घर वापसी बनाम धर्मान्तरण
क्या घर वापसी अथवा ख्रिस्ती व इस्लाम धर्मावलंबियों का सामूहिक धर्मान्तरण - धर्मशास्त्र सम्मत है ?
सोलहवीं लोकसभा नेता पंद्रहवें प्रधानमंत्री धर्मान्तरण के इस बिन्दु पर राष्ट्रपति जी के मार्फत सुप्रीम कोर्ट का फैसला मांगें तभी देश में सामाजिक सहिष्णुता कायम हो पायेगी अन्यथा राष्ट्र डांवाडोल होने के रास्ते बढ़ रहा है। मोदी नेतृत्त्व भारत राष्ट्र को स्थायित्त्व केवल सहिष्णुता के जरिये ही दे सकता है। गांधी के बाद मोदी का नेतृत्त्व हिन्दुस्तान को समर्थ सशक्त व स्मार्ट राष्ट्र राज्य तभी बना पायेगा जब धार्मिक अल्पसंख्यक अपने को सुरक्षित समझना शुरू करेंगे और उन्हें यकीन हो जाये कि हिन्दू जीवन शैली बलात् व्यक्तिगत अथवा सामूहिक धर्मान्तरण को सनातन धर्मसम्मत नहीं मानती। महात्मा गांधी ने 15 फरवरी 1916 को वसंत पंचमी के दिन वडील से पूछा कि क्या अस्पृश्यता सनातन धर्मशास्त्र सम्मत है ? महामना मदन मोहन मालवीय ने कहा - महात्मा जी मैं तो स्वयं ही परंपरा से छुआछूत मानता आरहा हूँ अतएव आपके इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है पर हां अवश्य ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सर्वपल्ली राधाकृष्णन आपके प्रश्न का समीक्षित उत्तर दे सकते हैं क्योंकि वे सनातन धर्म की गहराइयों के सक्षम जानकार हैं। महात्मा और महामना काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जिसे अंग्रेजी में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी नामकरण हुआ है उसके विद्वान आचार्य सर्वपल्ली राधाकृष्णन के डेरे में पहुंचे। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने दोनों विभूतियों का स्वागत करते हुए कहा - मुझे बुला लेते। महात्मा गांधी ने कहा - मुझे आपसे यह जानने की तीव्र उत्कंठा है कि क्या अस्पृश्यता सनातन धर्मशास्त्र सम्मत है ? राधाकृष्णन ने द्विमूर्ति से कहा - मैं भी अस्पृश्यता मानता हूँ किन्तु यह धर्मशास्त्र सम्मत है या नहीं इसका स्पष्टीकरण करने के लियेे आप मुझे एक पखवाड़े की अवधि प्रदान करें। पंद्रह दिन के पश्चात सर्वपल्ली ने महात्मा को कहा - महात्मा जी अस्पृश्यता सनातन धर्मशास्त्र सम्मत नहीं है। यह दोष उपधर्म या पाखंड के रूप में सनातन धर्म में घुसा हुआ महादोष है। महात्मा के अंतर्मन में मनुष्य मनुष्य के बीच में छुआछूत मानने की प्रथा पर अत्यंत उग्र आक्रोश था। वे जब 1915 में अफ्रीका से भारत आये कोचरब आश्रम में उन्होंने दूधाभाई - अस्पृश्य परिवार को आश्रम का महत्वपूर्ण कुटुंब माना। गुजरात के वैष्णव महात्मा गांधी के व्यक्तित्त्व से प्रभावित तो थे पर अस्पृश्यता निवारण उन्हें अस्वीकार था। वैष्णव समाज ने महात्मा को चंदा देना बंद कर दिया। तेरापंथी जैन मतावलंबी सेठ अंबालाल को जब मालूम हुआ कि गुजराती वैष्णव समाज वामन बनिया महात्मा के आश्रम को मदद देना बंद कर चुके हैं सेठ अंबालाल ने महात्मा गांधी के श्री चरणों में तेरह हजार रूपये की थैली समर्पित की। महात्मा का कोचरब आश्रम फिर पूर्ववत चलने लगा। वैष्णव गुजराती समाज को अपनी त्रुटि का आभास तेरापंथी सेठ अंबालाल की सहृदयता से हुआ। दूधाभाई परिवार का कोचरब आश्रम में रहना गांधी एकादश व्रत की महत्वपूर्ण कड़ी थी। सर्वपल्ली राधाकृष्णन की राय मालूम होने पर महात्मा गांधी को पूरा यकीन होगया कि उनकी मुहिम पूरी तरह सनातन धर्मशास्त्र सम्मत है। आगामी वसंत पंचमी कुम्भ संक्रांति 12 फरवरी 2016 को है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय इस दिन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय शताब्दी मनायेगा।
