ऋजु स्वभाव परो जनेषु दुर्लभः
अमेरिकी प्रेसिडेन्ट अब्राहम लिंकन महाशयः राष्ट्रगोप्ताः
मनुष्य मात्र बन्धु है यही बड़ा विवेक है। पुराण पुरूषोत्तम पिता स्वयंभू एक है।
शब्द यात्रा में भारत शास्त्र जिसे पश्चिमी सभ्यता इण्डोलौजी नाम से संबोधित करती है उसमें एक शब्द ब्रह्म है। ब्रह्मेति वर्तते - शब्द में ब्रह्म सरीखी सृजन शक्ति है। भारतीय वाङमय का ब्रह्म शब्द पश्चिम की यात्रा में निकला वर्तमान ईरान का एक पुराना नाम परसिया या फारस है। फारस की भाषा फारसी में संस्कृत शब्द ब्रह्म इब्राहीम होगया। शब्द यात्रा और पश्चिम की ओर बढ़ी यूनान और यूरप में पहुंचते ही यह शब्द अब्राहम होगया। इस्लाम धर्म ख्रिस्ती धर्म से चौथाई सहस्त्राब्दी से सवा शती नया मजहब है परंतु फारस के लोग इब्राहिम नाम से इस्लाम धर्म के उदय होने से पूर्व भी जाने जाते रहे। पारसीक धर्म इस्लाम धर्म व ख्रिस्ती धर्म से पुराना है। इस धर्म के अनुयायी भारत में पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता से आज भी रहते हैं भले ही इस धर्म के अनुयायियों की संख्या कुछ ही हजार क्यों न हो। हिन्दुस्तान में पारसीक धर्मावलंबियों की उपस्थिति भारतीय उद्यमिता की कारक शक्ति है। पारसी लोग आधुनिक हिन्दुस्तान के निर्माताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करते आरहे हैं। हिन्दुस्तान में इस मुल्क के पारंपरिक सनातन समाज में लोगों के नाम ब्रह्म देव, ब्रह्म दत्त, ब्रह्म सिंह, ब्रह्म गुप्त तथा ब्रह्म दास के अलावा भारतीय इस्लाम धर्मावलंबियों के नाम इब्राहीम, सैयद इब्राहीम, इब्राहीम लोदी देखे सुने जाते हैं। भारत के ख्रिस्ती धर्मावलंबियों में वे चाहे रोमन कैथोलिक हों अपने को सीरियन ख्रिस्ती कहें अथवा प्रोटेस्टेंट ही क्यों न हों उनमें अनेक लोगों के नाम अब्राहम मुख्य नाम अथवा उपनाम भी हुआ करते हैं। भारत में सनातन धर्मावलंबियों में ईश निन्दा के नाम से ज्ञात ईश्वर या परमात्मा के अस्तित्व से असहमति जताने वाले लोगों को नास्तिक कहा जाता है। वेदांत को मानने वाले लोग वे चाहे अद्वैत अनुयायी हों या द्वैत को मानते हों अथवा तो द्वैताद्वैत को ही मानते हों या माध्व संप्रदाय के विशिष्टाद्वैत के मानने वाले ही क्यों न हों ईश्वर और जीवात्मा के बीच आस्था सेतु का काम करता है। प्रह्लाद की नवधा भक्ति हो या नरसी मेहता की दशधा भक्ति देवर्षि नारद जिन्हें ईश्वर शक्ति सत्ता का पहला वाहक माना जाता है उन्होंने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में कृष्ण द्वारा अपने मौसेरे भाई चेदिराज शिशुपाल को अपने चक्र सुदर्शन के द्वारा निष्प्राण किये जाने पर शिशुपाल के शरीर की सूक्ष्म ज्योति ने कृष्ण के शरीर में प्रवेश करने की घटना को जब युधिष्ठिर ने देखा देवर्षि से प्रश्न किया देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से कहा -
यथा वैरानुबंधेन मर्त्यस्तन् मयिता मियात् न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः।
