लोकतंत्र में सार्वभौम कौन - बिहार के सार्वभौम क्षत्रप
बिहार के ताजा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव
अष्टशाखम् चतुर्मूलम् षष्ठिपत्रम् द्वये स्थितम् षट्पुष्पम् त्रिफलम् वृक्षम् यो जानाति स नीतिवत्।
कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार राजनीतिज्ञ वह है जो आठ शाखाओं, चार जड़ों, साठ पत्तों, दो तरीकों से स्थित, छः प्रकार के फूलों तथा तीन फल वाले वृक्ष - वृक्षे न वसति वयः वृक्ष उमर का कायल नहीं। जो राजनीति रूपी वृक्ष को सही सही तरीके से समझता है, तदनुसार व्यवहार करता है, उसे ही राजधर्म का ज्ञाता समझना चाहिये। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना करने के समानांतर सार्वभौम राज की संकल्पना करते हुए यह भी कहा व क्रियात्मक रूप से अपने निष्कर्ष का अनुपालन भी किया कि उत्तरापथ में कई जनपदों मंे गण्तंत्र है परंतु समर्थ राज व्यवस्था कायम करने के लिये मगध साम्राज्य की नींव डालने वाले नीतिवेत्ता कौटिल्य ने गणतंत्रीय राज व्यवस्था को नकार डाला। नंद वंश के पतनोपरांत जो राजव्यवस्था प्रयुक्त की वह पूर्णतः सार्वभौम सत्ता वाले सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का मगध के राज सिंहासन में प्रतिष्ठित करना था। नीति का वाक्य है कि ‘लोकाऽनुरंजते सः राजा’। राज वह सार्वभौम सत्ता है जो अपने भूमंडल का प्रजा, जनता, जन सामान्य का अनुरंजन करता है। लोकसत्ता का पूरी पूरी तरह संरक्षण करता है। यह व्यवस्था तो सार्वभौम सत्तासीन राजा की है पर जब दुनियां की बहुत सी राज सत्तायें राजतंत्र के बजाय गणतंत्र अथवा लोकतंत्र शासन व्यवस्था को वरण करते हैं ऐसी लोकसत्ता वाली व्यवस्था में जिसे पश्चिमी विचारक ‘डैमोक्रेसी’ कहते हैं, जनता जनार्दन अथवा वयस्क मताधिकार प्राप्त मतदाताओं के द्वारा चुने गये लोकप्रतिनिधि राजा की सामर्थ्य अथवा राजसत्ता शक्ति किस जनसमूह अथवा शक्ति में निहित मानी जाये। बर्तानिया में पार्लमेंटरी लोकतंत्र है परंतु प्रतीकात्मक राजसत्ता बर्तानिया के राजकुल में, राजा या रानी में अवस्थित है। निर्णयात्मक सत्ता बर्तानियां के हाउस आफ कामन्स में है। वहां हाउस आफ लार्ड्स भी है। बर्तानिया की पार्लमेंटरी डेमोक्रेसी को लोकतंत्रात्मक सत्ता की जननी मानने की परंपरा चल पड़ी है। बर्तानिया की परंपरामूलक मान्यतायें हैं। यूरप के अन्य देशों में जनतंत्र व्यवस्थायें कायम हैं। यूरोपीय देशों के यूरो संसद का सृजन कर लोकतंत्र को नया आयाम देने का प्रयास किया है। संयुक्त राज्य अमरीका को अपने लोकतंत्र पर आत्मविश्वास व सम्मान है। स्वाधीन भारत ने लोकतंत्र का पार्लमेंटरी तरीका अपनाया है या कहें कि भारत ने संविधान तो लिखित तौर पर स्थापित किया है बर्तानिया की तरह परंपराओं का अनुपालन करने का रास्ता पूरा पूरा नहीं अपनाया है। इसलिये भारतीय गणतंत्र में भारत राष्ट्र राज्य के घटक राज्यों की भाषायें व लिपियां भिन्न भिन्न हैं। मजहब और संप्रदायों के जरिय से