शहद की अद्भुत जीवनदायिनी विशेषता
\मधु त्वाता ऋतायते मधुः क्षरंति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वोषधी।
\मधुनक्तमुतोषसे मधुमत् पार्थिव रजः मधु द्यौ रस्तुनः पिता।
\मधुमात्रो वनस्पतीम्म्धुमां अस्तुसूर्याः माध्वीर्गावो भवन्तु नः।
लास एंजेल्स टाइम्स के मंगलवार 22 दिसंबर 2015 के अंक - सी4 में कैलिफोर्निया की केन्द्रीय घाटी का अलमांद प्रेम प्रसंग ने डारसिटा हनी बी जिसे हम हिन्दुस्तानी भौंरा कहते हैं ब्रज के चौरासी गांवों में गाया जाने वाला भ्रमर गीत ब्रज भाषा का व्यापक क्षेत्र जो मध्य प्रदेश की चंबल घाटी, राजस्थान की मूल ब्रज भूमि से सटे हुए इलाके धौलपुर उत्तर प्रदेश के इटावा, एटा के इलाके जहां ब्रज भाषा ही बोली जाती है, जहां कदम्ब के पेड़ों में भी भौरों के छत्ते लगे हुए रहते थे सूरदास का भ्रमर गीत अब पुराना पड़ गया है क्योंकि जंगलों का सफाया होने से भौरों का प्राकृतिक रखरखाव खेतीबाड़ी, बागवानी के क्षेत्र में कीटनाशक द्रवों के अंधाधुंध प्रयोग ने प्रकृति की अनुपम देन भौरों का शहद, भौरों के छत्ते अब कहीं कहीं दिखायी देते हैं। अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य में वन्य मौन वंश पर गहन अनुसंधानमूलक अध्ययन ने जिसे National Academy of Science ने एक अध्ययन रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित किया है उसमें उन्होंने अपने अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला है कि जंगली मौन वंश की बढ़ोतरी करना एक अत्यंत जरूरी प्रक्रिया है। अध्ययन यह भी प्रतीति करा रहा है कि जंगलों का मौन वंश शहद के व्यापार के लिये सुसज्जित रूप से मौन पालन के लिये मौन बॉक्स, मौनालयों पर ज्यादा ध्यान देने के कारण वन्य मौन वंश जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहायता प्राकृतिक पराग संवर्धन के द्वारा खेतीबाड़ी की उपज बढ़ाता है उसे व्यावसायिक मौनपालन हिन्दुस्तान के हिमालय तथा तराई के इलाकों के मौनपालन मुख्य तथा एपिस मेलिफेरा जो हिमालयी व उप हिमालयी परंपरागत मौन वंश एपिस इंडिका से आकार में बड़ी होती है और शहद भी ज्यादा मात्रा में उपलब्ध कराती है। हिन्दुस्तान में शहद के व्यापारिक उत्पादन करने वाले एपिस मेलिफेरिया मौन पालकों व भारत के हिमालयी राज्य जम्मू कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, नगालैंड, बंगाल, बिहार, त्रिपुरा तथा अरूणाचल के वन व कृषि मंत्रालयों का ध्यानाकर्षण किया जाना जरूरी इसलिये है कि संयुक्त राज्य अमरीका जो कृषि उपज संवर्धन के लिये मौन परागण का विशेष तौर पर वन्य मौन परागण का लाभार्जन कराना आवश्यक मानता है। कैलिफोर्निया में जो अध्ययन किये गये हैं उनकी तकनीकी भाषा में कहा गया है कि भौंरे जिन्हें अमरीकी तकनीकी समाज Wild Bee संज्ञा देता है अध्ययन रपट यह इंगित कराती है। अध्ययन रपट ने यह प्रतीति कराई है कि 139 काउंटियों (भारत के संबंध में गांव) जहां वन्य मौन मात्रा कम है, मौन परागण की जरूरत बहुत अधिक है रपट की मान्यता यह बनी है कि परागण का यह असंतुलन ज्यादा है। अमरीकी ऊपरी पठार, मिसिसिपी का निचला क्षेत्र नदी घाटी वाला इलाका तथा टेक्सास, कैलिफोर्निया, ऐरिजोना व वाशिंगटन ऐसे इलाकों में से हैं। वरमाउंट विश्वविद्यालय भू क्षरण और भू स्खलन विशेषज्ञ मिस्टर टेलर रिकेटस का मत है कि उच्च किस्म की मूल्यवान फसलों को परिस्थिति विज्ञानी रिकेटस