वैरानुबन्ध वैसा ही है जैसा कर्मानुबन्ध जिसे Bondage of Karma कहा जाता है। अब्राहम लिंकन रामकृष्ण परमहंस तथा संत ज्ञानेश्वर की तरह अन्तर्मन में सरस्वती के उद्भट उपासक प्रतीत होते है यद्यपि आधुनिक पाश्चात्य चिंतन धारा और भारतीय वाङमय चिंतन पोखर में बाहरी तौर पर गहरी वैचारिक प्रतिकूल भावना दिखती है पर लगता है हेनरी किसिंजर ने भगवद्गीता और अर्थशास्त्र में योगेश्वर भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण और आचार्य चणकनंदन जिन्हें संसार चाणक्य के नाम से पहचानता है कूटनीति, कूटयोधी तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र में वर्णित बिन्दु सार्वभौम राजतंत्र ही नहीं कृष्ण से सवा पांच हजार वर्ष पूर्व तथा विष्णु शर्मा चाणक्य से अढ़ाई हजार वर्ष के कालखण्डों के बावजूद उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अब्राहम लिंकन ने संयुक्त राज्य अमरीका में अफरीकी नीग्रो जिन्हें अपनी नस्ल को अश्वेतों से श्रेष्ठ मानने वाले यूरप से अमरीका में बसे श्वेत समाज के कतिपय समूह दास जिसे अंग्रेजी Slave नाम से जाना जाता है, इकली दासता नहीं सामूहिक दासों के रूप में प्रयोग करते थे। भारत के लोगों में भी दास्य भक्ति का एक स्वरूप है। भारत के परंपरा मानने वाले लोग चातुवर्ण्य, चार वर्णों, चार आश्रम व्यवस्था का अनुसरण करते थे जिनमें पहले वर्ण को शर्म, दूसरे वर्ण को वर्म, तीसरे वर्ण को गुप्त तथा चौथे वर्ण को दास संज्ञा दी जाती थी। इसी तरह चार आश्रम ब्रह्मचर्य(विद्याध्ययन व संस्कार संवर्धन), गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार एक आदमी अपने जीवन के पच्चीस वर्ष अध्ययन, पच्चीस वर्ष गृहस्थ, पच्चीस वर्ष वानप्रस्थ तथा अन्तिम पच्चीस वर्ष अथवा देहन्यास पर्यन्त सन्यासी रहता था। संत विनोबा भावे ने वर्णाश्रम व्यवस्था के बारे में एक अद्भुत आर्थिकी मीमांसा प्रस्तुत की, उनका कहना है कि एक व्यक्ति मर्द हो औरत जिन्दगी के पच्चीस वर्ष कमाये अपने श्रम से स्वयं के अलावा पंद्रह और लोगों को भी भोजन कराये। भारत की वर्णव्यवस्था लोगों में काम का बटवारा सिद्धांत था। यही कर्मगति टारे नाहिं टरी का मूल कर्मयोग कहलाता है।
प्रतीति होती है कि कुरूक्षेत्र के रणांगण में विषाद पूर्ण अवसाद से विचलित कौंतेय अर्जुन युद्ध के लिये तत्पर योद्धाओं को अपने सारथी योगेश्वर वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण के सान्निध्य में देखते हुए वासुदेव श्रीकृष्ण से कहते हैं -
स्वजनम् हि कथम् हत्वा सुखिनः स्याम माधव कुल क्षय कृतम् दोषम् मित्र द्रोह च पातकम् प्रपश्यद्भिर्जनादनः।
अर्जुन इस दोषपूर्ण मार्ग को अपनाना नहीं चाहता। उसने अपने अंतर्मन का विषाद कृष्ण को बताया। कृष्ण ने कौंतेय अर्जुन की पूरी पूरी बात ध्यानमग्न होकर सुनी। यहां प्रश्न उठता है कि क्या कुरूक्षेत्र का युद्ध जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे से संबंधित थे क्या यह युद्ध गृह युद्ध था ? जिसे अब्राहम लिंकन ने अमरीकी संदर्भ में सिविल वार कहा। युद्ध धर्मयुद्ध, गृहयुद्ध के समानांतर अमरीकी दास प्रथा को समाप्त करने में अग्रणी योग भाष्कर व्यक्तित्त्व के स्वामी अब्राहम लिंकन युद्ध, धर्मयुद्ध, गृहयुद्ध, कूटयुद्ध योगेश्वर कृष्ण का निरायुध रणछोड़ युद्ध इन सबसे ऊपर वाग्युद्ध सहित अष्टांग युद्ध वार्तायें हुई हैं। महाभारत के कुरूक्षेत्र में अठारह दिनों तक चलते रहे युद्ध को गृहयुद्ध के बजाय धर्मयुद्ध की संज्ञा दी गयी। दो व्यक्तियों के युद्ध में परशुराम व भीष्म के बीच हुआ युद्ध गुरू शिष्य का प्रभावशाली युद्ध था। गुरू परशुराम ने अपने प्रिय शिष्य भीष्म को ललकारा था। कहा था - भीष्म तुम अंबा की बांह पकड़ कर लाये हो उससे विवाह करो। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा की बात गुरू के सम्मुख रखी। परशुुराम वीतिहोत्र दौहित्री अंबा को राहत देना चाहते थे। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य भीष्म से कहा - मुझसे तुमुल युद्ध करो अगर हार गये तो अंबा से विवाह करना पड़ेगा। भीष्म ने अपने गुरू व वैशाख महीने की अक्षय तृतीया को जन्मे रेणुकेय जामदग्न्य परशुराम से कहा - गुरूदेव आपकी शर्त मंजूर है। इक्कीस दिनों तक दोनों में तुमुल युद्ध हुआ। गुरू ने शिष्य भीष्म को कहा - वत्स, तुम विजयी हुए। वीतिहोत्र तथा उनकी दौहित्री अंबा से परशुराम कहा - तुम्हें भीष्म को हराने के लिये जन्मांतर श्रम करना होगा। परशुराम ने यह भी कहा - गुरू शिष्य से पराजित होगया इसे ही कहते हैं गुरू गुड़ ही रह गये चेला बन गये शक्कर। कूटयोधी वासुदेव कृष्ण ने अपने दुश्मन मगध नरेश जरासंध से राजगृह जाकर भीम अर्जुन के साथ वामन वेष धारण कर युद्ध भिक्षा मांगी। मगध नरेश प्रतापी जरासंध ने ब्राह्मण वेश धारी भीम-अर्जुन-कृष्ण तिकड़ी को भीख देना मंजूर किया, कृष्ण ने मगध नरेश जरासंध से कहा - ये भीम और अर्जुन मेरे पिता की बहन कुंती पुत्र हैं। मैं कृष्ण आपका दुश्मन हूँ। जरासंध ने कृष्ण को कहा - तुम रणछोड़ हो। यह अर्जुन मेरे साथ युद्ध करने लायक योद्धा नहीं है। और आगे कहा - भीम मेरा तुल्य बल योद्धा है। भीम को जरासंध ने गदा सौंपी। दोनों सात दिन तक युद्ध करते रहे। ऐसे युद्ध को दो योद्धाओं की युद्ध कला प्रदर्शक कहा जा सकता है। योगेश्वर वासुदेव कृष्ण ने यदुवंशी समाज को कहा - आने वाले सात दिनों में द्वारका में जल प्लावन होगा इसलिये चलो सरस्वती-समुद्र संगम प्रभास पाटन चलें। यादवों के बीच जो महान यादवी संघर्ष प्रभास पाटन क्षेत्र में हुआ वह सही मायने में जातीय गृह युद्ध था। सार्वभौम राज्यों राज्य सत्ता हड़पने के लिये छोटे मोटे गृहयुद्ध होते रहते हैं। अब्राहम लिंकन को दास प्रथा समाप्ति तथा अश्वेत अमरीकी जिन्हें संयुक्त राज्य अमरीका लाकर दासता के भीषण बंधन में जकड़ा जाना श्वेत अमरीकी धन कुबेरों को अपना जन्मसिद्ध अधिकार महसूस होता था। भारत में एक अद्भुत ग्रंथ हुआ करता था, ध्वन्यालोक जिसका आप्त वाक्य ही ‘भिन्नरूचिर्हि लोकः’। लोक को पश्चिमी विद्वान प्लेनेट भी कहते हैं। भारत में यह पृथ्वी या धारित्री कही जाती है। भारतीय पौराणिक कथानकों में मनु शतरूपा पुत्र उत्तानपाद, उत्तानपाद के यशस्वी पुत्र ध्रुव और ध्रुव के प्रपौत्र पृथुश्रवा का आख्यान गाया जाता रहा है। पृथुश्रवा अथवा पृथु ही क्यों न कहें उसने धरती में राज व्यवस्था के समानांतर धरती की आर्थिकी का सांगोपांग कर्त्तव्य निर्वाह का रास्ता सुनिश्चित किया।
