Saturday, 26 December 2015

वैश्विक नारी जागरण में भारतीय नारी शक्ति की प्रतिभागिता
यो माम् जयति संग्रामे] यो मे दर्पम् व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके] स मे भर्ता भविष्यति।।

तारा बाई शिन्दे और कमला देवी चट्टोपाध्याय उन्नीस आधुनिक भारत निर्माताओं में। 
इतिहासज्ञ रामचंद्र गुह की पुस्तक ‘मेकर्स आफ इंडिया’ के एकोन विंशति निर्माताओं में दो स्त्री शक्ति स्त्रोत तारा बाई शिन्दे और कमला देवी चट्टोपाध्याय को संयोजित किया गया है। तारा बाई शिन्दे उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे दशक के शुरूआती वर्षों में जन्मी, बीसवीं शती के शुरू के दशक तक भारत भूमि के वर्तमान में महाराष्ट्र नाम से ज्ञात पौराणिक भारत के दण्डकारण्य नाग विदर्भ के बुलढाना कस्बे के एक मराठा कुटुंब में पैदा हुईं। विदर्भ का वर्णन पौराणिक कथ्यों में उत्तरापथ व दक्षिणापथ के संगम के रूप में हुआ है। यहीं विदर्भ नरेश भीष्मक कन्या दमयंती का पितृगेह था। नल दमयंती कथानक भारतीय दाम्पत्य जीवन का अनूठा उदाहरण है। नल हिमालय मानसखंड के निषध देश का राजा था। यहां छखाता नामक एक परगना है जिसमें साठ झील, तालाब अथवा सरोवर थे जिनमें से एक नल-दमयंती ताल भी कहलाता है। यहीं प्रसिद्ध नैना हृद भी है। पर्यटक लोग नैना झील को नैनीताल के नाम से भी जानते हैं। इतिहासज्ञ गुह की मान्यता है कि जब कोई हिन्दुस्तानी दम्पत्ति यदि सनातन धर्मावलंबी हो अपनी विवाह योग्य कन्या दान संपन्न करता है कन्यार्थी वर का हस्ताभिषेक कर वरार्थिनी अपनी कन्या को वर को सौंपता है कन्यादान प्रक्रिया संपन्न होते ही जब कन्या वर के साथ सात फेरे लगा कर यज्ञ अग्नि को साक्षी बनाते हुए वर कन्या एक दूसरे के साहचर्य निर्वाह का व्रत लेते हैं बिटिया पितृगेह से ससुरगेह अथवा पतिगेह यात्री बन जाती है। भारतीय वाङमय में पितुः शतगुणम् मातुः भगिनी सहस्त्र उच्यते कहा जाता रहा है। दक्ष प्रजापति ने कलखल हरिद्वार में विशाल यज्ञ का आयोजन किया। अपने सभी साढुओं, पत्नी भगिनियों, पुत्रियों दामादों को न्यौता पर अपनी एक कन्या सती और दामाद सती पति शंकर को निमंत्रित न कर पंक्तिभेद कर डाला। सती-शंकर को न्यौता न भेजने के दक्ष प्रजापति के अपने विशेष तर्क थे। हर लड़की को पितृगेह कौतुक हुआ ही करता है। सती को जब पता चला उसके पिता दक्ष प्रजापति यज्ञ कर रहे हैं उसने शंकर से इच्छा जताई कि वह अपनी मौसियों भगिनियों से मिलना चाहती है। शंकर ने सती को कहा कि बिना बुलाये जाना मृत्युतुल्य कष्टकारी होता है। शंकर की राय में कनखल में होरहे यज्ञ में सम्मिलित होना विवेक संगत नहीं था पर सती के आग्रह को देख शंकर ने अपने प्रिय गण नंदी को कहा - नंदी सती को कनखल पहुंचा आओ। सती कनखल यज्ञशाला में पहुंची ही थी कि मौसियों व मां सहित सहोदरा भगिनियों में  से किसी ने भी सती का कुशल क्षेम नहीं लिया। दुहित्र वत्सल पिता दक्ष ने भी सती की अनदेखी की। हवन कुंड में आहुतियां दी जारही थीं, मुख्य होता सती के बहनोई भृगु ऋषि थे। यज्ञ के पुरोहित देवगुरू बृहस्पति के नेतृत्व में यज्ञ संपन्न होरहा था। जब सती ने देखा कि यज्ञ में शंकर सती की पूरी अवमानना होरही है। सती पति शंकर के यज्ञ में सम्मिलित होने के बारे में कोई चर्चा नहीं होरही है और न कोई उससे बात ही कर रहा है। सती सोच रही थी कि उसका शरीर दक्ष की धरोहर है। वह पद्मासन में हवन कुंड के पास बैठी। सती साध्वी योगी भी थी। उसने अपने शरीर में देहज अग्नि का प्रज्वलन कर यज्ञ कुंड में ऋत्विजों की आहुतियों के साथ अपनी देह आहुुति हवन कुंड में इतनी जल्दी अर्पित कर डाली कि ऋत्विज चकाचौंध होगये। अग्नि ज्वााला से सती निष्प्राण होगयी। खबरची नारद ऋषि ने सती के देहोत्सर्ग की खबर कैलास पहुंच कर भगवान शंकर को दी। शंकर योग मार्ग से गणों सहित कनखल पहुंचे। गणों ने यज्ञ विध्वंस कर डाला। शंकर ने सती के अधजले शरीर को कंधे पर लटकाया और प्रिया वियोग में भारत भूमि पर यत्र तत्र भटकते रहे। जहां जहां सती के अधजले शरीर के हिस्से धरती में गिरे उन स्थानों को भारत के लोग शक्तिपीठ के रूप में आराधना स्थल मानते हैं। प्रत्येक शक्तिपीठ में सती की दैवी संपत् का शक्ति संपात् होता रहता है। ताराबाई शिन्दे की आत्मगाथा विवरण प्रस्तुत करते हुए इतिहासज्ञ पुत्री को ‘पराया धन’ मानने की भारतीय मान्यताओं का जिक्र कर रहे हैं। आज के वैज्ञानिक चिंतन युग में डी.