भी भारत की बहुल संस्कृति बहुल भाषायें तथा बहुल मजहबी समाज माना गया है। भारत में चार तरह के राजनैतिक स्तूप हैं। भारत की आजादी के लिये सर ह््यूम द्वारा संगठित इंडियन नेशनल कांग्रेस सबसे लंबी उम्र वाली राजनीतिक जमात है। इंडियन नेशनल कांग्रेस का भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम वाला दीप्तिमान चेहरा भी है। इंडियन नेशनल कांग्रेस विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं वाले व्यक्तियों का एक राष्ट्रीय जमावड़ा भी रहा है। इंडियन मुस्लिम लीग ने इंडियन नेशनल कांग्रेस को हिन्दुओं का बिल्ला चस्पाया और इंडियन मुस्लिम लीग ने कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में वामन बनिया नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ इस्लाम धर्मावलंबियों का एक राष्ट्र के रूप में रहना अस्वीकार कर हिन्दुस्तान के बंटवारे की भूमिका के अस्तित्व में ला डाला। आजादी व भारतीय संविधान के लागू होने के बाद 26 जनवरी 1950 से शुरूआती बारह चौदह वर्ष केरल व तमिलनाडु में छोड़ कर शेष घटक राज्यों में कांग्रेस सत्ता पंडित नेहरू के जीवन पर्यन्त बनी रही। पंडित नेहरू के निधन के पश्चात कांग्रेस राजनीतिक संगठन के रूप में कमजोर होती गयी। पंडित नेहरू का राजनैतिक उत्तराधिकार लाल बहादुर शास्त्री ने संभाल पर शास्त्री जी की जीवन लीला समाप्त होते ही कांग्रेस विघटन की ओर अग्रसर होगयी। तत्कालीन सिंडिकेट ने मोरार जी देसाई सरीखे अनुभवी व दृढ़प्रतिज्ञ राजनीतिक व्यक्तित्त्व को अपना नेता इसलिये नहीं चुना उन्हें भय था कि सिंडिकेट के सामूहिक नेतृत्व की मोरारजी रणछोड़जी देसाई अनदेखी कर सकते हैं। सिंडिकेट ने कांग्रेस अध्यक्षा रहीं पंडित नेहरू की प्रियदर्शिनी कन्या इन्दिरा नेहरू गांधी को अपना नेता चुना। ख्याल तो यह था कि इन्दिरा गांधी उनके इशारे पर चलेंगी पर इन्दिरा गांधी ने सिंडिकेट के सारे सपने चूर कर आत्मव्यक्तित्त्व को राजनीतिक दल के मुकाबले ज्यादा तरजीह दी। कांग्रेस पार्टी बिखर गयी पर इंदिरा गांधी ने 1966 से 1977 तक अपना राजनीतिक डंका सुस्थापित कर अपने सभी विरोधियों को धूल चटा दी। आपातकाल जारी कर राजनीतिक परिधान का चीरहरण कर डाला। परिणामस्वरूप 1977 के चुनाव में वह पराजित होगयीं पर उनकी राजनीतिक हिम्मत कम नहीं हुई थी। तीन वर्ष पश्चात वे फिर भारत की सत्ता पर काबिज होगयीं। सिक्किम को भारत संघ का हिस्सा बनाने और बांग्ला देश निर्माण की राजनीतिक दूरदर्शिता व अकाल तख्त में दखलन्दाजी से इन्दिरा जी को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ गया। राजनीतिक रूप से कांग्रेस पार्टी लंगड़़ा गयी और लोकतंत्र कुछ इनेगिने लोगों का बंदी बन गया जो राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह की मंडल संस्तुतियां लागू करने पर भारत का स्थायी राजधर्म का आकार ग्रहण कर चुका है। इंदिरा व उनके पुत्र राजीव गांधी की नृशंस हत्या से देश का राजनैतिक माहौल बिगड़ता चला गया। सत्ता में पी.