Friday, 27 November 2015

गांधी आश्रम बचाइये  गांधी आर्थिकी खादी संवारिये

नांदीमुख गांधी का पहला पड़ाव ईश्वरगंगी-काशी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र काशी में हिमालय में तपस्या कर चुके संत लाहिड़ी महाराज ने आचार्य कृपलानी और उनके 25 शिष्यों से कहा - आप अपने संगठन का नाम श्री गांधी आश्रम रखो। यह बात 20 नवंबर 1920 को हुई जब काशी विश्वविद्यालय के तीन सौ छात्रों ने देश की आजादी की जंग में कूदने का फैसला किया था। उन्हें महात्मा गांधी ने पुरजोर अपील करते हुए पढ़ाई छोड़ कर आजादी की जंग से जुड़ने का आह्वान किया था। विश्वविद्यालय छोड़ने वाले छात्रों को मालवीय जी ने समझाया उनमें से केवल 275 कृपलानी जी के साथ नहीं गये। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर याज्ञिक ने अपने सहयोगी प्रोफेसर कृपलानी व उनके साथ विश्वविद्यालय परिसर से निकल कर बनारस की गलियों में निकलने वाले 25 छात्रों को विदाई दी और उनके उज्वल भविष्य की कामना की। ईश्वर गंगी में इस समूह का स्वागत संत लाहिड़ी ने किया। उन्हें परामर्श दिया जो संगठन खड़ा कर रहे हैं उसे श्री गांधी आश्रम कहो। द्रोणागिरि पर्वत पर तपस्या कर जीवन में नयापन लाने वाले संत लाहिड़ी की सत्प्रेरणा आचार्य कृपलानी को भा गयी। उन्होंने श्री गांधी आश्रम की शुरूआत काशी में की। प्रोफेसर कृपलानी की एक महीने की तनख्वाह और पच्चीस छात्रों का जेब खर्च कुल जमा रकम पांच रूपये प्रति छात्र तथा कृपलानी की महीने भर की तनख्वाह रूपये 275 कुल मिला कर चार सौ की पूंजी से श्री गांधी आश्रम बढ़ा। वाराणसी जिले के धौरहरा गांव में हाथ कते सूत से खादी  के दो थान का निर्माण का कार्य आश्रम कार्यकर्त्ता कृपलानी जी के शिष्य रामाश्चर्य लाल ने किया। ये दोनों थान महात्मा गांधी को समर्पित किये गये। सन 1965-66 में श्री गांधी आश्रम का उत्पादन चरम पर था। महात्मा गांधी की खादी आर्थिकी का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र काशी - हिन्दुस्तान की देहाती आर्थिकी का पहला पड़ाव है। श्री गांधी आश्रम को संवारने में आचार्य कृपलानी को पंडित नेहरू का भरपूर समर्थन मिला। गांवों में खादी उत्थान व ग्रामीण उद्योग के लिये खादी ग्रामोद्योग आयोग के प्रथम अध्यक्ष वैकुंठ ल. मेहता अ.भा. खादी ग्रामोद्योग मंडल के शुरूआती तीन वर्ष 1953-54 से 1956-57 तक तथा अप्रेल 1957 से मार्च 1963 तक खादी आयोग के सदर रहे। उन्होंने अपने सहयोगी उद्योगपति प्राणलाल सुंदरजी कापड़िया के आत्मीय सहयोग से गांधी आर्थिकी खादी एवं ग्रामोद्योग संवर्धन का रास्ता अपनाया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बड़े बड़े उद्योगों के समानांतर ग्रामीण औद्योगीकरण के प्रबल पक्षधर थे। छात्रों की पाकेटमनी व आचार्य कृपलानी की एक महीने की तनख्वाह रूपये 275 याने कुल मिला कर रूपये 400 की पूंजी से गांधी आश्रम का 31.3.2004 के दिन इस गांधी आश्रम की भू भवन संपदा सोलह अरब रूपये थी जो उ.प्र. उत्तराखंड दिल्ली पंजाब जम्मू कश्मीर मध्यप्रदेश पश्चिम बंग सात राज्यों में फैली है। इस संगठन को सही तरीके से चलाने का श्रेय स्वातंत्र्य सेनानी विचित्र नारायण शर्मा व उनके गुरू आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी का गुरू शिष्य प्रयोजन और पंडित नेहरू का विचित्र नारायण शर्मा की एक दूसरे की प्रति अपार श्रद्धा है। पंडित नेहरू विचित्र नारायण शर्मा की संगठन शक्ति के प्रशंसक थे चाहते थे कि गांधी आर्थिकी भारत के गांव गांव में फैले। वैकुंठ ल. मेहता ने नेहरू जी के संकल्प को क्रियात्मक स्वरूप दिया। सघन क्षेत्र योजना के जरिये रूर्बन सोसाइटी सृजित करने का प्रयास निरंतर दस वर्ष करते रहे। वाराणसी जिले में तारगांव और अजगरा पहले गांव थे जहां कृपलानी जी के शिष्य रामसूरत मिश्र ने ग्रामोद्योगीकरण शुरू किया। कृपलानी जी को गांधी आश्रम का स्वरूप खड़ा करने में सबसे ज्यादा सहयोग उनके शिष्य विचित्र नारायण शर्मा ने किया। विचित्र नारायण शर्मा कृपलानी जी के शिष्य थे साथ ही पंडित नेहरू के विश्वासपात्र भी थे। वे 100 वर्ष जिये व 31 मई 1998 को उनका देहावसान होगया। उनके देहांत के पश्चात