एन.ए. की चर्चा यत्र तत्र सर्वत्र हुआ ही करती है। कन्या जब पितृगेह से पतिगेह जाती है उसकी संतति के लिये पिता, दादा, परदादा, मां, दादी, परदादी, नाना, परनाना, बूढे़ परनाना, नानी, परनानी, बूढ़ी परनानी ये बारह व्यक्ति छः पुरूष छः स्त्रियां दौहित्र या पौत्र सहित पुत्र के लिये नान्दीमुख कहलाते हैं। जब जब जीवात्मा (पुरूष या स्त्री) मानव शरीर प्राप्त करता है उसके लिये अपने नान्दीमुखों का महत्व होता है। संस्कृत कोशकार अमर सिंह के अनुसार विवाहो-उत्वहश्च पुरूष-स्त्री संगम ही विवाह है। मानव मनोविज्ञान की एक शाखा स्त्री मनोज्ञता भी है। ताराबाई शिन्दे जिस काल खंड में धरती पुत्री हुई वह जमाना ईस्ट इंडिया कंपनी बहादुर का राजकाज युग था। मुगल सल्तनत अस्ताचल गामी था। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर जीवन की आखिरी घड़ियां म्यांमार तत्कालीन बर्मा की जेल में बंद बिता रहे थे। महाराष्ट्र सहित समूचे भारत में ठग और पिंडारियों का बोलबाला था। कंपनी बहादुर का राजकौशल जिला मुख्यालय तक ही सीमित था। युग परिवर्तन होरहा था जब ताराबाई शिन्दे बुलढाना विदर्भ में 1830 के दशक में जन्मी थीं। रामचंद्र गुहा का निष्कर्ष हो अथवा ताराबाई शिन्दे के स्वभाषा लेखन से उन्होंने निष्कर्ष निकाला हो वासुदेव देवकीनंदन श्रीकृष्ण ने अपनी सहोदर भगिनी सुभद्रा का अपहरण अपने पैतृस्वसेय अर्जुन द्वारा कराया। कथ्य को श्रीमद्भागवत महापुराण एवं महाभारत कथ्य को पूरे तौर पर प्रस्तुत किया जाता तो बात साफ होती। हर मां बाप चाहते हैं उनकी कन्या राजरानी बने। कृष्ण के अग्रज बलराम ने अपने पिता वसुदेव तथा माता रोहिणी की भगिनी देवकी को परामर्श दिया कि सुभद्रा को कुरूराज धृतराष्ट्र नंदन महाराज कुमार सुयोधन को ब्याह दें। देवकी-वसुदेव के छः बेटे देवकी के चचेरे भाई राष्ट्रपाल कंस ने पटक कर मार डाले थे। वसुदेव दंपत्ति के दो बेटे बलराम व कृष्ण तथा कन्या सुभद्रा ही उनके लाड़ले थे। वसुदेव दंपत्ति को बलराम का प्रस्ताव रूचिकर लगा उन्होंने तय कर लिया कि सुभद्रा का विवाह राजकुमार सुयोधन से ही करेंगे। बलराम और सुयोधन दोनों मद्सेवी भी थे। बलराम ने सुयोधन को गदायुद्ध में पारंगत किया था। योगेश्वर वासुदेव को जब माता पिता के निर्णय का पता चला, उन्होंने दुर्योधन के व्यभिचार का जिक्र करते हुए माता पिता को निर्णय बदलने के लिये प्रेरित करना चाहा पर माता पिता ने कृष्ण की राय मानने से इन्कार कर दिया और कहा - हमारी इकलौती बिटिया राजरानी होगी बीच में अड़ंगा मत लगाओ। कृष्ण अपने अग्रज का खुल कर विरोध भी नहीं करना चाहते थे। कृष्ण की मान्यता थी कि भगिनी सुभद्रा दुर्योधन के साथ सुखी नहीं रह पायेगी। कौंतेय अर्जुन अढ़ाई साल के देश निकाले में गिरनार के रैवतक जंगलों में घूम रहे थे। श्रीकृष्ण द्वारका से गिरनार रैवतक तक गये और अपने साथ अर्जुन को बुला लाये। वसुदेव-देवकी के महल में अर्जुन ने सुभद्रा को देखा, सुभद्रा अर्जुन पर मोेहित हो गयी अर्जुन भी सुभद्रा से आकर्षित हुआ। श्रीकृष्ण रति विशेषज्ञ माने जाते थे और स्त्रियों के मन की बात के अद्वितीय ज्ञाता थे। श्रीकृष्ण ने सुभद्रा से पूछा - बहन तुम्हें दुर्योधन पसंद है या अर्जुन। सुभद्रा ने अग्रज कृष्ण को कहा कि वह अर्जुन पर मोहित हो गयी है। कृष्ण ने अर्जुन से कहा - देखते क्या हो शीघ्र सुभद्रा को भगा ले जाओ। बाकी मैं संभाल लूँगा। यादव सेना तुम पर आक्रमण नहीं करेगी। इसलिये ताराबाई शिन्दे अथवा इतिहासकार रामचंद्र गुहा का अर्जुन पर अपहरण का आरोप अतार्किक है। स्त्री-पुङ प्रसंग विस्मयकारी स्थिति उत्पन्न करता है। पहली बार एक दूसरे को देखते ही जो मनःस्थिति युवा नारी अथवा युवा पुरूष के हृदय में पैठ करती है उसे सटीक परिप्रेक्ष्य में परखने की जरूरत है। 
