Monday, 9 November 2015

त्रासद गरीबी से कैसे उबरें हम हिंदुस्तानी ?
सीस पगा न झगा तन में अरु पांय उपानह की नहिं सामा।
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रह्यो चकि सों वसुधा अभिरामा।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपुनो नाम सुदामा।
  बहुत से बनिये व्यापारी जीवन उत्तरार्ध में उपराम लेते हैं। पिलानी से कोलकाता जाने वाले बलदेव दास बिड़ला जब मारवाड़ के अपने गांव से निकले उनके पास शरीर में पहने कपड़ों के अलावा एक लोटा और कुंऐं से पानी खींचने के लिये रस्सी मात्र थी। माहेश्वरी बनिया बलदेव दास ने कोलकाता में अपना व्यापार शुरू किया। निरंतर चालीस वर्ष के उद्यम से तत्कालीन बर्तानी राज ने उन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी। साठ वर्ष की उम्र पार हो जाने पर उन्होंने अपने बेटों को बुला कर कहा - उपराम ले रहा हूँ इसलिये अब काशी वास करूँगा। राजा बलदेव दास बिड़ला ने अपने बेटों से कहा - दिल्ली में एक भव्य काली मंदिर बनवाओ। साथ ही मथुरा में कृष्ण जन्म भूमि पर मंदिर निर्मित कराओ। राजा बलदेव दास बिड़ला ने अपने बेटों से यह भी कहा - कृष्ण मंदिर मस्जिद से जुड़ा भी रहे कोई हर्ज नहीं किन्तु मुसलमानों की धार्मिक भावनायें आहत न की जायें। अहर्निश व्यापार से धनार्जन करने वाले सहृदय राजा बलदेव दास बिड़ला श्रीमद्भागवत महापुराण के सातवें स्कंध के चौदहवें अध्याय के आठवें श्लोक से अत्यंत प्रभावित थे - यावत् भ्रियेत जठरम् तावत्स्वत्वम् हि देहिनाम्। यही सदाचार का श्रेष्ठ उदाहरण है। पेट की जरूरत के अन्न पर आपका अधिकार है। राज बलदेव दास बिड़ला कोलकाता सहित हिन्द के असरदार उद्योग व्यापार अधिपति थे। उन्होंने साठ वर्ष की उम्र में काशीवास का निर्णय लिया। भारत का उत्कृष्ट कोटि का धनाढ्य व्यक्ति गंगातट पर काशी के जन सामान्य में रम गया। उनका अपना होगया। उसने संपन्नता को भुला कर आम आदमी की जिन्दगी बिताने का रास्ता चुना। राजा बलदेव दास बिड़ला की तरह तब सैकड़ों लोग जिन्दगी भर कमाई धमाई कर बुढ़ापे में सड़ कर मरने के बजाय काशी की गलियों गंगा घाटों पर अपनी शेष जिन्दगी बिताना पसंद करते थे। तब हिन्दुस्तान में अमीर गरीब के बीच में चौड़ी खाई नहीं थी। महात्मा गांधी ने गरीबी ओढ़ कर आजादी के दीवानों का मार्गदर्शन किया। संपन्न लोग सादगी से रहने का रास्ता अपनाने लगे। गांधी ने इसे ओढ़ी हुई गरीबी कहा। उन्होंने गरीब को दरिद्रनारायण कह कर मनुष्यता को श्रेय दिलाया। गांधी रामभक्त होनेे के साथ साथ आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के पारंगत व्यक्तित्त्व थे। उनसे पहले इस हिन्दुस्तान में स्वामी विवेकानंद दरिद्रनारायण में नारायण के दर्शन करने वाले राजऋषि थे जिनके बारे में कवि सुमित्रानंदन पंत ने कहा - 
मां अल्मोड़े में आये थे जब राजर्षि विवेकानंद फूल पांवड़े बिछे हुए थे मना हुआ अतुलित आनंद।
          महात्मा गांधी ने दादा भाई नौरोजी के देश प्रेम तथा देशबंधुओं के लिये उनकी जो मनोभावना थी उसका चित्ताकर्षक ब्यौरा हिन्द स्वराज में प्रस्तुत किया। सैयद बदरूद्दीन तैयब जो न्यायमूर्ति थे उनकी कन्या रेहाना बहन कृष्ण भक्ति में तल्लीन रहा करती थीं। यह ब्लागर जब गांधी तत्व विचार का विद्यार्थी था रेहान बहन जो तब काका साहब कालेलकर की सन्निधि में रहती थीं, कृष्ण भक्ति पर संवाद करतीं। भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत के कृष्ण प्रसंगों पर चर्चा करती रहती थीं। यह बातें तो गांधी युग की हैं। महात्मा गांधी से अढ़ाई हजार वर्ष पहले आचार्य चणक नंदन विष्णुगुप्त ने कौटिल्य अर्थशास्त्र लिख कर हिन्दुस्तान की राजनीतिक मर्यादाओं दुर्बल, दलित, पलित तथा विकलांग की मदद राज्य किस तरह कर सकता है इसका सटीक विश्लेषण अर्थशास्त्र के उस सर्वोत्कृष्ट विद्वान आचार्य चाणक्य ने अपने राजनीतिक ग्रन्थ 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' में विस्तारपूर्वक किया है जिसे आचार्य चणक नंदन होने के कारण लोग चाणक्य नाम से ज्यादा जानते हैं। उन्होंने कौटिलीय अर्थशास्त्र का सृजन किया, वे कहते हैं -
