Monday, 25 January 2016

जय हो स्वतंत्र विश्व कुलाधिपति अंजेला मर्केल
जर्मनी चांसलर जय जय जय हो।

शरणागत दीनार्त्त परित्राण परायणे सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणी नमोस्तुते।
अंजेला मृगलोचनि नमोस्तुते। अंजेला मरकेल नमोस्तुते।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार शरण में आये दीन और आर्त्तजनों के परित्राण परायणा, सब के कष्ट दूर करने वाली, हर प्राणी में प्राण रूप से बसने वाली देवि! आपको बारम्बार प्रणाम। टाइम पत्रिका के दिसंबर 21 अंक में पत्रिका संपादिका नान्सी गिव्स ने ख्रिस्ती सन् 2015 का वैश्विक व्यक्तित्त्व जर्मनी की चांसलर अंजेला मरकेल को चुना है। जहां तक हिन्दुस्तान का सवाल है सांस्कृतिक भारत में विश्व भर में ऐसे चिह्नित स्थान हैं जिनमें जर्मनी, कैस्पियन सागर, रूस, तिब्बत और अरब या अरेबिया नाम से प्रसिद्ध भू भाग संस्कृत वाङमय के अनुसार क्रमशः शर्मणि, कश्यप सागर, ऋषि देश, त्रिविष्टप और और्व नाम से जाने जाते हैं। जर्मन भाषी यूरप के अनेक देशों में गिरजाघरों में जो प्रार्थना होती है उसका सुर सामवेदी है। सामवेद जिस तर्ज पर गाया जाता है उसी तर्ज पर कैथोलिक अथवा प्रोटेस्टेंट गिरजाघरों में सामवेद की लय पर बाइबिल सम्मत प्रार्थना होती है। जीसस क्राइस्ट जिन्हें हिन्दुस्तान में ईसा मसीह के नाम से जाना जाता है का बपतिस्मा करने वाले सेन्ट जोन्ह थे। प्रतीति यह होती है कि सेंट जोन्ह और गंगाजल पी जाने वाले जन्हु महाराज में सांस्कृतिक साम्य है। ख्रिस्ती मजहब मानने वाले व्यक्ति को जब तक जलाभिषेक से बपतिस्मा नहीं किया जाता, व्यक्ति ख्रिस्ती धर्म पंगत में नहीं गिना जा सकता है। गिरजाघरों में प्रार्थना का सुर तथा बपतिस्मा विधि यह प्रतीति कराती है कि ईसा मसीह से पूर्व यूरप के कुछ भागों में सामवेदी जीवनचर्या का स्वरूप था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी महाविभूतियों का संदेश देते समय कहा - वेदानाम् सामवेदोस्मि, आगे कहा - वृहत्साम तथा साम्नाम्। जहां जहां गिरजाघरों में सामवेद के स्वर में प्रार्थना होती है तात्कालिक जरूरत यह प्रतीत होती है कि वृहत्साम् और गिरजाघरों में ख्रिस्ती प्रार्थना लय का संगीतात्मक अध्ययन व अनुसंधान किया जाये। जहां तक जर्मनी देश, जर्मन भाषा, ऋषि देश के नाम से मशहूर रूस तथा रूस व जर्मनी की भाषाओं का प्रारंभिक स्वरूप याने जर्मन और रूसी भाषा जिन्हें यूरप के भाषाविद् ओल्ड जर्मन और ओल्ड रसन भाषा कहते हैं उन दोनों भाषाओं में वैदिक संस्कृत सहित लौकिक संस्कृत के शब्दों का प्रतिशत ज्ञात किया जाये। भारत में वाङमय संबंधी मान्यता यह है कि समुद्र मंथन के उपरांत जब देवाधिदेव महादेव ने हालाहल अपनी अंजली - दोनों हाथों को मिला कर कटोरेनुमा बनाना - अंजलि कहलाता है। अंजलि में समुद्र मंथन से निकले महाविष का पान करने के पश्चात महादेव ने ताण्डव नृत्य किया और नृत्य समाप्त होने पर अपना डमरू नौ और पांच बार बजाया जिससे वैश्विक वाणी का उदय हुआ। अंजेला मर्केल महाशया मगध साम्राज्य निर्माता आचार्य चाणक्य की तरह जर्मनी और यूरप के देशों के बारे में प्रत्येक जानकारी रखती हैं। उन्होंने जी-20 देशों के सम्मेलन के अवसर पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का ध्यान भारत के केन्द्रीय विद्यालयों में दर्जा छः से दर्जा आठ तक विदेशी भाषाओं में जर्मन भाषा पढ़ाने के पाठ्यक्रम से हटाने का प्रसंग एक महत्वपूर्ण सलीके से प्रस्तुत किया। भारत व जर्मनी