          अब दशग्रीव रावण के प्रसंग पर आइये। रावण ब्रह्मा के मानस पुत्र पुलत्स्य के पौत्र, विश्रवा पुत्र, कुबेर का अनुज तथा विभीषण का वैमात्र और कुंभकर्ण का सहोदर अग्रज था। लंका कुबेर की स्वर्ण नगरी थी रावण ने अपने अग्रज को लंकेश के पद से पदच्युत कर वह स्वयं लंकेश बन गया। महाविष्णु ने कुबेर को पुष्पक विमान दिया था वह भी रावण ने छीन लिया। रामचंद्र गुह ने रावण के दोष दर्शन पक्ष को उजागर किया। व्यक्ति में दोषों के समानांतर गुण भी हुआ करते हैं। रावण विद्यावारिधि था एवं वेदों का पहला भाष्यकार विश्रवा नंदन रावण ही था। रावण संहिता नामक ज्योतिष ग्रंथ रचयिता रावण ही था। रावण संहिता का ज्योतिष शास्त्र में उतना ही महत्व है जितना भृगु संहिता का। शिवमहिम्न स्तोत्र का उद्गाता रावण देवाधिदेव महादेव का परम भक्त भी था। नियमित रूप से योग पथ से श्रीलंका से कैलास पहुंचा करता था। मानसरोवर के राजहंस के नीर क्षीर विवेक पर रावण यकीन नहीं करता था इसलिये उसने अपने स्नान के लिये मानसरोवर झील के समानांतर राक्षस ताल जिसे आजकल राकस ताल भी कहते हैं उसे अपने नहाने के लिये सृजित किया। रावण आत्मनिर्मित राकस ताल में स्नान कर कैलास में महादेव आराधना संपन्न करता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार मंदोदरी अद्वितीय सुंदरी होने के साथ साथ प्रतिभा संपन्न पुङ-स्त्री विशेषज्ञ सरोकार विज्ञ स्त्री थी। रावण के रनिवास को प्राचेतस वाल्मीकि ने स्त्री वन कहा। ऐसा प्रतीत होता है कि वाल्मीकि रामायण सहित तुलसी रामचरित मानस में भी प्रक्षिप्त अंश जुड़े होने के कारण जनसामान्य में जन भावनाओं को उद्वेलित करने वाले प्रसंग  वास्तविकी व व्यावहारिकी स्थितियों में संतुलन न होने के कारण संशयग्रस्तता उपजती है। क्षीरसागर प्रसंग, क्षीरसागर से चौदह रत्न निकलना, क्षीरसागर मंथन का महाविष्णु द्वारा दिया गया परामर्श अमृत उत्पादन हेतु था। क्षीरसागर मंथन में अमृत से पहले विष व वारूणी उपलब्ध हुए। देव दैत्य दानव जिनके संयुक्त संविद श्रम के लिये महाविष्णु ने आह्वान किया कि अमृतोत्पादन के लिये देव दैत्य दानव संविद करें। घृणा और वैमनस्य छोड़ कर क्षीरसागर मंथन के लिये तैयार हों। महाविष्णु ने आदित्य प्रमुख शक्र को समझाया कि यदि अमरत्व की चाह हो तो संविद करना ही होगा। त्रिदशों के प्रमुख देवराज इंद्र ने विरोचन नंदन बलि से संपर्क साधा। वैरोचन बलि को इंद्र को प्रस्ताव जंच गया। दैत्यराज बलि ने प्रमुख दानवों से भी चर्चा की। शुंभ निशुंभ सहित दानव वास्तु विशेषज्ञ मय के द्वारा वार्ता की। समुद्र मंथन में स्वयं महाविष्णु ने कूर्मावतार द्वारा मंथन का श्रीगणेश किया। समुद्र मंथन से चौदह रत्न उपलब्ध हुए वे हैं - श्री, रंभा, विष, वारूणी, अमिय, शंख, गजराज, धनु, धन्वंतरि, धेनु, तरू, चंद्रमणि अरू वाजि। लक्ष्य सिद्धि से पहले तीसरा उत्पाद हलाहल महाविष था जिसने दशों दिशाओं में प्रलयंकारी हाहाकार मचा दिया। आधुनिक युग के वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन सहित विज्ञानविद मानव जिन उपलब्धियों से अभिभूत हैं प्रकृति से मानव की छेड़छाड़ के अलावा प्राकृतिक उपलब्ध साधनों का मनमाना दुरूपयोग जन्य प्रतिकूल विषैले हालात से कैसे निबटें ? सृष्टि के प्रारंभ से कश्यप दायादों हरिद्रोही राज्याधीश हिरण्यकश्यप, उसके नवधा भक्ति के रसज्ञ पुत्र प्रह्लाद का राज्यारोहण, प्रह्लाद द्वारा अपने पुत्र विरोचन को दैत्यराज नियुक्त करने के बजाये अपने चचेरे भाई अंधक को दैत्यराज घोषित करना, अतुल सुंदरी केशिनी ने दैत्यराज प्रह्लाद से प्रार्थना की कि वह विरोचन एवं सुधन्वा जो दोनों उससे प्रेम करते हैं उनमें