Thursday, 1 October 2015

बांग्ला-तमिल-मराठी समृद्ध भाषायें
कोलकाता मद्रास मुंबई हाईकोर्ट भाषायें बनाई जायें
मद्रास उच्च न्यायालय में तमिल भाषी न्यायिक व्यवस्था
          तमिलनाडु के मद्रास उच्च न्यायालय के वकीलों की मांग है कि उच्च न्यायालय की अदालती भाषा के रूप में तमिल का उपयोग शुरू किया जाये। तमिल भाषी उच्च न्यायालय के वकीलों की इस मांग का समर्थन सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू ने किया है। काटजू मूलतः कश्मीरी हैं घर परिवार में अब भी अपना अपने संबंधियों के बीच कश्मीरी में वार्ता करते हों पर इलाहाबाद में रहने के कारण मार्कण्डेय काटजू अपने आपको इलाहाबादी हिन्दी भाषी मान कर चलते हैं। जब वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति थे हिन्दी में बहस सुनते वकीलों से हिन्दी में प्रश्न करते तथा हिन्दी में फैसला देने वाले न्यायमूर्तियों में अग्रणी थे। मार्कण्डेय काटजू जो मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी रह चुके हैं उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट में अभिव्यक्त किया कि तमिल को सशर्त तमिलनाडु उच्च न्यायालय की न्याय भाषा की तात्कालिक मान्यता दी जानी चाहिये। हिन्दू दैनिक अखबार के 21.9.15 संस्करण में मद्रास हाईकोर्ट के वकीलों के आंदोलन की इस खबर के साथ जी. कस्तूरी (17.12.24-21.04.2012) की यादगार में उनका फोटो छपा देख इस ब्लागर को डा. राममनोहर लोहिया की कस्तूरी रंगम से हुई बातचीत जो लोहिया जी के इस ब्लागर को अल्मोड़ा उनके मामा द्वारका प्रसाद अग्रवाल के घर में सुनाई थी उसकी स्मृति ताजा होगई। डाक्टर लोहिया पानी के जहाज से उतर कर सीधे हिन्दू अखबार के दफ्तर पहंुचे। उन्होंने कस्तूरी रंगम से कहा - मैं राममनोहर लोहिया बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डाक्टरेट लेकर आया हूँं कलकत्ता जाने का खर्चा पास में है नहीं इसलिये आपसे प्रार्थना करता हूँ कि हिन्दुस्तान की आर्थिक स्थिति सुधारने के क्या क्या उपाय हो सकते हैं आपको पढ़ने लायक लेख प्रस्तुत कर सकता हूँ। कस्तूरी रंगम जो तब अखबार के मालिक और संपादक दोनों थे उन्होंने कागज पेंसिल डाक्टर लोहिया को दिये। डाक्टर लोहिया ने तीन घंटे जम कर हिन्द की आर्थिकी पर फर्राटेदार अंग्रेजी में चार पेज लंबा लेख सौंपा। लेख में कस्तूरी रंगम ने पढ़ने के बाद अपनी संपादकी कलम का सेमी कालम बदलने के लिये भी प्रयोग नहीं किया। बात 1936 की है डाक्टर लोहिया को तीन सौ रूपये दिये। हिन्दू में छपे डाक्टर लोहिया के लेख ने हिन्दुस्तान की आजादी के लिये समर्पित सभी नेताओं को प्रभावित किया। डाक्टर लोहिया रातोंरात हिन्दुस्तान की राजनीति के चमकीले नक्षत्र बन कर उभरे। कोलकाता में उनके पिता हीरालाल लोहिया रहते थे उनसे मिलने के बाद अल्मोड़ा अपनी नानी के और अपने मामा से मिलने गये। कुमांऊँ के गांवों में घूमते समय यह घटना डाक्टर लोहिया ने इस ब्लागर को सुनाई। तब कांग्रेस में डाक्टर लोहिया आर्थिक मामलों और विदेश नीति के प्रवक्ता थे। पंडित नेहरू को अत्यंत प्रिय थे। 