में सांस्कृतिक व भाषायी अनुरूपता है। उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि भारत के केन्द्रीय विद्यालयों के छात्रों के पाठ्यक्रम से जर्मन भाषा हटाई न जाये। जर्मन, रसन व तिब्बतन ये तीनों भाषायें संस्कृत - प्राकृत भगिनियां हैं। इस ब्लागर ने समूचा संदर्भ भारत के विदेश मंत्री के संज्ञान में लाने के लिये सवा वर्ष पूर्व एक ब्लाग प्रस्तुत किया जिसे पकमंस1पकमंण्इसवहेचवजण्बवउ पर पढ़ा जा सकता है। भारत में विविधतायें हैं विभिन्न प्रकार की विविध विचार शैलियों व आचरण के बावजूद भारतीय संस्कृति में शरणागत व्यक्ति को अहिंसक चिंतन पोखर के मौलिक तत्वों के अनुसार आश्वस्त करना। अंजेला मर्केल ने यूरप के दूसरे राष्ट्र राज्य जो यूरोपीय संसद के हिस्से भी उनसे ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण अपना कर सीरियाई शरणार्थियों को आश्रय देने का शिवसंकल्प लिया। उन्होंने उत्कृष्ट राजधर्म का पालन किया। ईश्वर की सृष्टि में सत्-असत् दोनों विद्यमान हैं। राज शास्त्र सुशासन तथा रामराज्य की कल्पना करने वाले विचारक राजधर्म के समानांतर दस्युधर्म का भी विचार करते हैं। दस्युधर्म, राजधर्म का प्रतिलोम है जहां शरणागत को सुरक्षा देने में तत्पर राजधर्म पालने करने वाले व्यक्तित्त्वों में अग्रणी या अंजेला मर्केल हैं जो उग्र आततायी अबू बद्र अल बगदादी के अस्तित्व को स्वीकार करने वाली टाइम पत्रिका ने इस्लामिक स्टेट के आततायी व्यक्तित्त्वाचरण को भी नजरअंदाज नहीं कर उनकी उपस्थिति स्वीकार कर रहे हैं। राजधर्म व दस्युधर्म एक दूसरे के विलोम पथ हैं। अंजेला मर्केल जिन्हें नान्सी गिव्स ने बर्लिन दीवार की पीड़ा सहने वाला व्यक्तित्त्व का करूणामूलक उभार बताया। वस्तुतः करूणा का मूल्य ही तब बढ़ेगा जब करूणा के विरूद्ध उग्रतम आततायी यत्र तत्र सर्वत्र हिंसा का वातावरण बनाये रखेंगे। आधुनिक संसार में अगर मजहब को पहचान कर मजहब की खूबियों को गिना जायेगा अपने अपने मजहब के विस्तार के लिये दुनियां के दो बड़े मजहब जो धर्मान्तरण को मजहब का मजबूत पाया मान कर चलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है संस्कृत वाङमय से प्रभावित जर्मनी, रूस व तिब्बत ने तलवार का सहारा मजहब संवर्धन के लिये नहीं लिया क्योंकि इन तीनों भाषा भाषियों पर ब्रह्मा के पौत्र, मरीचि के पुत्र, कश्यप द्वारा प्रजापतित्व निर्वाह करने वाली तीन मातृप्रधान कौटुंबिक शक्तियां विस्तृत हुईं। अदिति अपनी भगिनियों में ज्येष्ठा व श्रेष्ठा थी उसके पुत्रों ने त्रिदश अथवा त्रिविष्टप जिसे आज का संसार तिब्बत के नाम से जानता है जिस तिब्बत को छप्पन वर्ष पहले तिब्बती धर्मगुरू व राजगुरू चौदहवें दलाई लामा को भारत की शरण में आना पड़ा। भारत ने दलाई लामा  व उनके धर्मावलंबियों को भारत में रह कर जीवनयापन का सुअवसर दिया पर बाहुबली माओ त्से तुंग से राजनीतिक मूर्धण्य आवश्यकता के बावजूद पंडित नेहरू ने विरोध मोल नहीं लिया पर विरोध की आग जलती रही जिसकी पहली चिंगारी सन 1962 में भारत ने महसूस की। बर्तानिया ने जो मैकमोहन सीमा रेखा तिब्बत व  भारत के बीच तय की थी विस्तारवादी चीन ने उसे स्वीकार नहीं किया। भारतीय वाङमय में तिब्बत को देवभूमि माना जाता है पर चीन अर्वाचीन तथा पराचीन शब्द वर्तमान चीनी गणराज्य जिसे पाश्चात्य जगत याने यूरप व अमरीका चायना कहते हैं भारत के कई हिस्सों को अपना राज्य बताता रहता है। यद्यपि चीन इतना तो स्वीकार करता है कि तिब्बत उसके लिये स्वशासी स्वायत्त क्षेत्र