2. 1915 में भारत का नेतृत्त्व महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी कर रहे थे। अस्पृश्यता निवारण अपने लिये आध्यात्मिक स्वराज देशवासियों के लिये पार्लमेंटरी स्वराज हिन्दू मुस्लिम विग्रह में हिन्दू मुसलमान भाईचारे का उनका प्रयास गोपालन व खेतीबाड़ी में गोवंश भूमिका में उनसे मतभेद रखने वाले लोग भी थे पर वे अपनी मुहिम में जुटे रहे। सौ वर्ष पश्चात 2015 में भारत का नेतृत्व नरेन्द्र दामोदरदास मोदी कर रहे हैं। मोदी जी को भी दोहरे अतिवादियों का सामना करना पड़ रहा है। उनके अपने घेरे वाले अतिवादियों में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें सहिष्णुता से परहेज है। धर्मान्तरण और गाय से संबंधित ऐसे अनेक प्रसंग हैं जिनसे समाज में तनाव बढ़ रहा है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के जरिये भारतीय वेदांत की पुरजोर स्थापना की। स्वामी जी के निर्धारित रास्ते पर चलने के लिये श्रद्धानंद जी महाराज ने पिछली शताब्दी के तीसरे दशक के मध्य में शुद्धि आंदोलन चलाया। जरूरत तब और आज इस बात की है कि क्या सनातन धर्मशास्त्र - धर्मान्तरण को शास्त्र सम्मत मानता है ? महात्मा ने जब अस्पृश्यता निवारण का सूत्रपात किया तब भारत में सनातन धर्मशास्त्र के पूर्ण ज्ञाता सर्वपल्ली राधाकृष्णन उपलब्ध थे। आज भारत में गैर हिन्दुओं को शुद्धि अथवा घर वापसी जरिये पुनः हिन्दू धर्मान्तरित करना क्या शास्त्र सम्मत है ? इसका फैसला कौन करे ? सनातन धर्मावलंबियों में वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत संप्रदायों सहित वल्लभ, माधव, रामानंद, कबीर, रैदास, गोरखनाथ, दादू अनेकानेक संप्रदाय हैं। आदि शंकर द्वारा स्थापित चारों मठों सहित कांची कामकोटि के स्वामी जयेन्द्र सरस्वतीव चार अन्य शंकराचार्यों यथा श्रंगेरी, द्वारका, पुरी एवं बद्रिकाश्रम का मत जानने का जिम्मा भारत का सर्वोच्च न्यायालय निश्चय करे। इन पांच शंकराचार्यों को सर्वोच्च न्यायालय में आहूत न किया जाये वरन उनका मत न्यायालय जानने के इतर तरीके अपनाये। भारत की सोलहवीं लोकसभा के नेता पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने मंत्रिमंडल के परामर्श से भारत के राष्ट्रपति महोदय से अनुरोध करें कि सनातन धर्म में इतर धर्मावलंबियों का धर्मान्तरण शुद्धि अथवा घर वापसी क्या धर्मशास्त्र सम्मत है ? इसका निर्णय करने के लिये विश्व हिन्दू परिषद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हिन्दू जागरण मंच हिन्दू महासभा सहित आर्यसमाज रामकृष्ण मिशन सहित जो जो व्यक्ति अथवा संगठन क्या सनातन धर्म में इतर धर्मावलंबियों का धर्मान्तरण शास्त्र सम्मत है ? अपना अपना पक्ष मत साक्ष्यों सहित प्रस्तुत करें। अस्पृश्यता निवारण कानूनी तौर पर संपन्न हो चुका था पर व्यावहारिक दिक्कतें अस्पृश्यता निवारण में यत्र तत्र व्याप्त हैं। दलित समाज में मंदिर प्रवेश, दलितों के साथ होने वाले अमानुषिक व्यवहार के प्रसंग अखबारी दुनियां व सोशल मीडिया द्वारा समय समय पर प्रकाश में आते रहते हैं। दलित आक्रोश बीफ महोत्सव महिषासुर अभिनंदन करने के लिये प्रेरित होता रहता है। इसलिये जहां एक ओर सनातन धर्म में इतर धर्मावलंबियों के धर्मान्तरण में शास्त्रीय मर्यादा का तकाजा है वहीं हिन्दू समाज विभिन्न जातियों वर्णाश्रमाचार का अनुयायी है। रूर्बन सोसाइटी के माध्यम से गांवों में ग्रामोद्योगी