वी. नरसिंहाराव के काबिज होने से जहां लाइसेंस परमिट राज का खात्मा हुआ वैश्विक आर्थिक खुलेपन ने आर्थिक क्षेत्र में हर्षद मेहता सरीखी स्थितियों को उभार मिला। सोनिया गांधी सहित कांग्रेस के कुछ नेता नरसिंहराव सरकार के रास्ते के रोड़े अटकाते रहे राममंदिर विवाद तथा बाबरी मस्जिद नाम से पुकारी जाने वाले रामकोट स्थित निर्माण को ढहाने से सांप्रदायिक स्थिति अनियंत्रित होगयी पर यह सब होने के बावजूद पी.वी. नरसिंह राव की सरकार ने आर्थिक सुधारों के जरिये भारत में एक नयी आर्थिकी को जन्म दिया। आर्थिक सुधारों में नरसिंह राव के वित्त मंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह दस वर्ष भारत के प्रधानमंत्री रहे। 1991 से वैश्विक खुलेपन के कारण भारत में शहरी आर्थिक कायाकल्प तो संपन्न हुआ पर भारत की जो जनता गांवों में रहती आरही थी उसकी आर्थिकी बद से बदतर होती गयी। लोगों का मानना है कि 83.3 करोड़ भारतीय जो गांवों में रहते हैं आजादी के साढ़े छः दशकों के निरंतर प्रयास के बावजूद गरीब दाल रोटी के लिये भटक रहा है। देश में पिछले पच्चीस वर्षाें में गरीब अमीर के बीच की खाई चौड़ी होती चली गयी है। पुरूष राजकरण व्यक्तित्त्वों में जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला उनके पुत्र डाक्टर फारूख अब्दुल्ला पौत्र उमर अब्दुल्ला का तीन पीढ़ियों वाला परिवार तंत्रत्र मुफ्ती सईद और उनकी कन्या का अपेक्षाकृत नया परिवार तंत्र, पंजाब में सरदार प्रकाश सिंह बादल व उनके पुत्र का परिवार तंत्र दिल्ली में अखिल भारतीय आवरण हुई 130 वर्ष पुरानी राजनीतिक हस्ती की एकछत्र नेत्री श्रीमती सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी ही इंडियन नेशनल कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव एवं उनके मुख्यमंत्री पदासीन पुत्र अखिलेश यादव जातीय परिवार सत्ता के प्रतीक राजनीतिक तरंगों को सटीक पहचानने वाले व्यक्तित्त्व हैं। डाक्टर राममनोहर लोहिया के उ.प्र. में जो निकटस्थ सहयोगी थे उनमें इटावा के अर्जुन भदौरिया, पूर्वांचल के जनेश्वर मिश्र जिन्हें लोग छोटे लोहिया के रूप में देखते थे जनेश्वर मिश्र ने अपनी राजनीतिक विशेषज्ञता के चलते उ.प्र. में डाक्टर लोहिया सृजित राजनीतिक परिपक्वता का प्रयोग मुलायम सिंह यादव के माध्यम से किया। मुलायम सिंह की राजनीतिक पात्रता के पोषक किसान नेता चौधरी चरण सिंह और भारत की राजनीतिक नाड़ी मर्मज्ञ हेमवती नंदन बहुगुणा भी थे। यही धरती पुत्र मुलायम उत्तर लोहिया, उत्तर नेहरू राजनीतिक क्षितिज में आने वाले उ.प्र. विधानसभा चुनाव 2017 तक पूरी अर्धशताब्दी तक देश के हिन्दी हर्टलैन्ड अथव काउलैन्ड के नाम से अभिहित होने वाले उ.