है जिसे अंग्रेजी भाषा में तिब्बत को चीन Autonomus Reign of Tibet संबोधित करता है। तिब्बती भाषा मंदारिन भाषा के नजदीक नहीं संस्कृत के नजदीक है। अब हम मैक्समूलर जिन्होंने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के तत्वावधान में ऋग्वेद का प्रकाशन कराया। मैक्समूलर कभी भारत नहीं आये पर भारत विधा के योग भाष्कर मैक्समूलर ने भारत विधा को जो हजारों हजार वर्षाें तक श्रौत विधा थी पिता ने पुत्र को वेद कंठाग्र कराया पुत्र ने अपने पुत्र को इस तरह वेदपाठी व्यक्ति आसेतु हिमाचल आज भी उपलब्ध हैं। वेदों का संपादन पार्वती परमेश्वरौ नंदन गणपति की सहायता से हिमालय के व्यास गुफा में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने किया। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास बादरायण व्यास भी कहलाते थे। वे महर्षि के प्रपौत्र, शक्ति के पौत्र, पंगमुनि पराशर के पुत्र तथा अवधूत षोडष वर्षीय शुक के पिता थे। वसिष्ठ से लेकर शुकदेव तक वेदपाठ श्रौत परंपरा थी। वेदों सहित पंचमवेद महाभारत तथा वेदव्यास रचित अठारह पुराणों को लिपिबद्ध करने में कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की सहायता पार्वती परमेश्वर पुत्र गणपति ने संपन्न की। मैक्समूलर जिन्होंने ऋग्वेद को छापाखाने में नागरी लिपि में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा छपाने की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया उन्होंने ऋग्वेद में स्वयं अपने आपको मैक्समूलर के स्थान पर मोक्षमूलः लिखा तथा आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के लिये आक्सफोर्ड शब्द के स्थान पर अक्षपत्तन शब्द का प्रयोग किया। हिन्दुस्तान के विधा प्रेमी हिन्दी भाषी डाक्टर राममनोहर लोहिया उतनी ही शुद्ध अंग्रेजी लिखते थे जितनी पंडित नेहरू। देशभक्ति तथा स्वभाषा भक्ति के पक्षधर डाक्टर लोहिया ने निर्णय लिया कि वे डाक्टरेट की उपाधि अंग्रेजी के जरिये नहीं प्राप्त करना चाहते। वे बर्लिन गये तीन महीने में जर्मन भाषा सीखी अनुभव किया कि जर्मन में संस्कृत प्राकृत शब्द भाषा के पिचानवे प्रतिशत तक हैं। उन्हांेने बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डाक्टरेट कर पानी के जहाज से मद्रास वर्तमान में चेन्नै आये। वहां भारत का राष्ट्रीय अखबार हिन्दू जो मुंबई से छपने वाले टाइम्स आफ इंडिया के बाद पहला अंग्रेजी अखबार था जिसकी राष्ट्रीयता राष्ट्रप्रेम अपनी एक विशेषता थी। अखबार के मालिक और संपादक से डाक्टर लोहिया बोले - कोलकाता जाने के लिये जेब में पैसे नहीं हैं हिन्दुस्तान की आर्थिकी पर एक लेख लिख कर आपको देना चाहता हूँ। भारत की तत्कालीन आर्थिकी पर डाक्टर लोहिया अंग्रेजी में एक लेख लिख कर कस्तूरी रंगन को दिया। कस्तूरी रंगन ने लेख ज्यों का त्यों हिन्दू में छापा, डाक्टर लोहिया को तीन सौ रूपये दिये। यह बात बीसवीं शती के चौथे दशक के शुरूआती वर्ष की थी। ज्योंही महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सत्यमूर्ति राजगोपालाचारी, पंडित गोविन्द वल्लभ पंत, सुभाष चंद्र बोस आदि ने डाक्टर लोहिया का लेख पढ़ा  उन्हें एक ही आर्थिकी लेख ने रातोें रात भारत विख्यात विचारक बना डाला। पंडित नेहरू तब कांग्रेस के अध्यक्ष थे उन्होंने राममनोहर लोहिया को कांग्रेस की विदेश नीति का महकमा सौंप डाला। 1934 में समाजवादी चिंतन धारा के समर्थक लोगों ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी - कांग्रेस के अन्दर ही गठित की। चंद्रभानु गुप्त सी.एस.पी. के सचिव तथा संपूर्णानंद, नरेन्द्रदेव, लोहिया, जयप्रकाश, अच्युत पटवर्धन, युसुफ मेहरअली, अरूणा आसफअली, कमलादेवी सारस्वत चट्टोपाध्याय सी.एस.पी. के स्तंभ थे। 