मिस्टर रिचर्ड स्टिनर की ताजा पुस्तक फादर अब्राहम 308 पृष्ठों वाली ईस्वी सन 2006 में पहली बार आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित ग्रंथ में स्टिनर ने परिश्रम पूर्वक अब्राहम लिंकन द्वारा जिस निरंतरता से अमरीका में दास प्रथा समाप्ति का जो भगीरथ प्रयास किया गया आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीतिक कौशल से दासता निर्मूलन के लिये संयुक्त राज्य अमरीका के राज्यों ने चौथी जुलाई ईस्वी सन 1776 में अमरीका के तेरह राज्यों ने सर्वसम्मत घोषणा कर संयुक्त राज्य अमरीका का श्रीगणेश किया और बर्तानी राजतंत्र के बंधन से अपने आपको मुक्त कर जहां एक ओर तेरह अमरीकी राज्यों ने संयुक्त अमरीकी राज्य संघ को जन्म दिया वहीं बर्तानी राजकुल से मुक्ति पाने के लिये ब्रिटिश राजकुल द्वारा अमरीका में बस गये प्रवासी समाज की तेरह सूत्री अनदेखी से मुक्ति पाने के लिये जो सत संकल्प किया अमरीकी संयुक्त राज्य श्रीगणेश का अदम्य उत्साह बर्तानी राजनीतिक बंधन से अमरीकी उपनिवेशों में स्थायी रूप से बस गये मानव समूह ने प्राकृतिक न्याय परमात्मा की परम प्रकृति प्रवासी से स्थायी आवासी आकार में अमरीका में नयी जिन्दगी अपना कर मानव की वैचारिक शक्ति का सम्मान बनाये रखने के लिये ही उन्होंने उन कारणों की समीक्षा करते हुए बर्तानी राजकुल हुकूमत से छुटकारा पाने का आदर्श सुनिश्चित किया। पार्थक्य का यह मार्ग स्वयं प्रमाणित शास्वत सत्य है कि सभी मानव सृष्टि से ही समतामूलक सृष्टा की ऐसी संतति हैं जिन्हें जन्मना ही ऐसे रूकावट रहित जीवन जीने, स्वातंत्र्य सत्ता का आनंद प्राप्त करने, इन अधिकारों की सहज प्राप्ति सरकारें निर्मित करने, ऐसे सिद्धांत वादी लक्ष्यों के अनुकूल मानव समाज का वे सत्तायें हासिल हों जिनके बलबूते पर शास्ताओं को शासितों पर शासन करने के अधिकार शासितों की सहमति से मिले। अगर कोई शास्ता विध्वंसकारी मार्ग का अनुसरण करे लोकसत्ता उसे निष्कासित करने अथवा उसका अंत करने का लोकमताधारित संबल से ऐसी सत्ता को पदच्युत कर नया सत्ताधिष्ठान जिसकी बुनियाद ऐसे आदर्शों पर टिकी थी तथा ऐसे सत्ताधिष्ठान का सूत्रपात लोकसुरस्क्षा एवं लोकानुरंजन करने वाले ऐसे स्तंभों पर खड़ी होकर शासकों को निर्देशित करने की क्षमता का क्षरण क्षुद्र आधारों पर किया जाना संभव नहीं और लोकसुरक्षा अनुभव सिद्ध शासन प्रथायें मानव हितों पर सांघातिक कष्टों से बचाव तथा दुःखदायी कष्टों से मानव समाज को मुक्त करने के लिये अगर शासन व्यवस्था व तंत्र को बदलना भी पड़े तो उसके लिये तैयारी हो तथा सत्ता का दुरूपयोग लोकहित पर प्रत्याघात करने के स्तर पर पहुंचने के पहले ही निस्तेज कर दिया जाये। वर्तमान बर्तानिया राजकुल का इतिहास ही ग्रेट ब्रिटेन द्वारा निरंतर आघात प्रत्याघातों की श्रंखला है जिन सबका सीधा वास्ता ग्रेट ब्रिटेन की राजसत्ता से पूरी तरह अनवरत कष्टप्रद शासन व्यवस्था से है। ऐसे अमरीकी राज्यों को तत्परतापूर्वक ऐसी प्रतिकूल दुःखदायी परिस्थितियां समाप्त करने के लिये इन हालातों को विश्व के सामने सिद्ध करने के लिये वास्तविक स्थितियां उद्घोषित करनी आवश्यक हैं। बर्तानी राजकुल लोकहित के कानूनों की स्वीकृति नहीं देता, तात्कालिक तथा अत्यंत जरूरी प्रावधानों के लिये बर्तानिया