कपसुवा, आगरा, कमला नगर आदि गांवों में सघन क्षेत्र योजना के जरिये ग्राम विकास का मंत्रघोष हुआ। दस वर्ष तक सफलतापूर्वक चलने वाला सघन क्षेत्र योजना के द्वारा रूर्बन सोसाइटी निर्माण की मुहिम रूक गयी। वैकुंठ ल. मेहता को पंडित नेहरू का समर्थन था, गांवों को ग्रामीण उद्यमों के जरिये विकसित करने के परिदृश्य से पंडित नेहरू व वैकुुंठ ल. मेहता के तिरोहित हो जाने से ग्रामीण औद्योगिकीकरण पर रोक लग गयी। ग्यारहवें राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होंने गांवों की आत्मा को बरकरार रख कर 2011 में अहमदाबाद में गांवों का रूर्बनाइजेशन का संकल्प लिया। जब केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार आयी श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन का सूत्रपात हुआ। भारत के गांवों को स्मार्ट शहरों की तरह स्मार्ट गांव में बदलने की प्रक्रिय चल रही है। रूर्बन मिशन का कारोबार गांधी के चर्खे व कबीर के करघे के बिना अधूरा रहने वाला है। इसलिये खादी मार्का खादी के समानांतर प्रधानमंत्री जी पारंपरिक गांधी आर्थिकी खादी के वर्तमान में उलझ गये प्रसंग पर खादी मिशन के संयोजक बाल विजय को बुला कर उनका पक्ष सुनें। एम.एस.एम.ई. मंत्रालय का खादी मार्क अभियान तब तक गति नहीं पकड़ सकता जब तक एम.एस.एम.ई. मंत्रालय 1924 से अद्यपर्यंत पिछले अस्सी वर्षों से अधिक समय से चर्खा करघा द्वारा खादी का काम करने वाले लोगों की सुध नहीं लेता। खादी संस्थायें जिनके पास अरबों रूपये मूल्य की भू भवन संपदा है वह छितर बितर हो जायेगी बिल्डरों के हवाले हो जायेगी यदि इन खादी संस्थाओं को पुनः चैतन्य नहीं बनाया जा सका। जिस तेजी से खादी का ह्रास होरहा है वह आने वाले चार वर्षों में भारत को गांधी की खादी से पूरी तरह अलग कर देगा। इसलिये प्रधानमंत्री जी को तुरंत ही बाल विजय व उनके पांच सात सहयोगियों से बात करनी चाहिये। गांधी आर्थिकी खादी हिन्दुस्तान के गरीबों का सहारा है। गरीबी निवारण करने के लिये व्यक्ति के हाथों को काम मुहैया करना पहली राष्ट्रीय जरूरत है। एम.एस.एम.ई. मंत्रालय और उसके अंतर्गत कार्यशील खादी ग्रामोद्योग आयोग का बोलबाला था। जब तक वैकुंठ ल. मेहता उसके सदर थे हिन्दी बेल्ट या काऊ बेल्ट के नाम से पुकारा जाने वाला हिन्दी भाषी उत्तर प्रदेश व बिहार का परंपरागत सूती खादी उत्पादन पहले और दूसरे क्रम पर था। आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी तथा बिहार के तपे तपाये खादी कार्यकर्त्ताओं का समूह गांव गांव में चर्खा कताई के जरिये ग्रामीण महिलाओं की परिवार की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका थी। बिहार व उत्तर प्रदेश के खादी बनाने वाले पिछड़ गये, खादी और हथकरघा पर पावरलूम हावी होगया। इस ब्लागर ने नान्दीमुख गांधी पोस्ट में भारत के गांवों का दूसरा सहारा चर्खे पर कताई करने के कार्य को राष्ट्रीय रोजगार जरूरत माना। प्रधानमंत्री बिहार विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर रहे हैं। जब तक गांवों के लोगों को वैकल्पिक पूर्णकालिक रोजगार नहीं मिल जाता चर्खा कात कर अपने समय का सदुपयोग करने के साथ साथ सूती कपड़ा व्यापार में खादी की महत्ता है। यह ठीक है कि फैशन वालों के बीच खादी मार्क