अंजेला मर्केल साठ वर्ष की उम्र में विश्व की ताकतवर और विवेकशील कुलाधिपति के तौर पर लोक सम्मानित होरही हैं। बर्लिन की दीवार अंजेला मर्केल की धरती माता में एक जीवात्मा के तौर पर उदित हो दस वर्ष पहले द्वितीय महायुद्ध के समाप्त होने हिटलर के अवसान पर खड़ी हुई थी। यह दीवार तब धरती में समा गई जब अंजेला मर्केल 36 वर्ष की प्रौढ़ा थीं। बर्लिन की दीवार के जमींदोज होने के पीछे सोवियत संघ का बिखरना भी था। पैंतालीस छियालीस वर्ष में ढह गई, यूरप के भाषायी राष्ट्र राज्यों में जर्मनी और फ्रांस प्रमुख हैं। यूरप में कहीं भी जाइये आपको यदि फ्रेंच व जर्मन भाषायें आती हैं आप यूरप भ्रमण का लाभार्जन कर सकते हैं। इटैलियन, ऐंग्लो पुर्तगाली, डच व उत्तरी यूरप के स्केनडेनेविया देशों में भी ग्रेट ब्रिटेन की भाषा अंग्रेजी के बजाय अंतर्राज्यीय भाषा जर्मन या फ्रेंच ही यूरप की लिंग्वा फ्रांका आम तौर पर समझी जाने वाली भाषायें हैं। यूरोपीय संघ यूरो तथा यूरप के देशों में चल रही मुद्रा - यूरो, यूरोपीय देशों की संघ शक्ति का प्रतीक है। यूरोपीय संसद गठन होने के बाद भी यूरोपीय भाषायी राज्यों, राष्ट्रों का अस्तित्व बना ही रहने वाला है। यही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का स्वभाषा प्रेम है। विश्वमानुषी अंजेला मर्केल ने भारत को एक सुनहरा मौका दिया भारत से अपेक्षा की कि उसके जिन केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा की शिक्षा छठी कक्षा से आठवीं कक्षा तक दी जारही थी उसे मानव संसाधन मंत्रालय के शैक्षिक विभाग ने व्यवस्था परिवर्तन का हिस्सा बनाना चाहा। जब यह प्रसंग भारत में तत्कालीन जर्मन राजदूत के माध्यम से चांसलर अंजेला मर्केल के संज्ञान में आई उन्होंने समय बर्बाद किये बिना भारत के प्रधानमंत्री का ध्यानाकर्षण किया। यहां पर महात्मा गांधी द्वारा एक शताब्दी से आठ वर्ष पूर्व इंडियन ओपीनियन के द्वारा महात्मा गांधी ने जो तब अपने मूल नाम मोहनदास करमचंद गांधी नाम से ख्याति प्राप्त थे उन्होंने इंडियन ओपीनियन के जरिये अपने विचार भारत के सार्वभौम राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रख कर अभिव्यक्ति दी। मोहनदास करमचंद गांधी ने हिन्द स्वराज रचना से पहले बर्तानियां में बन्दूक व दूसरे अस्त्र शस्त्रों के जरिये हिंसा का मार्ग अपना कर बर्तानियां में रह रहे उग्रवादियों की बात ध्यानपूर्वक सुनी। लक्ष्य तो युवकों का भी वही था जो मोहनदास करमचंद गांधी अपनी जननी जन्मभूमि के लिये संकल्पित किये हुए थे परंतु उनका मत हिंसा वाला रास्ता अपनाने के पक्ष में नहीं था। मोहनदास करमचंद गांधी की विचार धारा पर उनकी माता श्री पुतलीबाई की रामभक्ति का गहरा असर था। दाशरथि राम मानव मर्यादा चौखट में रहें यह उनकी माता का अपने लाड़ले बेटे जिन्हें वे मोनिया कहती थीं उसके लिये राम का आदर्श था। माता श्री की राम भक्ति तथा मर्यादित जीवन जीने की ममता ने महात्मा गांधी की जीवन शैली का ढर्रा ही राम भक्ति के सांचे में ढाल डाला था। आज अमरीका सहित विश्व के विकसित राष्ट्र अंजेला मर्केल की राजनीतिक परिपक्व शैली को एक विशेष चिंतन पोखर का दर्जा देरहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है पुनर्विवाह करने के बावजूद अंजेला मर्केल