करण की जो मुहिम पंडित नेहरू के राजनीतिक समर्थन से विकेन्द्रित अर्थांग के पुरोधा वैकुंठ ल. मेहता ने 1953 से 1964 तक लगातार गतिपूर्वक संपन्न की पंडित नेहरू के निधन व वैकुंठ ल. मेहता के खादी ग्रामोद्योग आयोग से रूखसत होने पर अभियान ठंडा ही नहीं पड़ा उसे कानूनी तौर पर भी अस्वीकृति झेलनी पड़ी। ग्रामोत्थान का ग्राम समाज का जो संकल्प था वह अधूरा रह गया नतीजा स्पष्ट है आजादी के सात दशकों के पश्चात भी गांवों में रहने वाले सवा तिरासी करोड़ लोग गरीबी की मार झेल रहे हैं। अनेकानेक बुद्धिजीवी चिंतन पोखर में गोते लगाने वाले कलम धनी लोगों ने सम्मान, सत्कार, पुरस्कार देने वाली सरकारी गैर सरकारी एवं विचार स्वातंत्र्य में अपने आपको रमाये हुए लेखकों उपन्यासकारों कवियों ने तुलसीदास का रास्ता नहीं अपनाया। स्वांतः सुखाय काव्य सृजन के बजाय कालिदास द्वारा अभिव्यक्त मत - ‘मूढ़ः कविः यशः प्रार्थी’ वाला रास्ता अपनाया। कोई भी कारण रहे हों उन्हें स्वांतः सुखाय वाला मार्ग अच्छा नहीं लगा। दक्षिणायें मिल रही थीं इनाम बंट रहे थे सम्मानों की लगातार झड़ी लगी हुई थी। सरस्वती के वरद पुत्रों को भविष्य का भान नहीं हुआ, उन्होंने सत्कार सम्मान प्रभृति दक्षिणायें लीं, अब उन उदरस्थ किये हुए सम्मानों को उगल रहे हैं। उन्हें उबकाई आरही है। उनका मानना है कि समाज में असहिष्णुता तेज रफ्तार से बढ़ रही है। इसलिये दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से भारत में असहिष्णुता का जो अचानक उभार आया है उसे नैतिक और न्याय मीमांसा के जरिये नियंत्रित किया जा सकता है। मर्यादाओं का अनुपालन राज सत्तासीन समूह के साथ साथ विभिन्न व्यवसायों में लगे जन सामान्य को भी नैतिक रूप से करना होगा इसलिये छुआछूत के पुनर्जागरण दलितों व विकलांगों के प्रति अमर्यादित अश्लील व्यवहार दलित मंदिर प्रवेश पर अनैतिक रोक और सनातन धर्म की सभी शाखाओं उपशाखाओं में इतर धर्मावलंबियों का धर्मान्तरण इन तीन बिन्दुओं पर सनातन परंपरा मानने वाले भारतीय बहुसंख्यक समाज जिसे दुनियां हिन्दू कहती है क्या उस सनातन धर्म के मूल धर्मशास्त्रीय आचरण में 1. छुआछूत अस्पृश्यता मानना 2. मंदिर में दलित प्रवेश को रोकना 3. सनातन धर्म से इस्लाम धर्म व ख्रिस्ती धर्म में धर्मान्तरित व्यक्ति या समूह को शुद्धि आंदोलन घर वापसी अथवा किसी अन्य आधार पर पुनः सनातन धर्मावलंबी घेरे में लाना जो वस्तुतः विशुद्ध धर्मान्तरण है वह प्रक्रिया सनातन धर्मशास्त्र सम्मत है क्या ? भारत सरकार को इन तीन बिन्दुओं पर विचार विमर्श कर भारत के राष्ट्रपति महोदय से अनुरोध कर अस्पृश्यता व दलित समाज से अमानुषिक व्यवहार और दलित मंदिर प्रवेश इन तीन बिन्दुओं के समानांतर शुद्धि घर वापसी सहित सामूहिक या वैयक्तिक रूप से किसी ख्रिस्ती या इस्लाम धर्मावलंबी की सनातन धर्म में प्रवेश क्या शास्त्र सम्मत है ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक अरब से ज्यादा हिन्दू कहे जाने वाले समाज की अद्वितीय सेवा करेंगे जिस दिन भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका अस्पृश्यता, दलित मंदिर प्रवेश, दलितों को तथाकथित सवर्ण हिन्दुओं द्वारा उत्पीड़ित करने की घटनाओं, सनातन धर्म में इतर धर्मावलंबियों का धर्मान्तरण या पुनः धर्मान्तरण हिन्दू धर्म शास्त्र की समीक्षा करते हुए सर्वपल्ली राधाकृष्णन के मत को न्यायिक संबल प्रदान करेगी। विश्व के मजहबी इतिहास में यह अद्वितीय घटना होगी। जो लोग हिन्दुत्व का उत्थान चाहते हैं जिस दिन हिन्दू यह घोषित करेगा कि वह धर्मान्तरण पर विश्वास नहीं करता सनातन धर्म की यशोपताका विश्व में अपना महत्वपूर्ण स्थान स्वयं ही प्राप्त कर लेगी।