के वर्तमान राजा ने निरंतर अनदेखी अख्तियार की है। बड़े बड़े लोक जनपदों के लोकमत तथा लोकाकांक्षा को नकार डालने के कारण ही संयुक्त राज्य अमरीका के तेरह राज्यों ने जो संकल्प लिया वह संयुक्त राज्य अमरीका में बर्तानी राज की तेरहवीं सरीखा दिन था। भारत में जब कोई व्यक्ति दिवंगत हो जाता है उसके बेटे भाई व बन्धु मृतात्मा को बारह दिनों तक तिलांजलि देते हैं तेरहवें दिन तेरहवीं और रस्म पगड़ी कर दिवंगत आत्मा के पारलौकिक शांति के समानांतर तेरहवीं को भोज दिया जाता है। शोक समाप्ति के लिये रस्म पगड़ी का आयोजन होता है। हेनरी किसिंजर अपनी ताजा पुस्तक World Order जिसे हम हिन्दुस्तानी आर विश्वायतन या वैश्विक प्रबंधन कहें तो अतिशयोक्ति दोष नहीं होगा। हेनरी किसिंजर की इस पुस्तक में यूरप, अंतर्राष्ट्रीय बहुल व्यवस्था, यूरप में सत्ता संतुलन पद्धति, इस्लामवादी मध्यपूर्व की विश्व दुरवस्था, संयुक्त राज्य अमरीका व ईरान व्यवस्थित करने की मानसिक तत्परता, एशिया की विविधतायें व एशियायी व्यवस्था की तरफ बढ़त का प्रयास, एशिया में टकराव व भाईचारे का रास्ता, समूची मानवता लोकहित संवर्धन के लिये संयुक्त राज्य अमरीका की प्रतिबद्धता के समानांतर व्यवस्था संबंधी दार्शनिक मनोभाव, संयुक्त राज्य अमरीका की महाशक्ति तकनालाजी का विवेकसंगत प्रयोग तथा मानव चेतना हमारे वर्तमान युग की विश्व व्यवस्था। पांचवे परिच्छेद ऐशियायी बहु विविधता का एक अध्याय - भारत की भगवद्गीता तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र का वैश्विक कल्याण हेतु आधुनिक संदर्भ में विवेकशील विवेचनपूर्ण वैश्विक प्रयोग - हेनरी किसिंजर की ताजा पुस्तक World Order जिसे हिन्दुस्तानियों की तात्कालिक समझबूझ के लिये विश्व व्यवस्था या वैश्विक प्रबंधन अथवा विश्वायतन भी कहा जा सकता है। हेनरी किसिंजर सरीखे अमरकी राष्ट्रपति निक्सन के अमात्य रहे व्यक्तिव पे अपने विश्वायतन सृष्टि में अमरीका को दास प्रथा से तिलांजलि दिलाने वाले अमरीकी राष्ट्रगोप्ता अब्राहम लिंकन, त्रिविष्टप संस्कृति के चौदहवें दलाईलामा का अपनी संरचना में जिक्र तक नहीं किया है। तिब्बत शब्द उनके चार सौ बीस पृष्ठीय पुस्तक में केवल एक बार पृष्ठ 199 में भारत चीन के बीच संपन्न युद्ध के संदर्भ में आया है। जिससे इजरायली मूल के अमरीकी राजनेता राष्ट्रपति निक्सन के अमात्य रहे किसिंजर महाशय द्वारा अपनी ताजी रचना विश्वायतन World Order अब्राहम लिंकन व दलाईलामा की विश्व उपलब्धियों की अनदेखी करना अखर रहा है। अभिव्यक्ति की सचेत विवेकसंगत अभिव्यंजना उनका वैयक्तिक अधिकार है। चीन जिसे पाश्चात्य जगत चायना संबोधन देता है हो सकता है अपने चायना अध्ययन में किसिंजर महाशय दलाईलामा व तिब्बत की सांस्कृतिक तथा आस्थामूलक वर्तमान दुर्दशा का सिंहावलोकन कर चुके हों पर उन्होंने हिन्दुस्तान के संदर्भ में भगवद्गीता - महाभारत महाकाव्य के भीष्म पर्व का प्रारंभिक दृश्य, महाभारत का कुरूक्षेत्र का धर्मयुद्ध अगहन-शुक्लपक्ष की एकादशी से शुरू हुआ। भाारतीय सौर-चंद्र मास में अगहन या मार्गशीर्ष आठवां महीना है। अगहन से पहला चान्द्रमास व सौरमास कार्तिक कहलाता है। कार्तिक कृष्णपक्ष