मयि सर्वाणि कर्माणि सन्यस्याध्यात्म चेतसा निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्वस्व विगतः ज्वरः।
कौशिक डेक महाशय कहते हैं - निर्वाचन-सफलता का सुनिश्चित मार्ग जमीन स्तर पर टिकाऊ और खुले तौर पर दिखने वाले विकास का कोई विकल्प नहीं। बड़े और छोटे राज्यों (भारती संघ के घटक) सर्वतोमुखी विकास के लिये गुजरात और सिक्किम राज्य पहली पंगत में हैं, खेती बाड़ी के क्षेत्र में मध्य प्रदेश व पुडुचेरी अग्रणी हैं। पार्श्वसज्जा में असम और मिजोरम आगे हैं पूंजी निवेश में गुजरात व सिक्किम पहले हैं। स्वास्थ्य-सुरक्षा में जम्मू कश्मीर व मणिपुर अग्रगण्य हैं। स्वच्छता, सफाई में भी गुजरात और सिक्किम सर्वोपरि हैं शिक्षा के क्षेत्र में केरल और गोआ पहली पंगत में खड़े हैं सुशासन में भी केरल और सिक्किम अव्वल हैं पर्यावरण में हरयाणा और पुडचेरी ही सर्वोत्कृष्ट हैं। उत्तम बनाम निकृष्ट विजयपताका फहराने वाले चार राज्य भा.ज.पा. शासित हैं। असम व केरल दो कांग्रेस शासित राज्य हैं। इन दो राज्यों में वर्ष 2016 में चुनाव होरहे हैं। बड़े आकार वाले राज्यों में असम सर्वोत्कृष्ट लाभार्थी है ओडिशा उसके बाद में आता है बड़े आकार वाले राज्यों में तमिलनाड सबसे गया गुजरा राज्य घटक है पहले नंबर से बीसवें क्रम में आगया हैै बिहार राज्य में हाल ही में चुनाव संपन्न हुए लालू प्रसाद यादव नीत राष्ट्रीय जनता दल ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा 80 पर विजयश्री हासिल की, राजद का वोट प्रतिशत 18.67 रहा। महागठबंधन के जनता दल यू. ने 101 सीटों में से 71 सीटें हासिल की अ.भा. कांग्रेस कमेटी ने 40 उम्मीदवार उतारे थे उन्हें 27 सीटें मिलीं महागठबंधन दो तिहाई बहुमत से विजयी हुआ। तीनों का साझा वोट प्रतिशत 41.9 रहा, 24 प्रतिशत वोट प्राप्त करने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी केवल 53 सीटें में ही विजयी हो पायी। समेकित और समग्र रूप से दो तिहाई बहुमत प्राप्त बिहार का विकास क्रम वर्ष 2013 में ग्यारहवां वर्ष 2014 में बीसवां वर्ष 2015 में छठे स्थान पर था शिक्षा के क्षेत्र में इक्कीसवें स्थान पर रहा सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी शिक्षा की तरह पंगत का आखिरी राज्य था शासन-सुशासन के क्षेत्र में बिहार 2013 में बारहवें क्रम में 2014 में आठवें और 2015 में सोलहवें स्थान पर रहा। विनिवेश के क्षेत्र में बिहार ग्यारहवें क्रम में रहा। मैक्रो इकानामी में बिहार का दर्जा सातवां, स्वच्छता के मामले में बिहार तेरहवें स्तर पर था। बिहार का क्षेत्रफल 94163 वर्ग किलोमीटर आबादी 10.38 करोड़ है राज्य में 38 जिले हैं। आबादी का पुरूष तत्व साढ़े पांच करोड़ महिला तत्व पांच करोड़ है आबादी की बढ़त का प्रतिशत पिछले जनगणना के मुकाबले 25 प्रतिशत अधिक है। साक्षरता प्रतिशत लगभग 64 है पुरूष साक्षरता 73 प्रतिशत तथा महिला साक्षरता 53 प्रतिशत है।