के अनुसार प्रभावित होना प्रत्यक्ष प्रमाण है। वन्य मौन Wild Honey Bee की उपादेयता के बारे में कैलिफोर्निया में जो अध्ययन संपन्न हुआ तथा यह प्रतीति हुई कि समूचे संयुक्त राज्य अमरीका में Wild Bee अध्ययन तथा Wild Bee परागण से विभिन्न फसलों की उत्पादकता में कितना अनुकूल प्रभाव पड़ता है यह देखे जाने की तात्कालिक जरूरत है। संयुक्त राज्य अमरीका का मौन पालन इतिहास केवल अढ़ाई सौ वर्ष पुराना है जबकि भारत का मौनपालन सृष्टि के शुरूआती समय से निरंतर चलता आरहा उपक्रम है। चरक का कहना है ‘सद्यः शक्तिप्रदो मधुः’ मधु तुरंत ही शरीर में शक्ति संचार करता है। अमरीकी राष्ट्रपति भवन ह्वाइट हाऊस ने गत वर्ष भी मौन पालन के क्षेत्र में अमरीका में होरही अनदेखी की तरफ ध्यानाकर्षण किया था। इस ब्लागर ने तत्कालीन सरकार को भारत में मौन पालन परागण उपज बढ़ाने सरसों सब्जी दालों फलों आदि की पैदावार बढ़ाने में परागण महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकता है। अंग्रेजी भाषा में Bee नाम से संबोधित मौन वंश को हिन्दुस्तान के ज्यादा हिस्सों में मधुमक्खी नाम से जाना जाता है पर मानसखंड व केदारखंड के हिमालय वाले क्षेत्रों में मधु को ‘मौ’ तथा मधुमक्खी को मौन कहा जाता है। अमरीकी राष्ट्रपति महाशय ने अपने प्रशासन व संयुक्त राज्य अमरीकी राज्यों का ध्यानाकर्षण करते हुए वर्तमान में संपन्न अध्ययन को आधार मानते हुए जिसमें 2008 से 2013 तक छः वर्षों में 1,40,000 एकड़ भूमि की विभिन्न फसलों पर परीक्षण हुआ। अलमंद उद्यमिता के तीन अरब डालर भारतीय मूल्य में 180 अरब रूपये बाकी उद्यमिता में से लगभग दस लाख मौनालयों का वार्षिक किराया भारतीय रूपये में एक बी हाइव का सालाना किराया रूपये 14340 माहवारी किराया लगभग 1200 रूपया याने एक दिन का किराया लगभग 40 रूपये। संयुक्त राज्य अमरीका का कृषि प्रशासन 70 लाख एकड़ भूमि में वन्य मौन Wild Bee के द्वारा परागण करने का पक्षधर है। अमरीका की कृषि बागवानी उपज की वृद्धि के लिये समूचे राष्ट्र में अभियान चला कर अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा किये गये आह्वान को अमरीकी प्रशासन जमीनी स्तर पर मौन पालन की उपलब्धियों का लाभार्जन करना चाहते हैं। अब भारत में मौन पालन की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया जाये पौने आठ वर्ष पहले एम.एस.एम.ई. मंत्रालय के तत्कालीन सचिव की उपस्थिति में पुणे महाराष्ट्र में मौन पालन के मुख्य आधार को लेकर तीन दिन की वर्कशाप का आयोजन खादी ग्रामोद्योग आयोग ने किया। खादी ग्रामोद्योग आयोग में ग्रामोद्योगों में मौन पालन Bee Keeping एक उद्योग है। आयोग द्वारा मौन पालन को संवर्धित करने का संकल्प अ.भा.खा.ग्रा. मंडल के अध्यक्ष 1.4.1957 के पश्चात केन्द्रीय कानून KVIC ACT LXI 1956 के अनुसार 1.4.1957 से वैकुंठ ल. मेहता ने बी कीपिंग पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने पुणे में सेंट्रल बी रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की। मौन पालन उद्योग को संगठित ग्रामोद्योग के रूप में विकसित करने के लिये एस.