          हिन्दुस्तान में बर्तानी राज की छाप के तीन महत्वपूर्ण इलाके बंगाल में प्रेसिडेंसी मद्रास में प्रेसिडेंसी तथा बौंबे प्रेसिडेंसी थे। इन तीनों जगहों पर बर्तानी राज का डंका बजता था। तीनों में उच्च न्यायालय क्रमशः कलकता हाईकोर्ट मद्रास हाईकोर्ट व बंबई हाईकोर्ट भी सर्वप्रथम स्थापित हुए। मद्रास हाईकोर्ट के वकीलों ने जो मांग रखी है वह बंगाल हाईकोर्ट तथा बंबई हाईकोर्ट के वकीलों द्वारा भी बांग्ला तथा मराठी को दोनों हाईकोर्टों की न्यायिक भाषा निर्धारित करने की मांग करनी चाहिये। न्यायार्थी अपनी मातृृभाषा में ही अपने पक्ष को सटीक पेश कर सकता है। जिन वकीलों की मातृभाषा मद्रास में तमिल बंगाल में बांग्ला महाराष्ट्र में मराठी है वे अपने पक्ष अपनी भाषा में ज्यादा मजबूती से प्रस्तुत कर सकते हैं। तमिल बांग्ला व मराठी भारतीय भाषाओं में समृद्ध भाषायें हैं। यदि इन तीनों भाषाओं को संबंधित हाईकोर्ट की अतिरिक्त न्यायिक भाषा निश्चित किया जाये - अंग्रेजी के समानांतर तमिल बांग्ला व मराठी में बहसें सुनी जायें तथा न्यायमूर्तियों के फैसले क्रमशः तमिल बांग्ला व मराठी में भी दिये जाने का प्रयास किया जाये। यह सही है कि उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश उस भाषा को बोलने वाला नहीं भी हो सकता। कई अन्य न्यायाधीश भी प्रदेश की भाषा के अलावा इतर भाषा भाषी भी हो सकते हैं ऐसी स्थिति में मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायमूर्तियों को राज्य की मुख्य भाषा समझने व भाषा की न्यायिक महत्ता को आंकने वाले भाषायी सहायक दिये जाने चाहिये। तमिल बांग्ला व मराठी लिपियां याने तमिल भाषा को मुख्य न्यायाधीश की मातृभाषा लिपि में प्रस्तुत करना, जो न्यायामूर्ति  मामला सुन रहे हैं उनकी मातृभाषा लिपि में वस्तुविषय प्रस्तुत कराने में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तथा इतर भाषा भाषी न्यायमूर्ति को प्रदेश की भाषा से आत्मीयता बढ़ेगी। 
          भारतीय संसद तथा भारतीय गणतंत्र के घटक राज्यों द्वारा अपने राज्य की घोषित राजभाषा में ही केन्द्र सरकार से तत्काल पत्र व्यवहार हो। केन्द्र भी अपने मंत्रालयों में राज्यों के साथ उनकी भाषा व लिपि में पत्र व्यवहार शुरू करे तभी देश में भाषायी सौमनस्य स्थापित होगा। आज तमिलनाडु ही नहीं अन्य भाषा भाषी राज्यों में भी नागरी लिपि संस्कृत और हिन्दी भाषाओं के लिये आक्रोश है। हिन्दीतर भाषा भाषियों के मन में संदेह है कि हिन्दी भाषा उन्हें अपदस्थ कर देगी। इसलिये पहले जरूरत यह है कि संसद में सांसद अपनी भाषा में अभिव्यक्ति करें। उसका अनुवाद इतर भाषा भाषियों की अपनी भाषा में मिले जो भाषायें नागरी लिपि के अलावा गुरूमुखी उर्दू गुजराती कन्नड़ मलयाली तमिल तेलुगु उड़िया बंगाली असमी मइती लिपि प्रयोग करते हैं उन भाषाओं पड़ोसी भाषा लिपि में भी प्रस्तुत किया जाये। 