झारखंड के अलग राज्य बनने के पश्चात बिहार नाम से संबोधित भारतीय संघ राज्य के महत्वपूर्ण घटक में मिथिला अंग मगध व भोजपुर (भोज पुरी भाषी बिहार राज्य का इलाका) मैथिली भाषी मिथिलांचल के जनक परम्परा वाले समाज, मगही अथवा अर्धमागधी भाषी मगध निवासी जिनमें जरासंध का राजगृह तथा गणतंत्र से राजप्रमुख तंत्र में कायाकल्पित मगध जिसके रचनाकार कौटिल्यीय अर्थशास्त्र के सृष्टा आचार्य चाणक्य तथा सम्राट पदवी पर चाणक्य द्वारा प्रतिष्ठित चन्द्र गुप्त मौर्य बिहार में सूर्य षष्ठी के मूल उद्गम क्षेत्र अंग जहां के कर्ण को महाराज कुमार दुर्योधन ने अंगनरेश की मान्यता दी। कर्ण मूलतः सूर्य-कुन्ती पुत्र थे पर कुन्ती ने लोकलाज के भय से कर्ण को यमुना में बहा दिया - जाको राखे साइयां मार सके नहिं कोय, बाल न बांका कर सके जो जग वैरी होय। कुंती नंदन सूर्य सुत कर्ण को वृषसेन दम्पति ने बहती गंगा की लहरों में पाया, पालन पोषण किया, अंग नरेश कर्ण ने महाराज कुमार सुयोधन को सदा सर्वदा आत्मीयता पूर्ण सहयोग दिया, पौराणिक भारत में बिहार का उद्घोष कहीं नहीं है अंग, वंग कलिंग तीन सांस्कृतिक स्तूप पूर्वी भारत के महत्वपूर्ण क्षेत्र रहे हैं। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से आधुनिक बिहार अंगिका, मैथिली, अर्धमागधी वज्जिका और भोजपुरी भाषायी क्षेत्र है। इसलिये बिहार राज्य न तो एकल भाषायी इकाई है नहीं एकल सांस्कृतिक इकाई पांच भाषायी समूहों के अलावा बिहार राज्य की 17 प्रतिशत मुसलमान जनसंख्या उर्दू को अपनी मादरे जबान घोषित करती रही है यही कारण है कि भारत विभाजन के समय बिहार से पूर्वी बंगाल या बांग्ला देश गये मुसलमानों को बांग्ला भाषी मुसलमानों ने नहीं अपनाया। वैसे सांस्कृतिक बहुलता वाले बिहार राज्य की राजभाषा हिन्दी है पर प्रादेशिक भाषाओं में भोजपुरी बिहार ही नहीं समूचे संसार में फैली भाषा है जहां जहां गिरमिटिया मजदूर गये वहां भोजपुरी भाषायी संस्कार अपने साथ ले गये उन्होंने भोजपुरी संस्कृति व भाषा की संरक्षा की। अगड़ी जातियों ब्राह्मण 4.1 प्रतिशत राजपूत 4.2 प्रतिशत भूमिहार 3.2 प्रतिशत कायस्थ 0.7 प्रतिशत कुल मिला कर अगड़ी जाति जन संख्या 12.2 लालू प्रसाद यादव के वंश धर यादव 15.4 प्रतिशत बनिये 6.6 प्रतिशत कुर्मी 3.5 प्रतिशत कुशवाहा कारेरी 4.1 प्रतिशत जजमानी प्रथा सेवा दात्री जातियां 22.9 प्रतिशत पासवान 5.4 प्रतिशत महादलित 12.9 प्रतिशत मुसलमान 16.4 प्रतिशत हैं जातीय समूहों में मुस्लिम यादव मिला कर 31.8 प्रतिशत याने विजयी लालू प्रसाद राजघराने के समर्थक बिहार की कुल जन संख्या का तिहाई हिस्सा है। विश्लेषकों का मानना है कि नितीश कुमार को दुबारा दो तिहाई बहुमत मिला है भाजपा अथवा राजद के साथ नितीश कुमार का अपना राजनीतिक वजूद सीमित है, उनका यह कहना कि बिहारी बनाम बाहरी संघर्ष में वे विजयी हुए। जिस जनता दल यूनाइटेड के तहत उन्होंने चुनाव लड़ा उसके अध्यक्ष श्री शरद यादव बिहार वासी नहीं हैं। जिस व्यक्तित्त्व जार्ज फर्नांडीज के नेतृत्व में नितीश कुमार की अगुआई हुई वे भी बिहार के लिये बाहरी थे, इसलिये नितीश कुमार जी का यह कहना कि बाहरी नरेन्द्र मोदी को उन्होंने परास्त कर दिया उन्हें जो जीत हासिल हुई है उसका श्रेय केवल लालू प्रसाद यादव को मुस्लिम यादव युति को ही उपलब्ध है। जनता दल यूनाइटेड के राजनीतिक महत्व का जहां तक ताल्लुक है उसमें भी वे लालू प्रसाद यादव का सामना करने की स्थिति में नहीें हैं