सर्वस्यास्य यथा न्यायम् भूपतिः संप्रवर्तकः, सरित इव समुद्रम् सम्पदस्तम् विशंति। 
2. हिन्दुस्तान की आज की आबादी एक अरब सत्ताईस करोड़ है। जनसंख्या विशेषज्ञों का मानना है कि देश की जनसंख्या आने वाले पैंतीस वर्षों में इतनी बढ़ जायेगी कि भारत दुनिया की आबादी में पहली पंगत का राष्ट्र हो सकता है। आज की वैज्ञानिक विचारशील दुनिया में जनसंख्या बढ़ने के क्रम को लोगों के प्यास भूख निवारण उनके रहने की व्यवस्था तथा स्वास्थ्य शिक्षा एवं रोजगार के नजरिये से देखा जाता है। यह दुनियावी आकलन है। दूसरी ओर बढ़ती हुई जनसंख्या एक नया संसार भी उत्पन्न करती है। नये नये लोग धरती में आते हैं। अपने सुकृत से मनुष्यता को नया आकार भी देते हैं। हिन्दुस्तानी पारंपरिक नजरिये से देखा जाये तो यह कल्प वाराह कल्प है। पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक लोग धरती की आयु की कल्पना वैज्ञानिक दृष्टि से करते हैं। खगोल शास्त्र के अनुसार मंगल ग्रह को भारतीय वाङमय मानसिकता भौम ‘मंगलो भूमिपुत्रश्च’ भारत के मंगल यान सहित संयुक्त राज्य अमरीका का अंतरिक्ष विज्ञान संगठन जिसे ‘नासा’ कहा जाता है उनका भी मानना है कि अंगारे सरीखे मंगल ग्रह में जीवन होने की गुंजाइश बहुत ज्यादा है। भारतीय मंगलयान की सफलता यह प्रतीति करा सकती है कि हिन्दुस्तान की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार भूमि और भौम ग्रह में निकटस्थ आत्मीयता है। स्काटलैंड के मूल निवासी अंगुशडीटन आर्थिकी नोबल पुरस्कार गरीबी तथा कुपोषण के कारण भारत के आधे से ज्यादा बच्चों को सुपोषित मानने के लिये तैयार नहीें हैं। भारतीय मान्यता के अनुसार पिता शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है - ‘सः पिता यस्तु पोषकः’। सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत में कुपोषित पांच वर्ष से कम उम्र के लड़के लड़कियों की संख्या अंगुशडीटन के अनुसार आठ करोड़ से ज्यादा है। 69 वर्षीय एडनबरा में जन्मे संयुक्त राज्य अमरीका के प्रिंसटन विश्वविद्यालय के शोधक अंगुशडीटन ने अपने विश्लेषण - उपभोग गरीबी व कल्याण मार्ग अनुसंधान में भारत की भीषण असमानता वाली गरीबी को पानीपत की तीसरी महत्वपूर्ण लड़ाई से जोड़ा है। वे मानते हैं कि भारत की आर्थिकी असमानता की जड़ें अढ़ाई सौ वर्ष से ज्यादा पुरानी हैं। पानीपत की तीसरी महत्वपूर्ण लड़ाई से करीब सवा सौ वर्ष पहले जब मुगल बादशाहत ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपनी तिजारत सूरत में शुरू करने की इजाजत दी थी तब से भारत के गांवों में गैर बराबरी वाला वातावरण ईस्ट इंडिया कंपनी बहादुर के व्यापारिक उद्देश्यों से शुरू हुआ। उससे पहले इस्लामी सल्तनत सहित जो भी राजतंत्र राजगृह पाटलिपुत्र और दिल्ली में राज करते थे हिन्दुस्तानी गांव के लोग एक प्रकार से गांव रिपब्लिक में अपनी आवश्यकतायें संपूर्त करने के लिये गांव पूरी तरह आजाद थे। राजगृह पाटलिपुत्र दिल्ली अथवा उनके जनपदीय सूबेदारों अथवा मांडलिक राजाओं का गांवों से वास्ता केवल वार्षिक कर देना था। गांव के मुखिया द्वारा ग्रामीणों से कर वसूला जाता था उसका एक अंश कर वसूलकर्ता स्वयं रखता था व शेष अस्सी फीसदी जनपद राजा को भेंट करता था। जनपदों के प्रमुख कराधान मगध नरेश जरासंध पाटलिपुत्र मगध राज्य के नये अधिष्ठाता चन्द्रगुप्त मौर्य को पहुंचता था। मगध नरेश अथवा धार नगरी के राजा भोज सहित थानेश्वर के हर्ष गुप्त साम्राज्य के अधिपति समुद्र गुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य सहित भर्तृहरि सरीखे राजाओं का गांव में दखल बिल्कुल नहीं था। जो बात आज अंगुशडीटन कह रहे हैं वह महात्मा गांधी ने आज से एक सौ आठ वर्ष पूर्व हिन्द स्वराज के माध्यम से अपने अफ्रीका प्रवास काल में व्यक्त कर दी थी। मोहनदास करमचंद गांधी हिन्द स्वराज