Tuesday, 15 December 2015

ऊर्ध्वम् गच्छन्ति सत्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा]
जघण्य गुण पृतिस्था अधो गच्छन्ति तामसा।

अनुराधा रमण ने रामायणों में सीता जी की ऊर्ध्व स्थिति शीर्षक से स्तंभकार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पांच वर्ष पूर्व पाठ्यक्रम से निष्कासित करने तथा विद्या वारिधि ए.के. रामनुजन रचित तीन सौ रामायण अनुस्नातक पाठ्यक्रम से बहिष्कृत किये गये। स्तंभकार अनुराधा रमण का मानना है कि यह उपक्रम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद छात्र संगठन भा.ज.पा. से संबद्ध है, उसका यह अभियान था पर वस्तुतः अ.भा. विद्यार्थी परिषद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आनुषांगिक संगठन है। ज्यादा से ज्यादा इसे भारतीय जनता पार्टी की भगिनी संस्था माना जा सकता है। विद्यार्थी परिषद का अपना स्वत्वाधिकार व प्राथमिकतायें भी हैं जो यदा कदा भारतीय जनता पार्टी के राजनैतिक विमर्श से इतर मार्ग का भी अनुसरण कर सकती है। अनुराधा रमण को चाहिये था कि वे जनकनंदिनी सीता के प्रसंग को राजनीतिक नजरिये से देखने के बजाय विशुद्ध मानवीय दृष्टिकोण से देखतीं तो उनके निष्कर्ष अलग भी हो सकते थे। उन्होंने वाल्मीकि रामायण का सांगोपांग पारायण अगर अंग्रेजी भाषा के माध्यम के बजाय अपनी मातृभाषा के माध्यम से किया होता तब भी उनके सीता-सरोकार  निष्कर्ष में प्रभावोत्पादक स्थितियों का उदय होता। 
भारतीय वाङमय के दो महाकाव्य रामायण और महाभारत पर रामानंद सागर और बी.आर. चोपड़ा ने रामकथा तथा महाभारत आधारित जो परिदृश्य दूरदर्शन के माध्यम से भारतीय समाज और भारतीय समाज से अनुराग रखने वाले विश्व समाज एवं भारतीय जीवन शैली का उग्र विरोध करने वाले समाज के जिन जिन व्यक्तियों, समूहों ने रामानंद सागर का रामायण सीरियल देखा कालांतर में बी.आर. चोपड़ा का महाभारत सीरियल अवलोकन किया उससे भारतीय जीवन शैली की झलक विश्व मानव समाज ने भी अनुभूत की। रामायण रचयिता आदि कवि प्राचेतस वाल्मीकि ने राम वनवास के समय गंगा तट श्रंगबेरपुर में अयोध्या-साकेत वासियों से कहलाया - वयम् सर्वे गमिष्यामो रामो दाशरर्थि यथा। महाभारत रचने वाले कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने पांडवों को बारह वर्षीय वनवास पर हस्तिनापुर से प्रस्थान करते समय कुरूराज के समस्त हस्तिनापुर वासी समाज से कहलाया - वयम् सर्वे गमिष्यामो यत्र गतां युधिष्ठिर। राम और युधिष्ठिर रामायण और महाभारत के महानायक हैं। राम को भारत के लोग विष्णु के अवतार के रूप में मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में देखते हैं। युधिष्ठिर को धर्मराज माना जाता है। परंपरागत भारतीय सोच में राम के राज्य को रामराज्य तथा धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य को धर्मराज्य माना जाता रहा है। अनुराधा रमण ने स्त्रियों को अपने स्तंभ का मुख्य विषय माना है। दोनों महाकाव्यों की