ने अपने पहले पति का कुल नाम त्यागा नहीं। जर्मन भाषा का मर्केल शब्द संभवतः संस्कृत शब्द मृगलोचनि अथवा मृगनयनि का प्रतीक है जिसका तात्पर्य यह है कि आंखों की बनावट मृगनयन की सरीखी जो देखते ही यह निश्चय कर लेती है कि दृष्टिकोण क्या हो ? जो दिखा उसे कैसे आत्मसात किया जाये। भारत में इलाहाबाद नाम का एक शहर मुगल बादशाह अकबर की दीन इलाही आस्था का प्रतीक है। वैसे उस शहर का पारंपरिक नाम प्रयाग है। प्रयाग भारत के तीर्थों का राजा है, वहां पंडित नेहरू के एक समकालीन साधु रहते थे। वे उतना ही भोजन करते जितना अंजलि में समाता। लोक उन्हें करपात्री महाराज कहते थे। अंजेला मरकेल महाशया वैसी ही दृढ़निश्चयी फूल के समान कोमल हृदय वाली वज्र के समान कठोर निर्णय लेने वाली विश्वायतन की अधिपति हैं। उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री का ध्यानाकर्षण कर भारत और जर्मनी की भाषायी सारूपता पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। जर्मनी शब्द संस्कृत वाङमय के शब्द शर्मणि का जर्मन स्वरूप है। उन्होंने जो संकेत भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को वर्ष 2014 के उत्तरार्ध में दिया उसे भारत के विदेश मंत्रालय की कूटनीतिक सरोकार में बदलने की तात्कालिक जरूरत है। भारत का विदेश मंत्रालय बर्तानियां, संयुक्त राज्य अमरीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिलीपाइन सहित बर्तानी उपनिवेश रहे अब के स्वतंत्र राष्ट्र राज्यों के साथ अंग्रेजी में कूटनीतिक व्यवहार करता रहे पर जिन राष्ट्र राज्यों की अपनी भाषा है वे अपनी भाषा पर जीवन न्यौछावर करने को तैयार हों। भारत को चाहिये कि पहल अंजेला मर्केल चांसलर जर्मनी के साथ उनके भारत स्थित राजदूत के साथ जर्मन भाषा में पत्र व्यवहार करना तुरंत शुरू करें। भारत में अंग्रेजी सहित हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयाली, गुजराती, मराठी, कोंकणी, बांग्ला, असमी, मइती, नैपाली विभिन्न घटक राज्यों की राजभाषायें हैं। इन भाषाओं के अलावा भारतीय संविधान में संस्कृत, सिंधी, संथाली, बोडो, डोंगरी और भोजपुरी भाषाओं को भाषायी अनुसूची में जोड़ा है। यह संभव है कि भविष्य में सिंधी, संथाली, बोडो, डोंगरी, कश्मीरी और भोजपुरी भाषाओं को घटक राज्यों की राजभाषायें घोषित किया जाये। कम से कम भारतीय घटक राज्यों की वर्तमान राजभाषाओं संस्कृत, प्राकृत, पालि, जर्मन भाषाओं का एक संयुक्त कोष निर्मित किये जाने का तत्काल प्रयास किया जाये ताकि भारत की संविधान सूची की सभी भाषाओं का जर्मन भाषा से नाता जुड़े और भारतीय विदेश मंत्रालय के जहां जहां दूतावास हैं उन राष्ट्र राज्यों की स्वभाषा में उन राष्ट्र राज्यों से पत्राचार करने का रास्ता खोलें। अंजेला मरकेल महाशया ने यह स्वर्णिम अवसर भारत को उपलब्ध कराया है। सबसे बड़ी बात यह है कि उर्दू को छोड़ कर सभी भारतीय भाषाओं की लिपियां तो अलग अलग हैं पर स्वर व्यंजन का उच्चारण एक तरीके का है। इसलिये भारत सरकार के विदेश मंत्रालय को भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध रणनीति, कूटनीति तथा वक्रोक्तियों का मानकीकरण करने के लिये राज्य सरकारों, उनके भाषा विभागों की सहायता से भारतीय लिपियों के स्वर ‘अ’ से लेकर ‘अः’ तक व्यंजनों में ‘क’ से लेकर ‘स’ तक तथा ऋ लृ एवं मराठी अक्षर ‘ळ’ को संयोजित कर भारतीय भाषा (संबंधित लिपि, नागरी लिपि तथा रोमन लिपि में Incyclopedia of All Indian Languages from ‘अ’ से ‘ळ’ तक is