के. कल्लापुर को उद्योग संगठन कार्य सौंपा। भारत सरकार का कृषि बागवानी मंत्रालय भी मौन पालन उद्यमिता का संवर्धन चाहता है परंतु भारतीय कृषि मंत्रालय के मौन पालन को बागवानी से जोड़ कर रखा है। खेती बागवानी के काम में भारत सरकार कृषि बागवानी उत्पादन बढ़ाने के लक्ष्य को ध्यान में रख कर कृमि कीट पतंग सरीखे जीवों से खेती बाड़ी की सुरक्षा के लिये कीटनाशक द्रव्यों का छिड़काव करती हैै। हिन्दुस्तान व जर्मनी की सरकारों में एक समझौता हुआ इसे इगाडा - Indo-German Agricultural Development Assistance कहा जाता रहा। इस योजना को कुमांऊँ की एपिस इंडिका प्रजाति की मौन वंश को पूरी तरह नाश कर डाला। मौन पालों की हजारों कालोनियां नष्ट होगयीं। इगाडा का मुख्य उद्देश्य फल उत्पादन के क्षेत्र में आधुनिक वैज्ञानिकता का सहयोग लेना था। कीटनाशक द्रव्यों के अंधाधुंध छिड़काव से कुमांऊँ का मौन पालन चौपट होगया। यहां तक कि जंगलात महकमा भी जंगल में पेड़ पौधों की सुरक्षा करने के लिये कीटनाशक द्रवों का छिड़काव करने लगा। जंगलों में भौंरा, पय्यों, झिमौड़, अग्नार आदि जंगली मौन वंश पर भी असर पड़ने लगा। ये जंगली मौन वंश जहां औषधि गुण वाले फूलों फलों के परागण से अपने छत्तों में शहद बनाते उस शहद की निकासी के भी अलग अलग तरीके थे। सारा शहद एक ही बार मिल जाये इसलिये भौंरा सहित अत्यंत विषैले बर्रे, अग्नार, झिमौड़ा व पय्यो नाम से जाने जाने वाले हिंस्रक मौन वंश पर भी कीटनाशक द्रवों का प्रभाव पड़ा। उत्तर प्रदेश सरकार व 2000 के पश्चात उत्तराखंड सरकार ने एपिस इंडिका को जीवन दान देने के बजाय एपिस मेलिफेरा का संरक्षण फुटहिल्स व तराई भाबर में शुरू किया ताकि एपिस इंडिका के वंश नाश से शहद आपूर्ति में जो भयावह रूकावट आयी सरकारें जवाबदेही से बचने के लिये ज्यादा शहद उत्पादन देने वाली एपिस मेलिफेरा के विस्तार में रम गये।
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय और पंजाब कृषि विद्यालय ने जम्मू, पंजाब की हिमालयी तलहट में एपिस मेलिफेरा के जरिये शहद उद्यमिताओं को शहद आपूर्ति का रास्ता चौड़ा किया परंतु हिमालयी गांवों से मौन पालन - विशेष तौर पर एपिस इंडिका का गुणवत्ता वाला शहद उत्पादन संबंधित सरकारों के लिये कभी भी मुख्य उद्देश्य नहीं रहा गौण विषय बन गया। ऐसी विषम परिस्थिति में कौन सा रास्ता अपनाया जाये यह यक्ष प्रश्न सामने मुंह बाये खड़ा है। एपिस मेलिफेरा व जरसी गायें भारतवासियों के प्रिय होगये हैं जिससे पंरपरागत भौंरा - भ्रमर व देसी गाय ने हिन्दुस्तानियों से मुंह मोड़ लिया। लगता है देसी गायों की साठ महत्वपूर्ण नस्लें भी अब केवल 24-25 ही शेष रह गयी हैं। इसलिये पहली जरूरत यह है कि हिन्द कृषि व पशुपालन मंत्रालय एपिस इंडिका व देसी गाय का महत्व समझने के लिये ब्रजभाषा में लिखित काव्य व साहित्य का पाठन करें। ब्रज के हर सांसद के हाथ में भ्रमर गीतसार व सूरदास का कृष्ण साहित्य रहे। वे भ्रमर गीत को पढ़ें व संवाद करें। देसी गाय का दूध, दही, घी, गोबर व गोमूत्र का उपयोग करें और यह प्रतिज्ञा कर लें कि शहद खायेंगे तो मेलिफेरा का नहीं एपिस इंडिका का ही सेवन करेंगे। जरसी गाय व संकर गाय का भी दूध, दही, घी नहीं खायेंगे। यह प्रतिज्ञा वे लोग पहले करें जो ब्रज में रहते हैं फिर आसेतु हिमाचल में देसी गाय का दूध, दही, घी व एपिस इंडिका का शहद ही उपभोक्ताओं को मिले ऐसा संकल्प किया जाये। भारत के वर्तमान कृषि मंत्री ने यदि अब तक भ्रमर गीत नहीं पढ़ा हो तो शीघ्र पढ़ें तथा अपने महकमे के हर अफसर को भंवरे का शहद व देसी गाय का दूध कैसे मिले इस पर राष्ट्रव्यापी बहस शुरू की जाये जिस तरह अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा महाशय ने संयुक्त राज्य अमरीका केे मौन पालन में Bee Hive मौनालयों के बजाय Wild Bee प्रोत्साहन का लक्ष्य तय किया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, कृषि मंत्रियों एवं वन मंत्रियों के साथ एक संयुक्त बैठक कर हिन्दुस्तान की मौन वंश संरक्षा का राजविद्या, राजगुह्य मार्ग उसी तरह सुनिश्चित करें जिस तरह वासुदेव कृष्ण ने कौंतेय अर्जुन को गीता का सार्थक संदेश सुनाते हुए अर्जुन के विषाद-अवसाद को कौंतेय के मन से उखाड़ डाला। उसे स्वकर्त्तव्य का बोध कराया। हिन्दुस्तान के राज्यों के मुख्यमंत्री महानुभावों को अपने अपने राज्यों की श्री वृद्धि के लिये मौन पालन को वरीयता देते हुए केन्द्रीय सरकार के संकल्प को छिद्रहीन करना होगा। तिलहनों और दलहनों का उत्पादन बढ़ाने में भी मौन वंश की उपस्थिति, विभिन्न प्रकार की दालों व तिलहन बीजों में भंवर परागण से उत्पादन पहले वर्ष दुगुना, दूसरे वर्ष चौगुना, तीसरे वर्ष आठ गुना तक बढ़ाने से ही देश की दलहन-तिलहन उपज पर किसान और किसान हितैषी समूह का भाग्य निखार आयेगा। राष्ट्रपति ओबामा की Wild Bee Promotion के लिये प्रधानमंत्री जी को प्रत्येक मुख्यमंत्री जी का ध्यानाकर्षण करना होगा कि किस तरह उनके राज्य की कृषि, बागवानी, दलहन-तिलहन उत्पादन में पराग निषेचण से बढ़ोतरी हो सकेगी। पहला काम तो यह है कि भारत सरकार यह मालूम करे कि देश में Wild Bee या Dorsitta Honey Bee हर राज्य में कहां कहां हैं। क्या उन भंवर छत्तों का अवलोकन संबंधित राज्य के सर्वोच्च कृषि विशेषज्ञ प्रशासनिक अधिकारी कृषि सचिव मुख्य सचिव कृषि मंत्री जिन्हें हिन्दुस्तान के अंग्रेजीदां लोग Wild Bee नहीं Dorsitta Honey Bee कहते हैं गांवों के देहाती कृषक Dorsitta Honey निकासी करने वाले, नट-पत्थर कट लोग जंगलों में जो मौन छत्ते पेड़ों पर हैं उनका दोहन करते समय ‘मौन लक्ष्मी’ जलायी न जाये। उन्हें परागण का मौका मिले। अनुभवी नट-पत्थर कटों का अनुभव भी लाभार्जित किया जाये। मौन पालन पर राष्ट्रीय श्वेत पत्र जारी करने का जिम्मा खादी ग्रामोद्योग आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष श्री विनय कुमार सक्सेना जी को सौंपा जाये। वे अपने तकनीकी सहयोगियों की मदद से सबसे पहले स्वयं भारत के पारंपरिक मौन पालन के समानांतर आधुनिक तथा वैज्ञानिक मौन पालन के नाम से संबोधित बी कीपिंग Bee Keeping पर पंडित आर.एन.मुट्टू के जमाने से जो प्रयास हुए हैं पारंपरिक मौनढाड़ा(Log Hive) स्वामी प्रणवानंद सरस्वती द्वारा विकसित Wall Hive जिसे पारंपरिक समाज मौन घरवा कहता है, मौन बक्से ए. व बी. हर जिले हर गांव गांव में कितने मौन वंश छत्ते किस किस प्रकार के हैं। अमरीकी Bee Keeping के अनुसार वहां दस लाख छत्ते हैं। भारत के मौन छत्तों की सही सही संख्या अगर 2011-12 में संपन्न जातिगणना में उद्यमिता गणना में ठमम ज्ञममचमत के तौर पर हुई हो तो उसका समीक्षित स्वरूप मालूम किया जाये। प्रधानमंत्री जी श्री विनय कुमार सक्सेना अध्यक्ष खादी ग्रामोद्योग आयोग मुंबई से पूछें कि 8-9 फरवरी 2008 को पुणे में संपन्न Forest Based Industries Workshop के पश्चात खादी ग्रामोद्योग आयोग ने अद्यतन भारत में कितनी मौन वंश प्रजातियां, उन्नत मौनालय - Bee Hive in Bee Boxes, Wall Hive, Log Hive तथा विभिन्न जंगलातों, सिविल जंगलों, पंचायती जंगलों में Dorsitta Hive कहां कहां हैं ?