महानायिकायें क्रमशः जनकनंदिनी सीता तथा याज्ञसेवी द्रौपदी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि दोनों महानायिकायें अयोनिजा हैं याने मैथुन सृष्टि की देन नहीं हैं। सीतामढ़ी नाम का बिहार का जनपद मूलतः सीतामही है। यहीं राजा सीरध्वज जनक ने बारह वर्ष अवर्षण के कारण स्वयं हल जोता। हल के सीये से वह घट निकला जिसमें सीता निकलीं। राजा जनक ने सीता का पालन पोषण किया, स्वयंवर रचाया। पांचाल नरेश द्रुपद कन्या भी अयोनिजा थी। उसके विवाहार्थ राजा द्रुपद ने स्वयंवर आयोजित किया। सीता और द्रौपदी दोनों स्त्रीत्व की गरिमा के समानांतर नारी जीवन में जो भीषणतम कष्ट कर स्थितियां होती हैं उन्हें इन दोनों स्त्री शक्ति ने सामना किया। सीता का अपहरण कर लंकेश रावण ने दारचौर्य कर सीता को अपने नंदनवन सरीखे अशोक वाटिका उपवन में विश्वस्त राक्षसी वीरांगनाओं के निरीक्षण में रख कर सीता को अपनी राजमहिषी बनाने का असफज प्रयास किया। दूसरी ओर कुरूवंश की भरी राजसभा में धृतराष्ट्रनंदन दुशासन ने द्रुपदनंदिनी द्रौपदी को चीरहरण से निर्वस्त्र करने का असफल प्रयास किया। दोनों स्त्री शक्ति के कारण राम रावण युद्ध तथा महाभारत का अठारह दिवसीय महासंग्राम हुआ। रामानंद सागर के रामायण सीरियल और बी.आर. चोपड़ा के महाभारत सीरियल की महानायिकायें सीता और द्रौपदी हैं। दोनों अयोनिजा होने के साथ अपने जीवन में भीषण परिस्थितियों उपस्थित हुईं पर दोनों का साहस तथा स्व व्रतचर्या यथापूर्व बनी रही। 
यावत् गंगा कुरूक्षेत्रे यावत् चंद्र दिवाकरौ यावत् रामकथा लोके यावत् तिष्ठति मेदिनी। 
          रामकथा का सातत्य धरती के बने रहने, अंतरिक्ष में सूर्य-चंद्रमा के प्रकाश मान रहने तक रामकथा - रामायण की कीर्ति बनी रहने वाली है। अनुराधा रमण कहती हैं विश्व में तीन सौ रामायण हैं। ए.के. रामानुजन ने शोधकार्य से दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में रामकथा को स्थान दिलाया। बर्तानी राज तथा बर्तानी राज से भारत के स्वतंत्र राष्ट्र होने की प्रक्रिया में भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी व बर्तानी राज व्यवस्था का भरपूर प्रभाव लार्ड मैकाले द्वारा भारतीय वाणियों को शिक्षा का माध्यम न बना कर बर्तानी राज व्यवस्था की सहायक शिक्षा शैली अंग्रेजी भाषा के माध्यम से शुरू की गयी। आज भारत पर मैकोलाइट अंग्रेजी ज्ञाता भारतीय मानवीय भाव प्रबलता लिये हुए है। संयोग यह है कि मैकोलाइट शिक्षा पद्धति ने भारतीय विचार श्रंखला को बर्तानी शैली पर ढाल दिया है जिससे तात्कालिक प्रभाव यह हुआ कि भारत के लोगों में हीनग्रंथि का उद्भव होगया। उन्हें भारतीय वाङमय के बजाय लैटिन जन्य यूरप की सभ्यता तथा यूरप की भाषा अंग्रेजी ने इतना गहरा प्रभाव डाला कि भारत का आधुनिक शिक्षित समाज इस देश की पुरातन श्रौत परंपरा से एकदम छिटक गया है। अनुराधा रमण का विवेकपूर्ण चिंतन भी मैकोलाइट अंग्रेजी माध्यम से भारत की संस्कृति, साहित्य तथा वाङमय को समझने