को भारत के लोग दीपावली पक्ष के रूप में मनाते हैं। चान्द्रमास में पखवाड़ा(कृष्ण व शुक्ल दोनों) आमतौर पर पंद्रह दिन वाला, कभी कभी सोलह और चौदह दिन वाला भी हुआ करता है। महाभारत युद्ध से पहले जो दिवाली पक्ष था वह तेरह दिन का ही पखवाड़ा था। दीपावली के चालीसवें दिन कुरूक्षेत्र के मैदान में धृतराष्ट्र पुत्र व पांडु पुत्रों के बीच कुरूवंश का राज्याधिकार किसे मिले ? युधिष्ठिर को या सुयोधन को ? युद्ध का मूल कारण हस्तिनापुर की राजगद्दी थी। किसिंजर महाशय ने भगवद्गीता को हिन्दू क्लासिक कहा है जब कि वास्तविकता यह है कि कुरूक्षेत्र में हुआ कृष्णार्जुन संवाद मनुष्य लोक की कर्म शैली है। भगवद्गीाता ने इसे ‘कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके’ कह कर गीता के मानव हित का संवाद हिन्दू धर्म सहित किसी भी मजहब से जोड़ा जाना विवेकसंगत नहीं होगा। भगवद्गीता को बहुत से लोग व्यास रचित अठारह पुराणों में श्रीकृष्ण चरित प्रकाशित करने वाला श्रीमद्भागवत महापुराण है। इस पुराण में बारह स्कंध हैं। इस पुराण के ग्यारहवें स्कंध को उद्धवगीता भी कहा जाता है। संत एकनाथ ने श्रीमद्भागवत महापुराण के ग्यारहवें स्कंध के 31 अध्यायों के 1351 श्लोकों के आधार पर अठारह हजार ललित अभंग लिखे जिन्हें मराठी भाषी लोग एकनाथी भागवत कहते हैं। कृष्ण भक्ति में रमे हुए संत इन अभंगों का गान करते हैं। अब्राहम लिंकन की ईश्वरपरायणता और अफरीकी अश्वेतों को संयुक्त राज्य अमरीका में दास प्रथा मुक्ति और अफरीकी अश्वेत समाज को मताधिकार की उपलब्धि कराना, अफरीकी संविधान में मनुष्यता को नस्लभेद से उत्कृष्ट आदर्श मानना तथा प्राणप्रण से अपने लक्ष्य की उपलब्धि के लिये कौटिल्यीय अर्थशास्त्र के साम, दाम, दण्ड, भेद चारों सूत्रों का कौटिल्य के राजशास्त्र में उपयोग में लाये गये लगभग पौने छः सौ बीज सूत्रों तथा अर्थशास्त्र के 6000 श्लोक हैं। ईश्वर की सृष्टि में समीक्षित ज्ञान मार्ग का अनुसरण करने वाले अनेक योग्य व्यक्ति समय समय पर धरती में जन्म लेते रहते हैं। अमरीका अथवा अमरीका नाम से प्रसिद्ध महाद्वीप में अब्राहम लिंकन का जन्म 1809 में हुआ। अब्राहम की मानसिक चिंतनशक्ति स्वजीवन को समतापूर्ण सामाजिकता के लिये अर्पित करना, यूरप से अमरीका में आकर बस गये श्वेत लोग अमरीका में अपना जोर जमाने के लिये अफ्रीकी नीग्रो लोगों की खरीद फरोख्त करते थे ताकि उनको शारीरिक श्रम कर अपनी मेहनत का फायदा श्वेत लोग निरंतर उपलब्ध करते रहें। यह स्थिति अब्राहम लिंकन को मनुष्यता को बर्बरतापूर्वक हीनग्रंथि में जकड़ने वाला उपक्रम लगा। भारतीय वाङमय में मनुष्य मात्र की बंधुता का व्यापक विश्लेषण हुआ है। चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को भारतीय दर्शन में ऊँचा स्थान दिया गया है। मानवों में देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस व किन्नर समुदायों में कर्म योग्यता के बंटवारे के अनुसार श्रेणियों में रखा गया है। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय को कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने सांख्य योग या ज्ञान योग की संज्ञा दी। सांख्य के उच्चतम विचारक कपिलाचार्य थे जिन्हें कृष्ण ने अपनी विभूतियों का ब्यौरा देते हुए पार्थ से कहा - ‘सिद्धानाम् कपिलो मुनिः’ सिद्धों में मैं कपिल हूँ। सिद्ध कौन ? इसका ब्यौरा देते हुए ज्ञान विज्ञान योग में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था -