गांधी आश्रम की पूरी जिम्मेदारी महेश चंद्र तिवारी ने निर्वाह की। उन्होंने अपना ज्यादा समय कश्मीर व पंजाब में बिताया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह महेश चंद्र तिवारी के प्रशंसक थे। अमृतसर में गांधी आर्थिकी का जो ईमानदार क्रियान्वयन महेश तिवारी ने किया वह अद्वितीय उपलब्धि थी। महेश तिवारी फरवरी 2005 में दिवंगत होगये। अपनी मृत्यु से छः महीने पूर्व उन्होंने इस ब्लागर से कहा - गांधी आश्रम का क्या होगा ? वे विचित्र नारायण शर्मा जी को विचित्र भाई संबोधित करते थे। उन्होंने इस ब्लागर से जोर देकर कहा - कुछ तो करो कि मेरे जाने के बाद विचित्र भाई की रचना कहीं कुम्हला न जाये। इस ब्लागर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी का ध्यानाकर्षण करते हुए प्रार्थना की थी कि श्री गांधी आश्रम को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाये क्योंकि इसका नाम श्री गांधी आश्रम है। यह स्वतंत्रता सेनानियों का साझा उपक्रम है। प्रधानमंत्री जी ने खादी ग्रामोद्योग आयोग की आख्या तलब की। इसी बीच महेश तिवारी इस संसार से विदा होगये। गांधी आश्रम की बागडोर क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम मुरादाबाद में सेक्रेटरी रहे ब्रजभूषण पांडे के हाथों में आगयी। 
          अक्टूबर 2004 में श्री गांधी आश्रम की भूमि भवन संपदा का बाजार मूल्य 16 अरब रूपये था। महेश तिवारी के सेक्रेटरी रहते मौनपालन के क्षेत्र में गांधी आश्रम अग्रणी था। श्री गांधी आश्रम मेरठ सहित आज देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू द्वारा संवर्धित श्री गांधी आश्रम मेरठ की भू भवन संपदा का आज का बाजार मूल्य तीस अरब रूपये से ज्यादा है। श्री गांधी आश्रम मेरठ तथा इससे निकले हुए अढ़तीस या उनचालीस क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रमों व खादी ग्रामोद्योग आयोग के बीच त्रिपक्षीय करारनामा है। ऐसा प्रतीत होता है कि खादी ग्रामोद्योग आयोग की ढिलाई से श्री गांधी आश्रम मेरठ जो अब लखनऊ से कार्यशील है भूमि संपदा का हस्तांतरण करना शुरू कर दिया है। नई संस्था खड़ी कर मेरठ में इन्होंने तीन या चार जगह श्री गांधी आश्रम की भूमि के हस्तांतरण तथा बिल्डरों को भूमि सौंपने का प्रयास शुरू कर दिया है। इसलिये तात्कालिक जरूरत यह है कि प्रधानमंत्री सचिवालय इस प्रसंग पर विचार करे। श्री गांधी आश्रम महात्मा गांधी के नाम पर बना इसकी सारी संपत्ति भारत माता की संपत्ति है। इसे सही परिप्रेक्ष्य में पुनः सक्रिय करने की तात्कालिक जरूरत है। इसलिये श्री गांधी आश्रम मेरठ (लखनऊ से कार्यशील) संगठन ने जिन जिन भूमियों को हस्तांतरित करने या बिल्डरों को सौंपने का फैसला किया है उस समूचे प्रसंग पर श्री गांधी आश्रम मेरठ व सभी क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रमों को गांधी ड्योढ़ी शती के अवसर पर बन्द होने से बचाने के लिये तीस अरब मूल्य की भू संपदा के संरक्षण के लिये और जिन जिन राज्यों में श्री गांधी आश्रम के विकेन्द्रित संगठन - क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम कार्यरत हैं या कार्यक्रम बाधायें हैं उनकी पड़ताल कराई जावे। जितनी जल्द संभव हो श्री गांधी आश्रम मेरठ पर आदाता - रिसीवर नियुक्त कर देश की एक महत्वपूर्ण रचनात्मक संस्था को छिन्न भिन्न होने से बचाया जाये। यदि भारत सरकार ने तुरंत कोई कार्यवाही नहीं की उ.प्र. व उत्तराखंड सहित पंजाब दिल्ली कश्मीर मध्यप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के सात राज्यों में श्री गांधी आश्रम मेरठ की भू भवन संपदा बिल्डरों व माफिया लोगों के हवाले भी हो सकती है। इसलिये तात्कालिक जरूरत यह है कि प्रधानमंत्री जी स्वयं इस प्रसंग पर विचार करें तथा जमीनी वास्तविकता से अवगत हों। यदि एम एस एम ई मंत्रालय तथा प्रधानमंत्री कार्यालय प्रश्नगत विषय को गम्भीरता से लेना चाहें तो रजिस्ट्रार सोसाइटीज व निबंधन उ.प्र. से अपेक्षा की जाये कि गांधी नेहरू विरासत श्री गांधी आश्रम मेरठ को बचाने के लिये यथाशीघ्र आदाता - रिसीवर की नियुक्ति की जाये। 
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