कौन श्रेष्ठ है केशिनी उसी के गले में वरमाला डालना चाहती थी। उसे दैत्यराज प्रह्लाद को न्यायपूर्ण निर्णय की प्रार्थना की। प्रह्लाद ने राजसिंहासन से महत्वपूर्ण निर्णय दिया। सुधन्वा तपस्वी पिता साध्वी माता का सुयोग्य पुत्र है। सुधन्वा के माता पिता दैत्यराज प्रह्लाद व विरोचन जननी से श्रेष्ठ हैं इसलिये सुधन्वा विरोचन से ज्यादा प्रतिभाशाली श्रेष्ठ युवा है। हरिद्रोही वर्तमान हरदोई दैत्यराज हिरण्यकश्यप दैत्यधानी थी। प्रह्लाद ने अपने पिता के निर्णय को बदला नहीं स्वयं राज्यारोहण करने के पश्चात हिरण्याक्ष नंदन अंधक को दैत्यराज बनाया। दैत्यराज अंधक अपने ज्येष्ठ पिता राजा हिरण्यकश्यप सरीखा दस्युधर्मी राजा था उसका शासन ज्यादा नहीं चला। वैरोचन बलि दैत्यराज होगये। जब समुद्र मंथन हुआ आदित्य अग्रेचर इंद्र तथा दैत्य दानव राज राजा बलि थे। हलाहल महाविष देवाधिदेव महादेव ने अंजलि भर कर पी डाला। उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। त्रासद महाविष से देव दानव गंधर्व यक्ष राक्षस व किन्नर संत्रस्त थे। देवाधिदेव महादेव ने विषपान किया उनका कंठ नीला पड़ा। देव दानव आदि आश्वस्त हुए। देवाधिदेव महादेव ने महाविष पान के पश्चात तांडव नृत्य किया। नृत्यावसान में नटराज शंकर ने अपना डमरू (हुड़का) बजाया। उससे नौ और पांच ध्वनियां हुईं ये चौदह ध्वनियां ही ध्वन्यालोक की मानव वाणी सरस्वती हैं। आज विश्व के सम्मुख मुखर यक्ष प्रश्न है। क्षीरसागर मंथन से जो हलाहल महाविष निकला उसे देवाधिदेव महादेव ने पी कर लोकहित संपन्न किया। आज जो महाविषैली गैसों व रासायनिक द्रवों के अंधाधुंध अविवेकशील उपयोग से जो विषैला वातावरण मनुष्य के चारों ओर मंडरा रहा है उससे कैसे छुटकारा मिले। सृष्टि के शुरूआती काल खंड में महादेव लोकहितार्थ आगे बढ़़े। उन्होंने लोक संग्रह संपन्न किया। आज विश्व मानव को नये महादेव की आकांक्षा है जो प्रदूषण जन्य विषवायु को पीकर लोकहित को निर्विष करने के लिये कटिबद्ध हो। प्रियव्रत का विवाह प्रजापति विश्वकर्मा नंदिनी बर्हिष्मती से संपन्न हुआ जिससे दस पुत्र व एकल कन्या ऊर्जस्व का विवाह भृगुवंशी उशना शुक्राचार्य से संपन्न हुआ। ओर्जस्वती पुत्री काव्य सुता देवयानी थी। नर नारी एक दूसरे के पूरक हैं। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने बृहस्पति पुत्र कच का देवयानी संबंधी प्रसंग, देवयानी के इकतरफा प्रेम कच को लक्ष्यच्युत नहीं कर सका। देवयानी प्रस्थिर होगयी फिर भी राजकुमारी शर्मिष्ठा और राज पुरोहित पुत्री देवयानी का पारस्परिक व्यवहार नारी जीवन में - दो नारियों में स्पर्धा के नजरिये से देखा जाना ज्यादा प्रासंगिक है। देवयानी दैत्यगुरू शुक्राचार्य की इकलौती कन्या थी। दुहितृ वत्सल पिता, पुत्री की उचित अनुचित मांग स्वीकार करते रहते थे। कच के साथ देवयानी का इकतरफा आकर्षण उसकी जिन्दगी को आवेशपूर्ण बनाने में मददगार हुआ। राजकुमारी शर्मिष्ठा का बिना किसी महत्वपूर्ण दुर्व्यवहार के सूखे कुऐं में निर्वस्त्र कर ढकेल डाला तो भाग्यवश राजकुमार ययाति ने निर्वस्त्र देवयानी को कुऐं से बाहर निकाला। देवयानी ने ययाति से कहा - कूपलग्न होगया मैं आपकी प्रणयिनी होगयी। यहां देवयानी गार्हस्थ का पूरा प्रकरण प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं इतना ही पर्याप्त है कि देवयानी गार्हस्थ अपने आप में स्त्री पुरूष प्रसंग का व्यतिरेक है। दक्ष प्रजापति की प्रथम तीन कन्यायें अदिति, दिति, दनु मरीचि नंदन कश्यप की पत्नियां थीं। अदिति, दिति तथा दनु तीनों के प्रजाध्यक्ष कश्यप थे। ये तीनों बहनें मातृ  प्रधान परिवार की प्रतीक हैं। आदित्य अदिति के पुत्र थे, दैत्य दिति पुत्र तथा दानव दनु पुत्र थे। मातृ प्रधान कुटुंब आज भी भारत के केरल राज्य में हैं। अदिति, दिति तथा दनु के लिये कश्यप केवल प्रजाध्यक्ष थे। जब उन मातृ प्रधान परिवारों की प्रमुखा स्त्रियों को पति की आवश्यकता महसूस होती वे कश्यप