लालू प्रसाद यादव ने साफ कहा है कि बिहार का राजतंत्र नितीश बाबू चलायेंगे लालू स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खिलाफ दिल्ली में करेंगे, अगर सर्वोच्च न्यायालय ने राजद क्षत्रप लालू प्रसाद यादव को चारा कांड में दोष मुक्त कर दिया लालू प्रसाद यादव को 2019 के लोकसभा निर्वाचन में अपने दम खम पर चुनाव लड़ने अथवा जैसा महागठबंधन बिहार में संपन्न हुआ वैसी कोई राजनीतिक स्थिति बनी लालू चाहेंगे कि वे ही बिहार-क्षत्रप के साथ साथ भारतीय संघ के प्रधानमंत्री का आसन ग्रहण करें। पिछले चौथाई शती से बिहार में लालू प्रसाद यादव राजघराना गति - दुर्गति और फिर प्रगति के रास्ते में है, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव राजघराना अपना अंगद पांव जमाये हुए है बिहार के मुकाबले उ.प्र. में गैर कांग्रेसी और भाजपाई दो मेढ़ियां - मुलायम सिंह यादव और मायावती नेतृत्व में राजनैतिक अश्वशक्ति का रोचक प्रदर्शन कर रही है। मायावती नेतृत्व जयललिता नेतृत्व की भांति गुरू-शिष्य प्रयोजन का प्रतीक है। मायावती राजतंत्र और जयललिता राजतंत्र को गुरूमंत्र - गुरू शिष्या प्रयोजन के तौर पर आंका जा सकता है दोनों दृढ़ निश्चयी महिला शक्ति स्त्रोत हैं राजनीतिक हालातों को बारीकी से परख कर निर्णय लेती हैं राजघरानों में एम. करूणानिधि घराना, कर्णाटक का देवगौड़ा घराना, महाराष्ट्र का छत्रपति शिवाजी की स्मृति में बाल ठाकरे - उद्धव ठाकरे राजघराना, कश्मीर के फारूख-उमर राजघराना, मुफ्ती सईद महबूबा पिता पुत्री राजघराना अ.भा. कांग्रेस कमेटी का राजघराना श्रीमती सोनिया गांधी पुत्र राहुल गांधी का राजघराना उड़ीसा का नवीन पटनायक राजघराना - दूरदर्शी बीजू पटनायक उत्कल केसरी की विरासत है पर पटनायक की नजर दिल्ली के तख्त पर नहीं है, दिल्ली के तख्त पर नजर रखने वाले लोगों में लघु अवधि के लिये प्रधानमंत्री रहे देवगौड़ा के अलावा राष्ट्रीय स्तरीय राजघराना - पंडित नेहरू तो लोकनेता थे उन्हें राजघराना संस्कृति से जोड़ना इसलिये भी सटीक नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उन्होंने अपने पिता पंडित मोतीलाल नेहरू की स्वराजिस्ट शैली अपनाने के बजाय महात्मा गांधी का बताया रास्ता चुना और अवध के किसानों के बीच चरम का नेतृत्व प्राप्त किया। इंदिरा गांधी राजीव गांधी - राजीव गांधी पत्नी सोनिया गांधी व पुत्र राहुल गांधी को इंदिरा राजघराना कहा जा सकता है पर कालचक्र ने सोनिया और राहुल गांधी नेतृत्व को गहरा धक्का लगाया है सोनिया और राहुल लालू प्रसाद यादव की भांति फिर जागरूक हो जायेंगे यह कम से कम आगे आने वाले चार वर्ष तक तो संभव नहीं लगता, अगर भारतीय जनता पार्टी का बहुमत बिखर भी गया मार्ग दर्शक नेता लोग अपनी अनदेखी को नहीं सह पाये पार्टी टूट भी गई तो भी राजनीतिक लाभार्थी नितीश कुमार अथवा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के बजाय अल्प समय के लिये भी राजनीतिक रूप से असंगठित दल नेता नितीश कुमार का लाभग्राही बनना टेढ़ी खीर मालूम पड़ती हैै अगर राजद सुप्रीमो की राजनीतिक बहादुरी और जाति चातुर्य को नितीश कुमार नहीं भांप पाये दिल्ली के तख्त की ओर नजर गड़ाये रखी उन्हें त्रिशंकु बन कर लटकना पड़ सकता है।
