कर्मण्येवाधिकारस्ते मंत्र उद्गाता
गांधी-नेहरू-विनोबा त्रयी ही स्वतंत्र भारत का
दीप्तिमान नक्षत्र पुंज
सर हेनरी रामजे स्कूल अल्मोड़ा के अंग्रेजी अध्यापक फादर ओकले अध्यक्ष नगरपालिका अल्मोड़ा ने जून 1929 में अल्मोड़ा म्यूनिसिपल बोर्ड की ओर से महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी का अभिनंदन करते हुए हिन्दी भाषा में महात्मा गांधी का अभिनंदन पूर्ण स्वागत किया। फादर ओकले और ख्रिस्ती धर्मावलंबी विक्टर मोहन जोशी से महात्मा प्रभावित हुए। महात्मा ने फादर ओकले से अनुरोध किया कि वे कांग्रेस अध्यक्ष तथा इलाहाबाद के नामी गिरामी वकील पंडित मोतीलाल नेहरू के लिये एक सुयोग्य स्टेनोग्राफर का चुनाव करें। फादर ओकले ने अपने पट्ट शिष्यों में योग्य युवक शिव दत्त उपाध्याय का नाम सुझाया, महात्मा गांधी ने शिव दत्त उपाध्याय की अंग्रेजी भाषा में दक्षता की परीक्षा स्वयं ली और पंडित मोतीलाल नेहरू से कहा पंडित जी यह नौजवान आपके लिये अनुकूल होगा। शिव दत्त उपाध्याय 1929 से पंडित मोतीलाल नेहरू के प्रमुख सहयोगी-सहकारी रहे पंडित मोतीलाल नेहरू के निधन के पश्चात उपाध्याय जी ने पंडित नेहरू के सहायक का कार्य संभाला। पंडित नेहरू शिव दत्त जी नाम से उन्हें पुकारते थे क्योंकि उपाध्याय जी उनके पिता जी के सहयोगी रहे थे। उपाध्याय जी ने इस ब्लागर को एक घटना के बारे में बताया जो उपाध्याय जी के नेहरू परिवार से जुड़ने से काफी पुरानी घटना थी। वह घटना उन्होंने पंडित मदन मोहन मालवीय से सुनी थी। उपाध्याय जी ने बताया कि पंडित मोतीलाल नेहरू व महामना मदन मोहन मालवीय दोनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील थे। दोनों में एक दूसरे के प्रति पूर्ण समादर था पर दोनों की जीवनशैली अलग अलग थी। पंडित मोतीलाल बग्घी में बैठ कर हाईकोर्ट जाते मदन मोहन मालवीय रिक्शे में बैठना उचित नहीं समझते थे इसलिये पैदल ही हाईकोर्ट जाते। मोतीलाल जी के निवास स्थान पर अक्सर ही जाते रहते थे। पंडित नेहरू की माता स्वरूप रानी नेहरू महामना मदन मोहन मालवीय को अपना जेठ मानती थीं अतः पर्दा करती थीं। मालवीय जी जब मोतीलाल जी की हवेली पर पहुंचे, माता स्वरूप रानी ने अपनी नौकरानी से कहा - शादी हुए ग्यारह वर्ष हो गये अभी तक गोद में बच्चा नहीं। यह सुन कर मालवीय जी ने कहा - पंडित जी आ जायें बता देना। मैं भारद्वाज आश्रम में महाराज के पास जारहा हूँ। खरामा खरामा मदन मोहन मालवीय भारद्वाज आश्रम के महात्मा के आश्रम पहुंचे। महात्मा जी ने मालवीय जी को कहा - मदन मोहन तुम्हारे पीछे पीछे बग्घी में बैठ कर मोतीलाल आरहा है। उसे पुत्रवान बनाने के लिये मुझे यह शरीर छोड़ना होगा। पंडित मोतीलाल ने बग्घी महाराज जी के आश्रम से एक फर्लांग दूर ही खड़ी करा दी। भारद्वाज आश्रम गये व महाराज जी को दण्डवत प्रणाम किया तो महाराज जी ने आशीर्वाद दिया - पुत्रवान भवः। भगवद्गीता का कथन है - शुचीनाम् श्रीमताम् गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते। पंडित नेहरू की वसीयत उनकी अपनी धर्मपत्नी कमला नेहरू अस्थि मंजूषा भगवद्गीता के साथ अपने सिरहाने रखना उनकी अध्यात्मपरायणता का प्रतीक है। हनुमान प्रसाद पोद्दार ने पंडित गोविन्द वल्लभ पंत के पत्र के जवाब में लिखा - आपने लिखा जवाहरलाल ऊपर से कुछ भी कहें आस्तिक हैं सो ठीक है उनके बारे में मैं भी यही मानता हूँ।