का प्रयास मात्र है। वे दूरदर्शन द्वारा प्रस्तुत सीरियलों को अपने निष्कर्ष का मूलाधार मान रही हैं जब कि रामायण व महाभारत के सीरियलों में उकेरे चरित्र चित्रण से रामायण तथा महाभारत की व्यवस्था को पूरा पूरा नहीं समझा जा सकता है। कन्नड़ भाषी कवि सरस्वती द्वारा रामायण महाकाव्य का चित्रण कन्नड़ भाषा में किया गया है। राम का जन्म अयोध्या में हुआ पर रामसीता कथा पूरे भारत में फेली। अगर अनुराधा रमण ने श्रीमद्भागवत महाकाव्य का ऋषभ भरत चरित्र का उद्गान किया है। वाल्मीकि तथा वेदव्यास की रचनायें आधुनिक युग के लोगों को रहस्यवाद जिसे अंग्रेजी में Mythology  कहते हैं। श्रौत परंपरा लगभग शून्य के निकट पहुंच गयी है। ऐसा प्रतीत होता है कि परिवर्तनशील संसार में नये नये परिवर्तन होते रहेंगे। जिस तरह जन्म मृत्यु का चक्र चलता रहता है परिवर्तन उसी की प्रक्रिया है। लोग इतिहास की बात करते हैं आधुनिक मानव समाज आधुनिक इतिहास को ईसामसीह से ही उद्भूत मानता है क्योंकि यूरप की जो वर्तमान सभ्यता है उसका मूल जेसस क्राइस्ट अथवा  ईसामसीह के धरती में उद्भव उपरांत का है। ईसा के अनुयायी ऐतिहासिकता को भी केवल दो हजार वर्ष पुराना ही मान कर चलते हैं। ईसा से पहले का युग अथवा कल्प उन्हें ऐतिहासिकता का बोध नहीं करा पाता उसे वे प्रागैतिहासिक संबोधित करते हैं। पांच हजार वर्ष पूर्व कुरूक्षेत्र के रणांगण में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था - अर्जुन मेरे व तुम्हारे अनेेक बार जन्म हुए मुझे अपने व तुम्हारे सभी जन्मों की बातें याद हैं। तुम्हें विस्मृति है तुम्हें याद नहीं है। इस सृष्टि में उद्भव पराभव उत्थान पतन होता रहता है। उसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं। अर्जुन व कृष्ण सखा व सुहृद थे नर नारायण भी थे। नर को विस्मृति है पर नारायण को सदा स्मृति रहती हैैैै यही अंतर है जीवात्मा व परमात्मा में। सरस्वती ने रामकथा स्वभाषा में गाई अन्य भाषाओं में भी रामकथा का गान होता रहता है। रामकथा श्रौताधारित होने के कारण उसमें देश काल के अनुसार लोकाचार के अनुकूल बदलाव भी आते रहते हैं इसलिये यदि कोई विचारक चिंतक रामकथा सहित किसी विचार श्रंखला को एक ही धारा में प्रवाहित नहीं किया जा सकता उसमें अनेक श्रंखलापूर्ण धाराऐं होना प्राकृतिक तथ्य है। भरत मुनि का नाट्यक्रम कहता है - भिन्न रूचिर्हि लोके। ध्वन्यालोक इसी का प्रतीक है। जब जब ज्ञानपथ को किसी खास धारा से जोड़ने के प्रयास हुए उसमें अड़चनें आना स्वाभाविक है। इसलिये यदि कोई ज्ञानी यह प्रयास करता हो कि संस्कृति का प्रवाह उसके निर्देशन से हो वह मृगमरीचिका है। रामकथा रामराज्य, कृष्णकथा कृष्ण का माधुर्य अपने अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है इसलिये रामकथा अथवा कृष्णकथा को मानवीकृत करना विचार स्वातंत्र्य की अवहेलना है। प्राचेतस वाल्मीकि ने रामकथा आदि कवि की काव्यात्मकता पूर्ण शैली रचना की। वाल्मीकि को रामकथा से