चुनाव में हार जीत वैसी ही है जैसी द्यूत क्रीड़ा में जुआ खेलने वाले का जीतना फिर जीत को हार में गंवा देना क्योंकि राजनीतिक मर्यादाओं का निरंतर उल्लंघन करते रहने से विषम परिस्थितियां उपस्थित होना स्वाभाविक भवितव्यता है। राजनीति में नाना जी देशमुख का उदाहरण प्रत्यक्ष है जनता पार्टी के राज्यारोहण के पश्चात नाना जी देशमुख ही ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने राजनीतिक वानप्रस्थ का मार्ग अपनाया उद्योग जगत में नामचीन लोगों में से राजा बलदेव दास बिड़ला पिछली शताब्दी के उपराम लेने वाले आदर्श व्यक्तित्त्व थे ताजा उदाहरण रतन टाटा का है पिचहत्तर वर्ष पूरे होने पर उन्होंने टाटा उद्योग घराने की बागडोर मिस्त्री को सौंप दी कांग्रेस नेता ने अखबार को बताया कि बिहार में नितीश विजय की दुंदुभि भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी के निवास स्थान 30 पृथ्वीराज रोड में आकर्षक ढंग के पटाखों द्वारा मनाई गई। यह सर्वविदित तथ्य है कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को 2014 के सामान्य निर्वाचन का उत्तरदायित्व सौंपने के आडवाणी एकदम खिलाफ थे। वे स्वयं प्रधानमंत्री पद की दौड़ में 2004 व 2009 में पिछड़ गये अपनी पार्टी को बहुमत या इकली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में खड़ा नहीं कर पाये, 2014 के चुनाव में वे वृद्ध हो चुके थे उन्हें स्वयं 2004 में ही नाना साहब देशमुख की तरह अपना रास्ता बदल लेना चाहिये था उनके मन में आशा किरणें थीं पर प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं बल्कि अब चौथी अवस्था में पहुंचे भारतीय जनता पार्टी के मूर्धन्य नेतृत्व समूह नरेन्द्र दामोदरदास मोदी से आंतरिक युद्ध करना चाहता है, 2014 में जब सामान्य चुनाव हुआ उन्हें चुनावी विजय मिली पर प्रधानमंत्री ने एक निश्चित आयु सीमा को लांघ गये महानुभावों को मंत्री पद नहीं नवाजा वे इसलिये असंतुष्ट हैं। ऐसे असंतुष्ट नेता चाहे बिहार से सांसद हों या अन्य किसी दूसरे राज्य से जहां नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी अपने बलबूते पर बहुमत में आई, 272 का आंकड़ा पार किया लोकतंत्र में अपना मत व्यक्त करने का हर व्यक्ति को मौलिक अधिकार है। बिहार में दल की पराजय के लिये जिम्मेदारी निश्चित करना भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड का अधिकार है पार्टी सांसदों की बैठक और कार्यकारिणी बैठक में वे अपना प्रस्ताव ला सकते हैं। अगर पार्टी का बहुमत मानता है कि बिहार व दिल्ली के चुनावों में हार के लिये पार्टी नेतृत्व ही जिम्मेदार है। पर लगता है बुजुर्ग नेतृत्व को अपनी अनदेखी चुभ रही है इसलिये वे मुखर हैं।