3. मजहबी दुनियां में ख्रिस्ती धर्मावलंबियों की संख्या आज दो अरब से ज्यादा है। दूसरे स्थान पर इस्लामी मजहब के अनुयायी एक अरब साठ करोड़ हैं। ये दोनों मजहब धर्मप्रसार धर्मान्तरण के प्रबल समर्थक हैं। भारत में इस्लाम धर्मावलंबियों में ज्यादातर लोग सनातन धर्म से धर्मान्तरित समूह हैं। श्रद्धानंद जी के शुद्धि आंदोलन से जिन मुसलमानों को पुनः हिन्दू समाज से जोड़ने का प्रयास हुआ वह पूर्णतः असफल प्रयास था। इस ब्लागर के सामने एक उदाहरण है। ताजपुर जिला बिजनौर के निवासी हिफजुर्रहमान वैकुंठ ल. मेहता के रूर्बन सोसाइटी अभियान से जुड़े संचालक थे। उनके पूर्वज चौहान राजपूत थे। उनके सामाजिक तथा राजनीतिक संबंध ताजपुर के पास के गांव के निवासी चौधरी खूब सिंह जो उ.प्र. विधानसभा के निरंतर बीस वर्ष सदस्य रहे हिफजुर्रहमान के निकटस्थ सहयोगी थे। चौधरी खूब सिंह चौहान राजपूत थे उनकी बहन मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा निवासी शिवस्वरूप सिंह को ब्याही थी। चौधरी शिवस्वरूप सिंह को हिफजुर्रहमान जीजा जी कहते थे और उनके बीच साले जीजा का परिहास भी होता रहता था। चौधरी शिवस्वरूप सिंह हिफजुर्रहमान को कहते अगर सारे कटुवे हिन्दू हो जायें तो समस्या अपने आप हल हो जायेगी। हिफजुर्रहमान कहते - जीजा जी हम तो लौटने को तैयार हैं पर हिन्दुओं में तो चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र हैं हमें किस में रखोगे ? क्या हिन्दू बनने पर हमसे रोटी बेटी का रिश्ता करोगे ? हिफजुर्रहमान की शंका बिल्कुल सही थी। वे इस ब्लागर को भी पहचानते थे। उन्होंने कहा - पंडित जी जीजा जी और मेरे बीच होरहे विवाद का सही सही फैसला आप ही कर सकते हो। इस ब्लागर ने हिफजुर्रहमान से कहा - बात आपकी सही है। मुसलमानों को हिन्दू बनाने से समस्या हल नहीं होगी। उन्हें अपना मजहब मानने की स्वतंत्रता हो पर सामाजिक क्षेत्रों हिन्दू मुस्लिम ताल्लुकात भाईचारे बने रहें तभी हिन्दुस्तान में अमन चैन आ सकता है। राष्ट्रपति महोदय ने सहिष्णुता बनाये रखने का आग्रह किया है इसलिये पहला सवाल जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को संकल्पित करना है वह है कि ख्रिस्तियों व मुसलमानों को उनके अपने अपने धर्मों में आस्था रखने की संवैधानिक व्यवस्था को क्रियात्मक रूप देना। जिन लोगों को आज दुनियां हिन्दू कहती है उनकी मजहबी संख्या एक अरब से ऊपर है। मजहब की दृष्टि से जिन्हें हिन्दू कहा जाता है वह एक जीवन शैली है। एक ईश्वर एक धर्मग्रंथ एक पैगम्बर - ख्रिस्ती व इस्लाम धर्मावलंबी जिस मजहब के आधार पर जीवन यापन करते हैं वह सनातन धर्म पर लागू नहीं होता इसलिये भारत की पहली जरूरत यह है कि नरेन्द्र मोदी सरकार मंत्रिमंडल के सामूहिक निर्णय से यह तय करे कि भारत के बहुसंख्यक जिन्हें हिन्दू धर्मावलंबी कहा जाता हैै हिन्दू धर्म में इतर धर्मों से लोगों को हिन्दू धर्म में धर्मान्तरित करना क्या शास्त्र सम्मत हैै ? छुआछूत सनातन धर्मशास्त्र सम्मत नहीं है उसी तरह धर्मान्तरण भी शास्त्र सम्मत नहीं है। समूचे प्रसंग को व्यवस्थित तरीके से न्यायिक विवेचना करने की जरूरत है कि क्या हिन्दू धर्म नाम से जाने जारहे धार्मिक आस्था में धर्मान्तरण करना या कराना शास्त्र सम्मत है ? यदि सुप्रीम कोर्ट फैसला देती है कि सनातन परंपराओं के अनुकूल इतर धर्मावलंबियों को