          भारत में रोमन लिपि समर्थक एक नया अंग्रेजीदां भद्रलोक उदय हुआ है। लोकप्रिय अंग्रेजी लेखक चेतन भगत का कहना है कि हिन्दी को रोमन लिपि में लिखा जाये ताकि हिन्दी विश्व प्रसिद्ध भाषा बन सके। नारायण मूर्ति के उत्साही पुत्र रोहन मूर्ति भी अंग्रेजी के द्वारा भारतीय वाङमय ह्नदयंगम करने के पक्षधर हैं। जो विद्यार्थी अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उनका सम्मान अपनी मातृभाषा से उठ गया है। वे सभी मैकोलाइट अंग्रेजीदां भद्रलोक यह मान कर चल रहे हैं कि भारत की 12 प्रतिशत जनसंख्या अंग्रेजी भाषा व ज्ञान प्राप्ति के अंग्रेजी झरोखे से प्रभावित है। प्रादेेशिक भाषाओं के विद्यालयों में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दिये जाने का प्रावधान लगभग लुप्त होगया है। प्रत्येक माता पिता अपने बेटे बेटियों को कान्वेन्ट स्कूलों में पढ़ाना चाहता है। सारे देश में अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की बाढ़ आगयी है। हर शहर और कस्बे में नब्बे दिनों में अंग्रेजी बोलना सिखाये जाने के विज्ञापन पोस्टर हर शहर हर गांव में जगह जगह लगे हुए हैं। भारत के मध्यम वर्ग निम्न मध्यम वर्ग तथा सरकारी नौकरी करने वाले राजसेवकों अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में पढ़ाने का चस्का लग गया है। प्रख्यात अमरीकी लेखक इलिच ईवान ने साठ वर्ष पूर्व डिस्कूलिंग नामक पुस्तक लिखी। अमरीकी अभिभावकों का ध्यान वर्तमान स्कूल व्यवस्था से रूखसत लेने की तरफ खींचा। इलिच ईवान का मानना है कि शिक्षा देने का सर्वश्रेष्ठ तरीका गुरू शिष्य प्रयोजन है। मौजूदा शिक्षा इलिच ईवान की राय में मौजूदा तरीका लश्करी अथवा रणांगण तरीके वाला है। इस स्कूलिंग से मानव समाज में घोर अव्यवस्था व स्वेच्छाचार ने आना ही है। मोरल पोलिसिंग की बात आज चल रही है। आपराधिक अथवा अपराध नियंत्रण कानूनी पोलिसिंग के समानांतर आज समाज को केवल कानूनी नहीं नैतिक सामाजिक शैक्षिक कर्मकौशल कला का विकास जिसे आज हिन्दुस्तान Skill Development or Skill Promotion कहा जारहा है उसे हाथ की कारीगरी से जोड़े बिना रोजगार संवर्धन संभव नहीं है। यदि हर हाथ में लैपटाप दिये जाने का संकल्प किया जाये दूसरे उद्यमों की देखभाल कैसे होगी ? इसीलिये न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू की सम्मति पर भारत के तीन प्रमुख उच्च न्यायालयों का ध्यानाकर्षण भारत के भाषायी तथा न्याय पथ पर चलाने के लिये एक आवश्यक शर्त्त है कि देश की तीन मूर्धन्य प्राचीनतम उच्च न्यायालयों द्वारा स्थानीय भाषाओं को अंग्रेजी के समानांतर प्रश्रय दिया जाये। भाषा विज्ञान तथा विभिन्न भाषाओं वाणी आदान प्रदान में जिसे अंग्रेजी में मदर टंग कहा जाता है उसकी मुख्य भूमिका है। पराई भाषा को अपनाने से मातृभाषा का पूर्णतः लोप तो नहीं हो पायेगा पर एक भाषायी विषमता वाणी उन्माद को जन्म देगी इसलिये मार्कण्डेय काटजू महाशय ने तमिलनाडु के वकीलों का जो उत्साहवर्धन किया है उसे दो अन्य उच्च न्यायालयों याने कोलकाता हाईकोर्ट और मुंबई हाईकोर्ट को भी अपनाना चाहिये ताकि बर्तानी राज की यादगार बंगाल प्रेसीडेंसी, मद्रास प्रेसीडेंसी व बाम्बे प्रेसीडेंसी में न्याय की उपलब्धता स्थानीय भाषाओं के माध्यम से शुरू हो।
।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

No comments:

Post a Comment