मनुष्याणाम् सहस्त्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये यततामपि सिद्धानाम् कश्चिन् माम् व्येति तत्वतः।
दास प्रथा समाप्ति करने के मार्ग में अब्राहम लिंकन के सामने दास प्रथा समर्थक समूह सहित अपने साथ चलने वाले समूह से भी निपटना था क्योंकि कुछ लोग दास प्रथा जारी रखने के लिये संयुक्त राज्य अमरीका का जो संघ चार जुलाई 1776 को संयुक्त राज्य अमरीका के तेरह राज्यों ने घोषित किया था, चौरासी वर्षों के अंतराल में दास प्रथा समर्थक दक्षिणी अमरीकी राज्य गृहयुद्ध के लिये आमादा थे। दास रखने, दास खरीदने के लिये वे संघ से विच्छिन्न होने की आकांक्षा भी पाल रहे थे। अब्राहम लिंकन के सामने दोनों ओर संत्रास का ही बोलबाला था इसलिये अब्राहम लिंकन द्वारा समय समय पर सन 1856 से लेकर सन 1865 तक अपनाया गया वह अब्राहम लिंकन के प्रकट वैरियों और प्रच्छन्न वैरियों जिन्हें हिन्दुस्तानी कहावत के अनुसार आस्तीन का सांप कहा जाता है दोनों से आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीतिक चालों से निबटना था इस आन्वीक्षिकी सही सही आकलन महाविष्णु द्वारा क्षीरसागर मंथन के लिये वैचारिक पथ अपनाया कश्यप दायादों में जो अहम् पूर्वम की जो मानसिकता थी उसका सटीक व सामयिक दोहन कर जिस तरह महाविष्णु ने क्षीरसागर मंथन कराया दास प्रथा मुक्ति और अमरीकी यूनियन को एक रखने के लिये अब्राहम लिंकन द्वारा चुना गया मार्ग था। अब्राहम लिंकन कार्यशैली और अमरीकी संघ को चौरासी वर्ष की उम्र में छिन्नभिन्न होने से बचाने का श्रेय अब्राहम लिंकन को ही जाता है। लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ 1917 में गठित हुआ चौरासी वर्ष से दस वर्ष पहले यानी मात्र पौन शताब्दी तक ही जीवित रह कर छिन्नभिन्न होगया। अब्राहम लिंकन भारतीय दर्शन के उस शास्वत सिद्धांत को हृदयंगम किये विवेकशील राजनीतिज्ञ थे उत्थान-पतन, जय-पराजय कालचक्र की तरह घूमते रहते हैं। अर्जुन से कृष्ण ने यह भी कहा था - ‘हतो वा प्राप्स्यसे स्वर्गम् जित्वा वा मोक्षसे महीम्’। गीता के इस दर्शन का प्रतिपादन अब्राहम लिंकन की कार्य शैली थी। कौटिल्य अर्थशास्त्र के पौने छः सौ सूत्रों और छः हजार श्लोकों का अमरीकी डेमोक्रेसी अथवा बर्तानियां की तर्ज पर हिन्दुस्तान की पार्लमेंटरी डेमोक्रेसी पर अढ़ाई सहस्त्राब्दी के कालखंड के बावजूद राजतंत्र और लोकतंत्र की सत्ता शैलियों पर आदि शंकराचार्य की स्मार्त शैली वाले कौटिल्य अर्थशास्त्र के सामयिक भाष्य से भावी विश्वायन पथ निर्धारण हो सकता है।
अब्राहम लिंकन का सरल स्वभाव - ‘सहजम् कर्म कौंतेय सदोषम् न त्यजेत्’ कथन को संबल देता है।
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अब्राहम लिंकन का सरल स्वभाव - ‘सहजम् कर्म कौंतेय सदोषम् न त्यजेत्’ कथन को संबल देता है।
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