हिन्दू धर्म में धर्मान्तरित करने के लिये धर्मशास्त्र में कोई प्रावधान नहीं है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचे इतर धर्मावलंबियों को हिन्दू धर्म के चौखट में लाना शुद्धि करना घर वापसी सहित सारे धर्मान्तरण के कृत्यों पर रोक लगा दी जाये। धर्म व्यक्ति का परिवार की आस्था का प्रतीक हो। दुनियां में धार्मिक आस्था के जो जो प्रमुख स्तूप हैं उनके बारे में कृष्णार्जुन संवाद का चौथा अध्याय कर्मयोग के अनंतर ज्ञान कर्म सन्यास योग के प्रारंभ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने पार्थ अर्जुन से कहा -
इमम् विवस्वते योगम् प्रोक्तवानहमव्ययम् विवस्वान मनवे ग्रह मनुः इक्ष्वाके ब्रवीत।
इतना कहने के बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा -
स काले नेह महता योगोनष्टः परन्तपः स एवायम् मया तेऽद्य योगः प्रोक्तःपुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा मेति रहस्यम् हमेतदुन्तमम।
4. हमारे जो मनीषी आज हिन्दुत्व की बात करते हैं गीता का भी उद्धरण देते रहते हैं उन्हें कार्लमार्क्स से भी स्वयं को जोड़ना होगा। दुनियां के सेमेटिक मजहबों और भारत के सनातन मार्ग में धरती और आसमान का फर्क है। सेमेटिक मजहब पुरोधा ईशनिन्दा जिसे अंग्रेजी में Blashfamiya कहा जाता है उसे मजहब का महत्वपूर्ण कार्यकारी स्तंभ मानते हैं। ईशनिन्दा करने वाले व्यक्ति का सिर धड़ से अलग करने में विलंब नहीं करते जब कि हिन्दुस्तानी आस्था परंपरा में ईशनिन्दा - ईश्वर भक्ति का अनौखा मार्ग माना जाता है। योगेश्वर वासुदेव श्रीकृष्ण के मौसेरे भाई शिशुपाल के बारे में नारद ने युधिष्ठिर से कहा - यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्वन्मयताभियात न तथा भक्ति योगेन इतिमे निश्चिताभक्तिः। वैरानुबंध भी भक्ति से ऊँचा स्त्रोत है। परमात्मा तक पहुंचने का यह मत नारद ने युधिष्ठिर को बताया था। यही वैरानुबंध भक्ति कहलाती है। भारत के लोगों में दैत्यराज प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप की वैरभक्ति याने ईशनिन्दा भी ईश्वर तक पहुंचने का एक मार्ग है। इस प्रविधि का अनुपालन सेमेटिक धर्मावलंबी नहीं कर पाते हैं यही हिन्दुस्तान की विशेषता है। बात तो साठ वर्ष पुरानी है, गो सेवा व्रती गौरीशंकर डालमिया नयी दिल्ली कनाट प्लेस में रहते थे। उनके अग्रज हिन्दुस्तान के उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया एक खास अंदाज वाले वैष्णव मतावलंबिता व जैन मतावलंबिता में सेतु का काम करते थे। उन्होंने टाइम्स आफ इंडिया का कार्यभार अपनी इकलौती कन्या रमा को सौंप दिया था जो नजीबाबाद के मूल निवासी श्रेयांस प्रसाद जैन को ब्याही थी। श्रेयांस जैन व रमा ने टाइम्स आफ इंडिया का कायकल्प कर उस बर्तानी अखबार को नवयुग, धर्मयुग, नवभारत टाइम्स, दिनमान सरीखे हिन्दी पत्रकारिता के चमकीली अखबार नवीसी का स्वरूप दिला डाला। टाइम्स आफ इंडिया में भी उन्होंने गिरिलाल जैन सरीखे संपादक के माध्यम से टाइम्स का कायाकल्प कर डाला। गो सेवक गौरहरि डालमिया के सुपुत्र अमरीका में रहते गौमांस का सेवन करते। यह घटना गो सेवी डालमिया जी को तकलीफ देती थी पर वे बेबस थे। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विश्वस्त सहयोगियों में थे। उन्होंने एकाधिक बार यह घोषित किया कि वे बीफ या गौमांस भोजी हैं। मार्कण्डेय काटजू भी कहते हैं वे बीफभोजी हैं। राजनीति में नैतिक मर्यादाओं का ख्याल रखने वाले पूर्व ग्राम विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह का कहना है कि भारत के ऋषि मुनि भी गौमांस का सेवन करते थे। गौमांस संबंधी विवाद पर महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। महात्मा के ग्रामीण उद्योग सहयोगी डा. जे.