all 51 Alphabets) सृजित करनेे के लिये भारतीय भाषायी आयोग का गठन तत्काल करना चाहिये। संबंधित राज्य सरकारों, भाषायी अनुसंधान संगठनों, विश्वविद्यालयों के परामर्श से समेकित भाषायी आयोग का गठन कर भाषान्तरण कार्य को सुरूह बनाने का उपक्र करना चाहिये। वर्तमान में भारत का भाषायी तंत्र अंग्रेजी के इर्द गिर्द घूम रहा है जिससे देश में भाषायी ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। प्रधानमंत्री को चाहिये कि विश्व की विभिन्न भाषाओं में वाणी व भाषा तत्वज्ञ हैं उनसे राय मशविरा लिया जाये तथा लोकवाणी की मौलिकता को नजरअन्दाज न किया जाये। जितनी जल्दी हो सके वर्तमान में जो भारतीय भाषायें घटक राज्यों की राजभाषायें हैं उनका प्रयोग संसद के दोनों सदनों में करने की इजाजत दी जाये तथा प्रत्येक सदस्य को उसकी चाहत वाली भाषा में सांसद द्वारा संसद के सदनों में उपयोग की भाषा का भाषान्तरण तत्काल सुनने को मिले। सांसदों को संविधान सहित संसद अभिव्यक्ति सांसद की चाहत वाली भाषा में उपलब्ध हो। किसी भी लोकप्रतिनिधि सांसद पर कोई भाषा थोपी न जाये। यूरप में लोक आस्था मुख्यतः कैथोलिक अथवा प्रोटेस्टेंट है पर वहां भाषायी राष्ट्र राज्य हैं। आप पेरिस या बर्लिन चले जाइये आपको वहां कोई साइन बोर्ड या परिचय चिह्न केवल फ्रेंच या जर्मन भाषाओं में ही उपलब्ध होगा। वहां जननी जन्मभूमि और मातृभाषा अनुराग चरम पर होने के साथ साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उपलब्ध है। 
अंजेला मरकेल जिन्हें टाइम्स पत्रिका ने ईस्वी सन् 2015 का वर्ष पति कुलाधिपति तथा 1986 के पश्चात तीस वर्ष के अंतराल में टाइम्स पत्रिका ने स्त्री शक्ति का उद्गान किया। मरकेल के व्यक्तित्त्व की अन्य खूबियों के बारे में जो वास्तविकी व व्यावहारिकी राजनीति का वह गुह्यपर्व है जिसे कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी विद्या का सूत्रधार माना है। राजनीति के मूल तत्व को समझने के लिये अपने समर्थकों, सलाहकारों व मंत्रणा दाताओं के समानांतर आन्वीक्षिकी प्रयोग करने वाले राजा अथवा लोकतांत्रिक नेता को सदैव जागरूक रहने के अलावा ‘त्यागात् शांति निरन्तरम्’ को भी अपना लक्ष्य बिन्दु बनाना होगा। यदि विरोधी अथवा जानलेवा दुश्मन जीवनलीला समाप्त करने के भी प्रयास करता हो तब भी निर्भय व निडर होकर अपना रास्ता चुनना ही सफलता की कुंजी है। अंजेला मरकेल जर्मनी की बर्लिन दीवार चुनी जाने के दस वर्ष बाद भी पूर्वी जर्मनी के रूस के प्रभाव वाले जर्मन समाज जन्मीं और उनकी जिन्दगी का उत्कर्ष उनके द्वारा बचपन से साठ वर्ष तक पहुंचने की जीवन यात्रा का रोचक विवरण तथा आज दुनियां आज जिस नाके पर खड़़ी है उसमें अंजेला मरकेल की भूमिका का नान्सी गिव्स व राधिका वर्णित ब्यौरे का संक्षिप्त पर रोचक उद्गान इस पोस्ट में किया जारहा है। मरकेल और हिन्दुस्तान तथा हिन्दुस्तानी बागियों के लिये हिन्दुस्तानी सांस्कारिक जीवंतता के लिये उन्होंने जो रास्ता अपनाया उसका ब्यौरा दिया गया है। भारतीय वाङमय में शर्मन, वर्मन, गुप्तम्, दासम् वर्णाश्रम व्यवस्था के मनुष्यों में कार्य विभाग के चार वर्ण तथा व्यक्ति की जिन्दगी पहले, दूसरे, तीसरे तथा अंतिम चरण आश्रम कहलाते हैं। वर्ण + आश्रम का समुच्चय ही पुरानी हिन्दुस्तानी समाज व्यवस्था थी। ऐसा लगता है यह व्यवस्था जर्मनी व रूस सरीखे देशों में भी विद्यमान थी जिससे अंजेला मरकेल का अंतर्मन प्रभावित हुआ है। कार्ल मार्क्स का चिंतन पोखर यू.एस.एस.