लिखने के पश्चात यूरप के अनेकानेक मूर्धण्य विद्वानों ने अपनी अपनी मातृभाषाओं में हिन्द स्वराज का भाषांतरण करा कर यह राय व्यक्त की कि यूरप की दुर्दशा का मूल कारण औद्योगिक क्रांति है। जिसे जन सामान्य विकास पथ मानता है उसे यूरप के विद्वानों ने विनाश पथ का पहला मील पत्थर माना। हिन्द स्वराज की मानस कल्पना करने से पूर्व अहिंसा के मसीहा मोहनदास करमचंद गांधी ने हिन्दुस्तान के उन युवाओं को विलायत में सुना। उनका मंतव्य रक्त क्रांति के द्वारा आजादी प्राप्त करना था। महात्मा नौजवान क्रांतिकारियों की शस्त्र क्रांति शैली के पक्षधर तो बिल्कुल नहीं थे पर उन्होंने क्रांतिकारी भारतीय युवाओं से हुई चर्चा व विचार विमर्श को एक विचार के प्रति विचार के तौर पर प्रस्तुत किया। उनकी जो बातें क्रांतिकारियों से हुईं उस विचार विमर्श का निष्कर्ष अधिपति और वाचक संवाद के रूप में मोहनदास करमचंद गांधी ने इंडियन ओपीनियन के जरिये बीस अध्यायों के माध्यम से प्रस्तुत किया। अमृत लाल नानावटी गुजराती भाषा में रचित हिन्द स्वराज के संवाद में अधिपति और वाचक शब्दों के लिये हिन्दी भाषा में क्रमशः संपादक व पाठक शब्द उपयोग में लाये। यदि गुजराती भाषा की तरह हिन्दी अथवा भारत की दूसरी भाषाओं में हिन्द स्वराज का अनुवाद प्रस्तुत करते समय अमृत लाल नानावटी सहित सभी भाषान्तरणकार उन्हीं शब्दों का प्रयोग करते जो अधिपति व वाचक संवाद के रूप में महात्मा गांधी ने स्वयं प्रयोग किये थे तो गुजराती में गांधी तत्वज्ञान हिन्द स्वराज को हृदयंगम करने में गुजराती से इतर भारतीय भाषा भाषियों को सटीक रूप में उपलब्ध होता इसलिये तात्कालिक जरूरत यह है कि भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री जिनकी अपनी मातृभाषा गुजराती है महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तुत हिन्द स्वराज का सुसंपादन उसी तरह करने का भगीरथ प्रयास करें जिस तरह चारों वेदों का संपादन कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने किया और वैदिक ऋचाओं, छन्दों को हिन्दुस्तानी वाङमय में आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया। हिन्द स्वराज का सुसंपादित संस्करण गुजराती भाषी फिर पढ़ें हिन्दी सहित सभी भारतीय लोक भाषाओं में गांधी के हिन्द स्वराज को प्रस्तुत किया जाये तभी भारत के गांवों का आर्थिकी जागृति का ऊषाकाल शुरू हो सकता है और भारतवासी छिन्न संशय होकर हिन्द के गांवों व स्मार्ट शहरों में हिन्दुस्तानियत का पैगाम प्रसारित कर सकते हैं। भारत में हिन्द स्वराज के बारे में मोहनदास करमचंद गांधी के राजनीतिक गुरू प्रोफेसर गोपाल कृष्ण गोखले ने एक मूर्ख की रचना कहा था। मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी पहली स्वभाषा रचना पर अपने राजनीतिक गुरू की बात को बिल्कुल भी अन्यथा नहीं लिया। वे केवल अपने मंतव्य पर टिके रहे। महात्मा के तीन आचार्यों में दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर जिन्हें लोग काका साहेब कालेलकर के नाम से जानते हैं हिन्द स्वराज लिखने के पचास वर्ष पश्चात महात्मा की बात को सिरे से नकार दिया। हिन्द स्वराज का खुला बहिष्कार तो पंडित नेहरू व महात्मा के एकादश व्रतों के पूर्ण अनुयायी संत विनोबा ने हिन्द स्वराज पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की विरोध में कुछ नहीं कहा पर काका साहब कालेलकर ने पंडित नेहरू व संत विनोबा का उल्लेख करते हुए अपनी कलम से लिखा कि महात्मा का हिन्द स्वराज इस वैज्ञानिक युग में भारत स्वीकार नहीं कर सकता। संत विनोबा के सर्वोदय अभियान का उल्लेख करते हुए काका साहब कालेलकर ने कहा था कि विनोबा भी अपने सर्वोदय को क्रियात्मक आकार देने के लिये आधुनिक विज्ञान का सहारा लिये बिना आगे नहीं बढ़ सकते। महात्मा गांधी की इहलौकिक लीला 30 जनवरी 1948 को संसार छोड़ कर तिरोधान होगयी। वराह पुराण में एक कथा आती है। हर पैदा होने वाला व्यक्ति नीरोग रहे, प्रयत्न यह भी था कि मृत्यु का भय समाप्त होजाये। कोई मरे ही नहीं। नैमिषारण्य में अजर अमर लोगों की प्रदर्शनी हुई काफी लंबे अर्से तक अजरता, अमरता तथा रोगहीनता का सामाजिक सरोकार चलता रहा। मृत्यु असहाय होगयी जनसंख्या बढ़ गयी। बढ़ी हुई जनसंख्या में नये नये सरोकार आने शुरू होगये। नयी नयी समस्यायें उदित हुईं। अंततोगत्वा अजर अमर नीरोग लोगों को मानना पड़ा कि बढ़ी हुई अजर अमर जनसमूह में नये नये विकार आयेंगे। नई समस्यायें उठ खड़ी होंगी। अंततोगत्वा सृष्टि के सामान्य धर्म - जन्ममृत्यु को अजर अमर लोगों को भी स्वीकारना पड़ा। 