सी. कुमारप्पा ख्रिस्ती धर्मावलंबी थे पर गोरक्षा तथा गाय व हिन्दुस्तान की खेतीबाड़ी में उनका स्पष्ट मत था कि गायों की संरक्षा भारत की संरक्षा है। मुंबई से सन 1923 से लगातार छपने वाले फ्रेंड्स जनरल जमीयत उलेमा ए हिन्द का प्रमुख चेहरा अरसद मदनी का साक्षात्कार गौ हत्या पर अक्टूबर 24 2015 के अंक में प्रकाशित हुआ है। मौलाना अरसद मदनी कहते हैं मौलाना अबुल कलाम आजाद ने हिन्दुस्तानी मुसलमानों को इदुज्जुहा पर गौकशी न करने की सलाह भी दी थी। मौलाना मदनी की मान्यता है कि हिन्दुस्तान का मुसलमान इदुज्जुहा तकरीब के अवसर पर गौकशी नहीं करता, भैंसकशी करता है इसलिये मुसलमानों को गौहत्या के लिये जिम्मेदार मानना बेतुका तर्क है। जब कि नित्य गौमांस सेवी हिन्दुस्तान के बर्तानी शासकों ने अपने फूट डालो और राज करो नुस्खे के जरिये हिन्दू मुसलमान विभेद बढ़ाया जिसके कारण ही अंततोगत्वा भारत का धार्मिक आधार पर विभाजन भी हुआ। हिन्दुस्तानी मुसलमानों के बर्तानी राज ने भारत के पश्चिमी भाग व पूर्वी भाग के मुस्लिम बहुल इलाकों को नये मुस्लिम राष्ट्र का आकार दिया। दो द्वादशाब्दी या कहें चौथाई शताब्दी से एक वर्ष कम समय में पूर्वी पाकिस्तान ने चोला बदल कर अपने आपको बांग्ला देश घोषित कर डाला। पाकिस्तान के मौजूदा शासकों को भय सता रहा है कि उनके कब्जे का कश्मीरी भूभाग उनसे छिटक सकता है। बलूच व पख्तून कभी भी पाकिस्तानी सल्तनत के समर्थक नहीं रहे। पाकिस्तानी सैन्य मनोवृत्ति मानती है कि जिस तरह भारत ने पाकिस्तान से बांग्ला देश जुदा कर डाला उसकी पुनरावृत्ति बलूचिस्तान में भी संभव हो सकती है। अंततोगत्वा कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना की कल्पना का मुस्लिम राष्ट्र क्रमशः सिंध पंजाब बलूच व पश्तो क्षेत्रों के रूप में आने वाले सात वर्ष याने पौन शताब्दी पिछहत्तर वर्षों के अंतराल में राष्ट्र अस्तित्त्व खो भी सकता है। आज भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत में जनसंख्या विस्फोट का जो गुब्बारा आकाश में उड़ रहा है वह आने वाले दशक में दुनियां की मुस्लिम आबादी वाला राष्ट्र राज्य बन सकता है। राजनीतिक जरूरत केवल इस बात की है कि भारत का हिन्दू यह घोषणा करे कि इतर धर्मावलंबियों को हिन्दू धर्मान्तरण भारत की शास्त्र सम्मत प्रकृति के अनुकूल है। अंततोगत्वा अखंड भारत - उत्तरम् यः समुद्रस्य हिमाद्रेश्च दक्षिणम् वर्षम् तद् भारतम् नामः भारती तस्य सन्तति। जिस तरह यूरप में जर्मनी का जर्मन राष्ट्रत्व पुनर्जीवित हुआ उसी तरह अखंड भारत विभिन्न भाषा भाषियों व संप्रदायों मजहब अलग अलग होने के बावजूद एक ऐसा गणतंत्र होगा जिसमें विविधता में एकता का समेकित भारत राष्ट्रवादिता निहित होगी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दलित छात्र तथा दलित अध्यापक वर्ग बीफ महोत्सव का आयोजन करता रहता है। महिषासुर को भगवती ने मार डाला था। वे लोग जो बीफ महोत्सव प्रेमी हैं कभी कभी महिषासुर उत्सव भी मनाने का मन बनाते हैं। दुनियां के हर आदमी को पूर्ण निरामिष शाकाहारी भोजन करने वाला मंतव्य भी ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ सिद्धांतानुसार भी पूर्णतः उपलब्ध किया जाने वाला लक्ष्य नहीं है। भारत में हिन्दू मुसलमान समूहों के बीच विग्रह रेखा का निर्माण बर्तानी राज ने किया। अंग्रेज व यूरप के अन्य समाज को गो मांस एक प्रिय भोज है। बर्तानी राज ने हिन्दू मुस्लिम विभेद को बढ़ाने में अपने बीफ भोज का प्रयोग बड़ी चतुरता से किया। औसत मुसलमान हिन्दुस्तान सहित जहां जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है अपनी भोजन परिपाटी को मुसलमानों में लोकप्रिय बनाने का राजनीतिक षडयंत्र था।