आज का घटनाक्रम राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आंकना हो तो मोरारजी रणछोड़जी देसाई की बहुमत वाली सरकार की पतन गाथा को याद कीजिये, बिहार से ही लोकसभा प्रतिनिधित्व करने वाले प्रखर समाजवादी मधु लिमये ने जो सवाल उठाया मोरारजी देसाई की सरकार भरभरा कर ध्वस्त होगई मोरारजी से उ.प्र. के मंजे हुए राजनीतिक खिलाड़ी में लौहपुरूष चंद्रभानु गुप्त ने कहा - मोरारजी भाई इजाजत दीजिये सबको दुरूस्त किया जाये चौधरी चरण सिंह का साथ एक जमाने में मोरारजी के समर्थक रहे भूमिहार नेता राजनारायण ने दिया चरण सिंह प्रधानमंत्री होगये बाबू जगजीवन राम देखते रह गये उन्हें मौका नहीं मिला। संजय गांधी राजनीतिक परिपक्वता के प्रतीक व दृढ़निश्चयी थे, उन्हें पता था कि मोरारजी पदत्याग करना पसंद करेंगे सांसदों की खरीद फरोख्त का रास्ता नहीं अपनायेंगे, चौधरी चरण सिंह जिस तरह उ.प्र. के मुख्यमंत्री 1967 में बने बारह वर्ष पश्चात उन्होंने वही रास्ता अपनाया भारत के प्रधानमंत्री बन गये, संजय गांधी की सलाह पर श्रीमती इंदिरा गांधी ने चौधरी साहब को सरकार से बाहर रह कर समर्थन दिया, चौधरी साहब की भारत सरकार लोकसभा का सामना नहीं कर पाई कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया चौधरी साहब की सरकार के रूखसत होगई, नये चुनाव संपन्न हुए इंदिरा जी पूरे जोश खरोश के साथ फिर सत्तासीन होगईं। संयुक्त राज्य अमरीका सहित दुनिया के ताकतवर देश जिनमें चीनी गणराज्य भी सम्मिलित है भारत को उत्कर्ष के रास्ते जाने से सशंकित हैं, वेटिकन सहित दुनियां के संपन्न राष्ट्रों को नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की फुर्ती से अजीर्ण होगया लगता है। असहिष्णुता का राग जोर जोर से अलापा जारहा है कवि, लेखक, वैज्ञानिक, आर्थिक चिंतक सैनिक हर कोई अपने सम्मान हजम की हुई दक्षिण राशि, मेडल, तथा पù सम्मानों को वापस करने की बात कह रहे हैं। पंडित नेहरू की सरकार ने गीताप्रेस चलाने वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार को देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ देना चाहा पर हनुमान प्रसाद पोद्दार ने नम्रतापूर्वक सर्वोच्च सम्मान लेने से असहमति जताई। तुलसीदास ने रामचरित मानस सम्मान पाने के लिये नहीं स्वांतः सुखाय रचा।
एक अखबार ने लिखा कि बिहार में लालू प्रसाद यादव की विजय को तीस पृथ्वीराज रोड नई दिल्ली जहां भारत के पूर्व गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी रहते हैं पटाखे छोड़े गये पटाखे जला कर बिहार में भाजपा की करारी हार का जश्न उस व्यक्ति के निवास में मनाया गया जिसे बिहार क्षत्रप लालू प्रसाद यादव जी ने बिहार में प्रवेश नहीं करने दिया, लालकृष्ण आडवाणी जी डाक्टर मनमोहन सिंह जी की तरह भारत विभाजन से पश्चिम पाकिस्तान नाम से पुकारे जाने वाले सिन्ध में हुआ, डाक्टर साहब पश्चिमी पंजाब के मूल निवासी थे वे दस वर्ष श्रीमती सोनिया गांधी के आशीर्वाद अनुकम्पा से भारत के प्रधानमंत्री रहे, आडवाणी जी अगर 2004 2009 में अपनी राजनतिक जमात को सशक्त बना पाते वे ही प्रधानमंत्री बनते पर वे 2004 व 2009 के सामान्य निर्वाचन में भा.ज.