3. भारत की सोलहवीं लोकसभा के नेता नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने हिन्दुस्तान को नयी राह दिखायी है पर देश के गांवों में रहने वाले सवा तिरासी करोड़ से ज्यादा लोगों की आर्थिकी अत्यंत चिंतनीय विषय है। आज हिन्दुस्तान में एक अरब सत्ताईस करोड़ लोग बसते हैं। ऐसा महसूस होता है कि महात्मा गांधी जब 55 वर्ष के हुए उन्होंने कदमकुआं पटना में आल इंडिया स्पिनर्स ऐसोसियेशन - हिन्दुस्तानी लहजे में कहें तो चर्खा संघ अपनी 56वीं वर्षगांठ आश्विन बदी द्वादशी संवत् 1981 ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार उस दिन 24 सितंबर 1924 तारीख थी, महात्मा अपना जन्मदिन चर्खा द्वादशी के रूप में मनाते थे। हिन्दुस्तान सहित राष्ट्रसंघ के देश महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस के रूप में मना रहे हैं पर गांधी को चर्खा प्यारा था। वे जानते थे कि हिन्दुस्तान के गांवों की गरीबी का निवारण करने में चर्खे की बहुत बड़ी भूमिका है। आज महात्मा गांधी वाला आई. एस. ए. नहीं है पर भारतीय मिल मालिकों का आई. एस. ए. कारगर है। गांधी जिस आर्थिकी से हिन्दुस्तान की गरीबी नियंत्रित करना चाहते थे वह चर्खा, करघा व ग्रामीण उद्यमों के जरिये गांवों को स्वावलंबी बनाना था। गांधी के हिन्द स्वराज से भारत के अर्थशास्त्री तथा प्रबंधशास्त्री प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने गरीबी नापने का दूसरा रास्ता अपनाया। गरीबी रेखा का निर्धारण गरीब की क्रय शक्ति का निर्धारण करने के लिये उत्तर नेहरू युग से प्रयास होते रहे। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण सहित भारत राष्ट्र राज्य के घटक राज्यों सहित अखिल भारतीय स्तर पर जो तरीका जानकारियां एकत्रित करने के लिये अपनाया जारहा है उसमें प्रश्नकर्ता द्वारा पूछे गये प्रश्नों का निर्धारण के विशेषज्ञ भारतीय गांवों की आर्थिकी से भावनात्मक एकता रख पाते हैं। मूलतः प्रश्न निर्धारण की विधि आर्थिकी के अंग्रेजीदां विशेषज्ञों द्वारा होता है। उनकी दृष्टि अर्थशास्त्र की दृष्टि से सटीक हो सकती है किन्तु हिन्दुस्तान के गांवों की जमीनी हकीकत उससे बहुत भिन्न है। सर्वेक्षण तौर तरीके अंग्रेजी में तय होते हैं। उन्हें भारत की स्थानीय लोकभाषाओं में भाषान्तरित करने में भी त्रुटियां रहने से प्रश्नकर्ता प्रश्न को स्वयं ही सही सही नहीं समझता है। जब वह सर्वेक्षित उत्तरदाता का उत्तर सुनता है तो उसमें भी समझ बूझ का अंतर आने से सेंपल सर्वे उपादेयता विदित ही है। उत्तरदाता व्यक्ति सही सही स्थिति का ब्यौरा देने से कई कारणों से कतराता है जिससे सर्वेक्षण के आंकड़े सर्वेक्षित व्यक्ति की वास्तविक स्थिति का चित्रण होने के बजाय एक कृत्रिम वातावरण तैयार होता है। यही कारण है अंगुशडीटन को भारत में व्यवहृत होरही गरीबी रेखा अवधारणा के प्रति गहरा अविश्वास है। इन्दिरा गांधी शासनकाल से अद्यपर्यन्त गांवों की वास्तविक त्रासदी संशयग्रस्त सर्वेक्षण है। इसी बिन्दु पर प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्राध्यापक ने अपनी राय सुनिश्चित की है। अतएव पहली  जरूरत भारतीय संविधान के 73वें व 74वें संविधान संशोधन से जो सांस्थनिक स्वायत्तता वाली भूमिका गांव पंचायतों क्षेत्र पंचायतों व नगर पंचायतों सहित शहरी क्षेत्रों व जिला पंचायतों को संविधान भावना के क्रियान्वयन