प्र. में अपना वर्चस्व निरंतर स्थापित किये हुए है। यद्यपि वर्तमान में लोकसभा के उनके पांचों सांसद स्वपरिवारी हैं सत्ता पर काबिज सैफई के भूमि पुत्र हैं। इन सभी आरोपों के बावजूद यह मानना पड़ेगा कि मुलायम सिंह यादव की पकड़ भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण विधा है। मुलायम सिंह की इस राजनीतिक पात्रता तथा विज्ञता के परम पारखी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी भी हैं। परिवारी राजनीति के धुरंधर विज्ञ लालू प्रसाद यादव भी हैं जिन्हांेने स्वयं और अपनी धर्मचारिणी गृहिणी पत्नी के माध्यम से बिहार में अपना राजनीतिक सिक्का जातीय आधार पर वट वृक्ष सा बना डाला पर सत्ता व अनर्जित धन की लालसा ने लालू प्रसाद को जनप्रतिनिधित्व धारिता से अयोग्यता के गहरे कुएंें में धकेल डाला पर लालू विचलित न हुए। लालू परिवार सत्तावाद आज भी बिहार को महागठबंधन की महत्वपूर्ण कड़ी है। बिहार की सत्ता की पहली कड़ी लालू यादव के हाथ है। उन्हें जदयू राजद कांग्रेस महागठबंधन में 101 सीटें आवंटित हुईं। उन्होंने अपने राजनैतिक कौशल से बिहार विधानसभा के लिये सर्वाधिक सदस्य संख्या हासिल कर जनता दल यूनाइटेड और कांग्रेस को भी अपने कौशल से लाभान्वित कराया है। बिहार की राजनीतिक पहल लालू प्रसाद यादव के हाथ है। उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि इंडियन नेशनल कांग्रेस सहित जनता दल यूनाइटेड उनके लिये आस्तीन के सांप हैं। राजनीतिक अथवा प्रशासनिक नौकरशाही जनित भ्रष्टाचार की बात आज कोई मायने नहीं रखती। जातियों का सामाजिक कौशल तथा इतर जातियों के लालू प्रसाद यादव को अपने अनुकूल नहीं भी मानतीं उनके इक्के दुक्के लोगों को राजनैतिक लालच से लालू यादव अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं। यहीं पर अमरीकी यहूदी राजनीतिज्ञ हेनरी किसिंजर द्वारा कौटिल्यीय अर्थशास्त्र की प्रयोग भूमि है। बिहारी और बाहरी की मृग मरीचिका के साथ साथ बिहार के दलितों, महादलितों, पिछड़ों और पिछड़ों में भी पिछड़ों को अपनी ओर खींचने की अद्भुत कला की क्षमता लालू प्रसाद यादव ने बिहार के हाल ही में संपन्न हुए चुनावों मंे प्रयुक्त की। यह वैसा ही सवाल है जैसा उत्तरापथ के गणतंत्रीय समाजों के लिये कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र की भूमिका में उपयोगी नहीं मान कर ग्वाल बाल चंद्रगुप्त मौर्य को नंद वंश का समूल नष्ट कर मगध का मूर्धाभिसिक्त सम्राट नियुक्त कर डाला। लालू ने नीतीश को कहा - आपको जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहिये था। उन्होंने अपना उदाहरण दिया जब वे शासन करने के पात्र नहीं रह गये। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को सत्ता की बागडोर सौंप दी पर उसका संचालन वे स्वयं करते रहे। गृहिणी ने राजनीतिक दांवपेचों का रास्ता त्याग दिया है। लालू प्रसाद ने संतति को आगे लाने का उपक्रम किया। लालू प्रसाद यादव का वास्तविक राजनीतिक कौशल आने वाले समय में सामने आयेगा। वे स्वयं नरेन्द्र मोदी विरोध की डोर पकड़ कर भाजपा के अन्दरूनी नरेन्द्र मोदी विरोधी व इतर राजनीतिक दलों के मोदी विरोधियों को एक मंच पर लाने का प्रयास करेंगे। यही वह बिन्दु है