स्वांतः सुखाय तुलसी दास द्वारा रचित भाषा भाणिति में अंतर है। तुलसीदास ने जो रामकथा लिखी वह सर्व सामान्य जन में राम के प्रति आस्था का उद्गम है इसलिये भारतीय संस्कृति मंत्रालय यदि यह कल्पना करता है कि वह रामकथा को मानकीकृत करेगा यह दिवास्वप्न मात्र है। रामकथा इतिहास नहीं इतिहास की जननी है। अनुराधा रमण ने अपने कथन में बेलचेरू नारायण राव को उद्धृत करते हुए कहा - रामायण भारत के लिये कोई कहानी नहीं जिसमें तरह तरह के कथ्य व उपकथ्य कहे गये हों। यह वाणी विलास है जिससे नूतन उद्गान होता रहता है। भारत में वाणियां हर बारह कोस में अपना कलेवर बदलती रहती हैं। पारंपरिक भारत में रामकथा गांव गांव तक फेली हुई है। एक नई बात जिस पर अनुराधा रमण ने अवतार प्रयोजन पर ध्यानाकर्षण किया तथा राम जिसमें योगी रमण करता है वह राम तत्व जिसका समीक्षित विवेचन तुलसी ने किया। दूसरा रामलीला आयोजन अथवा रामकथा का फिल्मीकरण वह चाहे रामानंद सागर कर रहे हों या कोई दूसरा फिल्म निर्माता या रामलीला नाटक का मंचन करने वाला व्यक्ति या समूह। रामकथा का श्रेष्ठतम आदर्श तुलसी के शब्दों में प्राण जाहि पर वचन न जाई, प्राण त्याग करने वाले राजा दशरथ ने अपनी रानी कैकेयी को जो वचन दिया था उसे उन्होंने पूर्ण किया। राम ने मर्यादाओं का निर्धारण किया, वनवास के लिये प्रयाण अथवा राजसिंहासनारूढ़ होना दोनों ही स्थितियां उनके लिये एक सी थीं। भार्या सीता व अनुज वैमातज लक्ष्मण ने राम को अपनी मर्यादा कायम रखने में अद्वितीय सहयोग दिया। रामकथा का एक पक्ष मानव व वानर जातियों में सहभागिता है। सुग्रीव हनुमान व अंगद ने राम को सहायता दी। उन्हें लंका विजय में अभूतपूर्व सहयोग दिया। राम लंका विजय तथा रावण वध के पश्चात जब साकेत पधारे गंगा सरयू घाटियों के कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज ने राम का अभिनंदन करने के बजाय उन्हें ब्रह्महत्या का कारक बताया। राम ने सरयूपारी वशिष्ठ से पूछा। वशिष्ठ ने राम को राय दी कि कान्यकुब्ज समाज को देश निकाला न दें। राम के द्वारा कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को निरादृत न करने का निर्णय कान्यकुब्जों को भा गया। वे राम के पास पहुंचे राम ने उनका स्वागत किया। योग्य ब्राह्मणों को अपने राज्य में प्रतिष्ठा दी। उन्हें देश निकाला नहीं दिया यह राम की मर्यादा पुरूषोत्तम स्थिति का प्रतीक था। राम ने अपने अनुजों को लोकाकांक्षा जानने गुप्त रूप से ज्ञात करने के लिये भेजा। साकेत के लोगों में एक अफवाह थी कि राजा रामचन्द्र ने पराई घर रही सीता को अपनी महारानी के पद पर प्रतिष्ठित किया। राम तथा वशिष्ठ के बीच जो संवाद हुआ उसे लोग योगवाशिष्ठ के नाम से जानते हैं। राम ने चाहा कि वे अपनी पत्नी सीता के साथ राज्य रहित होकर रहें राज्याभिषेक उनके अनुज वैमात्र भरत का हो जाये पर वशिष्ठ ने राम की इच्छा का आदर नहीं किया। राम ने वशिष्ठ से कहा कि यदि मुझे राजा ही रहना है तो मुझे सीता का त्याग