5. इसलिये हिन्दुस्तानी हिन्दू मुसलमानों को मुगल सल्तनत सहित दिल्ली व सूबों में राज करने वाले मुसलमान बादशाहों नवाबों आदि के द्वारा इस्लामी सल्तनत के दौरान गाय की हत्या या कुर्बानी को अपनी शासन व्यवस्था का मुख्य बिन्दु कभी स्वीकार नहीं किया। ज्यादातर इस्लामी सल्तनतें हिन्दुओं की गो भावना का सम्मान करते हुए गोवध पर रोक लगाती थीं। समूची इस्लामी सल्तनत में गिने चुने बादशाह ही ऐसे थे जिन्होंने गोवध को प्रोत्साहित किया। इसलिये गाय को हिन्दू मुस्लिम विभेद का कारक तत्व नहीं माना जा सकता। गोवध को पूर्णतया रोकने के लिये भारत की सरकार को लोकमत जागृत करना होगा। ज्यों ज्यों शहराती संस्कृति बढ़ती जायेगी सामिष भोजन और गौमांस के प्रति मांस भोजी आकर्षण बढ़ता ही रहेगा। इसलिये हिन्दुस्तानी सरकार को सर्वधर्म समभाव का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव है उसको ध्यान मे रखते हुए ख्रिस्ती धर्मावलंबियों और इस्लाम धर्मावलंबियों में यह संदेश पहुंचाने की तात्कालिक जरूरत है कि भारत के जो लोग हिन्दू कहलाते हैं उनमें सनातन धर्म में आस्था रखने वाले विचार पोखर में अन्य धर्मों से सनातन धर्म में धर्मान्तरण सनातन धर्मशास्त्र सम्मत नहीं है। वेटिकन सहित ईसाई धर्म प्रचारक यह मानने लग गये हैं कि धर्मान्तरण अब उतना सरल नहीं रहा जितना आज से 50-60 वर्ष पहले था। ईसाई व मुस्लिम मतावलंबियों को जब यह यकीन हो जायेगा कि सनातन धर्मावलंबी दूसरे मजहबों से सनातन धर्म में धर्मान्तरण विवेक संगत नहीं मानते हैं उनका विश्वास हिन्दू समाज पर बढ़ेगा। असहिष्णुता सहित जितने बिन्दु आज भारतीय समाज में उभर रहे हैं उन्हें नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय दूसरे धर्मावलंबियों को हिन्दू धर्म में धर्मान्तरित करना भारत के लोगों में आस्था को व्यक्ति परिवारमूलक मानते हुए धर्मान्तरण पर सटीक बहस शुरू कर दी है इससे घृणा, सांप्रदायिक दंगे जैसे मसलों में कमी आयेगी। धर्मान्तरण में यकीन न करने वाले हिन्दू धर्मावलंबियों की संख्या आज विश्व धर्मों में तीसरे क्रम में है। अगर मोदी सरकार शुद्धि आंदोलन घर वापसी मुसलमानों व ईसाईयों को सामूहिक रूप से फिर हिन्दू धर्म में लौटाने पर रोक लगायेगी तो भारत का सम्मान विश्व में बढ़ेगा और सांप्रदायिक सद्भाव का वातावरण तैयार होगा। इसलिये भारत की तात्कालिक जरूरत यह तय करने की है कि हिन्दू धर्म या हिन्दू समाज जीवनशैली अथवा आस्था शैली को जन्माधारित मानता है। दूसरे मजहबों से लोगों को हिन्दू धर्म में लौटाना या जोड़ना धर्मशास्त्र सम्मत नहीं है। महात्मा गांधी ने छुआछूत के लिये धर्मशास्त्र का सहारा लिया। नरेन्द्र मोदी भारत के हिन्दू समाज से दुनियां को यह कहलायें कि हिन्दू दूसरे धर्मों से लोगों को हिन्दू धर्म में लाने के के विचार का समर्थक नहीं है। असहिष्णुता वाली सारी बातें स्वयं हल हो जायेंगी। जिस दिन हिन्दुस्तान का हिन्दू यह घोषणा करेगा कि हिन्दू धर्म दूसरे धर्मों से हिन्दू धर्म प्रदेश को धर्मसम्मत, शास्त्रसम्मत तथा नीतिसम्मत नहीं मानता। इसलिये