अब मुख्य बात की ओर मुड़ें। गोपाल कृष्ण गांधी के महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू विचार पोखर की तरफ बढ़ें। पंडित नेहरू ने महात्मा जी की निजी कुमांऊँ यात्रा का प्रबंध किया था। महात्मा 11 जून 1929 को अहमदाबाद से रवाना हुए। 14 जून 1929 को काठगोदाम पहुंचे। वे नैनीताल रूकने के बजाय ताकुला में ठहरे। अगले दिन भवाली में जनसभा संबोधित की और शाम प्रेम विद्यालय ताड़ीखेत पहुंचे। जून 1929 की कुमांऊँ यात्रा में महात्मा नैनीताल नहीं गये पर 1930 में वे नैनीताल भी गये। संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के गवर्नर सर मालकम से उन्होंने सूबे के किसानों के दुःख दर्द का ब्यौरा रखा। महात्मा की कुमांऊँ यात्रा ने पंडित नेहरू को पूर्ण स्वराज्य के मंत्र के जरिये स्वराजिस्ट पंडित मोतीलाल नेहरू के दृष्टिकोण से महात्मा गांधी के स्वराज्य मंत्र की ओर उत्प्रेरित किया। रावी के तट में 1930 में पूर्ण स्वराज्य का उद्घोष पंडित नेहरू के नेतृत्व में संपन्न हुआ। गोपाल कृष्ण गांधी की सोच है कि उनकी दादी कस्तूरबा की पहली संतान - हरिलाल से पहले जन्मी कन्या थी। वे कहते हैं इसका प्रमाण उनको उपलब्ध नहीं है। पंडित नेहरू की धर्मपत्नी कमला नेहरू ने एक पुत्र को भी जन्म दिया था पर पुत्र दीर्घायु नहीं हुआ। गोपाल कृष्ण गांधी कल्पना लोक में दौड़ कर अपनी दादी की काल्पनिक कन्या प्रभा का उल्लेख कर रहे हैं। सृष्टि में सनातन हिन्दुस्तानी सोच के अनुसार चौरासी लाख योनियों से जीवात्मा को गुजरना होता है। महात्मा को रामभक्ति उनकी माता पुतलीबाई से विरासत मातृ स्तनपान में मिली थी। गोपाल कृष्ण गांधी के माता पिता यद्यपि क्रमशः तमिलभाषी व गुजरातीभाषी थे पर उन दोनों में कबीर की उक्ति - भगती उपजी द्रविड़ देस का प्रभाव था। गोपाल गांधी के मातामह चक्रवर्ती राजगोपालाचारी प्रखर सनातनी थे। देवदास गांधी पर भी पिता व नाना का प्रभाव था। महात्मा गांधी व पंडित नेहरू के साहित्य का इस ब्लागर ने गहन अध्ययन किया है। जवाहरलाल महात्मा के आध्यात्मिक व आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति के अद्भुत अनुयायी थे। महात्मा गांधी की खादी आर्थिकी का पंडित नेहरू पर क्या असर था ? यह पंडित नेहरू आचार्य कृपलानी व उनके शिष्य विचित्र नारायण शर्मा के बीच हुए पत्र व्यवहार से साफ झलकता है। ग्रामोद्योगों से ही ग्रामोत्थान हो सकता है। यह प्रायोगिक रूप में कैसे अपनाया जाये, वैकुंठ ल. मेहता ने अप्रेल 1959 में अ.भा. घानी तेल सम्मेलन का आयोजन भागलपुर बिहार में किया। समूचे देश में घानी सप्ताह मनाने का उपक्रम हुआ। यह ब्लागर आचार्य कृपलानी जी के निवास स्थान 30 पृथ्वीराज रोड नयी दिल्ली गया उनकी सम्मति ज्ञात करने। आचार्य जी ने कहा - पंडित जी के पास जा उनसे लिखा ला। जो पंडित नेहरू लिखेंगे उसे मुझे दिखाना। इस ब्लागर को पंडित नेहरू जानते थे। उनके पास गया वे प्रतिमाह एक कनस्तर सरसों का घानी तेल नियमित रूप से लिया करते थे। करोलबाग का