फैशन वाले कपड़े प्राकृत हों पर जो लोग गरीब हैं महंगा खरीदने की ताकत नहीं है उनके लिये मनरेगा - स्किल्ड लेबर वरदान हो सकता है इस पर प्रधानमंत्री जी विचार करें। चर्खा कताई करघा बुनाई मनरेगा स्किल्ड लेबर से जुड़ें ताकि गांवों की तस्वीर साफ हो सके। दूसरी ओर परंपरागत खादी वालों का नेतृत्व करने वाले बाल विजय से प्रधानमंत्री जी चर्चा करें। गांधी की अहिंसा का पहला अस्त्र चर्खा ही है। अहिंसा के मसीहा महात्मा गांधी के चर्खे पर कताई करने वाले करघे पर बुनाई करने वाले गांधी ड्योढ़ी शताब्दी 150 चर्खे 150 करघे तथा 150 हाथ बुनाई करने वाली महिला श्रम शक्ति को संवर्धन देने वाला गांधी आर्थिकी कार्यक्रम का आयोजन संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में हो। संयुक्त राष्ट्र संघ में अहिंसामूलक आर्थिकी का जिम्मा बाल विजय और उनके परंपरागत साथी संपन्न करें। बाल विजय का साथ देने वाले खादी संगठन जो खादी मार्क पर यकीन नहीं करते खादी मार्क अपनाने को तैयार नहीं हैं प्रत्येक राज्य से चुनी गयी ऐसी कर्मठ संस्थाओं को भारतीय संघ के विदेश मंत्रालय द्वारा नियुक्त भारतीय दूतावासों में दस चर्खा कातने वाली महिलायें दो या तीन बुनकर तथा प्रत्येक दूतावास में खादी ग्रामोद्योगों व हस्तकौशल हस्तकला निर्मितिज्ञों का प्रदर्शन कक्ष संचालित करने का उत्तरदायित्त्व देश की चुनी हुई अलग अलग राज्यों में कार्यशील खादी संस्थाओं को राष्ट्रीय हस्तकौशल से जोड़ कर विदेशी हस्तकौशलकारों के जरिये भारतीय संस्कृति सभ्यता वेशभूषा भाषा का चैतन्य स्तूप प्रत्येक देश में संपन्न किया जाये। प्रधानमंत्री जी कृपापूर्वक बाल विजय जो आध्यात्मिक व्यक्तित्त्व हैं उन्हें इस ब्लागर ने उनके साथ जनवरी 1992 में पीलीभीत से लेकर पूरे कुमांऊँ मंडल में भ्रमण किया तब बाल विजय को स्वामी विवेकानंद के स्मृति स्थल रामकृष्ण मिशन मायावती जिला चंपावत में समाधिस्थ होते देखा। वे ठीक उसी जगह बैठे थे जहां स्वामी विवेकानंद तपश्चर्या किया करते थे। कौसानी में बाल विजय को अनासक्ति आश्रम में भी समाधि लगी इसलिये इस ब्लागर का यह निश्चित मत है कि मेक इन इंडिया को प्रभावी बनाने के लिये प्रधानमंत्री जी बाल विजय से वार्ता करें और गांधी आर्थिकी पर अपनी सरकार का रूख स्पष्ट करते हुए छोटी छोटी दस्तकारियों से भारत राष्ट्र राज्य को उद्यमिता संवर्धित करें ताकि गांधी की खादी पहनने वाले लोगों को भी राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके।
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महात्मा गांधी ने चर्खा कताई का सवाल अपनी पचपनवीं वर्षगांठ - चर्खा जयंती 24 सितंबर 1924 याने आज से इक्यानवे वर्ष पूर्व कदमकुआं पटना में चर्खा संघ खड़ा करके की थी। चर्खा संघ के महात्मा के अपने अनुयायियों ने दुनियां से गांधी विदाई वर्ष 1948 में ही खत्म कर सर्व सेवा संघ खड़ा कर डाला। जब महात्मा ने चर्खा संघ खड़ा किया था भारतीय मिल मालिकों का आई.एस.