आर. याने सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक को लेनिन के मार्फत अस्तित्व में लाया। सोवियत संघ केवल लगभग पौन शताब्दी अथवा न्यून शताब्दी तक ही अस्तित्व में रहा। स्टाालिन के लौह आवरण वाला सोवियत संघ भरभरा कर ढह गया। संयुक्त राज्य अमरीका ने बर्तानी राजकुल से अपना नाता तोड़ कर आज से दो सौ चालीस वर्ष पूर्व चार जुलाई 1776 को जार्जिया के जार्ज वाल्टन, उत्तर कोलंबिया के जान्ह पेन, दक्षिण कैरेबियन के आर्थर मिडिल्टन, मासाचेटस के जान्ह हरकुक, मे लैंड के चार्ल्स कोरल बोरोलियन वाले, वर्जीनिया के कार्टर प्राक्टन, पेन्सिलिनिया के वेन्जामिन्स्स, डेलावेअर के थामस मैलिन, न्यूयार्क के लेविस मोरसिस, न्यूजर्सी के अब्राहम क्लार्क, न्यू हैम्पशायर के विलियम व्हिपल, रहोड आइलैंड के विलियम एलटी, कानेटकट के ओलिवर वालकट इन तेरह राज्य सरीखे इलाके के तत्कालीन राजपुरूषों नेे यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका की सृष्टि की। ये तेरह महानुभाव संयुक्त राज्य अमरीका के समुच्चय पूर्ण निर्माता हैं। आने वाले दस वर्ष पश्चात जुलाई 4 ईस्वी सन् 2026 के दिन संयुक्त राज्य अमरीका अपने निर्माण की दो सौ पचासवीं वर्षगांठ मनायेगा। अमेरिकी संयुक्त राज्य सत्ता बर्तानिया, जर्मनी, रूस, फ्रांस, इटली, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, पुर्तगाल, स्पेन देशों, राष्ट्र राज्यों तथा रोमन साम्राज्य एवं वेटिकन धर्मगुरूमंत्र की तरह उत्कर्ष और अपकर्ष का इतिहास लिये हुए राजसत्ता नहीं है। सोेवियत संघ के धराशायी होने के पश्चात संयुक्त राज्य अमरीका पिछले करीबन पच्चीस वर्षों में विश्व की इकला सत्ता स्तूप कहा जारहा है जिसकी विश्वायतन शक्तिमत्ता का बौद्धिक चातुर्य आख्यान हेनरी किसिंजर अपने ताजा लेखन World  Order में किया है। वाल्टर इसाक्सन, टाइम हेनरी किसिंजर की लेखनी के कमाल को पाठकों को जागरूक बनाने वाली दिग्दर्शक-निर्णायक पुस्तक बताया है। कीसिंजर ने 2005 से जर्मनी की चांसलर पद पर दस वर्ष से आरूढ़ व्यक्तित्त्व अंजेला मर्केल का जिक्र अपनी पुस्तक में नहीं किया जबकि नान्सी गिव्स व उनके सहयोगी मानते हैं कि अंजेला मर्केल विश्ववंदिता नारी शक्ति की प्रतीक हैं। अपनी ताजा पुस्तक जिसे हेनरी कीसिंजर World  Order शीर्षक देते हैं उन्हें संशयग्रस्तता है कि ई.यू.(यूरप यूनियन) दीर्घजीवी भी होगा ? वे भगवद्गीता को हिन्दू क्लासिक कहते हैं पर भगवद्गीता का कृष्णार्जुन संवाद हिन्दू क्लासिक नहीं मनुष्यता मनुष्य के मनन शक्ति तथा छिन्न संशय व्यक्तित्त्व को व्यक्ति में उत्कीर्ण करने वाला संवाद काव्य है। भगवद्गीता भारतीय महाकाव्य महाभारत के भीष्म पर्व का एक छोटा सा हिस्सा है। प्रतीति यह होती है कि जिस अंतरंग प्रसंग को नान्सी गिव्स इसलिये इंगित नहीं कर पायीं क्योंकि उन्हें भारतीय महाकाव्य महाभारत के शांति पर्व का जो आत्मिक अनुभव बर्लिन की दीवार के ढहाये जाने और जर्मन संस्कृति के एकीकरण जिसे स्वयं कीसिंजर भी यूरप का जर्मन कनफेडरेशन कहते हैं, अन्य यूरप राष्ट्र राज्यों को फ्रांस राजसत्ता, स्पेन राजसत्ता, यूनाइटेड किंगडम आफ नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम आफ ग्रेट ब्रिटेन व आयरलैंड, किंगडम आफ डेनमार्क, किंगडम आफ प्रशिया, आस्टेयन साम्राज्य, किंगडम आफ पोलैंड, रूसी साम्राज्य, आटोमन साम्राज्य, रोम का पापल स्टेट, किंगडम आफ स्पेन, किंगडम आफ पिडमांट सरडीनिया, दोनों सिसिलयों के राज्य, नारवे व स्वीडन का संयुक्त राज आदि