रामचन्द्र तेली उनके निवास स्थान पर प्रतिमाह तेल पहुंचाता। घानी का तेल पंडित जी को बहुत पसंद था। उन्होंने इस ब्लागर से कहा - क्या लिखूँ ? इस ब्लागर ने पंडित जी को कृपलानी जी की राय बताई। पंडित जी ने हिंदी में अपने हाथ से लिख दिया - घानी का तेल पुष्टिवर्धक है। अपने दस्तखत भी कर दिये। इस ब्लागर ने पंडित जी से कहा - अंग्रेजी में भी लिख दीजिये तो पंडित जी ने अंग्रेजी मे भी लिख दिया। उन्होंने पूछा - डाक्टर रामचंद्रन तुम्हें हिन्दी फैनेटिक कहते हैं तुम्हारी हिन्दी की प्रशंसा भी करते हैं। तुम्हें अंग्रेजी का रोग कब से लग गया। इस ब्लागर ने कहा - पंडित जी कार्यक्रम सही सही चलाने के लिये सबका ध्यान रखना पड़़ता है। जो लोग हिन्दी नहीं जानते उनके लिये भी हम सोचें। वे दिल्ली के तब के 276 गांवों में ग्रामोद्योग चलाने के बारे में माहवारी रपट मांगते रहते थे। बड़े बड़े उद्योग ही नहीं छोटे छोटे घरेलू उद्योगों के भी पंडित नेहरू पक्षधर थे। वे सहकारिता पुरोधा व विकेन्द्रित अर्थांग के निष्णात विद्वान वैकुंठ ल. मेहता से चर्चा करते रहते। वैकुंठ भाई पंडित नेहरू व पंडित पंत से चर्चा करनेे के लिये इस ब्लागर को अपने साथ ले जाते थे। पंडित नेहरू भारत के हर गांव में ग्रामीण उद्यमिता का विकास करना अपनी विकास प्राथमिकता मानते थे। पंडित नेहरू युवा कांग्रेसियों में जयप्रकाश जी व लोहिया जी के हिन्दी भाषण क्षमता के प्रशंसक थे। डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिन्दी वक्तृता उन्हें भाती थी। संपूर्णानंद, पुरूषोत्तम दास टंडन, प्रोफेसर वासुदेव सिंह, सेठ दामोदर स्वरूप हिन्दी भाषण कला तथा अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रमुग्ध करने वाले हिन्दी भाषण की पंडित जी प्रशंसा करते रहते थे।
संतति पुण्यमा ख्याति - संतति व्यक्ति के पुण्य प्रताप का प्रतीक है। अपत्योदय अपत्य लाभ और अपत्य हानि संबंधी दृष्टांत हिन्दुस्तानी विचार पोखर का मुख्य स्तंभ है। पता नहीं गोपाल कृष्ण गांधी योगेश्वर वासुदेव कृष्ण के बारे में क्या सोचते हैं। कृष्ण-बलराम ने 64 दिन गुरूकुल निवास किया। गुरूरानी ने अपने पति से सांदीपनि से कहा -चौंसठ दिन में चौंसठ विद्यायें, कलायें और आन्वीक्षिकी विधा सीख लीं। ये दोनों शिष्य बड़े भाग्यशाली हैं। मेरा सोचना है कि मेरे मरे हुए बेटे को ये ला सकते हैं। गुरू सांदीपनि ने अपनी पत्नी से असहमत होने के बावजूद बलराम व कृष्ण से कहा - तुम्हारी गुरूरानी गुरूदक्षिणा में अपने मृत बेटे को वापस चाहती है। कृष्ण बलराम ने यमलोक पहुंच कर गुरू सांदीपनि के मृत पुत्र को पुनः जीवित कर लाये। गुरू दक्षिणा में अपने गुरू को उनका पुत्र दिया। जब यह बात कृष्ण की माता देवकी को पता चली देवकी ने अपने बेटे कृष्ण से कहा - मैंने सुना है तुम अपने गुरू के बेटे को यमलोक से लाकर गुरूरानी को दे आये हो। तुम्हारे छः बड़े भाइयों को तुम्हारे मामा मेरे भाई राष्ट्रपाल कंस ने पटक कर मार डाला उन्हें मुझे लाकर दो। कृष्ण ने राजा बलि की मदद से अपने मृत अग्रजों को लाकर माता को दे दिया।