से मिलनी चाहिये उसे ग्राम क्षेत्र जिला पंचायत व नगर पंचायत नगर पालिका नगर निगम स्तर पर सामर्थ्य प्राप्त करने की पहली तात्कालिक जरूरत है ताकि संविधान में ग्राम क्षेत्र जिला व नगर इकाइयों को जो संवैधानिक स्तर मिला है उसका तात्कालिक क्रियान्वयन का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। गांधी आर्थिकी चिंतन पर पंडित नेहरू की पकड़ थी इसलिये उन्होंने ग्रामीण उद्यमिता का संवर्धन करने का जिम्मा विकेन्द्रित आर्थिकी के पुरोधा वैकुंठ ल. मेहता को सौंपा। वैकुंठ ल. मेहता ने गांधी आर्थिकी तथा अपने नेता पंडित नेहरू के ग्रामीण औद्योगीकरण के लिये सहकारिता का रास्ता अपनाया। सहकारिता पश्चिमी भारत व दक्षिणी भारत के गांवों में फल फूल रही है पर जिसे लोग हिन्दी बैल्ट या काउ बैल्ट कहते हैं वहां सहकारिता आंदोलन को राजनीतिक हस्तक्षेप का ग्रहण लग गया। उत्तराखंड नाम का नया नया बना राज्य जिसके सहकारी आंदोलन के बारे में एक वर्तमान विधायक तथा पूर्व में सहकारी मंत्री रहे महानुभाव का कहना है कि उत्तराखंड की तीन चौथाई सहकारी कागजों में जमीनी वास्तविकता से कोसों दूर है। अंगुशडीटन को भारतीयों द्वारा दारिद्र्य रेखा पर विगत शताब्दी के आठवें दशक में किये गये फैसलों पर गहरी आपत्ति है। वस्तुतः जब तक भारतीय नियोजन विद्या पर पंडित नेहरू का वर्चस्व था उन्होंने अवध के गांव गांव जाकर हर घर के कुटंब के हालातों को अपनी आंखों से देखा था। गांववासियों से पंडित नेहरू की गहरी आत्मीयता भी थी। उनकी पुस्तक ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ का आधार स्तंभ ही अवध के गांव हैं। इलाहाबाद, प्रतापगढ़, रायबरेली, सुल्तानपुर, उन्नाव, लखनऊ, फैजाबाद के गांव गांव घर घर के लोगों को पंडित नेहरू व्यक्तिगत रूप से जानते थे। गांवों की मूलभूत समस्याओं से वे भलीभांति वाकिफ होने के अलावा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अलावा तालुकेदारों, जमींदारों, नवाबों व राजाओं से निकटता रखते वाले नेता थे। आनंद भवन इलाहाबाद एक ऐसा जनसंगम था जहां हर तबके के लोग पंडित नेहरू से मिलने आते थे। पंडित नेहरू के दिमाग में गांधी का स्वतंत्रता वाला तरीका घर कर चुका था। वे अपने स्वराजिस्ट पिता पंडित मोतीलाल नेहरू के मुकाबले महात्मा गांधी के विचारों के साथ ज्यादा लगाव रखते थे। उनके जमाने में प्रोफेसर महालनवीस सरीखे जो अर्थशास्त्री अथवा योजनाकार गांवों के बारे में वार्ता करते, नेहरू गांवों के बारे में उन विशेषज्ञों से ज्यादा जानते थे इसलिये जब तक नेहरू जिन्दा रहे गरीबी रेखा की अवधारणा जोर नहीं पकड़ पायी। पार्थ सिन्हा एवं श्रीकांत त्रिपाठी के कथनानुसार अंगुशडीटन का अरविन्द पनगरिया के साथ भारतीय शिशुओं के आकार में छोटे होने संबंधी हलके विवाद का भी उल्लेख किया है। उदयपुर जिले के एक सौ पुरवों जिन्हें हिन्दुस्तान के कई हिस्सों में मौजा या तोक भी कहा जाता है उनका सर्वेक्षण किया गया। छूत की बिमारियों की रोकथाम के लिये न्यूनतम प्रबंध टीके लगाना भी उपलब्ध नहीं था। राज्य सरकार की तरफ से स्वास्थ्य सुरक्षा के न्यूनतम उपाय भी उपयोग में नहीं लाये जाते थे। गांव के लोगों को टीके लगाने के लिये भी निजी डाक्टरों को ऊँची रकम अदा करनी पड़ती थी। स्तंभकार का मानना है कि उदयपुर जिले में स्वास्थ्य सेवा में सुधार में कोई प्रगति नजर नहीं आती। श्रीमती इंदिरा गांधी के शुरूआती दस साला शासन प्रबंध में बड़े वेग से गरीबी हटाने की घोषणा हुई। गरीबी हटाने के बहाने उन्हें 1971 में भारत पर शासन करने का लोक समर्थन अधिकार तो मिल गया पर अमीर व गरीब के बीच का फासला बढ़ता गया। अमीर लोगों में गरीब व गरीबी के प्रति सहानुभूति के बजाय एक घृणा मिश्रित अरूचि का उद्भव हुआ। उन्होंने भारत भर में लोन डिले शुरू कर गरीब के प्रति सामाजिक असहिष्णुता का बीज बो डाला। लोन मेलों ने बैंकों के अधिकारियों व किसानों के बीच एक नये किस्म के दलालों का उद्भव होने से गरीबी हटाने के नाम