का आह्वान करतीं थीं। कश्यप परंपरा के समानांतर भारत में निमि जनक परंपरा भी पौराणिक भारत की देन है। भारतीय संघ के घटक बिहार राज्य का पूर्वात्तर भाग मिथिलांचल कहा जाता है जिसके दक्षिण में अंग, पूर्व में बंग तथा उत्तर में नैपाल राज्य का मधेस इलाका है। सीता के पिता सीरध्वज जनक की जनकधानी जनकपुर है जो नैपाल के मधेस का हिस्सा है। सीतामढ़ी जहां सीता जी भूमि से मिलीं उसे रामायण सीतामही के नाम से पुकारती है। भारत की सीता शक्ति को जागरूक करने वाली ताराबाई शिन्दे विदर्भ में उत्पन्न हुईं तथा स्त्री शक्ति को अपनी मातृभाषा मराठी के जरिये जागरूक करती रहीं। दूसरी नारी शक्ति संपात करने वाली कमला देवी पश्चिमी घाट के बंदरगाह नगर मंगलुरू के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मीं। इतिहासविद रामचंद्र गुहा ने कमला देवी के बारे में केवल इतना ही संकेत दिया कि वे चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण संप्रदाय में जन्मी थीं। उनके पिता श्री उपनिवेशाई सिविल सर्विस में थे। इतिहासज्ञ लिखते हैं कि कमला देवी अपनी माता श्री से अत्यंत प्रभावित थीं। उनकी मां तमिल, अंग्रेजी, हिन्दी तथा मराठी भाषायें जानती थीं। मंगलुरू शहरनुमा बंदरगाह दक्षिण कन्नड़ जिले का महत्वपूर्ण कस्बा है। यहां के लोग कन्नड़भाषी हैं। इतिहासकार लिखते हैं कि कमला देवी विवाह छोटी उम्र में ही होगया था। उन्होंने कमला देवी के पहले पति का नाम तो नहीं लिखा पर बताया कि विवाह के समय उनके पति की उम्र मात्र सोलह वर्ष थी। षोडषी होने से पूर्व ही कमला देवी के प्रथम पति, जिनका नाम इस ब्लागर ने पता किया कृष्णराव था। कृष्णराव अठारह वर्ष की उम्र में ही दिवंगत होगये और कमला देवी बाल विधवा होगयीं। कन्नड़भाषी दक्षिण कन्नड़ के ज्यादातर ब्राह्मण मध्वाचार्य के अनुयायी विशिष्टाद्वैत संप्रदाय से संबद्ध हैं। सारस्वत ब्राह्मण भारत के कश्मीर, पंचनद (हरयाणा सहित पंजाब) उत्तरी राजस्थान जिसे मारवाड़ भी कहा जाता है वहां बसते हैं। सरस्वती नदी के जल प्रवाह क्षेत्र में निवास करने वाले ब्राह्मण ही अपने आप को सारस्वत कहते हैं। यदि कमला देवी के माता पिता कन्नड़ भाषी माध्व संप्रदाय से संबंधित नहीं रहे उत्तर पश्चिम भारत से मंगलुरू आकर बस गये फिर भी दक्षिण कन्नड़ के वैष्णव व शैव ब्राह्मणों की अपनी परंपरायें हैं। नैपाल के काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर के रावल कन्नड़ शैव ब्राह्मण ही हुआ करते हैं। अंग्रेजी भाषा में छपने वाली मासिक पत्रिका ऐस्ट्रालाजिकल के संस्थापक संपादक ने तमिल तथा कन्नड़ भाषी वैष्णव, शैव, शाक्त तथा कर्णाटक के माध्व संप्रदाय वाले विशिष्टाद्वैत वादी ब्राह्मणों की गाथा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ तथा मलयालम भाषाओं उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार अंग्रेजी भाषा में भी लिपिबद्ध किया है। कमला देवी के माता पिता सहित उनके प्रथम पति कृष्णराव तथा उनके माता पिता के नांदीमुखों के बारे में सटीक जानकारी एकत्र करने का प्रयास ब्लागर हिमकर अपनी कन्या वीणा तथा जामाता ईश्वर केडिला जो स्वयं मंगलुरू दक्षिण कन्नड़ के वशिष्ठ गोत्रीय ऋग्वेदीय हव्यवाह ब्राह्मण परंपरा के मानने वाले हैं उनके जरिये कमला देवी के माता पिता सहित नांदीमुख याने कमला देवी के पिता, दादा, परदादा, मां, दादी, परदादी, नाना, परनाना, बूढ़े परनाना, नानी, परनानी, बूढ़ी परनानी इन बारहों के नांदीमुख ब्यौरे एकत्र कर आधुनिक भारत निर्मात्री कमला देवी चट्टोपाध्याय जिन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय में विद्याध्ययन के दौरान सहपाठी हरीन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय से पुनर्विवाह किया। हरीन्द्र नाथ भारत कोकिला कवियित्री सरोजिनी नायडू के अग्रज थे। सरस्वती नदी आज से पांच हजार दो सौ इकतालीस वर्ष जिसे श्रीकृष्ण संवत्सर भी कहते हैं प्रभास पाटन में