गोपाल कृष्ण गांधी ने महात्मा गांधी कस्तूरबा दंपति के चार पुत्रों से पूर्व जन्मी कन्या का उल्लेख तो किया पर यह भी इंगित किया कि इसका कोई प्रमाण नहीं है। जिस युग की गोपाल कृष्ण गांधी चर्चा कर रहे हैं तब लिखित प्रमाण रखने की परंपरा नहीं थी। किस दंपति को कितनी संतति हुई उनमें कितने दीर्घजीवी हुए कितने छोटी उम्र में दिवंगत हो गये या जन्म के एक वर्ष के अन्दर ही काल कवलित होगये इसका लेखाजोखा रखने का कोई रिवाज भी नहीं था। इसलिये श्रौत परंपरा को आधार मानते हुए उन्होंने जो सुना उसे ही मानकर चलना उचित प्रतीत होता है। महात्मा गांधी की पहली संतान हरिलाल के तौर तरीकों से महात्मा गांधी को आत्मिक पीड़ा तो हुई पर उन्होंने हरिलाल प्रकरण से स्वयं व्यथित होने का रास्ता नहीं चुना। पंडित नेहरू दुहित वत्सल पिता थे उन्होंने अपनी प्रियदर्शिनी कन्या इंदिरा को अपने जेल निवास के दर्मियान पत्र भेजे पत्र अंग्रेजी भाषा में थे। पिता पुत्री पत्र व्यवहार अंग्रेजी में हुआ करता था पर पंडित नेहरू ने अपने पत्रों का हिन्दी अनुवाद सस्ता साहित्य मंडल के माध्यम से प्रकाशित कराया। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पिता के पत्र पुत्री के नाम से बहुत प्रकाशित हुए। हर हिन्दी भाषी ने पिता के पत्र पुत्री के नाम पढ़ा। जरूरत इस बात की है कि पंडित नेहरू द्वारा प्रियदर्शिनी इंदिरा को लिखे पत्रों को सुसंपादित विधि से भारत की प्रत्येक भाषा में प्रकाशित करा कर स्कूल कालेजों में अध्ययन कर रही बालिकाओं को पढ़ने के लिये उपलब्ध कराया जाना चाहिये। पिता पुत्री का संबंध दुहित्रवत्सल पिता तथा पितृवत्सल दुहिता के रूप में भारतीय शिक्षित समाज को नई ऊर्जा देगा। इस ब्लागर को महसूस होता है कि गोेपाल कृष्ण गांधी भावुकता में बह रहे हैं। प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी के फिरोज गांधी से विवाह के लिये कमला नेहरू ने अपने पति पंडित नेहरू से मृत्युशय्या में आश्वासन लिया था। पंडित नेहरू परिवार के अनन्य हितैषी हृदयनाथ कुंजरू ने पंडित नेहरू से कहा जिस तरह महात्मा गांधी ने विजय लक्ष्मी पंडित को मेहर अली से विवाह करने के मामले में पुनर्विचार करने को कहा। हृदयनाथ भी चाहते थे कि इंदिरा फिरोज से विवाह न करे पर पंडित नेहरू ने जो वचन अपनी अर्धांगिनी को दिया था उसका उन्होंने पालन किया। फिरोज से इंदिरा का विवाह संपन्न हुआ। दामाद श्वसुर में वैसा ही अनमेल था जैसा दक्ष प्रजापति व शंकर जी में था पर पंडित नेहरू के हितैषी राजनीति तथा समाज की नाड़ी पर ध्यान केन्द्रित कर मृदुभाषी पंडित पंत ने पंडित नेहरू के दामाद फिरोज गांधी को पूरा सम्मान दिया। फिरोज भी मानते थे कि पंडित पंत उनके अनन्य हितैषी हैं। नेहरू युग में फिरोज के राजनैतिक उत्कर्ष तथा लोकहित के प्रसंगों को जो ऊँचाई मिली वह पंडित पंत के कारण ही फिरोज तत्कालीन भारत के राजनीतिक हस्ती के रूप में प्रतिष्ठित हुए। जब पंडित नेहरू के देहत्याग से मात्र नौ महीने पहले डाक्टर राममनोहर लोहिया ने पंडित नेहरू की सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में नब्बे मिनट तक धाराप्रवाह हिन्दी में बोलते हुए संसदीय क्षेत्र में नया कीर्तिमान कायम किया पंडित नेहरू ध्यानपूर्वक डाक्टर लोहिया को सुनते रहे। इस ब्लागर को डाक्टर