पर आर्थिक भ्रष्टाचार का बोलबाला होगया। इन ही प्रतिकूल परिस्थितियों में गरीबी रेखा का निर्धारण ऐसे लोगों के द्वारा संपन्न हुआ जिसका नतीजा सामने है। गांवों में न रोजगार है न ही खेतीबाड़ी इसके अलावा कोई ऐसा धंधा भी नहीं है जिससे गांव के लोगों को परिवार की आमदनी बढ़ाने में हल्की फुल्की मदद ही मिल सके। श्रीमती इंदिरा गांधी का भारतीय गांवों संबंधी विश्लेषणात्मक अध्ययन उस स्तर का नहीं था जिस स्तर का पंडित नेहरू व उनके समकालीन राजनेताओं में गांधी आर्थिकी का प्रभाव था। श्रीमती इंदिरा गांधी अपने उन परामर्शदाताओं तथा प्रशासनिक विज्ञ लोगों से घिरी थीं जिन्हें गांवों की सही सही स्थिति का न तो सही अन्दाजा ही था न ही उन्होंने भारतीय गांवों की दुर्दशा स्वयं देखी ही थी इसलिये इंदिरा जी ने जो रास्ता गरीबी निर्धारण के लिये सुनिश्चित किया वह पूरी तरह उलट बांसी वाला उल्टा रास्ता था। राजनीतिक स्तर में उनके जो सहयोगी गांवों के बारे में जमीनी जानकारी रखते थे वे भी इंदिरा जी के डर से सही सही बात को बताने की स्थिति में नहीं थे। इसलिये अंगुशडीटन का जो दृष्टिकोण भारत के गांवों की गरीबी के बारे में प्रकाश में आया है वह वर्तमान सरकार की आंखें खोलने के लिये पर्याप्त है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पनगरिया सहित देश के आर्थिकी विशेषज्ञ समूह को ग्रामीण आर्थिकी के मूूल तत्वों को सटीक रूप से समझने के लिये गांवों के लोगों के दोनों हाथों को तत्काल काम मुहैया कराना खेतीबाड़ी से होरही आमदनी को सहारा देने के लिये नितांत आवश्यक है। इसलिये पहली जरूरत यह है कि गांव की महिला श्रम शक्ति को सशक्त बनाया जाये। हर महिला अपने फालतू समय में चर्खा कताई, हाथ बिनाई व दस्तकारी के कामों से जोड़ कर खेती की आमदनी को सहारा देने के लिये परिवार की महिला श्रम शक्ति को सामर्थ्य दी जाये। केवल महात्मा गांधी द्वारा सुझाये गये चर्खा कताई हाथ बिनाई व हथकरघा एवं हाथ की दस्तकारियों से परिवार की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। नीति आयोग और भारत सरकार को ग्रामीण रोजगार गारंटी से चर्खा, कर्घा, हाथ बिनाई के तीन कामों को स्किल्ड लेबर श्रेणी में रख कर अर्थ वर्ष में कम से कम 50 दिन के लिये रोजगार गारंटी से जोड़ा जाना चाहिये। गांधी आर्थिकी वाला रास्ता ही गांवों में ग्रामीण औद्योगीकरण की आधारशिला रख सकता है। हर गांव में सामूहिक गौपालन पशुपालन के साथ साथ जिसे पश्चिमी नजरिये से सोचने वाले भारतीय आर्थिक चिंतक ‘ऐनीमल होस्टल’ कह रहे हैं हर गांव में ऐसे पशुशालायें संकल्पित की जायें। गांवों के मौजों, पुरवों तथा तोकों में रहने वाले कम से कम सात और अधिक से अधिक सोलह परिवारों के स्वयं सहायता समूहों के द्वारा पशुशालायें सृजित हों। स्वच्छ गांवों की अवधारणा के लिये प्रत्येक पशुशाला के समानांतर बायो गैस संयत्र लगे। गांव की सफाई परिवारों के शौचालय इन बायो गैस केन्द्रों से संयोजित हों। पशुओं के लिये चरागाहों का बन्दोबस्त भी गांवों की उस जमीन में रचे जायें जहां खेतीबाड़ी संभव न हो। 83.3 करोड़ आबादी जो आज भी गांवों में बसर कर रही है जिसे स्वातंत्र्योत्तर अड़सठ वर्षों में उनकी आर्थिकी पर असर करने वाला कोई चमत्कार नहीं हुआ है। संपन्न व्यक्ति की संपन्नता बेतहाशा बढ़ी है। 1957 से 1959 तक धीरूभाई अंबानी मुंबई में माहवारी अढ़ाई सौ रूपये कमाते थे। बीस वर्ष के बाद जब धीरूभाई अंबानी ने गाजियाबाद जिले के डासना गांव में पोलियस्टर सूत का कारखाना चालू किया तो वे भारतीय उद्योगपतियों की पंगत में जुड़े। पिछले अढ़तीस वर्षों में अंबानी घराना हिन्दुस्तान का उद्योग घराना होने के साथ साथ दो पीढ़ियों की उद्यमिता ने मुकेश अंबानी व उनके अनुज अनिल अंबानी को भारत के मुख्य उद्योगपति व भारत का धनकुबेर बना डाला। भारतीय उद्योग घरानों में टाटा घराना व बिड़ला घराना पिछली पांच पीढ़ियों से अपने लिये उचित स्थान बनाये हुए हैं। ये दोनों घराने टिकाऊ होने के