का उल्लेख किया है। सन् 1815 में वियना में संपन्न कांग्रेसोत्तर यूरप के नक्शे में कीसिंजर पुर्तगाल को नहीं जोड़ा। पुर्तगाल भी बर्तानियां, स्पेन, फ्रांस, डच साम्राज्य की तरह विश्व के अनेक देशों में अपने उपनिवेश कायम करने वाला यूरोपीय राज खानदान था जिसने भारत में गोआ, डमन, डियू तीन इलाकों में भारतीय स्वातंत्र्य 1947 के चौदह वर्ष तक अपना राज चलाया तथा बलात धर्मान्तरण की एक जबर्दस्त मुहिम गोन्डा में चलाई। जर्मनी यद्यपि ख्रिस्ती धर्मावलंबी राष्ट्र राज्य है पर मजहबी दृष्टिकोण विस्तारवादी नहीं साथ ही जर्मन भाषायी विशेषता जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण भारत आये बिना मैक्समूलर को वैदिक ज्ञान जर्मनी में ही अपने बाल्यकाल से ही उपलब्ध होगया। उन्होंने यूनाइटेड किंगडम आफ ग्रेट ब्रिटेन व आयरलैंड के विश्वविख्यात आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ऋग्वेद का प्रकाशन कराया। भारत में ऋग्वेद सहित चारों वेद गुरू-पिता अपने शिष्य-पुत्र को कण्ठाग्र कराता था। सस्वर, सटीक उच्चारण तथा शरीर के हावभाव सहित जिसे आजकल विश्व के अंग्रेजीदां बाडी लैंग्वेज कहते हैं वेदवेत्ता के शरीर में वैदिक वेत्ता ज्ञानक्रिया अपने आप संचारित होती थी। वेदों के संपादनकर्त्ता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने एक बार व्यक्त किया - अहम् वेत्ति, शुको वेत्ति, संजयो वेत्ति वा न वा। पाराशर्य - सत्यवती सूनु कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास पराशर मुनि के पुत्र, शक्ति के पौत्र तथा वशिष्ठ ब्रह्मर्षि के प्रपौत्र थे। उन्होंने पंचमवेद महाभारत अपने बुद्धि विवेक से रचा। महाभारत में अनेक पर्व हैं जिनमें महत्वपूर्ण पर्व शांति पर्व है। ऐसा प्रतीत होता है कि अंजेला मरकेल ने जर्मनी में बर्लिन दीवार 1989 में ढहाये जाने के बाद भी जीवन केे खट्टेमीठे चरपरे समूचे अनुभव 2005 में जर्मनी या कहें संयुक्त जर्मनी के राजतंत्र को परखा है। स्वभाषा पर उनका गहन अधिकार है। वे दूसरी यूरोपीय भाषायें भी जानती हैं परंतु सरस्वती की उन पर अपार कृपा है कि वे अंतरात्मा में स्थित विवेक से स्वयं छिन्नसंशय हैं। अपने राष्ट्र राज्य जर्मनी को भी छिन्नसंशय बना चुकी हैं। आन्वीक्षिकी षडविधा राजनीति तभी सफल होती है जब व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ के त्रिविध नरक का द्वार देखता नहीं है। शत्रु, मित्र, उदासीन सबसे वही व्यवहार करता है जो शाश्वत सत्य का प्रदर्शक है। नान्सी गिव्स ने अपनी उद्भट पत्रकारिता क्षमता से जो फैसला किया कि इक्कीसवीं शती के पंद्रहवें वर्ष की वर्षपति कुलाधिपति अंजेला मरकेल हैं। अगर नोबल पुरस्कार प्राप्तकर्ता हेनरी कीसिंजर जो अब 91 वर्षीय सक्रिय लेखक हैं अगर उन्होंने शतायु जीवन पाया सन् 2025 तक आने वाले नौ वर्षों में अंजेला मरकेल विश्व की महाशक्ति संयुक्त राज्य अमरीका सहित के समानांतर संयुक्त यूरप को अपने स्वदेश जर्मनी सहित राजनीतिक विश्वायतन का महामांगल्य मय केन्द्र बना लेंगी। तुलसी के शब्दों में अंजेला मरकेल के कृतित्व वाले व्यक्तित्त्व को देखते रहिये वे जर्मनी को भारतीय वेदान्त का नान्दीमुख बना कर ही दम लेंगी। कीसिंजर महाशय ने अपनी खोजी पुस्तक विश्वायतन वर्ल्ड आर्डर में ईस्वी सन् 2005 से लगातार जर्मनी चांसलर रहीं अंजेला मरकेल की ओर तर्जनी संकेत नहीं दिया, यह कर्मानुबंधीनि मनुष्य लोके का ही प्रतीक है। 
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