लोहिया ने कहला भेजा था कि एक दिन की छुट्टी लेकर मुझे संसद में सुनो। दर्शक दीर्घा का पास भेज रहा हूँ। पंडित नेहरू डाक्टर राममनोहर लोहिया को राममनोहर कह कर संबोधित करते। उन्होंने तीन आना बनाम तीन रूपये वाली बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा - राममनोहर यह रकम तीन आना नहीं पंद्रह आना हैै। संसदीय शिष्टाचार का ख्याल आते ही पंडित जी ने फिर कहा - माननीय सदस्य। डाक्टर लोहिया ने पंडित जी से प्रार्थना की कि पंडित जी कृपया मुझे राममनोहर ही कहें। मैं आपकी इतनी कटु आलोचना कर रहा हूँ पर आपका स्नेह वही है जो 1935-36 में था। पंडित नेहरू के बारे में एक बात और प्रचलित थी जब तक वे अपने अभ्यागत से पंडित जी शब्द नहीं सुनते थे उन्हें लगता था कि कुछ छूट गया है। आज भारत की धरती में महात्मा गांधी व पंडित नेहरू की जोड़ी नहीं है उनकी स्मृतियां मात्र शेष हैं। गांधी-नेहरू का राजनीतिक चिंतन पोखर भारत की आजादी से पहले कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना से हिन्दू मुस्लिम संबंधों में तथा डाक्टर भीमराव रामराव अंबेडकर से दलित तथा तथाकथित सवर्ण के बीच चौड़ी होती जारही खाई के संबंध में महात्मा गांधी का आंतरिक सद्भाव मोहम्मद अली जिन्ना तथा बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर से निश्छल मनोभाव था। दूसरी तरफ से वह भावना नहीं थी जिसका महात्मा गांधी हृदय स्पंदन करते थे। महात्मा के मनोभावों को हिन्द स्वराज के 20 अध्यायों का सतत मनन करने पर ही ज्ञात किया जा सकता है। कायदे आजम जिन्ना की दृष्टि में महात्मा गांधी व पंडित नेहरू का नेतृत्व हिन्दुस्तानी वामन बनिया राज था। उनकी दृढ़ धारणा थी कि हिन्द का मुसलमान वामन बनिया की चाकरी नहीं कर सकता। महात्मा से कायदे आजम का इकतरफा वैचारिक मतभेद इसलिये भी अर्थहीन था क्योंकि महात्मा ने कभी भी जिन्ना व इस्लाम धर्मावलंबियों को अपने किसी भी आचरण से कुप्रभावित नहीं किया।
गोपाल कृष्ण गांधी ने महात्मा गांधी कस्तूरबा दंपति के चार पुत्रों से पूर्व जन्मी कन्या का उल्लेख तो किया पर यह भी इंगित किया कि इसका कोई प्रमाण नहीं है। जिस युग की गोपाल कृष्ण गांधी चर्चा कर रहे हैं तब लिखित प्रमाण रखने की परंपरा नहीं थी। किस दंपति को कितनी संतति हुई उनमें कितने दीर्घजीवी हुए कितने छोटी उम्र में दिवंगत हो गये या जन्म के एक वर्ष के अन्दर ही काल कवलित होगये इसका लेखाजोखा रखने का कोई रिवाज भी नहीं था। इसलिये श्रौत परंपरा को आधार मानते हुए उन्होंने जो सुना उसे ही मानकर चलना उचित प्रतीत होता है। महात्मा गांधी की पहली संतान हरिलाल के तौर तरीकों से महात्मा गांधी को आत्मिक पीड़ा तो हुई पर उन्होंने हरिलाल प्रकरण से स्वयं व्यथित होने का रास्ता नहीं चुना। पंडित नेहरू दुहित वत्सल पिता थे उन्होंने अपनी प्रियदर्शिनी कन्या इंदिरा को अपने जेल निवास के दर्मियान पत्र भेजे पत्र अंग्रेजी भाषा में थे। पिता पुत्री पत्र व्यवहार अंग्रेजी में हुआ करता था पर पंडित नेहरू ने अपने पत्रों का हिन्दी अनुवाद सस्ता साहित्य मंडल के माध्यम से प्रकाशित कराया। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पिता के पत्र पुत्री के नाम से बहुत प्रकाशित हुए। हर हिन्दी भाषी ने पिता के पत्र पुत्री के नाम पढ़ा। जरूरत इस बात की है कि पंडित नेहरू द्वारा प्रियदर्शिनी इंदिरा को लिखे पत्रों को सुसंपादित विधि से भारत की प्रत्येक भाषा में प्रकाशित करा कर स्कूल कालेजों में अध्ययन कर रही बालिकाओं को पढ़ने के लिये उपलब्ध कराया जाना चाहिये। पिता पुत्री का संबंध दुहित्रवत्सल पिता तथा पितृवत्सल दुहिता के रूप में भारतीय शिक्षित समाज को नई ऊर्जा देगा। इस ब्लागर को महसूस होता है कि गोेपाल कृष्ण गांधी भावुकता में बह रहे हैं। प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी के फिरोज गांधी से विवाह के लिये कमला नेहरू ने अपने पति पंडित नेहरू से मृत्युशय्या में आश्वासन लिया था। पंडित नेहरू परिवार के अनन्य हितैषी हृदयनाथ कुंजरू ने पंडित नेहरू से कहा जिस तरह महात्मा गांधी ने विजय लक्ष्मी पंडित को मेहर अली से विवाह करने के मामले में पुनर्विचार करने को कहा। हृदयनाथ भी चाहते थे कि इंदिरा फिरोज से विवाह न करे पर पंडित नेहरू ने जो वचन अपनी अर्धांगिनी को दिया था उसका उन्होंने पालन किया। फिरोज से इंदिरा का विवाह संपन्न हुआ। दामाद श्वसुर में वैसा ही अनमेल था जैसा दक्ष प्रजापति व शंकर जी में था पर पंडित नेहरू के हितैषी राजनीति तथा समाज की नाड़ी पर ध्यान केन्द्रित कर मृदुभाषी पंडित पंत ने पंडित नेहरू के दामाद फिरोज गांधी को पूरा सम्मान दिया। फिरोज भी मानते थे कि पंडित पंत उनके अनन्य हितैषी हैं। नेहरू युग में फिरोज के राजनैतिक उत्कर्ष तथा लोकहित के प्रसंगों को जो ऊँचाई मिली वह पंडित पंत के कारण ही फिरोज तत्कालीन भारत के राजनीतिक हस्ती के रूप में प्रतिष्ठित हुए। जब पंडित नेहरू के देहत्याग से मात्र नौ महीने पहले डाक्टर राममनोहर लोहिया ने पंडित नेहरू की सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में नब्बे मिनट तक धाराप्रवाह हिन्दी में बोलते हुए संसदीय क्षेत्र में नया कीर्तिमान कायम किया पंडित नेहरू ध्यानपूर्वक डाक्टर लोहिया को सुनते रहे। इस ब्लागर को डाक्टर लोहिया ने कहला भेजा था कि एक दिन की छुट्टी लेकर मुझे संसद में सुनो। दर्शक दीर्घा का पास भेज रहा हूँ। पंडित नेहरू डाक्टर राममनोहर लोहिया को राममनोहर कह कर संबोधित करते। उन्होंने तीन आना बनाम तीन रूपये वाली बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा - राममनोहर यह रकम तीन आना नहीं पंद्रह आना हैै। संसदीय शिष्टाचार का ख्याल आते ही पंडित जी ने फिर कहा - माननीय सदस्य। डाक्टर लोहिया ने पंडित जी से प्रार्थना की कि पंडित जी कृपया मुझे राममनोहर ही कहें। मैं आपकी इतनी कटु आलोचना कर रहा हूँ पर आपका स्नेह वही है जो 1935-36 में था। पंडित नेहरू के बारे में एक बात और प्रचलित थी जब तक वे अपने अभ्यागत से पंडित जी शब्द नहीं सुनते थे उन्हें लगता था कि कुछ छूट गया है। आज भारत की धरती में महात्मा गांधी व पंडित नेहरू की जोड़ी नहीं है उनकी स्मृतियां मात्र शेष हैं। गांधी-नेहरू का राजनीतिक चिंतन पोखर भारत की आजादी से पहले कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना से हिन्दू मुस्लिम संबंधों में तथा डाक्टर भीमराव