जहां ढीला ढाला राजनीतिक दलों का महामंडल अखाड़ा खड़ा होगा। लालू यादव पिछले पच्चीस वर्षों से महामंडलेश्वर बने हैं। यह आने वाला समय ही तय करेगा कि क्या दिल्ली राजनीति के मसीहा लालू यादव दिल्ली के तख्त पर कब्जा कर पायेंगे या बिहार में जदयू व कांग्रेस की संयुक्त उलझन में ही सीमित हो जायेंगे। जो भी हो मगध एक बार फिर जरासंध, नंद, महामात्य राक्षस तथा राजनीतिक अर्थशास्त्र पुरोधा कौटिल्य के सूत्रों में उलझ कर पुनर्भूषिकों भव वाली कहावत चरितार्थ करेंगे। लालू प्रसाद जिस पैंतरेबाज राजनीतिक प्रवर्तक हैं उसे नकारा नहीं जा सकता। उनका मुस्लिम यादव सरोकार बिहार की धरती से बहिष्कृत नहीं किया जा सकता। लालू प्रसाद यादव भले ही हिन्दुस्तान की सत्ता की डोर अपने हाथ में लेने की क्षमता अर्जित न कर सकंे पर उन्होंने मंडल संस्तुतियां भारत के पिछड़े वर्ग को संगठित करने में उपयुक्त की हैं। उसे चाणक्य के कौटिलीय अर्थशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में विवेचित किये जाने की आवश्यकता है। कलिंग उत्कल ओडिसा के तीन नामों से पहचाना जाने वालो ओडिसा गांधी आर्थिकी को अपनाने वाला प्रदेश है। जहां अरूणाचल, असम, बंग, मणिपुर मेघालय मिजोरम, त्रिपुरा नागालैंड के समानांतर भारत का पौर्वत्य भानु प्रदेश है सिक्किम सहित भारत की नौ पौर्वत्य राज्य घटकों में सूर्य किरणें पहले आती हैं पर सभी घटकों के पूर्व में भूमि है जहां सूर्योदय उनसे पहले होता है। भारतीय वाङमय के अनुसार भाष्कर, दिनमणि, आदित्य सूर्यनारायण मार्तण्ड, रवि, दिनकर को कलिंग देशो धव याने सूर्यनारायण का पहला दर्शन उत्कल भूमि में समुद्र तटीय होने के कारण भारतीय वाङमय ने ओडिशा को सूर्य स्थल माना, बीजू पटनायक की तकनीकी तािा राजनीतिक क्षमता को पंडित नेेहरू ने भी सराहा, उत्तर नेहरू युग में बीजू पटनायक ने अपने जीवनकाल में बीजू जनता दल के माध्यम से उड़ीसा की राजनीतिक हलचलों को सामर्थ्यवान बनाया। ताजा रपटों के अनुसार उड़ीसा का नवरंगपुर जनपद भारत का सबसे गरीब जिला है जिसे पवई मुंबई स्थित आई.आई.टी ने अंगीकृत करने का संकल्प लिया है। नवीन पटनायक एक राजनीतिक सुप्रीमो के तौर पर उड़ीसा पर राज कर रहे हैं पर उन्हें व उनके पिता को परिवारतंत्रीय राजधर्मावलंबी संज्ञा नहीं दी जा सकती। भारतीय गणतंत्र का तमिलनाडु राज्य वह पहला इलाका है जहां कांग्रेस सत्ता का सत्तावसान सबसे पहले हुआ सी.एन. अन्नादुराई को वंशवादी राजतंत्र से नहीं जोड़ा जा सकता पर निरीश्वरवादी एम करूणानिधि ने तमिलनाडु पर द्रविड मुनेत्र कड़गम के माध्यम से पारिवारिक सत्ता का सूत्रपात किया, परन्तु निरीश्वरवादी तथा सनातन धर्मी तमिलभाषी लोगों के बीच करूणानिधि पुत्र स्तालिन भक्ति के जन्मस्थान तमिलनाड में मंदिरों में जाकर माथा टेक रहे हैं। तमिल राजनीति में यह यह नया तूफान है ताकि जयललिता का वे सामना कर सकें। कर्णाटक में पारिवारिक सत्ता का स्तंभ देवगौड़ा हैं महाराष्ट्र में पारिवारिक सत्ता का