साथ साथ समर्थ भी हैं। जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ तो लोग उद्योग घरानों में टाटा बिड़ला डालमिया का नाम लेते थे। टाटा घराना और बिड़ला घराना उद्यमिता पिछले पांच पीढ़ियों से निरंतर गतिशील है परंतु रामकृष्ण डालमिया सरीखा औद्योगिक व्यक्तित्त्व पंडित नेहरू के राजघराने की तरह औद्योगिक घरानों में बेटी की तरफ बढ़ा। डालमिया जी की पुत्री रमा डालमिया नजीबाबाद के धनी श्रेयांस प्रसाद जैन को ब्याही गयी थी। डालमिया जी की उद्योग घराना बिटिया दामाद के मार्फत हिन्दुस्तान के सबसे पुराने अखबार टाइम्स आफ इंडिया के मार्फत अपने बेटी दामाद अस्तित्व पर टिकी रही पर डालमिया जी की उद्यमशीलता पराभव की ओर उन्मुख होगयी। घराने औद्योगिक हों, व्यापार वृत्ति वाले हों, सांस्कृतिक तथा नृत्य वादन वाले ही क्यों न हों भारत में घराना संस्कृति का अपना सांस्कृतिक वजूद नयी औद्योगिक शहराती दुनिया के बावजूद विद्यमान है। एक नयी घटना और हुई है वह राजनीतिक क्षेत्र में घराना सभ्यता की पैठ। कश्मीर से चलें वहां शेख अब्दुल्ला फारूख अब्दुल्ला तथा उमर अब्दुल्ला का तीन पीढ़ियों वाला राजघराना जम्मू कश्मीर के नये राजघराने मुफ्ती सईद और महबूबा - बाप बेटी का राजघराना जो इस समय भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक सहयोग से सत्तासीन है। पंजाब का पिता पुत्र राजनीति का बादल घराना भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राय में अफ्रीकी नेता मंडेला और प्रकाश सिंह बादल में अंगद का पांव अड़ा रखने की खानदानी ताकत उपलब्ध है। बाप बेटे की पंजाब वाली मेढ़ी भी एक प्रमुख राजनीतिक घराना वाली ताकत है जिसके पीछे अकाल तख्त की आस्था संबल देरही है। खानदानी राजतंत्र का तीसरा घराना अपने आपको जातपांत तोड़ो अभियान के प्रमुख डाक्टर राममनोहर लोहिया से जोड़ने वाले धरती पुत्र सैफई नंदन मुलायम सिंह यादव हैं। डाक्टर लोहिया की चौखंभा राजकरण वाली सिद्धि से मुलायम सिंह यादव कितने प्रभावित हैं यह अभी स्पष्ट नहीं है पर उ.प्र. में छोटे लोहिया नाम से प्रसिद्ध जनेश्वर मिश्र का राजनीतिक वरदान मुलायम सिंह को मिलता रहा है। वे स्वयं समाजवादी सुप्रीमो हैं, पुत्र अखिलेश मुख्यमंत्री हैं, सहोदर भाई व चचेरे भाइयों भतीजों का पूरा जमावड़ा भारतीय संसद की पांच आसनों पर काबिज है। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव उनकी धर्मपत्नी राबड़ी देवी तथा पुत्रगण बिहार में यादव सत्ता के लिये प्रयत्नशील हैं। लालू यादव घराना लालू प्रसाद यादव को न्याय पथ के मील के पत्थर ने रोक दिया पर लालू हिम्मत हारने वाले व्यक्ति नहीं हैं। वे बिहार में अपनी उपस्थिति पक्ष अथवा विपक्ष किसी भी तरह अपने आपको खड़ा रखने की राजनीतिक घराना वाली शक्ति के स्वामित्वधारक हैं। पारिवारिक राजतंत्र का भारतीय राजधर्म का सबसे ताकतवर स्त्रोत द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम के प्रमुख एम. करूणानिधि उनके पुत्र की राजनीतिक विरासत है। यह राजनीतिक घराना भारतीय तमिल राजनीति का स्तूप है। कर्णाटक में बाप बेटे की राजनीतिक घराने की शक्ति का एक मुख्य स्त्रोत पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा व उनके पुत्र कुमार स्वामी हैं। देवगौड़ा का पूरा परिवार करूणानिधि की तरह राजनीतिक घराना है। पारिवारिक राजनीति के दो बड़े धड़े महाराष्ट्र में हैं। बाला साहब ठाकरे व उनके पुत्र उद्धव ठाकरे की सिंह गर्जना और भारतीय राजनीति केे पहलुओं को बारीकी से समझने वाले शरद पवार तथा उड़ीसा की उत्कल राजनीति के चमकीले नक्षत्र बीजू पटनायक के यशस्वी नवीन पटनायक का एकच्छत्र राज्य। कश्मीर के मुफ्ती सईद-महबूबा, प्रकाश सिंह बादल-सुखबीर सिंह, मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव, लालू यादव-राबड़ी देवी व उनके दोनों पुत्रों वाली राजनीतिक घराना राजनीति से एकदम अलग राजनीति करने वाली तीन मातृशक्तियां हैं। तमिलनाडु की जयललिता, पश्चिम बंग की ममता बनर्जी तथा उत्तर प्रदेश की मायावती, इन तीनों में तमिल जन सेवी जयललिता गुरू शिष्या प्रयोजन वाली महाभागा हैं। उनकी ही तरह उ.