पा. को वह बढ़त नहीं दिला पाये जो 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी ने संजोयी थी, उन्होंने नरेन्द्र मोदी का हर जगह विरोध किया जब नितीश कुमार भाजपा के साथ थे उन्हें लालकृष्ण आडवाणी का हार्दिक समर्थन था देवगौड़ा से यदि नितीश कुमार प्रधानमंत्री पद के दूसरे दावेदारों से आगे पढ़ते हैं दावेदार पंगत के मुखिया बन जाते हैं, उनके 20 नवंबर 2015 के शपथ यज्ञ में आकर आडवाणी जी सम्मिलित हुए वह मुहूर्त भाजपा की टूट की शुरूआत होगी पर भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को ही इस लायक माना कि वे भारतीय जनता पार्टी को विजय श्री दिला सकते हैं। नरेन्द्र मोदी ने उन सभी बुजुर्गों को विजय श्री दिलाई जो आज उन्हें उखाड़ने में लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी सांसद अश्विनी कुमार सम्पादित अखबार पंजाब केसरी के संपादकीय पन्ने रविवार 15 नवंबर 2015 के दिल्ली संस्करण में श्री त्रिदीप रमण का भाजपा असंतुष्टों की नई पार्टी संबंधी आलेख छपा है, स्तंभ लेखक के अनुसार लालकृष्ण आडवाणी मुरली मनोहर जोशी यशवंत सिन्हा शांता कुमार अरूण शौरी शत्रुघ्न सिन्हा रामजेठमलानी जैसे पार्टी नेताओं के मन में पीड़ा है कि हाल के वर्षों में मोदी अभ्युदय के बाद भाजपा अटल जी के आदर्शों से भटक गई है इसलिये वे आगामी 25 दिसंबर 2015 अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के अवसर पर बुजुर्ग नेता नई पार्टी की संकल्पना भी कर सकते हैं। वर्तमान संसद में भारतीय जनता पार्टी के 282 सांसद हैं वर्षों से भाजपा का साथ देती आरही शिवसेना भी जिसके 18 सांसद हैं नरेन्द्र मोदी का तख्ता पलट करने की इच्छुक लगती है, सुश्री जयललिता सुश्री ममता बनर्जी ओडिशा जननेता नवीन पटनायक के बीजू जनता दल के 91 सांसद हैं। बिहारी बनाम बाहरी का जो नारा नरेन्द्र मोदी के खिलाफ नितीश कुमार मंडली ने लगाया, बिहार से सांसद रहे जार्ज फर्नांडीज मधु लिमये भी बिहार के लिये बाहरी थे जनता दल यूनाइटेड के सदर शरद यादव जबलपुर के निवासी हैं वे भी बाहरी हैं। ऐसा वातावरण बनने के लक्षण दिखाई देरहे हैं कि बिहार राज्य के असंतुष्ट भाजपा विधायकों सहित काऊ बेल्ट के नाम से प्रसिद्ध यू.पी. व बिहार के कई भाजपा सांसद बिक सकते हैं। नरेन्द्र मोदी के सामने वह स्थिति आ सकती है जो छत्तीस वर्ष पहले गुजराती भाषी दृढ़ निश्चयी अपने सिद्धांत को मानने वाले मोरारजी रणछोड़जी देसाई नीत बहुमत वाली सरकार को झेलनी पड़ी थी, तुलसीदास ने कहा है - सुर नर मुनि सब की यह रीती स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति। स्वार्थ रहित राजनीति करने वाले कुछ इने गिने लोग नेतृत्व तक पहुंचते हैं आचार्य चाणक्य राजनीति को बाहर से चलाने वाले नीतिज्ञ थे स्वयं उसमें घुसते नहीं थे, राजनीति की गुफा में घुस कर निर्लिप्त कर्म का उदाहरण पंडित पंत ने दिया पर चाहत और घृणा से वे भी नहीं चले उन्होंने कूर्मांचल केसरी बदरी दत्त पांडे को महात्मा गांधी व पंडित नेहरू से नजदीकियों के बावजूद इकला रखा। उ.प्र. में चौधरी चरण सिंह के साथ पंडित पंत के दिल्ली जाने से छः माह पूर्व करीब 101 विधायक थे जो चौधरी साहब की बात पर यकीन करते थे पंडित पंत ने उन सभी विधायकों को अलग अलग बुलाया उनकी चाहतें पूरी कीं जब वे दिल्ली के लिये रवाना होरहे थे उन्होंने उ.प्र. की बागडोर डाक्टर संपूर्णानंद को सौंपी, बारह वर्ष पश्चात 1967 में जब चौधरी साहब ने तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त की सरकार के खिलाफ जंग लड़ी उनके साथ केवल 17 विधायक थे, भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सदस्य जो बिना बिके आडवाणी जी को प्रधानमंत्री बनाने के लिये संकल्पित पार्टी में जुड़ते हैं महागठबंधन तथा उ.