सूत्रधार शिवसेना संस्थापक बाला ठाकरे कर रहे हैं जिन्होंने 1966 से मृत्युपर्यन्त शिवसेना का संचालन किया स्वयं राज्य करने के बजाय प्रतिनिधि शासन तंत्र चलाया पर अपनी राजनीतिक सत्ता अपने पुत्र उद्धव के हवाले की, कांग्रेस के समर्थ नेता शरद पवार ने मराठा राजनीति का सूत्र यशवंत राव बलवंत राव चह््वाण के अपने हाथों लिया अंततोगत्वा उन्हें कांग्रेस से निकल कर राष्ट्रवादी कांग्रेस का गठन कर डाला उन्होंने सुप्रीमो शैली नीति का चलन तो किया पर परिवारी सत्ता स्त्रोत के बावजूद शरद पवार को पूर्णतः निरंकुश सत्ताधीश क्षत्रपत्व प्रतीक नहीं माना जा सकता। राजनीति की जितनी समझ शरद पवार को है उन्होंने बारामती के लिये जो संरचना की है उसे अजित पवार अथवा शिवसेना से शरद शरण में आये भुजबल को उनके तथाकथित भ्रष्टाचरण के लिये दंडित भी होना था तो भी शरद पवार की जो वैयक्तिक छवि है उसे दुरभिसंधि का राही नहीं बताया जा सकता, दूसरी तरफ बाला साहेब ठाकरे निर्मित शिवसेना के वर्तमान प्रमुख उद्धव ठाकरे को लगता है वे महामंडलेश्वरी राजनीति पुरोधा लालू प्रसाद यादव की सफलता से महाराष्ट्र में अपनी ताकत बढ़ा सकते हैं। यह स्वाभाविक है कि उद्धव ठाकरे, अरविन्द केजरीवाल, ममता बनर्जी, सहित नरेन्द्र मोदी विरोधी समूचे भारतीय राजनीतिज्ञों को आशान्वित कर रही है पर उनमें से कोई भी राजनीतिज्ञ इतना चैतन्य नहीं है जो राजनीतिक चैतन्यता श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने दृढ़ इच्छा शक्ति तथा वैयक्तिक उच्चादर्श पूर्ण आचरण ने उन्हें पंडित नेहरू के पश्चात सक्षम एकदलीय नेतृत्व का संबल दिया है। कोई भी व्यक्ति नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पर परिवार भाई भतीजावाद का आरोप नहीं लगा सकता। यह सरस्वती की कृपा है कि मोदी अपने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता के धनी हैं। फिर भी राजनीति तो वारांगना है, श्रीमद्भागवत महाकाव्य में पिंगला नाम्नी वारांगना का अद्भुत जीवन वृतांत है, यहां एक सवाल उठता है जब पंडित नेहरू उत्तर भारत के महत्वपूर्ण नगर इलाहाबाद के पालिकाध्यक्ष चुने गये उनके पार्षदों में महामना मदनमोहन मालवीय भी थे, महामना चाहते थे कि वेश्यावृत्ति के खिलाफ इलाहाबाद म्युनिसिपैलिटी प्रस्ताव करे, प्रस्ताव आया पंडित नेहरू ने अध्यक्ष के नाते जो वक्तव्य दिया वह पिंगला नाम की वेश्या जीवनवृत सरीखा है, महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में बर्तानिया की पार्लमंेट को बेसवा कहा, लोगों ने इस शब्द का कड़ा विरोध किया पर महात्मा ने अपने वक्तव्य को बदला नहीं। पितामह, पिता पुत्र तथा परिवारी राजतंत्र, पति पत्नी का लालू प्रसाद यादव राजतंत्र जिसने नया नया अवतार पुत्री व युगल पुत्रों को बिहार राज विधानसभा में पिता-माता की महामण्डलेश्वरी सत्ता के पश्चात संख्याबल में कमजोर बिहार नेता नितीश कुमार का साथ राजकाज संचालन का लोकतंत्र प्रदत्त अधिकार अर्जित किया है उनका