रामराव अंबेडकर से दलित तथा तथाकथित सवर्ण के बीच चौड़ी होती जारही खाई के संबंध में महात्मा गांधी का आंतरिक सद्भाव मोहम्मद अली जिन्ना तथा बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर से निश्छल मनोभाव था। दूसरी तरफ से वह भावना नहीं थी जिसका महात्मा गांधी हृदय स्पंदन करते थे। महात्मा के मनोभावों को हिन्द स्वराज के 20 अध्यायों का सतत मनन करने पर ही ज्ञात किया जा सकता है। कायदे आजम जिन्ना की दृष्टि में महात्मा गांधी व पंडित नेहरू का नेतृत्व हिन्दुस्तानी वामन बनिया राज था। उनकी दृढ़ धारणा थी कि हिन्द का मुसलमान वामन बनिया की चाकरी नहीं कर सकता। महात्मा से कायदे आजम का इकतरफा वैचारिक मतभेद इसलिये भी अर्थहीन था क्योंकि महात्मा ने कभी भी जिन्ना व इस्लाम धर्मावलंबियों को अपने किसी भी आचरण से कुप्रभावित नहीं किया।
गोपाल कृष्ण गांधी ने महात्मा व पंडित नेहरू के पारस्परिक वैचारिक दृष्टिकोण को भावनात्मक स्वरूप देने का प्रयास किया है। वे केवल सामाजिक तथा राजनीतिक नजरिये से गांधी नेहरू संगम पर चर्चा कर रहे हैं। गांधी के आध्यात्मिक पक्ष विश्लेषण संत विनोबा ने किया है। संत विनोबा व महात्मा गांधी की आध्यात्मिक दृष्टि की मीमांसा करने वालों में आचार्य नरेन्द्र देव आचार्य दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर दादा धर्माधिकारी व शंकर राव देव की अपनी अपनी विशिष्ट शैली थी। गोपाल कृष्ण गांधी ने इतिहास को राजघराना मूलक नहीं व्यक्ति प्रधान स्त्रोत माना है। उनकी इस मीमांसा में व्यावहारिक वास्तविकी छिपी हुई है। गांधी-विनोबा निर्वैर व्यक्तित्त्व थे। उनमें दैत्यराज प्रह्लाद की नवधा तथा नरसी मेहता की दशधा भक्ति का असर था। नेहरू सक्रिय राजनीति करते थे पर अपने विरोधी के मत का सम्मान करते थे। भारत सन 2019 में महात्मा की एक सौ पचासवीं जयंती मनायेगा। पंडित नेहरू की सवा शती जयंती 14 नवंबर 2014 से 14 नवंबर 2015 तक हो चुकी है। जवाहरलाल नेहरू का सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक तथा भारत विभाजन की पीड़ा से भारत को उसके निवासियों को - भारत संतति को जो पीड़ा हुई उसे दूर करने में पंडित नेहरू का ज्यादा समय लगा। दलीय व चुनावी राजनीति से ऊपर उठ कर पंडित नेहरू के राष्ट्र संकल्प पर विचार पोखर निर्माण की तात्कालिक जरूरत है। गांधी-नेहरू के व्यक्तित्त्व ने हिन्दुस्तान को नयी राह दिखाई है। गांधी नेहरू का राष्ट्रीय मंत्र था -
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत्।
अभी तो महात्मा की भारत से पार्थिव विदाई आगामी 30 जनवरी 2016 के दिन केवल अड़सठ वर्ष होंगे। पंडित नेहरू के पार्थिव व्यक्तित्त्व की इतिश्री महात्मा की देहयात्रा संपूर्ति के सोलह वर्ष पश्चात हुई। महात्मा और नेहरू की पार्थिव जीवन यात्रा को राजनीतिक सोच से ऊपर उठ कर मानवीय विचार से देखने की जरूरत है। लोकतंत्र में एक ही राजनैतिक विचार पोखर का बोलबाला सदा सर्वदा के लिये नहीं हो सकता परिवर्तन तो समय का कालचक्र है इसलिये गांधी व नेहरू का मूल्यांकन दलीय सोच से नहीं राष्ट्रीय विचार पोखर के रूप में होना चाहिये।
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