प्र. के भाजपा सांसद जिन्हें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी बहुजन समाज पार्टी अपनी ओर आकर्षित करती उन्हें भा.ज.पा. से टूटने के लिये नजराना देती है। आज के राजनीतिक वातावरण में यह असंभव नहीं एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है इसलिये दिल्ली व बिहार की असफलता से उत्पन्न स्थितियों के सरोकारों पर भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को स्वयं बात करनी चाहिये उन्हें रोजाना कम से कम दस बारह सांसदों से मिल कर उनकी मनोकामना को शांत करने का तत्काल प्रयास करना चाहिये बुजुर्ग सांसदों से उनके घर जाकर मिलना चाहिये उनकी निजी पीड़ा समझ कर उन्हें रचनात्मक कार्यों से जुड़ाना चाहिये इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में आज जितने शीर्ष राजनीतिक लौहपुरूष हैं उनमें पंडित नेहरू की तरह 18 घंटे काम करने का माद्दा केवल नरेन्द्र मोदी में है, सारा भारत उनका अपना परिवार है वे भाई भतीजावाद सहित वैयक्तिक चारित्रिक नजरिये से निर्दोष व निस्पृह व्यक्ति हैं। आधुनिक भारत को विश्व में समर्थ सक्षम व स्मार्ट राष्ट्र बनाने के लिये नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ही सक्षम हैं। श्रीमती सोनिया-राहुल राजघराना सहित मुलायम सिंह राजघराना, लालू प्रसाद यादव राजघराना एम करूणानिधि राजघराना, देवगौड़ा राजघराना, स्वयं राज न करने वाला ठाकरे राजघराना जम्मू कश्मीर के दोनों राजघराने, पंजाब का प्रकाश सिंह बादल राजघराना, इनके अलावा मायावती, ममता बनर्जी जयललिता के महिला सशक्तिकरण वाले राज प्रबंधन सहित छोटे बड़े सभी राजनीतिक हस्तियों से प्रधानमंत्री का संवाद निरंतर चलता रहे प्रधानमंत्री उन्हें जो दे सकते हैं उदार होकर दें पर सहयोग की कामना का ज्वर न पालें नितीश कुमार व अरविन्द केजरीवाल की दोहरी नजर हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री पद की ओर टकटकी लगाये देख रही है पर दोनों का राजनैतिक ढांचा लड़खड़ाया हुआ है। इनसे ज्यादा राजनैतिक शक्ति तो मायावती व जयललिता में है। भारत राष्ट्र की तात्कालिक जरूरत राजनीतिक टुटन को रोकने की है, साथ ही साथ मजहब संबंधी मामले में नरेन्द्र दामोदरदास मोदी सरकार समीक्षित मार्ग का अनुसरण करे तभी भाजपा नेतृत्व वाली राजग सरकार आगामी साढ़े तीन वर्ष देश पर शासन कर सकती है तथा मध्यावधि चुनाव की नौबत तभी नहीं आ पायेगी जब नरेन्द्र दामोदरदास मोदी राजनीतिक सतर्कता तथा खुले दिमाग से दोस्त-दुश्मन दोनों से निर्वैर निश्चल संवाद जारी रखने का उपक्रम करेंगे। प्रशासनिक सहायता के लिये वे उप प्रधानमंत्री का दर्जा देकर देश विदेश में अपना ज्यादा समय कारगर संवाद करने में बितायें। भारत की राजनीति को भीष्माचार्य, चणकनंदन विष्णु शर्मा तथा महात्मा गांधी की आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति से प्रेरित करें यही वह बिन्दु है जिस पर कृष्ण ने अर्जुन से कहा था - युध्वास्व विगत ज्वरः।
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