सरस्वती सागर संगम करती थी। पितृगेह हिमालय से पतिगेह सागर में समा जाती थी। कृष्ण ने यदुवंशियों से कहा कि सात दिन बाद द्वारका जलमय हो जायेगी अतः चलो प्रभास पाटन क्षेत्र में सरस्वती स्नान करने चलो। प्रभास पाटन में सागर तीर सरस्वती संगम में यदुवंशी समाज में महान गृह युद्ध हुआ जिसे पाश्चात्य संस्कृति सिविल वार संज्ञा देती है वहां कृष्ण ने अपने खानदानियों को आपसी गृह युद्ध में लिप्त देख कर कहा, कृष्ण के कथ्य को कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जिन्हें लोग बादरायण व्यास भी कहते हैं उन्होंने कहानी बताते हुए लिखा एवं ‘नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशवः’ कृष्ण ने अपनी आंखों से अपने कुल का कुल का नाश होते हुए देखा। सारस्वत ब्राह्मणों का रहन सहन इतर ब्राह्मणों से जरा अलग है। सारस्वत ब्राह्मण सामिष भी होते हैं। बाबा साहेब भीमराव रामराव अंबेडकर का मत है कि हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में अपेक्षित सुधारों की आकांक्षा जाति प्रथा समाप्ति से उपलब्ध की जा सकती है। डाक्टर राममनोहर लोहिया भी जातपांत तोड़क मुहिम चलाते थे पर डाक्टर लोहिया संभवतः मारवाड़ी बनिया होने के कारण द्विज कहे जाने वाले गुरूकुल शिक्षित ब्राह्मणों के उतने तीव्र विरोधी नहीं थे जितनी बाबा साहेब अंबेडकर की मान्यता थी कि उत्तर और मध्य भारत के ब्राह्मण सामाजिकता में दक्षिण सहित दण्डकारण्य (दक्खिनी) ब्राह्मणों यथा द्रविड़ ब्राह्मणों महाराष्ट्र के ब्राह्मणों से घटिया दर्जे वाले थे। दूसरी तरफ बाबा साहेब कायस्थ व दक्षिण भारत के ब्राह्मणेतर जातियों वाले लोगों को अधिक व्यावहारिकी दृष्टिकोण अपनाने वाले समूह मानते थे।  इतिहासविद गुहा मानते हैं कि ईस्वी सन 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की रचना हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वराज्य भवन इलाहाबाद से संचालित होती थी। रामचंद्र गुहा मानते हैं कि सी.एस.पी. की एक मुख्य स्तंभ कमला देवी चट्टोपाध्याय थीं। उन्होंने जिन उन्नीस भारतीयों को आधुनिक भारत निर्माताओं की श्रेणी में रखा है उनमें कमला देवी के अलावा डाक्टर राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण भी सी.एस.पी. के स्तंभ थे। गुहा ने जयप्रकाश नारायण को सी.एस.पी. से संबद्ध होना स्वीकार किया है पर लोहिया के सी.एस.पी. से संबद्ध होने के प्रसंग को नजरअंदाज कर जातपांत तोड़ो व अंग्रेजी हटाओ पर ही लोहिया जी की आधुनिक भारत निर्माता होने की व्यावहारिकी स्थिति मान लिया है जबकि डाक्टर लोहिया की चिंतन धारा अत्यंत ऊर्जावान थी। वे अपने आप को कुजात गांधीवादी कहते थे। मारवाड़ी बनिया होने के कारण उनमें रामभक्ति की आध्यात्मिकता कूट कूट कर भरी हुई थी। वे तुलसीकृत रामचरित मानस को दाशरथि राम के आध्यात्मिक प्रभाव को जन जन तक पहुंचाने वाली अद्भुत रचना मानते थे। सी.एस.पी. की संरचना में जयप्रकाश नारायण डाक्टर लोहिया कमला देवी के अलावा डाक्टर संपूर्णानंद, आचार्य नरेन्द्रदेव, अच्युत पटवर्धन, युसुफ मेहर अली, अरूणा आसफ अली के अलावा चंद्रभानु गुप्त सी.एस.पी. के महत्वपूर्ण स्तंभ थे। गुप्त जी सी.एस.पी. के सचिव भी थे। 1934 से 1947 तक सी.एस.पी. इंडियन नेशनल कांग्रेस में समाजवादी दृष्टिकोण उद्गाता थी। स्वातंत्र्योत्तर भारत में सी.एस.पी.  को इंडियन नेशनल कांग्रेस से बाहर कर समाजवादी आंदोलन जयप्रकाश नारायण, लोहिया, नरेन्द्रदेव, अच्युत पटवर्धन आदि ने सोशलिस्ट पार्टी 1948 में खड़ी कर डाली। कमला देवी ने राजनीतिक दर्शन से समाज के सामाजार्थिक आकार को मजबूत करने दस्तकारियों सहित हाथ के काम को वरीयता देकर भारतीय नारी श्रम शक्ति के संवर्धन का मार्ग अपनाया। इतिहासज्ञ रामचंद्र गुहा ने गांधी आर्थिकी का जिक्र न तो अपने ग्र्रंथ के सातवें परिच्छेद मल्टिपल एजेज आफ एम.