ए. इंडियन स्पिनर्स ऐसोसियेशन भी कपड़ा उद्योग का सक्षम संगठन था। मिल मालिकों का आईएसए आज भी जिन्दा है पर गांधी का आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसियेशन - चर्खा संघ भरी जवानी की चौबीस वर्ष की उम्र में विदा होगया। गांधी आर्थिकी गांधी की खादी को गांधी के अनुयायियों ने ही चर्खा करघा पर हमला बोला। भारत सरकार ने 1954 में अखिल भारतीय खादी ग्रामोद्योग बोर्ड वैकुंठ ल. मेहता की सदारत में खड़ा किया। खादी के खेवनहार प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया मिलों व खादी के बीच एक पुल का काम करते थे। खादी और ग्रामीण उद्यमों के फैलाव के लिये वैकुंठ ल. मेहता दस वर्ष अहर्निश सेवा करते रहे। उन्होंने भारतीय गांवों को इजरायल पद्धति से विकसित करने का व्रत लिया। रूर्बन सोसाइटी का उद्भव हुआ। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के गांव जीरादेई से रूर्बन सोसाइटी का संकल्प जाग्रत हुआ। जीरादेई, कपसुवा, आगरा, कमला नगर आदि गांवों में सघन क्षेत्र योजना के जरिये ग्राम विकास का मंत्रघोष हुआ। दस वर्ष तक सफलतापूर्वक चलने वाला सघन क्षेत्र योजना के द्वारा रूर्बन सोसाइटी निर्माण की मुहिम रूक गयी। वैकुंठ ल. मेहता को पंडित नेहरू का समर्थन था, गांवों को ग्रामीण उद्यमों के जरिये विकसित करने के परिदृश्य से पंडित नेहरू व वैकुुंठ ल. मेहता के तिरोहित हो जाने से ग्रामीण औद्योगिकीकरण पर रोक लग गयी। ग्यारहवें राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे उन्होंने गांवों की आत्मा को बरकरार रख कर 2011 में अहमदाबाद में गांवों का रूर्बनाइजेशन का संकल्प लिया। जब केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार आयी श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन का सूत्रपात हुआ। भारत के गांवों को स्मार्ट शहरों की तरह स्मार्ट गांव में बदलने की प्रक्रिय चल रही है। रूर्बन मिशन का कारोबार गांधी के चर्खे व कबीर के करघे के बिना अधूरा रहने वाला है। इसलिये खादी मार्का खादी के समानांतर प्रधानमंत्री जी पारंपरिक गांधी आर्थिकी खादी के वर्तमान में उलझ गये प्रसंग पर खादी मिशन के संयोजक बाल विजय को बुला कर उनका पक्ष सुनें। एम.एस.एम.ई. मंत्रालय का खादी मार्क अभियान तब तक गति नहीं पकड़ सकता जब तक एम.एस.एम.ई. मंत्रालय 1924 से अद्यपर्यंत पिछले अस्सी वर्षों से अधिक समय से चर्खा करघा द्वारा खादी का काम करने वाले लोगों की सुध नहीं लेता। खादी संस्थायें जिनके पास अरबों रूपये मूल्य की भू भवन संपदा है वह छितर बितर हो जायेगी बिल्डरों के हवाले हो जायेगी यदि इन खादी संस्थाओं को पुनः चैतन्य नहीं बनाया जा सका। जिस तेजी से खादी का ह्रास होरहा है वह आने वाले चार वर्षों में भारत को गांधी की खादी से पूरी तरह अलग कर देगा। इसलिये प्रधानमंत्री जी को तुरंत ही बाल विजय व उनके पांच सात सहयोगियों से बात करनी चाहिये। गांधी आर्थिकी खादी हिन्दुस्तान के गरीबों का सहारा है। गरीबी निवारण करने के लिये व्यक्ति के हाथों को काम मुहैया करना पहली राष्ट्रीय जरूरत है। एम.एस.एम.