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की एक ब्रज प्रांत शाखा है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वितीय सर संघ संचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जी को लोग गुरू गोलवलकर के नाम से ज्यादा पहचानते थे। गोलवलकर जी की यह विशेषता थी कि वे महात्मा गांधी की तरह हिन्दुस्तान के हर हिस्से की सांस्कृतिक महत्ता को हृदयंगम किये हुए विज्ञ व्यक्तित्त्व के स्वामी थे। विचारभेद के मर्मज्ञ थे उनका गुरूमंत्र ही कांच व हीरे के अंतर को जानना था। आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उनमें परंपरागत भारतीय वाङमय के ज्ञान की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के काशी, अवध व ब्रज प्रांतों को वरीयता दी। अवध और ब्रज दोनों सगुण वैष्णव भक्ति के क्षेत्र थे। अवध प्रांत के उनके तुलसी की रामभक्ति, ब्रज प्रांत की सूरदास की बालकृष्ण भक्ति के मर्म को समझा था। कृष्ण भक्ति, रामभक्ति की अपेक्षा केवल पांच हजार वर्ष पुरानी है। आज भारत में कृष्ण भक्ति का ही भक्ति का राजमार्ग है। इसलिये ऊधो माधो का सत्पथ अपनाने की तात्कालिक जरूरत है। ब्रजभाषा का भ्रमर गीत आधुनिक हिन्दुस्तान को विश्व का समर्थ राष्ट्र निर्मित करने की क्षमता रखता है इसलिये भ्रमर गीत पढ़िये। भंवरे कैसे शहद निर्मित करते हैं प्रत्यक्ष अनुभव लीजिये। मधु, शहद, मौ के बारे में एक बिन्दु और है। मुजफ्फरपुर और देहरादून का लीची शहद नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत जिन पांच जिलों को सांस्कृतिक कुमांऊँ कहा जाता है वहां का च्यूरा शहद अत्यंत लाभकारी एपिस इंडिका सृजित शहद है जो इस धरती में अमृततुल्य प्रभावोत्पादक है। शर्त्त केवल इतनी ही है कि इन शहदों को एपिस मेलिफेरा शहद से मिला कर सेवन न किया जाये। आइये हिमालय का एपिस इंडिका शहद चखिये। मौन वंश को सूरदास के भ्रमर गीत से जोड़िये। अनाज, दाल, तिलहन तथा औषधगुण वनस्पतियों के पेड़ पौधों और फूलों में परागण प्रक्रिया से वातावरण को जीव हितकारी बनाने में अपना हाथ बंटाइये। जितनी जल्दी हो अपने नजदीकी पेड़ पौधों कन्दराओं गुफाओं में लगे मधुमक्खी - मौन छत्ते का लाभार्जन करने के सभी उपायों में अपनी प्रतिभागिता संपन्न कीजिये। सरकार तथा शहद की विशेष तौर पर भौंरा जिसे अमरीकी इंटोमोलोजिस्ट एपिकल्चर विशेषज्ञ Wild Bee कहते हैं अमरीकी राष्ट्रपति Wild Bee पर विशेष ध्यान देने के लिये स्वयं ह्वाइट हाऊस में प्रयत्नशील हैं। भारत का मौन पालन तथा भौंरों का यत्र तत्र सर्वत्र अपने छत्ते पेड़ों में लगाने जो लाभ परागण से खेती बाड़ी को होता है उस पर भारत के प्रधानमंत्री स्वयं पहल करें ताकि गांव के लोगों की आमदनी बढ़ाने में हाथ बुनाई, चर्खा कताई, हाथों की दस्तकारी, करघे पर कपड़ा बुनाई वगैरह छोटे छोटे समझे जाने वाले उद्यमों के प्रति भारत संघ के मुख्यमंत्रियों का ध्यानाकर्षण कर सर्वोपरि प्राथमिकता जंगलों, सिविल जंगलों गांव के बागों में जो पारंपरिक मौन वंश जिसे अमेरिकी समाज Wild Bee कहता है।
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