के. गांधी में किया न ही तेरहवें परिच्छेद The renewed agenda of Mahatma Gandhi में ही गांधी आर्थिकी का उल्लेख किया। कमला देवी चट्टोपाध्याय परिच्छेद में भी इतिहासकार ने गांधी आर्थिकी का कोई उल्लेख न करना हिन्दुस्तान के बारे में गांधी विचार जो गांधी जी की छप्पनवीं चर्खा जयंती 24 सितंबर 1924 से अगले दस वर्ष गांधी जीवन यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव था कि हिन्दुस्तान के हर गांव में कम से कम एक ग्रामोद्योग चर्खा कताई के समानांतर खड़ा करना ताकि हिन्द का हर गांव आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सके। गांधी संकल्पित ग्राम स्वराज्य की यही संकल्पना थी। कमला देवी ने अपना पूरा जीवन दस्तकारियों के संवर्धन से भारत की नारी शक्ति अपने कुटुंब को हाथ की दस्तकारी से अतिरिक्त आय का स्त्रोत बने। हर परिवार आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो मितव्ययता का सहारा ले। सी.एस.पी. से जुड़े लोगों में कमला देवी के अलावा समाजवाद पर हिन्दी भाषा में प्रस्तुत डाक्टर संपूर्णानंद की अद्वितीय रचना, गांधी आर्थिकी की डाक्टर लोहिया द्वारा संपन्न व्याख्या, संत विनोबा के साहचर्य में जयप्रकाश नारायण द्वारा गांधी आर्थिकी और गांधी आध्यात्मिकी को भारत के लिये एकमात्र रामबाण औषध मानना, जयप्रकाश द्वारा राजनीतिक सत्ता सार्वभौमता विकेन्द्रीकरण एक नूतन मार्ग, गांव रिपब्लिक - गांव की राजनीतिक पंचायती सत्ता का पुनर्जागरण न तो विचार पोखर के रूप में 1959 में लोक संबल पा सका न 1977 में जयप्रकाश नेतृत्व ने जो राजनैतिक दिग्दर्शन प्रस्तुत किया उस विचार ने साकार रूप पा सका। इतिहासज्ञ गुहा कहते हैं कि बीसवीं सदी के अंतिम दशक के शुरूआती वर्षों में संविधान संशोधन द्वारा भारत संघ घटक राज्य के समानांतर जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत तथा ग्राम पंचायत व भारत ने नागर क्षेत्रों के लिये नगर पंचायत, नगर परिषद व नगर निगम के रूप में गांव, शहर, विकास खंड स्तर पर क्षेत्र पंचायत तथा जिला स्तर पर जिला पंचायत को संवैधानिक सांस्थानिकता संविधान में दर्ज होगयी परंतु गांव, नगर, क्षेत्र तथा जिला स्तर पर पंचायती व्यवस्था को कारगर तरीके से भारत संघ घटक राज्य के समानांतर चार खंभे वाला डाक्टर लोहिया संकल्पित चौखंभा व्यवस्था सहित छः खंभे वाली राज व्यवस्था को क्रियात्मक रूप देना बाकी है। घटक राज्य सरकारों को अपनी राज्य सत्ता का गांव, नगर, क्षेत्र तथा जिला इन चार को सौंपने का संकल्प लेना होगा तभी गांधी का ग्राम स्वराज तथा जयप्रकाश नारायण का संकल्प क्रियात्मक हो सकता है। अ.भा. सर्व सेवा संघ ने भारतीय लोकसत्ता पुनर्निमाण संबंधी जयप्रकाश संकल्पिल संपूर्ण क्रांति साकार हो सकती है। उसके लिये जयप्रकाश नारायण तथा डाक्टर लोहिया चिंतित लोकशक्ति को सटीक आकार देने में भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री अपने स्मार्ट विलेज, स्मार्ट सिटी तथा स्मार्ट फेडलरिज्म की घटक राज्य सत्ता तथा भारतीय गणतंत्र के संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत स्मार्ट इंडिया, स्वच्छ भारत एवं समर्थ भारत के रूप में दुनियां के राजनीतिक नक्शे में आदर्श लोकतंत्र का बाना पहना सकते हैं लक्ष्य हो - 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःखभागभवेत्।
ताराबाई शिन्दे एवं कमला देवी चट्टोपाध्याय इन दो महिलाओं के अलावा भी भारत की अन्य महिला शक्तिपात अन्वेषण करने से पहले एक अहम सवाल विचारणीय लगता है। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी काव्य में मनु-शतरूपा का पहला दाम्पत्य पथ को कथात्मकता दी है। संस्कृत वाङमय व भारतीय ज्योतिष में मिथुन शब्द चर्चित हुआ है। सौर मान वर्ष में तीसरा महीना जिसे आषाढ़ कहते हैं उसे मिथुनाई कहा जाता है। मिथुन एक पुरूष व एक नारी के जोड़े को कहा जाता है। पुत्र व माता, पिता पुत्री व भाई बहन ये तीनों मिथुन हैं। पति पत्नी भी मिथुन हैं। मिथुन ही मैथुन सृष्टि का मार्ग है जो पति पत्नी का दम्पति धर्म कहलाता है। संस्कृत के नाम धन्य कवि कालिदास जब अपनी भार्या विद्वत्तमा से मिले तो विद्वत्तमा ने सवाल किया - अस्ति कश्चिद् वाग् विशेषः। कालिदास के तीन काव्य मेघदूत, कुमार संभव तथा रघुवंश इन्हीं तीन शब्दों से शुरू होते हैं। यहां केवल मेघदूत - ‘कश्चित् कांता विरह गुरूणा’ से प्रारंभ मेघदूत महाकाव्य का ही उल्लेख किया जारहा है। कुमांऊँ की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़े को कुमइयां लोग अल्माड़ कहते हैं। यहां बरेली-अल्मोड़ा राजमार्ग में जाखन देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। अल्माड़ का प्राचीन नाम अलकापुरी-कुबेरधानी है। कुबेर रावण से पराजित होकर हिमालय मानसखंड में अलकापुरी का निधिपति होगया। वह यक्षों का मुखिया था। वह अपने अमात्य पक्ष से असंतुष्ट था। कुबेर ने यक्ष को देश निकाला दे डाला। यक्ष प्रेयसी यक्षिणी को कुबेर ने सजायाफ्ता यक्ष के साथ नहीं जाने दिया। वह अल्मोड़ा के जाखन देवी मोहल्ले में ही रहती रही। यक्ष विरह व्यथा पालते रहा। हिमाद्रि से विन्ध्यान्द्रि पार कर रामगिरि (छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों में) रहने लगा। उसने अपना विरह संदेश प्रिया यक्षिणी को बादलों के जरिये भेजा। रामगिरि पर्वत का खरोष्ट्री लिपि वाला शिलालेख यक्ष की विरह गाथा समाये हुए है। यक्ष के द्वारा बादलों के माध्यम से अपनी प्रिया यक्षिणी को भेजा गया संदेश मिथुन संक्रांति को भेजा गया था। मिथुन संक्रांति प्रति वर्ष 15 जून को पड़ती है। हर चौथे वर्ष मिथुन संक्रांति अगले दिन 16 जून को भी हो़ती है। स्त्री पुङ प्रसंग का अर्धनारीश्वर तथा मनुष्य देह में जीवात्मा का एक महीने पुरूष शरीर रहना, अगले महीने स्त्री शरीर धारण करना क्या कोरी कल्पना है या मार्कण्डेय पुराण में वर्णित - ‘एवं युवतयः सद्य पुरूषत्वं प्रयेदिरे’ युवतियां पुरूषों में परिणित हो जाती हैं। विचार स्वातंत्र्य युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पुरूष का पुरूष से विवाह करना तथा स्त्री का स्त्री से विवाह करना आज विश्व के अनेकों देशों में मानवाधिकार माना जारहा है। यह धारणा ‘विवाहो-उत्वाहश्च्’ अवधारणा के अनुकूल नहीं है पंरतु लोकमत में यह धारणा संबल पारही है। इस प्रकार के विवाह से सृष्टि में विसंगति भी उत्पन्न हो सकती है। चरक के मतानुसार समलिंगी विवाह से विवाहकर्ता स्त्री सुख या रतिसुख का आनंदातिरेक सीमित मात्रा तक उपलब्ध कर सकता है पर ऐसे सरोकार विवाह संस्था को अप्रासंगिक भी बना सकते हैं। ताराबाई शिन्दे एवं कमला देवी चट्टोपाध्याय के समानांतर स्वातंत्र्यवीर नारी रानी लक्ष्मीबाई, भगिनी निवेदिता, इंदिरा गांधी, मदर टेरेसा, कवियित्री महादेवी वर्मा तथा योगिनी मां आनंदमयी के व्यक्तित्त्वों का पुनरावलोकन कर ताराबाई शिन्दे एवं कमला देवी चट्टोपाध्याय के साथ साथ आधुनिक भारत के निर्माताओं की अगली सूची में जोड़ने बाबत सोचेंगे। कमला देवी चट्टोपाध्याय का पितृकुल और उनकी माता का अपनी बाल विधवा ब्राह्मणी कन्या को उच्च शिक्षा के लिये मद्रास भेजना तथा मद्रास विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे हरीन्द्र नाथ से आकर्षित होकर अप्रौढ़ावस्था जव वह केवल तेईस वर्ष की युवती थी पुनर्विवाह करना हरीन्द्र नाथ से कमला देवी के विधवा विवाह को कमला देवी की माता द्वारा सहमति देना एक क्रांतिकारी कदम था। कन्नड़ भाषा में कमला देवी के पितृवंश तथा मातृवंश संबंधी जानकारी यह ब्लागर अपनी कन्या वीणा के माध्यम से एकत्रित करने का प्रयास कर रहा है ज्योंही मंगलुरू स्थित ब्राह्मण परिवारों से संबंधित वांछित समीक्षित ब्यौरे हस्तगत होंगे, कमला देवी के पितृगेह सहित कमला देवी के नांदीमुखों को भी मुखरित किया जायेगा। भारतीय नारी को महाभारत के स्त्री धर्म के सापेक्ष्य में हृदयंगम करना आज के युग की पुकार है।
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