ई. मंत्रालय और उसके अंतर्गत कार्यशील खादी ग्रामोद्योग आयोग का बोलबाला था। जब तक वैकुंठ ल. मेहता उसके सदर थे हिन्दी बेल्ट या काऊ बेल्ट के नाम से पुकारा जाने वाला हिन्दी भाषी उत्तर प्रदेश व बिहार का परंपरागत सूती खादी उत्पादन पहले और दूसरे क्रम पर था। आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी तथा बिहार के तपे तपाये खादी कार्यकर्त्ताओं का समूह गांव गांव में चर्खा कताई के जरिये ग्रामीण महिलाओं की परिवार की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका थी। बिहार व उत्तर प्रदेश के खादी बनाने वाले पिछड़ गये, खादी और हथकरघा पर पावरलूम हावी होगया। इस ब्लागर ने नान्दीमुख गांधी पोस्ट में भारत के गांवों का दूसरा सहारा चर्खे पर कताई करने के कार्य को राष्ट्रीय रोजगार जरूरत माना। प्रधानमंत्री बिहार विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर रहे हैं। जब तक गांवों के लोगों को वैकल्पिक पूर्णकालिक रोजगार नहीं मिल जाता चर्खा कात कर अपने समय का सदुपयोग करने के साथ साथ सूती कपड़ा व्यापार में खादी की महत्ता है। यह ठीक है कि फैशन वालों के बीच खादी मार्क फैशन वाले कपड़े प्राकृत हों पर जो लोग गरीब हैं महंगा खरीदने की ताकत नहीं है उनके लिये मनरेगा - स्किल्ड लेबर वरदान हो सकता है इस पर प्रधानमंत्री जी विचार करें। चर्खा कताई करघा बुनाई मनरेगा स्किल्ड लेबर से जुड़ें ताकि गांवों की तस्वीर साफ हो सके। दूसरी ओर परंपरागत खादी वालों का नेतृत्व करने वाले बाल विजय से प्रधानमंत्री जी चर्चा करें। गांधी की अहिंसा का पहला अस्त्र चर्खा ही है। अहिंसा के मसीहा महात्मा गांधी के चर्खे पर कताई करने वाले करघे पर बुनाई करने वाले गांधी ड्योढ़ी शताब्दी 150 चर्खे 150 करघे तथा 150 हाथ बुनाई करने वाली महिला श्रम शक्ति को संवर्धन देने वाला गांधी आर्थिकी कार्यक्रम का आयोजन संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में हो। संयुक्त राष्ट्र संघ में अहिंसामूलक आर्थिकी का जिम्मा बाल विजय और उनके परंपरागत साथी संपन्न करें। बाल विजय का साथ देने वाले खादी संगठन जो खादी मार्क पर यकीन नहीं करते खादी मार्क अपनाने को तैयार नहीं हैं प्रत्येक राज्य से चुनी गयी ऐसी कर्मठ संस्थाओं को भारतीय संघ के विदेश मंत्रालय द्वारा नियुक्त भारतीय दूतावासों में दस चर्खा कातने वाली महिलायें दो या तीन बुनकर तथा प्रत्येक दूतावास में खादी ग्रामोद्योगों व हस्तकौशल हस्तकला निर्मितिज्ञों का प्रदर्शन कक्ष संचालित करने का उत्तरदायित्त्व देश की चुनी हुई अलग अलग राज्यों में कार्यशील खादी संस्थाओं को राष्ट्रीय हस्तकौशल से जोड़ कर विदेशी हस्तकौशलकारों के जरिये भारतीय संस्कृति सभ्यता वेशभूषा भाषा का चैतन्य स्तूप प्रत्येक देश में संपन्न किया जाये। प्रधानमंत्री जी कृपापूर्वक बाल विजय जो आध्यात्मिक व्यक्तित्त्व हैं उन्हें इस ब्लागर ने उनके साथ जनवरी 1992 में पीलीभीत से लेकर पूरे कुमांऊँ मंडल में भ्रमण किया तब बाल विजय को स्वामी विवेकानंद के स्मृति स्थल रामकृष्ण मिशन मायावती जिला चंपावत में समाधिस्थ होते देखा। वे ठीक उसी जगह बैठे थे जहां स्वामी विवेकानंद तपश्चर्या किया करते थे। कौसानी में बाल विजय को अनासक्ति आश्रम में भी समाधि लगी इसलिये इस ब्लागर का यह निश्चित मत है कि मेक इन इंडिया को प्रभावी बनाने के लिये प्रधानमंत्री जी बाल विजय से वार्ता करें और गांधी आर्थिकी पर अपनी सरकार का रूख स्पष्ट करते हुए छोटी छोटी दस्तकारियों से भारत राष्ट्र राज्य को उद्यमिता संवर्धित करें ताकि गांधी की खादी पहनने वाले लोगों को भी राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके।
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