मार्गदर्शन लालू प्रसाद यादव करने वाले हैं। उत्कल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना कर्णाटक में भी परिवार तंत्र हैं। दूसरी ओर समर्थ महिला शक्ति के दो स्तूप - गुरू शिष्या परंपरा से जुड़े जयललिता और मायावती हैं। सुश्री ममता बनर्जी का लक्ष एकला चलो है। नये सत्ता क्षत्रप केजरीवाल हैं। संघीय भारत लगभग उतने ही राजनीतिक खेमे हैं जितनी जातियां हैं। मार्कण्डेय पुराण भारत की स्त्री शक्ति का प्रतीक है। दुर्गति नाशिनी दुर्गा का उद्घोष है कि वही जाति के रूप में प्रत्येक जीवात्मा में स्थित है। इसलिये जातिवाद को जड़ से उखाड़ना अत्यंत दुष्कर कर्म है। हिन्दुस्तान की अहमियत जातीयता में ही निहित है। इसलिये आज भारत की जरूरत बहुल संस्कृति, बहुल जातीय, बहुल मजहबी तथा बहुल भाषी भारत वासियों में एक ऐसा वातावरण जरूरी है जिसमें प्रत्येक को अपना अस्तित्व बनाये रखने में मदद मिले। विनोबा की बात भारत के राजनीतिज्ञ मनन करें पहले सहमति वाले बिन्दु चर्चित हों जहां असहमति है उसे बहस के द्वारा तय किया जाये, लोकतंत्र में पक्ष विपक्ष दोनों की महत्ता है जानलेवा शत्रुभाव के बजाय - मर्यादापूर्ण राजधर्म युद्ध का सहारा राजीनतिज्ञ है। राजनीतिक मर्यादाओं के निर्धारण में भारत के वर्तमान राजनीति विशारदों को सबसे बड़ा सहारा कौटिल्य के 572 सूत्र राजनीति पथ के 6 हजार श्लोकों का अनुशीलन मददगार साबित हो सकता है, यदि महामंडलेश्वरी राजनीति विद लालू प्रसाद यादव तथा गुरू शिष्य परंपरा वाली जयललिता लोकनेत्री मायावती, धरती पुत्र मुलायम सिंह इतिहास में अपनी यशस्वी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं तो उन्हें मर्यादा गिरी का उल्लंघन करने से पहले सोचविचार करना जरूरी होगा भारत के हर राजनीतिज्ञ को कौटिल्य और महात्मा गांधी की निर्विकार षडविधा राजनीति को हृदयंगम करना ही लाभदायक होगा, कौटिल्य के अर्थशास्त्र में विवेचित राजनीतिक सूत्रों के दृष्टिकोण से स्वातंत्र्योतर भारत की राजनीतिक क्षत्रप सत्ता का विवेचन, किसी राजनीतिक से वैर नहीं किसी राजनीतिज्ञ से दोस्ती नहीं, राजनीतिक गुणवत्ता संवर्धन तथा राजनीतिक नेताओं को आत्मसंयम के लिये अपने अंदर झांकने - वाक सरस्वती का प्रयोग सोच समझ कर करने की जरूरत है, वाणी की नदी सरस्वती भारत में लुप्त प्रायः है उसे पुनर्जीवित करने के लिये भारतीय मातृभाषाओं के जरिये संयमित वाणी का प्रयोग पहली जरूरत है ताकि लोकतांत्रिक विरोध - अहिंसा का मार्ग ही अपनाये हिंसक राजनीति से परहेज किया जाता रहे, यह तभी संभव है जब हर राजनीतिज्ञ कौटिल्य के अर्थशास्त्र का स्वयं अध्ययन करे अपने अनुयायियों का राजनीतिक मार्ग दर्शन संयमित वाणी से संपन्न करे, उग्र वामपंथी तथा उग्रदक्षिण पंथी संवर्ग आधारित राजनीतिक स्त्रोतों को भी कौटिल्य का अर्थशास्त्र - सन्मार्ग दिख सकता है बशर्ते के ये दोनों पक्ष वाणी संयम का अनुसरण करते रहें।
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