करना होगा। उन्होंने लोकहित में स्वहित को त्याग दिया। एकल तथा पीड़ित जिन्दगी जी कर रामराज्य स्थापित किया। यहां पर कुछ स्त्रीवादी समाज के लोगों का मानना है कि राम ने सीता के साथ अत्याचार किया उन्हें त्याग दिया। सीता ने वाल्मीकि आश्रम ब्रह्मावर्त में युगल पुत्रों को जन्म दिया। बालकों का पालन पोषण तथा दीक्षा वाल्मीकि के आश्रम में ही हुई। राजा रामचन्द्र के दोनों पुत्रों लव कुश ने युद्ध में राम का सामना किया। जब राम को पता चला कि लव कुश सीता के पुत्र हैं तो उन्होंने सीता से पुनर्मिलन चाहा। राम ने यज्ञ के लिये पुनर्विवाह करने से इन्कार कर दिया। वशिष्ठ ने मध्यम मार्ग सीता की स्वर्ण प्रतिमा बना कर यज्ञ संपन्न किया। सीता ने राम से मिलने के बजाय धरती में समा जाना ज्यादा महत्वपूर्ण माना। उन्हें राम की निठुरता का क्षोभ था। अनुराधा रमण कहती हैं सिया के राम का विश्व बाजारीकरण होगया है। राम की मर्यादायें राजपुरूष की मर्यादायें हैं। राम कर्तव्यपरायण पुरूष थे। विपत्तियों व विरोधाभासों के बीच सीता और द्रौपदी ने अपनी कर्तव्यपरायणता का उद्घोष किया। इसलिये आज जो स्त्री पुरूष विभेद समाज में तीव्रता से व्याप्त है उसे सही दिशा में ले जाने का कार्य भारत की वह नारी शक्ति संपन्न कर सकती है। भारत के अंग्रेजीदां पुरूष व स्त्री जो मैकोलाइट अंग्रेजी ज्ञान से स्वयं को सर्वज्ञ व विवेकशील मानने का भ्रम पाले हुए हैं जिनकी सांस्कृतिक जड़ें भारत से कट चुकी हैं उन्हें भारतीय ज्ञान पिपासा की संपूर्ति अंग्रेजी माध्यम से करने की आदत पड़ गयी है पर वे पूर्णतः ऐंग्लीवाइज नहीं हो पाये हैं। सोच अधूरी भारतीय वाणी से शुरू होती है निष्कर्ष पर पहुंचने के लिये उन्हें मानक विलायती - किंग्स इंग्लिश अथवा क्वींस इंग्लिश तथा संयुक्त राज्य अमरीका की संकर अंग्रेजी के बजाय हिन्द की संकर अंग्रेजी के भारतीय संस्करण यथा हिंग्लिश बंग्लिश मराठीलिश तमिलिश आदि भारत भूमि की वाणियों में अंग्रेजी का मुलम्मा चढ़ा कर अभिव्यक्ति आज भारतवासी अंग्रेजी की रोमन लिपि द्वारा कर रहे हैं। रोहनमूर्ति तथा चेतन भगत सरीखे हिन्दुस्तानी अंग्रेजीदां भारतवासियों को हिन्दी संस्कृत सहित सभी भारतीय भाषाओं के लिये रोमन लिपि का सहारा लेना चाहते हैं जब कि लैटिन भाषा में 24 अक्षर, रोमन में 26 तथा भारतीय लिपियों में - नृत्यावसाने नटराज राजो ननाद ढक्का नवपंच वारम् के जरिये 51 अक्षर हैं जो सभी जैसे उच्चारित होते हैं वैसे ही लिखे भी जाते हैं। वाणी या सरस्वती स्वयं स्त्री शक्ति है। जरूरत इस बात की है कि भारत की नारी शक्ति अयोनिजा सीता व याज्ञसेवी से तादाम्य बैठायें। रावण और दुर्योधन सरीखे सत्तावंत व्यक्ति भी सीता और द्रौपदी को उन महानायिकाओं को अपने आदर्श से भटकाने में समर्थ नहीं हो सके इसलिये आज की भारतीय नारी शक्तिका शक्ति स्त्रोत सीता व द्रौपदी के निष्कलंक चरित्र से ही संवर्धित किया जा सकता है। 
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