प्रधानमंत्री जी को चाहिये कि अस्पृश्यता निवारण संबंधी महात्मा गांधी के शिवसंकल्प और अपने गुरूमंत्र सबका साथ सबका विकास को अमली जामा देने के लिये अपने मंत्रिमंडल को प्रेरित करें कि 1. अस्पृश्यता निवारण का गांधी संकल्प 2. मंदिरों में दलित प्रवेश 3. इतर धर्मावलंबियों का धर्मान्तरण या शुद्धि आंदोलन अथवा घर वापसी। इन तीन मसलों पर सनातन धर्मावलंबियों को मूलाधार धर्मशास्त्र में क्या अस्पृश्यता, दलित मंदिर प्रवेश न करना व धर्मान्तरण क्या शास्त्र सम्मत कृत्य हैं ? देश के पांचों शंकराचार्यों की इन तीनों बिन्दुओं पर क्या राय है ? उनकी राय सुप्रीम कोर्ट के अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा प्राप्त कर सर्वोच्च न्यायालय के विचारार्थ बंद लिफाफे में प्रस्तुत हो। अस्पृश्यता मानने वालों व अस्पृश्यता समाप्ति के चाहने वाले संगठन या व्यक्ति अपना अपना पक्ष स्थापित परंपरा शास्त्र सम्मत प्रमाणों सहित सर्वोच्च न्यायालय के विचारार्थ प्रस्तुत करें ताकि हिन्दू जीवन पद्धति जिसके वर्तमान में दलित संज्ञा से व्यक्त किये जाने वाले समूह भी अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहें उन्हें भी अवसर दिया जाये। साथ ही भारत के कबायली जिसे अंग्रेजी में ट्राइब कहते हैं क्या वे भारतीय आस्थामूलक परिधि से बाहर हैं ? शैड्यूल्ड ट्राइब संज्ञा से जाने जाने वाले भारतीय समूहों की आस्था संबंधी विवेचना का भी अवसर दिया जाना चाहिये ताकि समाज में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को भारतीय आस्थामूलक मान्यताओं के आधार पर न्याय पथ का अनुसरण करने की प्रेरणा दी जा सके। ज्योंही भारत के मूल निवासी अथवा भारत धर्म से प्रभावित वे लोग जो भारत में आकर भारत के होगये उनके भारत धर्म को विश्व के इतर धर्मावलंबी भी समझ सकें। उन्हें यह यकीन हो कि हिन्दुस्तान का रहने वाला वह जनसमूह जिसे हिन्दू कहा जाता है धर्मान्तरण पर यकीन नहीं करता। उसकी मान्यता भीष्माचार्य के उस कथन में निहित है जो उन्होंने धर्म की व्याख्या करते हुए राजा युधिष्ठिर से कही - ‘ध्यायन, स्तुवन, नमस्यश्च यजमानस्तथैव’। धर्म के चार चरण ध्यान धर्म, प्रार्थना धर्म (ख्रिस्ती प्रार्थना पद्धति), नमस्या (नमाज अता करने का और्व योग), इन तीनों के पश्चात आता है यज्ञ हवन करने वाला, वायु शुद्धि वायु प्रदूषण निराकरण करने वाला लोकहित संवर्धक, परिवार व व्यक्ति को छिन्न संशय व्यक्तित्त्व देने वाली आस्था प्रथा जिसका अनुकरण थोड़ी बहुत मात्रा में आज भी उन लोगों द्वारा संपन्न होरहा है जिन्हें लोग हिन्दू कहते हैं। मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व के एक पूरी शताब्दी के पश्चात गुर्जर भूमि ने हिन्दुस्तान को अद्भुत नेतृत्व क्षमता वाले व्यक्ति नरेन्द्र दामोदरदास मोदी व्यक्तित्त्व के रूप में नया नेतृत्व दिया है जिसकी जीवन पुस्तक के पन्ने पढ़े जा सकते हैं। सदाचार, शिष्टाचार, विरोधी के साथ भी शिष्ट व्यवहार जिसका राजधर्म वाला स्वधर्म है वही हिन्दुस्तान को Soft State से Smart State में तब्दील कर सकता है। जो अजातशत्रु भाव - राजा रामचन्द्र व युधिष्ठिर में था उसका अनुसरण लोकतंत्रीय व्यवस्था के विभिन्न पेचों दर पेचों के बावजूद नरेन्द्र दामोदरदास मोदी संविधान सम्मत व्यवस्था को कारगर बना सकते हैं। सिद्धान्त यह है ‘न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः’ दोस्त व दुश्मन से शिष्ट व्यवहार।
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