प्र. की मायावती भी गुरू शिष्या परंपरा वाली हैं और हिम्मत वाली मातृसत्ता हैं। ममता बनर्जी इनसे कुछ भिन्न है पर ये सभी सुप्रीमो राजनीतिक हैं। भारत के प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये अरविन्द केजरीवाल भी सुप्रीमो राजनीति के प्रवर्तक हैं। राजनीतिक दंगल में नौसिखिये अरविन्द केजरीवाल एक सौ सांसद नहीं चार सांसद जुटा पाये पर अपना प्रतिद्वंदी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को ही मानते हैं। 130 वर्ष पुरानी इंडियन नेशनल कांग्रेस की सदर सोनिया गांधी अपने लाड़ले पुत्र को हिन्दुस्तान का शाहनशाह बनाने का सपना देखती रही हैं। ये सभी राजनीति अखाड़ों के पहलवानों को सही परिप्रेक्ष्य में पहचानने की क्षमता केवल 600 श्लोक वाली कौटिल्य अर्थशास्त्र में है। अंगुशडीटन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को गरीबी रेखा वाले प्रकरण में राजनीतिक सुप्रीमो जन सहित यह रास्ता दिखा दिया है कि गरीबों का सामना करने की एकमात्र शक्ति गांधी के चर्खे और हथकरघे में ही है। गांव खेतीबाड़ी पशुपालन गांव की सेहत संरक्षा गांव की सफाई को तभी कारगर बनाया जा सकता है जब भारत सरकार द्वारा भारतीय गांवों को इजरायली तौर तरीकों से पुनर्स्थापित किया जाये। महिला श्रम शक्ति को चर्खा हाथ बिनाई व करघा से सामर्थ्य दी जाकर गांव के लोगों की दैनिक आमदनी का इजाफा किया जाये। गांवों की निराशा को भगाने का एकमात्र उपाय गांव की हर मां बहन के हाथ में चर्खा देना, चर्खा कताई तथा करघा बुनाई के काम से गांव में परिवार की आमदनी को बढ़ाया जा सकता है। वैकुंठ ल. मेहता ने 1953 से 1963 तक दस वर्ष सघन क्षेत्र योजना के जरिये गांवों में खादी उद्यमिता बढ़ाई। उन्हें पंडित नेहरू का समर्थन था। वे भारत में इजरायली पद्धति का गांव विकास करने के लिये उद्यत थे पर पंडित नेहरू व वैकुंठ भाई के निधन के पश्चात रास्ता बदल गया। बदले हुए रास्ते ने फैशन खादी मार्क वाला तरीका खोजा पर गांधी आर्थिकी चर्खा कताई, करघा बुनाई ढीली पड़ गयी। ग्यारहवें राष्ट्रपति ने 'पूरा' Providing Urban Amenities to Rural Areas  का मंत्रोच्चार किया।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांवों की आत्मा बरकरार रख कर रूर्बनाइजेशन की बात उठाई। भारत सरकार डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन के जरिये गांवों के 300 क्लस्टर खड़े कर स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट गांव का संकल्प ले रहे हैं पर घटक राज्यों के फेडरल सहयोग के जरिये ही गरीबी कम करने के तात्कालिक उपाय हो सकते हैं। गरीबी रेखा निर्धारण करने से गरीबी तो दूर नहीं होगी पर एक खाई अमीर गरीब के बीच में सदा के लिये खुद जायेगी इसलिये गांवों की गरीबी निर्धारण का एकमात्र जरिया चर्खे पर सूत कताई, कते हुए सूत को करघे पर बुनना, गांवोें के लोगों को वस्त्र स्वावलंबन की ओर अग्रसर करना मनरेगा को स्किल्ड लेबर से जोड़ कर चर्खा कातने वाली महिला श्रम शक्ति को चर्खा कताई व हाथ बुनाई के जरिये रोजगार गारंटी का पात्र सुनिश्चित करना, खादी ग्रामोद्योग आयोग तथा राज्यों के खादी ग्रामोद्योग बोर्ड की उत्पादकता 1963-64 के स्तर पर ले जाना। अंगुशडीटन ने एक दिशा बोध कराया है। प्रधानमंत्री गांधी आर्थिकी अपनायें, वही गांवों की गरीबी हटा सकती है। गरीबी निवारण का रास्ता गरीबी रेखा निर्धारण करने से मिटने वाला नहीं है। गांवों के हर हाथ को उसकी क्षमता के अनुसार काम मिले तो गांवों के लोगों की आमदनी बढ़ पायेगी और तभी गांव शहर की बराबरी कर सकते हैं। गांव शहर का नाता पुनर्भाषित करना आज की गांधी आर्थिकी का युगधर्म है। यही राष्ट्रधर्म भी है इसलिये इसका अनुपालन अंततः राष्ट्र हित में उपयोगी सिद्ध होगा।
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